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बुधवार, 9 जुलाई 2014

बस स्टॉप से.…………… !

आई आई टी सैक बस स्टॉप



                     
  

                      एक मध्यम वर्गीय इंसान के लिए बस स्टॉप एक  ऐसी जगह है , जहाँ से सब चल देते है गंतव्य को और फिर वापस अपने घर को।  हाँ आने और जाने के ये  बस स्टॉप अलग अलग होते हैं और जाने के समय का मूड और लौटने के समय का मूड भी अलग अलग होता है।  ऑफिस या स्कूल या कॉलेज कहीं भी जाना हो।  जाते समय बस एक मन केंद्रित होता है कि जल्दी से पहुँच जाय।  कल का कुछ काम बाकी  है   उसको पूरा कर लेंगे - आज के लेक्चर पर कुछ खास देख लेंगे।  प्रेजेंटेशन है तो कुछ और खोज कर उसमें शामिल  कर लेंगे. 
                               यही बस स्टॉप नए नए रिश्तों के गढ़ने का एक स्थान भी बन जाता है।  हम एक  दूसरे को अच्छी तरह से जानने लगते हैं।  घर की , बाहर की , रिश्तों की और बच्चों की सारी बातें शेयर होने लगती हैं।  अब जब कि मैं बस स्टॉप छोड़ चुकी हूँ लेकिन फिर मन हुआ कि  ३ साल बाद फिर  बस स्टॉप से बस में चढ़ कर आया जाय कितने लोग अभी तक हैं  कितने कहीं और चले गए।  
                                  मैं आई आई टी कभी बस से गयी नहीं क्योंकि बस बहुत जल्दी जाती है और मेरे घर के रुट पर कोई बस आती ही नहीं  इसलिए मैंने हमेशा जाने के लिए खुद का साधन चुना और लौटने में स्टाफ बस लेती रही क्योंकि वहां से लौटने समय तो निश्चित होता था।   दिन में एक फ्रेंड के घर गयी थी , उनके पतिदेव ने कहा कि वो गाड़ी से छोड़ देते हैं मैंने मना कर दिया।  सोचा  बहुत दिन बाद फिर एक बार बस से जाते हैं और वह भी समय से पहले बस स्टॉप पहुंचा जाय।  बस स्टॉप की ओर  बढ़ते बढ़ते कितने साथी मिलने लगे --
- 'अरे मैडम आज कहाँ से दर्शन हो गए  ?' 
-' मैडम जी कैसे आप बिलकुल से गायब हो गयीं ?'
-'आंटी हम आपको बहुत मिस करते हैं। '
-'आपको पता है आपके डिपार्टमेंट के ऑफिस में जो रजनी थी न , जिसका बेटा आपकी लैब में था , अचानक नहीं रही। '
-मिसेज बहरानी भी ऐसे ही अचानक नहीं रहीं। ' 
                               मुझे साथ आने वाली सभी वर्ग की महिलायें , स्टूडेंट्स , रिसर्च से जुड़े लोग सब से एक लगाव था।  जब कि  उनमें से मेरे साथ काम करे वाला कोई भी नहीं था।  इन तीन सालों में किसी के बच्चे का सिलेक्शन हो चूका था , किसी की पढाई पूरी हो चुकी थी और किसी की शादी हो चुकी थी।  जिनके बच्चे छोटे थे वे स्कूल जाने लगे थे।  सबके डिटेल्स ले नहीं  सकती थी।  फिर भी कुछ कहानियां बन चुकी थी और जिनके बारे में शुरू से जुडी थी , सुनकर दुःख हुआ।  वे कहानियां जो बस स्टॉप से जन्मी  हो  -  सिलसिला सा बना और फिर उस सिलसिले को आगे ले चलने का मन हो रहा है।  कुछ नाम , कुछ जीवन और कुछ लोग जिन्हें कभी किसी ने तवज्जो दी ही नहीं कुछ तो ऐसा था जो लिखा जाय। कुछ नाम जिनके जीवन के संघर्ष , झंझावातों से झूझते हुए अपनी कश्ती खींचते हुए लोगों की एक तस्वीर , एक झलक प्रस्तुत करने का मन हुआ सो आगे उनके बारे में  लिखना है जो यथार्थ है और कटु भी।  फिर मिलते हैं इसी बस स्टॉप पर ……………\\

शनिवार, 5 जुलाई 2014

विडम्बना !

                                             जीवन कर्मभूमि है और इस पर कर्म सभी करते हैं - फिर चाहे वे धर्म और नीति संगत हों या फिर असंगत।  सब अपने घर परिवार के लिए ही कमाते हैं भले ही उनका तरीका कोई भी हो लेकिन वह तरीका इस रूप में फलित होगा ये अगर इंसान जान ले तो फिर गलत रस्ते पर चलने की सोचे ही नहीं। 
                                            हमारे परिवार से जुड़ा एक परिवार , आज  से नहीं बल्कि हमारे ससुर जी के ज़माने से - मुखिया उम्र में बहुत बड़े हैं लेकिन कुछ ऐसा है कि  हम उन्हें बड़े भाई की तरह मानते हैं  और उनके बच्चे हमें भाई तरह।  जीवन तो उन्होंने गाँव से निकल कर एक स्कूल टीचर की तरह  शुरू किया और ख़त्म भी किया लेकिन बीच में जो रास्ते दूसरी और मुड़  गए तो फिर पलट कर नहीं देखा।  वे भाग्यवश एक हाउसिंग सोसायटी के सचिव बन बैठे और फिर वारे न्यारे होने दीजिये।  करोड़ों  की कमाई तीन बेटे अच्छी शिक्षा का प्रयास किया लेकिन कोई कुछ कर नहीं नहीं पाया जरूरत भी नहीं थी।  करोड़ों की कमाई आखिर थी किसके लिए ? हर एक का ये प्रयास की पिताजी हमें ज्यादा दें।  खैर सबके खर्चे वह उठाते रहे और बेटे दलाली में फंसे कारनामे करते रहे।  फिर भी घर में आने वाले किसी भी रिश्तेदार को उस कोठी में रहने की जगह तो दूर एक कप चाय भी नसीब नहीं थी।  बेचारे सड़क से ढाबे से चाय माँगा कर पिलाते और खाने के लिए होटल ले जाते। 
                                       सारे भाई इस बात में उसको ज्यादा देते हो , एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगते रहते और इसके बाद भी खाना उन लोगों को कौन  दे?  या फिर एक माँ को दे और दूसरा उनको दे , जबकि सबकी घर गृहस्थी का इंतजाम वह ही करते थे .  उनका ये सफर उस समय ठिठक गया जब एक दिन कहीं  जाते वक़्त उनको ब्रेन हैमरेज हो गया और वह भी किसी नर्सिंग होम के  करीब।  खैर पैसे की कमी न थी या फिर कर्मों के कुछ फल देखने बाकि रहे होंगे - चार महीने कोमा में रहने के बाद भी वह बच गए और घर आ गए।   पिछले तीन साल से बिस्तर पर हैं।  पैसे ख़त्म होते चले जा रहे हैं फिर भी कहते हैं न कि  मरा हुआ हाथी भी सवा लाख का होता है।  पत्नी और एक नौकर के सहारे गुजर रहे थे दिन - इसी बीच एक बेटा अचानक कैंसर के शिकार हुआ और चल बसा।  पत्नी  के लिए तो सदमा सहन करने के काबिल न था और फिर पति की हालत से चिंतित रहती।  वह आधी स्मरण शक्ति खो चुके हैं लेकिन फिर भी बेटों की चिंता रहती है। 
                                     फिर अचानक एक दिन पत्नी बेहोश हो गयीं और उनकी चेकअप हुआ तो पता चला कि उनको ब्रेन ट्यूमर है।  उनका ऑपरेशन किया गया वह कैंसर  बन चूका था।  कल जब उनको देखने हॉस्पिटल गयी तो उनके पास किराए की एक नर्स थी और दूसरी रात में रहती है।  बेटा दिन में एक दो बार आ जाता है।  बताते चले की उनके परिवार में उनकी ही कमाई से पलने वाले दो बेटे बहुएं , एक युवा पोता , पोती हैं लेकिन माँ के लिए किसी के पास वक़्त नहीं है।  किराए की नर्सों के सहारे अपने दिन पूरे कर रही हैं।  अब इस समय में पति घर में नौकर के सहारे और पत्नी अस्पताल में दूसरों के सहारे।करोड़ों रुपये कमाए , एक प्लाट दो दो लोगों को बेच कर जालसाजी की।  सब कुछ ख़त्म हो रहा है।  हाँ इतना जरूर है कि बेटों के लिए इतना कमा कर रख दिया कि वे  जीवन ऐसे ही गुजार  सकते हैं।  उनके हिस्से में क्या आया ? अपने बेटे भी तो नहीं आये। 
                                    
   यही तो कहा जाएगा -- 'जो औरों की खातिर जिए मर मिटे पूछती हूँ उन्हें क्या मिला ?'

गुरुवार, 2 जनवरी 2014

अम्मा की तृतीय पुण्यतिथि !

           
                         आज अम्मा की तृतीय पुण्यतिथि है लेकिन लगता है कि कल तक तो अम्मा हमारे साथ थी।  वह नहीं हैं तो क्या कुछ बातें ऐसी हैं जो हमें उनकी याद उस अवसर पर जरूर ही दिला जाती है। 
                          नए नोटों को रखने की आदत थी पुराने नोट उनके पर्स में जा ही नहीं सकते थे अगर कभी पेंशन में पुराने नोट आ गए तो वह उन्हें अपने तकिये के नीचे रख लेती और जब जेठ जी की  तनख्वाह मिलती तो उनसे खरे खरे नोटों में बदलवा लेती थी।  एक नयें नोटों का पर्स और दूसरा रेजगारी का।  उन्हें बड़ी ख़ुशी होती जब वह किसी को भी अपने पर्स से नए नोट निकल कर देती। 
                           जब  हमारी बेटियां घर से बाहर पढने के लिए गयी तो उनके जाने से पहले दादी टीका जरूर करती और उनको नोट देती और साथ ही कुछ रेजगारी भी देती कि रास्ते  में चाय पी लेना ये पैसे काम आयेंगे।  उनके सामने हमारी पाँचों बेटियां घर से बाहर पढने के लिए जा चुकी थी।  मजाल है कि कोई भी बेटी आये और दादी उसके जाने के पहले टीका न करें।  अगर लेट नाइट की ट्रेन है तो वह बैठी रहती जब जायेगी तब टीका करेंगी उसके बिना तो जाना सम्भव ही नहीं था।  जब उनकी उम्र नब्बे के ऊपर हो गयी तो  बेटियां कहतीं कि दादी आप टीका कर दीजिये हम अभी जा रहे हैं ताकि उन्हें बहुत रात तक बैठ कर इन्तजार न करना पड़े।  
                               हमारी कोई भी बेटी घर से बाहर बगैर टीके के तो  गयी ही नहीं।  अब जब भी बेटियां आती हैं और जाती हैं तो हमारी टीका करने की हिम्मत ही नहीं होती है कि ये काम तो अम्मा ही करती थी।  फिर ये  ख़त्म ही हो गया।  उन्हें अपनी पोतियों की शादी देखने का बड़ा शौक था लेकिन उनके सामने सिर्फ एक बेटी की शादी हो पायी और वह भी हमने बेंगलोर जा कर की थी तो अम्मा उतने दूर नहीं जा सकती थीं और उसके एक साल बाद वो चली गयीं।  लेकिन वो हमारे साथ आज भी हैं यादों में - अपनी आदतों के साथ और आशीर्वाद के साथ।  आज उन्हें अपने श्रद्धा सुमन इसी तरह अर्पित करती हूँ। 

रविवार, 20 अक्टूबर 2013

बाबूजी की 22 वीं पुण्यतिथि !




            २२ वर्ष  बाबूजी को गए हुए ,  लेकिन वे अपने स्वभाव और सिद्धांतों से हमारे साथ आज भी हैं।  आत्मनिर्भर , कर्मठ और स्पष्टवादी  होने के कारण वे अपनी अलग छवि रखते थे।  कानपूर के उर्सला हॉर्समैन हॉस्पिटल में फार्मासिस्ट के पद पर जीवन भर काम किया।  कई बार स्टोर इंचार्ज बने लेकिन मजाल है कि कोई एक गोली भी बगैर डॉक्टर के पर्चे के बगैर ले जाय।  परिणाम वही अपने जीवन में सिर्फ यापन ही कर सके।  मित्रों के शौक़ीन बाबूजी ने कभी बेईमानी की बात नहीं जानी।  अपने जीवन में ये भी नहीं सोचा कि  यहाँ से रिटायर्ड होकर कहाँ रहेंगे ? कोई घर नहीं , कोई जमीन नहीं और रिटायर होने के बाद नियमानुसार जितने दिन का समय मिला रहे और फिर तुरंत बेटों को आदेश के किराये का मकान  खोजो। जब की उनके साथियों में उनसे पहले अपने एक नहीं दो दो मकान तैयार करवा लिए थे।  वैसे इस समय तक मैं उनके परिवार में शामिल भी नहीं हुई थी। 
                        किराये के मकान में कभी रहे नहीं थे सो मकान मालिक की दखल से परेशान और उनके भाग्य ने साथ दिया और उनको कानपूर विश्वविद्यालय में डिस्पेंसरी संभालने का काम मिल गया और वे फिर सरकारी आवास में आ गए।  मैं उनके परिवार में यही शामिल हुई थी।  उनके बेटी नहीं थी सो उनकी बहुएँ  ही उनकी बेटियां बनी लेकिन सख्त अनुशासन ने हमें अनुशासित कर दिया था।  वैसे अपने मायके में कौन इतना अनुशासित रहता है ? समय से चाय , दूध और खाना इसमें कोई ढील पसंद नहीं थी।

                          वे अपनी 80 वर्ष की आयु तक अपने सारे  काम स्वयं करते थे।  अपने कपडे धोने से लेकर बागवानी तक।  बस जीवन के ४ महीने उन्होंने आश्रित होकर गुजारे  क्योंकि उनको कैंसर हुआ था और आखिरी चार महीने वे खुद कुछ कर पाने में असमर्थ रहे।  मुझे याद है कि उनसे कुछ महीने पहले १० अगस्त को मेरे पापा का अकस्मात् निधन हो गया था और मुझे खबर तक नहीं मिली क्योंकि टेलीग्राम आया ही नहीं था।  जब मैं लौट कर आई तो उन्होंने गले से लगा लिया मैं बहुत रोई तो उन्होंने सिर  पर हाथ  फिरते हुए कहा - "जाने के दिन तो हमारे थे वो कैसे चले गए ? मैं तो ये भी नहीं कह सकता कि मैं तो हूँ , मेरा क्या ठिकाना ? "
                            शायद मैं दुनियां में अकेली होऊँगी जिसके सिर से दोनों पिताओं का साया एक साथ उठ गया।  अब बस यादें हैं - आज दिन तो रुला ही जाती है।  

सोमवार, 30 सितंबर 2013

दोहरी मानसिकता : आखिर कब तक ?

मेरी एक सहेली वर्षों तक मेरे साथ काम करती आ रही थी।  हम एक दूसरे के साथ करीब २४ साल काम किया है।  उनकी मानसिकता से  मैं परिचित तो अच्छी तरह हूँ।  उन्होंने अपनी बेटी की शादी अंतर्जातीय की और बेटे की खुद खोज कर सजातीय।  फिर शुरू हुआ उनके परिवार में शादी का सिलसिला।   साथ रहे तो एक दूसरे के परिवार ससुराल और मायके पक्ष के   विषय में अच्छे से परिचित हैं।  हमने  हर सुख दुःख भी बांटा है - चाहे मेरे पापा का निधन हो या उनकी माँ के निधन की घडी। 
                          अब दोनों ही कम मिल पाते हैं लेकिन संपर्क में तो रहते ही हैं।  उनके परिवार में किसी लडके की शादी होनी है तो उन्होंने मुझसे अप्रत्यक्ष रूप से कहा की - 'रेखा कोई अच्छी सी कायस्थ लड़की बताओ , देवर के बेटे के लिए खोज रहे हैं। '
                 मैंने सहज रूप से लिया लेकिन बाद में कि  वह लोग लड़कियों की शादी तो कहीं भी कर सकते हैं लेकिन अपने घर में सजातीय लड़की ही चाहते हैं क्योंकि वह अगर दूसरे जाति की होती तो उसके तौर तरीके , संस्कार सब  अलग होंगे। अपने परिवार में कैसे ले सकते हैं ? आखिर खून तो हर जाति का अलग अलग होता है। 
                  मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि क्या हमारी मानसिकता शिक्षा, पद या फिर प्रगतिवादी होने के बाद भी बदलती नहीं है या फिर हम अवसरवादी हो जाते हैं कि अगर हमारी बेटी सुन्दर नहीं है और अपनी जाति में वर नहीं मिला तो बेटी की पसंद को प्राथमिकता दे दी जाय।  हाँ अगर बेटे वैसे हुए तो उनकी तो शादी हो ही जायेगी।  क्या संस्कार भी जाति के आधार पर होते हैं।  नैतिकता , सामाजिकता और संस्कार की भी परिभाषा अलग हो जाती है।  क्या बड़ों को सम्मान देने का तरीका , अपने दायित्वों को संभालने का ,शिक्षा  ग्रहण करने का तरीका जाति के अनुसार बदल जाता है ? क्या शरीर का खून भी अलग अलग रंग का होता है ? क्या ब्राह्मण , कायस्थ , ठाकुर कही जाने वाली जातियों में अपराधी  जन्म नहीं लेते।  क्या इनके घर में षडयंत्र नहीं रचे जाते।  इन परिवारों में महिला उत्पीडन , घरेलु हिंसा नहीं होती , दहेज़ नहीं माँगा जाता है।  आज सभी उच्च शिक्षित हो रहे हैं , परिवार का स्तर भी बहुत अच्छा हो चुका  है , उनके संस्कार भी हमसे कम नहीं है। 
                     अगर हम दूसरे पक्ष को देखे तो लोग कहते हैं ( अभी भी समाज में उच्च शिक्षित 75 प्रतिशत लोग इसको मानते हैं ) अगर निम्न जाति में शादी कर दी जाएगी तो बेटी उसी जाती  की हो जायेगी। अगर वह किसी अनुसूचित जाति  में शादी कर लेती  है तो फिर हम अपने घर कैसे बुला सकते हैं ? क्यों क्या सिर्फ शादी कर देने भर से उस बेटी के शरीर का खून बदल जाएगा या फिर  उसकी डी एन ए बदल जाएगा और वह आपके परिवार की बेटी न होकर उस परिवार की हो जाएगी ? कई बार ऐसी ऐसी दलीलें सुनने को मिल जाती हैं कि   आश्चर्य भी होता है और गहरा सदमा भी लगता है कि हम अपनी सोच कब बदल पायेंगे ? ये निम्न जाति की परिभाषा कहाँ से गठित हुई ? उस इतिहास में जाकर उसके आधार को देखने की किसी को जरूरत नहीं है. बस लीक आज भी पीटने को तैयार है। 
                         ऐसी सोच अगर हम रख कर प्रोफेसर , डॉक्टर , अधिकारी हुए भी तो हमारी शिक्षा का , हमारे समाज के लिए दिग्दर्शन करने का कोई आधार रहेगा ? हम रूढ़िवादिता न छोड़ सके।  हम यथार्थ को समझने के लिए तैयार न हुए तो फिर हममें और हमारे पीछे की गुजरी पीढ़ियों में क्या अंतर हुआ ? हमने घर में चूल्हे को छोड़ कर गैस अपना ली , हाथ के पंखे झलने के जगह पर अब बिजली के उपकरण अपना लिए।  बेटियों को अपने पुराने परिधान के जगह पर नयें पाश्चात्य परिधान स्वीकार कर लिए।  उनको घर से बाहर भेज कर पढ़ाने के लिए भेजने पर भी कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि अब हम प्रगति कर रहे हैं लेकिन हमारी  वही प्रगति इस विषय पर कहाँ चली जाती है ? अगर आज भी हम दोहरे मानको को लेकर चलते रहेंगे तो हम इस समाज में कौन सा सन्देश दे सकेंगे ?

सोमवार, 22 जुलाई 2013

गुरु पूर्णिमा : गुरु को नमन !

                          गुरु हमें वह सब देता है जिसकी हमें जरूरत होती है . मानव तो जीवन में दिशाहीन सा जीता रहता है कुछ  भौतिकता को ही जीवन का सत्य मान कर  आगे बढ़ जाते हैं .  वह गुरु जो मानव को  देता एक ऐसी दृष्टि   देता  है , जिससे वह ग्रहण करता है आध्यात्मिक ज्ञान , दिव्य ज्ञान और वह सब कुछ जो गुरु उसको  समझाता है .   ऐसे गुरु को इंसान  खुद नहीं खोज पाता है बल्कि गुरु अपने शिष्यों को खुद पहचानता है और   जब उन्हें योग्य पाता है तो वह सब कुछ सौंप देता है जिसको उसने  अर्जित किया होता है . वह जीवन में कई कसौटियों पर कसकर ही चुनता है और  तब अपने शिष्य को शिष्यत्व  प्रदान करता है. 

                                मैं अपने गुरु को नमन करते हुए विनम्र नमन के साथ कहती हूँ  कि मैं एक ऐसी शिष्या - मेरा जैसा सौभाग्य शायद ही किसी को मिला हो कि जो अपने गुरु की गोद में बचपन से खेलते  हुए बड़ी हुई और अंततः उनके लिए शिष्य बन गयी . वे  पितातुल्य मेरे फूफाजी "श्री जगदम्बा प्रसाद श्रीवास्तव " थे .  जब भी वे कानपूर से उरई जाते कुछ  सिखा  कर आते . प्रिय तो उनको पूरा परिवार था लेकिन मैं और मेरे भाई साहब विशेष प्रिय थे . 
                                मेरी शादी के निर्णय को अंतिम स्वीकृति देने वाले वही थे. उसके बाद भी पग पग पर सावधान करते रहे और इस तरह से बच  कर निकलना है  ये बताते रहे . जीवन में संघर्ष की परिभाषा और उससे जूझकर निकलने की शक्ति भी उन्ही से मिली . उन्होंने मुझे अपने पैमाने के अनुसार  कसौटियों पर कसते हुए जब इस योग्य पाया कि मैं कहीं भी उनकी दी गयी शिक्षाओं और मार्गों की अवमानना नहीं करूंगी तब मुझसे कहा था -- 'तुम अपने जीवन में कभी किसी का अहित मत सोचना , भले ही वह तुम्हारा हित न सोचे .'  मैंने इसे स्वीकार कर उनको वचन दिया था और उसको आज भी निभा रही हूँ . 
                           तब मैं ये नहीं जानती थी की दीक्षा क्या होती है औरकैसे ली जाती है ?  क्योंकि हमें इस विषय में कभी बताया ही नहीं गया था . मेरी हर मुसीबत से लड़ने के अस्त्र उन्होंने मन्त्रों के रूप में सहज ही  दे रखे थे . फूफाजी थे कोई बात नहीं थी . वे एक सीधे सादे गृहस्थ थे और उनके ज्ञान को मैं स्वयं अपने जीवन में नहीं समझ पायी थी . फिर एक दिन उन्होंने मुझसे कहा - "रेखा , अब तुम इस जीवन में किसी भी व्यक्ति से दीक्षा मत लेना ." मैं इस बारे में कुछ जानती नहीं थी सो कह दिया कि नहीं लूंगी
                           फिर १९९६ में मेरे परिवार में " आसाराम बापू " की दीक्षा लेने के लिए तैयार हुए . तब मुझे वह शब्द याद आये और मैंने मना कर दिया कि मेरे गुरु तो वही थे जिन्होंने मुझे सब कुछ ऐसे सिख दिया जैसे माँ अपने बच्चे को सिखाती है . वे हमें १९९५ में छोड़ कर चले गए थे . तब मुझे पता चला कि दीक्षा क्यों लेते हैं ? मेरे गुरु तो मुझे बचपन से दीक्षा देते रहे और मैं लेती रही . मेरे जैसे गुरु शायद ही किसी को  मिले होंगे .
                          उनके अपने गुरु कौन थे ? ये बात उन्होंने मुझे बताई थी की उनका गुरु भी कोई मानव नहीं था बल्कि  उन्होंने सूर्य की उपासना करके सम्पूर्ण ज्ञान अर्जित किया और मोक्षगामी आत्मा बने . आज भी अप्रत्यक्ष रूप से वे मेरा दिग्दर्शन करते हैं .

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

कब बदलेंगे हम ?

                                  अपने जीवन में बहुत सारे लोगों से  हुआ . बहुत से लोगों की गुत्थियों को सुलझाया , दिशा दी या फिर कुछ इस तरह से जीवन में शामिल हो गए कि जैसे वे मेरे बहुत अपने हों लेकिन इस बार कुछ ऐसा हुआ कि लग रहा है शायद एक आत्महत्या को बचा पाना मुश्किल है . कहेंगे हम इसे आत्महत्या लेकिन होगी ये ऑनर किलिंग ?

                                निधि ( काल्पनिक नाम ) मेरी बेटी की सहेली है बचपन से K G  से साथ पढ़ी और आगे जाकर उनकी दिशा तो बदल गयी लेकिन साथ नहीं बदला। जब भी बेटी कानपूर आती है वो जरूर मिलने आती है और सारा दिन एक साथ बीतता है  या फिर बेटी वहां जाती है . कुछ इत्तेफाक ऐसा है कि मेरी बड़ी बेटी की जितनी भी सहेलियां है हम सबके परिवार से जुड़े हैं लेकिन छोटी वाली की सहेलियों से तो जुड़े हैं उनके परिवार से कोई वास्ता नहीं है .  न मैं कभी गयी और न वे लोग कभी आये .
                             वैसे तो बिटिया रानी भी अच्छी काउंसलिंग कर लेती हैं लेकिन इस बार हार  कर मुझसे सलाह ली और मामला कुछ ऐसा निकला कि उनकी मित्र जो नौकरी भी करती है लेकिन वह जिससे शादी करना चाहती है वह उनके क्षेत्र का ही इंसान है लेकिन वह उनके बराबर की सजातीय  नहीं है . उसने इस बारे में अपने घर में बात की और परिणाम ये है कि  हमें कहते हुए शर्म आती है कि पढ़े लिखे उच्च शिक्षित लोग भी ऐसा कर सकते हैं . राजी होने तो दूर की बात उन्होंने बेटी को जिस तरीके से टार्चर कर सकते हैं किया , वह हमेशा चहकने वाली लड़की - खामोश हो चुकी है .  आज के ज़माने में जब की संकीर्णता की बेड़ियाँ टूट रही है हम अब भी वहीँ जी रहे हैं . मुझसे बात नहीं हुई लेकिन उनकी दलील सुनी तो लगा कि क्या कुछ लोगों  की विचारधारा कभी बदल नहीं सकतीहै .     इज्जत के नाम पर खुद अपनी दुनियां उजड़ जाए तो कोई बात नहीं है लेकिन इज्जत रहनी चाहिए . ये क्यों भूल जाते हैं कि  अगर अति संवेदनशील बच्चा अवसाद की स्थिति में कोई आत्मघाती कदम उठा  लेता है तो आप लोगों को क्या उत्तर देंगे ? उनके कितने कटाक्ष सुनेगें ? तब आपकी इज्जत बरक़रार रहेगी शायद नहीं,  आप अपने बच्चे को भी खो देंगे और इज्जत को भी . शादी के बाद कोई पूछने नहीं आता है कि आपकी बेटी कैसी है ? उसके और आपके सुख दुःख में साथ  देने वाले कोई नहीं होंगे आपके अपने बच्चे ही होंगे .
               अगर कल को वह लड़की इतने अवसाद के चलते आत्महत्या कर लेती है तो उनकी इज्जत के लिए कितने  सवाल पैदा होंगे ? ये बात उनकी समझ क्यों नहीं आती है ?
                     मान लीजिये कि उस लड़की ने आपकी इज्जत की दुहाई के लिए कहींऔर शादी कर भी ली और कल 
वह सामंजस्य न बिठा पाई तो आप उसके जीवन को कितने वर्षों तक साथ देंगे ?
            आपने अपनी जिन्दगी अपने अनुकूल जी और अब चाहते हैं कि बच्चे भी अपनी जिन्दगी आपके अनुरूप ही जियें . समझदारी इसी में है कि उनकी जिन्दगी उन्हें जीने दें . वे अब बच्चे नहीं रहे कि  हम उनकी अंगुली पकड़ कर या गाय बकरी की तरह से जहाँ चाहे जिस खूंटे से चाहे बांध दें और वे बंधे रहें .अगर जिद और हालत के चलते बड़ों ने निर्णय न बदला तो कल का इतिहास कुछ भी हो सकता है .  आप लोग भी कुछ राय दें कि हम क्या कर सकते हैं ?

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