गुरुवार, 21 अगस्त 2014

बस स्टॉप से ………( प्रीती बहरानी ) !

                     लिखना तो बहुत कुछ चाहती हूँ लेकिन समय हर जगह देर करवा देता है।  ये चरित्र जो मेरे जीवन में बस स्टॉप से जुड़े बहुत महत्वपूर्ण और नारी संघर्ष की एक बानगी है।  हो सकता है कि हमारे कुछ मित्रों को ये काल्पनिक लगे लेकिन जिसने जीवन का जो पहलू नहीं देखा है वो उससे अनजान ही रहता है।  इसी लिए भोगा हुआ यथार्थ ही जीवन के सजीव तस्वीर प्रस्तुत कर पाता है। 

                     वह बस स्टॉप पर मिली थी बहुत साल पहले, अपनी ननद के साथ आई थी।  उनकी ननद पूछने लगी कि मैं किस विभाग में काम करती हूँ।  मैंने बताया तो कंप्यूटर साइंस में।  उन्होंने पूछा कि  कंप्यूटर सेंटर में एक इंजीनियर मि. बहरानी को आप जानती हैं।  मि. बहरानी की हाल ही में पीलिया से मृत्यु हुई थी।  मैंने कहा हाँ।  बताने लगी कि ( साथ में जो एक सीधी सादी महिला थी)  ये प्रीती बहरानी है।  मेरी भाभी मि. बहरानी  की पत्नी।  इसकी नौकरी के लिए कुछ हो जाए।
                       मेरे प्रोजेक्ट डायरेक्टर बहुत ही सज्जन और दयालु व्यक्ति थे।  मैंने उनसे कहा कि आप उनसे मिल लीजियेगा।  मैंने उनका रूम न. सब बता दिया।  वह दूसरे ही दिन  मिली - सर उनको लेकर हमारे रूम में आये ( हम लोगों के काम करने का एक अलग रूम था ) और उन्होंने परिचय कराया और कहा कि कल से ये आप लोगों के साथ बैठेंगी और इनके लायक काम इनको बतला दीजिये।
                        प्रीती की ननद ने चलते समय कहा - आप लोग इसे मुसीबत की मारी अपनी छोटी बहन समझिए।  इसे कुछ भी नहीं आता है , पर आपके साथ सब सीख लेगी।  इसको आपके सहयोग की बहुत जरूरत है।
                    वही प्रीती सिर्फ हायर सेकेंडरी पास थी , जीवन में ऐसे सदमे  के लिए कोई तैयार नहीं होता है।  मि. बहरानी जेई के एग्जाम के लिए पीलिया की हालत में चेन्नई गए थे और वहाँ से लौट कर ऐसे बीमार हुए कि कोमा में चले गए और फिर कभी होश में नहीं आये।  चूंकि कंप्यूटर सेंटर नीचे ग्राउंड फ्लौर पर है और हम फर्स्ट फ्लोर कर बैठते थे।  जानकारी तो रहती ही थी।
                      प्रीती को हिंदी वाला काम दिया गया।  तब हम डेस्कटॉप पर जिस्ट कार्ड लगा कर काम करते थे।  उसको कंप्यूटर पर काम करने के लिए टाइपिंग सीखनी थी।  वह ऑफिस से छूट कर टाइपिंग स्कूल भी जाने लगी।  उसकी २ बेटियां थी।  एक ८ साल की और दूसरी ३ साल की।  बेटियों को घर में बंद करके जाती थी।  धीरे धीरे उसने टाइपिंग सीख ली।   लंच टाइम में डेस्कटॉप पर ही टाइपिंग के लेसन  पड़े थे।  उन पर प्रैक्टिस करती रहती।  अधिक समय नहीं लगा और वह काम करने लगी। उसने इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की,  जिससे उसको अगर यहाँ पर नौकरी मिले तो चतुर्थ श्रेणी में न मिले।  एक इंजीनियर की पत्नी को कम से कम क्लर्क की  नौकरी तो मिले।   
                        परिवार में उसी मकान  में उसके जेठ और उसके लडके रहते थे , उनकी नजर हमेशा उसके  पैसों पर रहती थी।  वह जीवन में बहुत सीमित हो गयी थी।  ऑफिस , घर और बेटियां।  सिर्फ उसकी ननद ही ऐसी थी जो उसके साथ खड़ी रहती थी. अपने परिवार वालों का व्यवहार , उसके और बेटियों के प्रति उपेक्षा उसको सालती रहती थी।  पति के रहते बड़े भाई हमेशा प्रेम से बोलते थे लेकिन उनके जाते हीउनका भी रवैया बदल गया।  प्रीती नौकरी करना ही उन्हें पसंद न था।  

                        पति के साथी इंजीनियर उसकी नौकरी आई आई टी में दिलवाने का प्रयास बराबर कर रहे थे।  उसके वहां पर काम करने से साथियों पर भावात्मक दबाव बना रहता था।  तीन साल तक उसने हमारे साथ काम किया और फिर उसका संघर्ष फल लाया और उसे आई आई टी के  एक विभाग में नौकरी मिल गयी।  वह हमारा साथ छोड़ कर वहां चली गयी।  कभी कभी मुलाकात होती थी लेकिन काम में किसी को  कहाँ मिलता है ? 
                         फिर महीनों और  बरसों गुजरने लगे।  हम अलग अलग हो गए।  उसकी बड़ी बेटी जब ग्रेजुएट हो गयी तो उसे लगा कि वह शादी कर दे।  उसने भाग दौड़ शुरू की लेकिन पता नहीं वक़्त को क्या मंजूर  था।  वह अथक प्रयास के बाद भी सफल न हो सकी।  
                            फिर उसके बाद इतने साल बाद बस स्टॉप पर ही  मनहूस खबर मिली कि प्रीती बहरानी नहीं रही।  उसको बुखार आ रहा था हॉस्पिटल में एडमिट  हुई।  एक शाम ऑफिस फ़ोन किया कि वह सोमवार से ज्वाइन करेगी और इसी के बाद उसको इतना तेज बुखार हुआ कि वह कोमा में चली गयी और फिर हमेशा के लिए। उसकी अंतिम क्रिया पर भी घर वालों ने दांव खेला  कि  जेठ का बेटा  तभी अंतिम संस्कार करेगा जब उसके पैसे का वारिस उसको बना दिया जाय।  बेटियों की शादी की जिम्मेदारी वह लोग उठाएंगे  , लेकिन बुआ ने मना कर दिया और बड़ी बेटी ने बेटे का काम पूरा  किया।   बस दो बच्चियां माँ और बाप दोनों के साये से वंचित हो गयीं।  बच्चियों को उनकी बुआ ले गयीं।
  

बुधवार, 20 अगस्त 2014

भारतीय होने का प्रमाण पत्र !

                                      जन्म से लेकर आज तक कितने प्रमाण पत्र मिलते हैं और हर बात को साबित करने के यही एक मात्र साधन होता है।  जन्म प्रमाण पत्र , विवाह प्रमाण पत्र , शिक्षा के प्रमाण पत्र , निवास प्रमाण पत्र , जाति प्रमाण पत्र , आय प्रमाण पत्र , अनुभव प्रमाण पत्र --  पता नहीं क्या क्या देखे हैं ? इतनी बड़ी आयु में पहली बार पता चला कि भारतीयता को प्रमाणित करने वाला प्रमाण पत्र भी चाहिए।  
                                        लेकिन ये कोई नहीं बता रहा है कि ये प्राप्त कहाँ से किया जा सकता है ? इसको प्रमाणित करने वाला कौन अधिकारी होगा ? तीन दिन से भागते भागते एड़ी चोटी का जोर लगा लिया।  पसीना बहाते बहाते दिन में कई बार नहा भी लिए लेकिन परिणाम सिफर। 
                                       मामला  एक संस्थान में प्रवेश लेने का है , जिसमें काउंसलिंग के समय ही भारतीयता प्रमाण पत्र माँगा गया है। वैसे भारतीय नागरिक होना - हमारे देश की किसी भी सेवा , चुनाव लड़ने से लेकर हर जरूरी माना गया है लेकिन क्या हमारे इतने सरे सांसद , विधायक , पार्षद या फिर पूरी सरकारी तंत्र में इसके प्रमाण पत्र को प्रस्तुत किया भी गया है  ( मुझे इसका ज्ञान नहीं है , इसीलिए आप लोगों  से पूछ रही हूँ। )  कचहरी से लेकर SDM तक के हर दरवाजे को नाप डाला।  कोई नहीं जानता है कि ये कहाँ से बनेगा ? बस यहाँ से नहीं बनता है।  इसके आगे कोई कुछ भी नहीं जानता है।  अगर संस्थान में प्रवेश  से पहले ये प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना इतना आवश्यक है तो महत्वपूर्ण पदों पर बैठे अधिकारीयों को भी तो इसको प्रस्तुत करना जरूरी ही होगा अगर नहीं तो फिर बच्चों को क्यों परेशान किया जा रहा है ? 
                                         कोई इसके फॉर्मेट के बारे में तक नहीं बता पाया।  कोई कहता है विधान सभा जाइए वहां पर मिल सकता है।  क्या इतना आसान है बच्चों के लिए विधान सभा तक पहुँचना। फिर  पूरी विश्वसनीयता से बताने वाला कोई भी नहीं।  अगर आप में से कोई जानता हो तो मार्गदर्शन करें।

सोमवार, 18 अगस्त 2014

कहाँ है हम ?

                                    हम बहुत आगे जा रहे हैं और इसमें कोई शक भी नहीं है लेकिन क्या हम अपनी मानसिकता से भी उतने ही आगे बढ़  पा रहे हैं या नहीं। कभी कभी ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं कि सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि  आज भी हम वहीँ खड़े हैं क्या ? 

                                     एक दंपत्ति मेरे पास आये थे।  उनको बच्चे नहीं थे और उम्र के चलते डॉक्टर ने उम्मीद भी काम ही बताई थी और सलाह दी थी कि कोई बच्चा गोद ले लीजिए।  पतिदेव  गाँव से सम्बंधित थे सो  परिवार में सभी प्रकार के लोग थे।  पत्नी शहर से थी लेकिन  सबका सम्मान बराबर करती थी।  जब गोद लेने की बात आई तो पतिदेव के बचपन का सहपाठी जिसकी दो बेटियां थी अपने तीसरी बेटी को देने के लिए तैयार था लेकिन वो उनके पास के गाँव का था और साथ ही वह अनुसूचित जाति का भी था। 
                                    घर वालों ने मना कर दिया कि  'एक तो लड़की लो वह भी नीच जाति की , लड़का होता तो भी सोच लेते।  गाँव भर थू थू हो जायेगी। '
                          पति को भी कोई परेशानी न थी और पत्नी को भी नहीं लेकिन घर वाले।  उनका कहना था कि'  ' अभी छोटे भाई की पत्नी कोबच्चा होने वाला है अगर लड़का हो जाएगा तो अगला बच्चा तुम्हें दे दिया जाएगा।  बाहर का पता नहीं कैसा खून हो ? '

                                     इस परिवार  में सभी भाई सरकारी नौकरी करने वाले हैं और सोच उनकी कितनी छोटी है।