मंगलवार, 30 मार्च 2010

अविश्वनीय सच!



                               इस तरह कि कहानियां फिल्मों और टीवी सीरियल में ही देखने को मिलती हैं , किन्तु इस जीवन के यथार्थ में भी ऐसे कुछ घटनाक्रम बने होते हैं कि यकीन कोई करे या न करे सच हमेशा सच ही होता है.

                           पिछली बार जब में अपने घर गयी तो एक गाड़ी दरवाजे पर आकर रुकी. आने वाले ने दरवाजा नहीं खटखटाया बल्कि जिसको वो साथ लेकर आया था उसने दरवाजा खुलवाया. वह हमारा परिचित था पहले पुराने मकान के पास ही एक छोटा सा होटल था उसी में काम करने वाला एक कारिन्दा था. 
                          उससे पूछा कि क्या बात है? तो उसने गाड़ी के निकल कर बाहर खड़े हुए व्यक्ति की ओर इशारा किया - "ये आपका घर पूँछ रहे थे, तो मालिक ने आपके यहाँ भेजा था. "
मैंने उस व्यक्ति को नहीं पहचाना, मैंने पूछा कि किससे मिलना है? 
"दीदी" उसने मुझसे यही कहा और मैं नहीं समझी कि ये है कौन? और क्या चाहता है?
"अन्दर आ जाऊं?"  
"हाँ, हाँ, आओ", मुझे अपनी मूर्खता पर हंसी भी आई कि कोई दीदी कह रहा है जरूर पहचानता होगा.
                              अन्दर आया तो उसने माँ के पैर छुए,  भाभी को देख कर पूछा - अगर मैं गलत नहीं हूँ तो ये भाभी ही होंगी.'  और उसने झुक कर उनके भी पैर छुए.
                  मैं तो उसी पुराने वाले घर में गया था, फिर होटल वाले ने कहा कि आप लोग बहुत साल पहले यहाँ से चले गए हैं और अब चाचा भी नहीं रहे हैं. फिर उसी ने अपना आदमी भेजा कि घर तक पहुंचा दो.
"आप  अपना परिचय देंगे." मैंने अब भी नहीं पहचाना था. 
"मैं कौन सा नाम बताऊँ - विदित रैना या मंगू." उसकी आवाज भर्रा गयी थी.
"मंगू" - मुझे किसी ने जमीन पर फ़ेंक दिया था.
"हाँ, मेरी पोस्टिंग झाँसी में हुई तो मैंने सोचा कि चाचा से मिलूंगा किन्तु ........." फिर वह चुप हो गया.
              मंगू नाम ने मुझे करीब ३५ साल पहले धकेल दिया था. जिस होटल का उसने जिक्र किया था , वह उसी में बर्तन धोने का काम करता था और उसका मालिक जरा सी गलती पर बहुत पीटता था. एक दिन इतना पीटा कि उसकी पीठ पर छड़ी के निशान आ गए और पास ही में Advertising Company चलने वाले सज्जन ने उसको उठा कर अपनी दुकान में बैठा लिया तो होटल वाला लड़ गया कि आप हमारे लड़कों को बिगाड़ रहे हैं , ये आपने अच्छा नहीं किया. जब ये लावारिस घूम रहा था तो मैंने ही इसको रखा था.
                 उन्होंने कहा कि ' अब ये मेरे पास रहेगा और मैं इसको काम सिखाऊंगा और खाना भी खिलाऊंगा.'
उस  मंगू को उन्होंने अपनी ही दुकान में जगह दे दी.


     उनकी जान पहचान सरकारी आफिस में भी थी , उनके काम से जो जुड़े थे , वे सब उनकी बहुत इज्जत करते थे क्योंकि वे एक सच्चे इंसान थे.  बहुत अमीर नहीं थे लेकिन नेक दिल और नेक कार्य करने वाले थे.  अपने ५ बच्चों के साथ एक लड़का और पाल लिया.  घर वालों ने विरोध भी किया था किन्तु धुन के पक्के थे.  वही सोता और बस घर में खाना खाने आता था.
              एक बार वहाँ पर एक कश्मीरी प्लानिंग ऑफिसर आये, उनके बच्चे नहीं थे और उनसे घनिष्ठ सम्बन्ध होने पर बोले एक बच्चा गोद देना चाहता हूँ. बहुत संकोच के साथ उन्होंने मंगू के बारे में उन्हें बताया और ये शायद उसकी किस्मत थी कि वे तैयार हो गए. तब किसी को गोद लेना और रखना इतना मुश्किल न था. रैना जी ने उसको अपने घर रखा और उसका दाखिला भी स्कूल में करवा दिया. फिर उनका वहाँ से ट्रान्सफर भी हो गया और समय के साथ सब मंगू को भूल गए. 
                        हाँ एक बार जरूर रैनाजी किसी काम से वहाँ आये तो उसको साथ लाये थे और वह मिलने आया. स्कूल की तरफ से किसी कार्यक्रम में भाग लेने आया था. तब अपने चाचा से मिलने आया था -' चाचा, पापा और मम्मी बहुत प्यार करते हैं, मैं बहुत अच्छे स्कूल में पढ़ रहा हूँ.'
                             उनको भी देखकर तसल्ली हुई कि जो एक काम किया था , वह सफल रहा.
                      फिर आज वो नहीं हैं,  विदित रैना ने उनके उस काम को फिर से याद दिला दिया.
      विदित ने अपने बारे में बताया - 'मम्मी अब नहीं हैं, पापा हैं, मेरी शादी भी हो गयी है, दो बच्चे हैं और मैं एक बैंक में नौकरी कर रहा हूँ. जब झाँसी आ गया तो अपने को रोक नहीं पाया. पहले मैं उस होटल पर ही गया था और फिर मैंने चाचा की दुकान देखी. उस होटल वाले से पूछा तो उसने बताया कि चाचा तो रहे नहीं हैं , चाची और भैया दूसरे मकान में चले गए हैं. 
           "अच्छा तुमको चाचा की याद रही." मैंने उससे उत्सुकता से पूछा क्योंकि एक लम्बा अंतराल बीत गया था.
         "क्यों नहीं? ये जो भी आज हूँ, मेरी किस्मत कितनी है नहीं जानता लेकिन चाचा का हाथ मेरे ऊपर जरूर है. जगह की बहुत अधिक याद तो नहीं थी, पर होटल और दुकान  अभी भी उसी तरह से याद है."

                    उस व्यक्ति से मिलकर मुझे बहुत अच्छा लगा और मेरा सिर भी गर्व से ऊँचा हो गया क्योंकि जिस व्यक्ति ने उसको गोद दिया था और होटल से निकाल कर अपने घर में रखा था वह मेरे पापा थे.

मंगलवार, 23 मार्च 2010

संस्कृति - संस्था - संस्कार !

                                                     संस्कृति - संस्था - संस्कार  ये तीन आधार है - मानव जीवन को एक पृथक स्वरूप लेने वाले. ये सर्व विदित है की विश्व में भारतीय संस्कृति, सामाजिक संस्थाएं  ( विवाह, परिवार आदि) और संस्कार (गर्भाधान से लेकर श्राद्ध तक) को बहुत ही सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है. वहाँ जाकर बस जाने वाले व्यक्ति भी कभी कभी अपने श्राद्ध जैसे संस्कार के लिए भारत आकर कभी वाराणसी , कभी हरिद्वार में पूर्ण करते हैं. कितने विदेशी युवा भारतीय विवाह पद्यति को अपना कर अपना  वैवाहिक जीवन आरम्भ  करते हैं. पर हम क्यों इनसे दूर होते जा रहे हैं? हम अपनी संस्थाओं के महत्व को खोते जा रहे हैं, उनके मूल्य को नहीं समझ पा  रहे या फिर न समझने का नाटक कर आसन जीवन जीने की लालसा रखते हैं. अपनी जड़ों से अलग होकर किसी भी वृक्ष का कोई अस्तित्व शेष नहीं रहता है. वह एक दिन सूख कर सिर्फ ठूंठ  बन जाता है.
                                   परिवार संस्था की टूटती हुई एक कड़ी हाल ही में देखी  - एक  युवक  की  अस्वाभाविक  मृत्यु  पर  - उसी जगह रहने वाले उसके भाई और माँ का अंतिम क्षण तक इन्तजार किया गया कि  रक्त - सम्बन्ध इतने गहरे होते हैं कि कितना ही विवाद सही इस जीवन के अंतिम संस्कार में तो साथ होते हैं. श्मशान में बहुत देर तक सबकी आँखें यह देखती रही कि शायद अब माँ और भाई आएगा, अपने बेटे और भाई  के अंतिम दर्शन के लिए. 
किन्तु शायद दुर्भावनाएं अधिक बलवती थीं और उस बेटे और भाई को , जो उनका भार वहन कर रहा था अपनों का साथ मिलना नसीब नहीं था. सबकी आँखें मुड़कर देख रही थीं की अंतिम संस्कार कौन करेगा?
                                उसकी २८ वर्षीय पत्नी रोली ने बहुत देर रो लिया था और घर वालों की रास्ता भी देख ली थी, उसने अपनी दो वर्षीय पुत्री को पिता की गोद में देकर मुखाग्नि के लिए खुद को तैयार कर लिया था. अपने पति को मुखाग्नि देते समय उसकी मनःस्थिति तो शायद ही कोई समझ सकता हो लेकिन वहाँ पर इकट्ठे लोगों की आँखें बरसने लगीं.
                          बहुत छोटी सी घटना लग रही होगी किन्तु क्या हमारी संवेदनाएं इतनी मर चुकी है या फिर हमारे संस्कार  बिलकुल ही समाप्त हो चुके हैं. ये हम कहाँ से ले रहे हैं? दोष यह दिया जाता है की बच्चों को TV बरवाद कर रहा है. पश्चिमी संस्कृति ने हमारे समाज , संस्कृति और संस्कारों पर कुठाराघात  किया है - नहीं वे संस्कार जो हमें  विरासत में मिलते हैं कभी भी ख़त्म नहीं होते- हाँ हमारी दी परवरिश ही गलत हो तो कुछ नहीं कहा जा सकता है. 
                         माँ -बाप सदैव सही करते हों , ऐसा भी नहीं है. अपने ही दो बेटों के बीच में भेदभाव रखने  वाले माता पिता की कमी नहीं है. वह भी अपने स्वार्थ के लिए सब कुछ करने लगते हैं किन्तु ये भूल जाते हैं कि अगर हम अपने ही पौधों की जड़ में विष डालेंगे तो उसके फूल और फल सुखदायी कैसे हो सकते हैं?  वे अपने स्वार्थ में लिप्त ये भी नहीं सोच पाते हैं कि उनकी जिन्दगी अब समाप्तप्राय हो चुकी है और ये हमारे बच्चे अपना जीवन आरम्भ  कर रहे हैं. 
मेरे बाद इस दुनियाँ में मेरी ही तरह से इन सबका परिवार भी अलग बस जाएगा लेकिन जीवन में सुख और दुःख सभी क्षणों में हर व्यक्ति ये कामना करता है कि कोई उसका अपना उसके साथ हो. अगर बड़ा हो तो सिर पर हाथ रख देने भर से एक विश्वास और सहारा अनुभव होता है और अगर छोटा भी होता है तो कंधे पर रखे हुए हाथ तब भी अपने होने के साक्षी होते हैं. वैसे बहुत अपने होते हैं, मित्र होते हैं, पड़ोसी होते हैं, सहकर्मी होते हैं किन्तु जो भाई या बहन होते हैं - उनके बीच पलने वाले प्यार या जीवन के बचपन के पलों का जो अहसास होता है वह जुड़ा होता है. उस साथ में ज्यादा विश्वास और अपनत्व होता है. 
                             यहाँ पर सबसे महत्वपूर्ण भूमिका विवेक की होती है, ये विवेक मनुष्य के श्रेष्ठ प्राणी होने का प्रतीक है, उसके अतिरिक्त ये गुण किसी में नहीं होता, जीवन के कुछ निर्णय विवेक से लिए जाएँ तो बहुत सी घटनाएँ , दुर्घटनाएं और त्रासदियों को बचाया जा सकता है. अगर आप एक अच्छे माता पिता हैं तो स्वयं विवेक का प्रयोग करके अपने जीवन के निर्णय और अपने बच्चों में भी इस गुण की नींव डालें ताकि ये समाज और भारतीय संस्कृति किसी ऐसी रोली के प्रकरण को दुबारा न दुहराए. 

गुरुवार, 18 मार्च 2010

वो अमृत की बूँदें!

                घर के आँगन में एक बच्चे की चहक के लिए परेशान एक दंपत्ति - कितने प्रयास किये, कोई डाक्टर नहीं छोड़ा, कोई मंदिर और मजार नहीं छोड़ी. भाग्य को शायद ये मंजूर न था की उस घर में कोई चिराग रोशन हो.
                              फिर एक दिन उसकी डाक्टर मित्र  ने उसको फ़ोन किया कि  तुम दोनों सोमवार को यहाँ पहुँचो. वे बुधवार को पहुँच पाए - उस डाक्टर ने एक जीवन समाप्त करवाने आई माँ से अनुनय की थी कि वह बच्चे को जन्मने दे. खर्च वह उठाएगी. माँ जन्म देते  ही चली गयी और डाक्टर बच्ची को अपने नर्सिंग होम में ही रखे रही. उन दोनों के पहुँचते है , उसने गाड़ी से नहीं उतरने दिया  और निश्छल के गोद में बच्ची को देकर बोली - 'बधाई हो निश्छल तुम अब पिता बन गए.'
                      निशा ने बच्चे को गोद में लिया तो जी भर आया क्योंकि उसने झेला था कैसे पढ़ी लिखी औरतें भी अपने बच्चे को उसको देने में हिचकती थी क्यों? क्योंकि उसके कोई बच्चा नहीं था. उसकी आँखें आसुंयों से भीग गयीं और  वह डाक्टर को धन्यवाद ही दे सकी क्योंकि ये उसका अपना बच्चा होगा. डाक्टर ने किसी को कुछ भी नहीं बताया न उसके होने वाली माँ को कि बच्चा किसको देंगी और न निशा को कि ये बच्चा किस माँ का है?  हाँ एक थर्मस में दूध देकर उन्हें बाहर से ही विदा कर दिया.
                    निशा बच्चे को लेकर अपनी माँ के घर चली , रास्ते में बच्ची को दूध पिलाया लेकिन वह छोटी बच्ची बोतल से पी नहीं पा रही थी और फिर गर्मी की वजह से दूध ख़राब हो गया. निशा से बच्ची का रोना नहीं देखा जा रहा था. उसको लग रहा था की क्या उसकी गोद इसके बाद भी सूनी हो जायेगी?  बच्ची के होंठ नीले पड़ने लगे थे कुछ भूख  की वजह से और कुछ रोने से. वह कितनी विवश थी? पास बैठी महिला ने कहा कि आप अपना दूध पिलाइए शायद चुप हो जाए. किन्तु? इसका उसके पास कोई विकल्प और उत्तर न था. आखिर निशा रोने लगी कि इस बच्ची को कैसे चुप कराऊँ मन में चल रहा था कि अब क्या होगा ? 
                 ट्रेन में पिछली ओर बैठी एक बच्चे की माँ उठकर आई और बोली - 'अगर आपको बुरा न लगे तो मैं इसे  अपना दूध पिला देती हूँ, शायद चुप हो जाए.'  निशा को अँधेरे में रौशनी की एक किरण दिखाई दी. उसने बच्ची को उस महिला की गोद में दे दिया.  जब माँ का दूध मिला तो पेट भरने पर वह सो गयी और निशा ने एक राहत की सांस ली. उसने उस अनजानी माँ को बहुत दुआएं दीं , जिसने एक नन्हीं जान को अपने दूध में अमृत की वो बूँदें पिला दीं जिससे उसकी जान बच गई.  वह उस माँ के दूध की कर्जदार हो गयी. जिसको वो तो कभी चुका ही नहीं सकती  थी.
               वो बच्चा गोद लेने वाली माँ मेरी अपनी छोटी बहन ही है.

जो गैरों की खातिर जिए मर मिटे ....................

  जो गैरों की खातिर जिए मर मिटे ....................
                                 कुछ  पंक्तियाँ कितनी सार्थक कथन बन जाती हैं, ये तो वही समझ सकता है जो  कि भुक्तभोगी हो. परोपकार मानव मूल्यों और नैतिक मूल्यों में सर्वश्रेष्ठ कर्म माना जाता है. अभी यह पृथ्वी वीरों से खाली नहीं हुई है और ऐसे कितने मिल जाते हैं कि इनसान अपने जीवन की प्राथमिकताओं को तिलांजलि देकर दूसरों के लिए समिधा बन जाता है. जब उस हवन कुण्ड की ओर देखता है तो सिर्फ उससे उठता हुआ धुआं दिखाई देता है  जिससे उसको यथार्थ भी धुंधला दिखने लगता है.
                             क्या कोई  उसके दर्द को समझ सकता है - शायद नहीं. वह जिनको अपना समझता रहा , वे तो अपने थे ही नहीं, उसे सीढ़ी समझ कर ऊपर चढ़े और आसमान छूने लगे तो पैर से वह सीढ़ी ठेल कर दूर कर दी., अब उन्हें उस सीढ़ी की जरूरत ही कहाँ रह गयी थी? 
                             ऐसे ही समर ने अपने भाई के परिवार की खातिर ( भाई एक दुर्घटना में विकलांग हो चुके थे) अपना पूरा जीवन ही लगा दिया. तन-मन-धन से समर्पित था अपने परिवार के लिए. उनके बच्चों के जन्म से लेकर हर कदम पर उनके साथ खड़ा रहा. चाहे बीमारी हो, पढ़ाई हो , कहीं नौकरी के लिए जाना हो, उनके लिए प्राइमरी से लेकर नौकरी में स्थापित होने तक वह अंगुली पकड़े रहा. जब पैरों पर खड़े हो गए तो  उस लक्ष्य तक अगले बच्चे को लेकर चलने लगा. इन बच्चों का भविष्य जैसे उसकी अपनी जिम्मेदारी थी.
                            और फिर एक दिन सब बच्चे सक्षम हो गए - उच्च शिक्षित , उच्च  पद प्रतिष्ठित तो एक दिन उनमें से बोला - "आप क्यों जाते हैं? आपको मना कर देना चाहिए था, मेरे मम्मी पापा खुद कुछ व्यवस्था करते."  जिनके लिए खुद शादी नहीं की. जिन्हें मेरी बेटियां और बेटे कहते जबान नहीं थकी. उसके इन शब्दों ने उसे उठाकर जमीन पर पटक  दिया  था. अब वे सब समर्थ थे और उन के लिए  इस इंसान की जरूरत ख़त्म हो चुकी थी. जिसने अंगुली पकड़ कर चलना सिखाया और शिखर तक ले जाने में अपना जीवन गवां दिया. उसकी पीड़ा का अहसास कौन करेगा? शायद कोई नहीं - वह किसी से कह भी तो नहीं सकता क्योंकि उसके दोस्त कहते थे - जिनके लिए तुमने अपनी ख़ुशी और जीवन न्योछावर कर दिया,  वह अपने होने का व्यामोह उन्हीं के द्वारा तोड़ा जाएगा. सिर्फ मतलब तक के सारे रिश्ते होते हैं. फिर दुनियाँ को क्या पड़ी कि वह तुम्हारे आंसूं पोंछने आएगी.  क्या उससे पूछ कर ये सब कर रहे थे .
                      एक समर ही क्यों? निहारिका भी तो ऐसी ही है - वो मेरी बचपन की सहेली है. पिता बैंक में अफसर थे और माँ मानसिक तौर पर विक्षिप्त . चार भाई बहनों में बड़ी सारी जिम्मेदारी और पढ़ाई एक साथ उठाये रही. पिता गैर जिम्मेदार थे सिर्फ खर्च लेने से मतलब रखते थे. उनकी दूसरी दुनियाँ भी थी. कभी कभी ही घर आते थे. अगर वह अपनी शादी के बारे में सोचती तो बाकी सब का क्या होता? पता नहीं कैसे लोग मिलें? कैसी ससुराल मिले?  सब भाई बहनों की शादी की लेकिन उसकी कौन करता? माँ बाप भी समय के साथ चल बसे. अब इस उम्र में शादी कौन करेगा? अब शादी करके क्या करोगी? हम सब लोग हैं न . 
                        ये दावे करने वाले अपने अपने घरों में व्यस्त हो गए. गर्मियों की छुट्टी में जिसके पास जाती सब उपहारों की राह देखते होते. दीदी आएगी तो छोटों के लिए कुछ तो लेकर आएगी ही. बुआ थी जिसकी उन्हें लगता बुआ कमाती है, कोई खर्च तो है नहीं. जिनकी मौसी थी वे भी यही सोचा करते . इन परिवारों में उसकी कम उसकी कमाई और उपहारों की कीमत अधिक होती थी. ऐसे ही एक बार वह अपनी बहन के घर बीमार पड़ी और बीमारी लम्बी खिंच गयी बहुत कमजोर हो गयी थी . उठने बैठने में भी तकलीफ होती. अब तो वह बोझ नजर आने लगी कि आगे बीमारी पर खर्च कौन करे?  दबी जबान से कहा गया की अगर वह चैक काट देती तो कुछ पैसा ले आते बीमारी में पैसा तो लगता ही  है. उसने चैक काट कर दे दी और फिर पैरों में ताकत आने तक वह रुकी , खड़े होने लायक होते है वह अपने घर वापस आ गयी. ये जब उसने मुझे बताया तो -- मैं साक्षी थी उसके त्याग, संघर्ष और समर्पण की. यदि वह खुद शादी कर लेती तो ये सब सड़क पर घूम रहे होते. कोई उनको देखने वाला नहीं था. 
                               बरबस ही ये पंक्तियाँ मन में उमड़ने लगीं.
जो गैरों की खातिर जिए मर मिटे पूछती हूँ -- उन्हें क्या मिला? क्या मिला? क्या मिला?


                 

बुधवार, 10 मार्च 2010

क़ानून को ठेंगा दिखाते ये कारनामे!

                                 देश और समाज कि प्रगति और के लिए सरकार तो बहुत कुछ कर रही है लेकिन यथार्थ क्या है?  इसके सही और सच्ची तस्वीर पेश कर रही है - ये घटना जो अभी २४ घंटे पहले ही घटी है .
                                 स्कूल के बच्चों को स्कूल से पढ़ाई के समय में कुछ मजदूरी का लालच देकर किसी अध्यापक के खेत में आलू खोदने के लिए ट्रैक्टर से ले जाया गया. ट्रैक्टर चालक ने मानव रहित क्रासिंग  पर सामने आती हुई ट्रेन को अनदेखा कर क्रासिंग पार करने का दुस्साहस किया और ट्राली ट्रेन कि चपेट में आ गयी. जिसमें ९ की मृत्यु हो गयी. इन में ५ लड़के , २ लड़कियाँ  और २ महिलाएं थीं. ये बच्चे स्कूल में पढ़ने वाले १० से १५ साल के बीच के थे.  कितने घर उजड़ गए? 
                                   ये एक बहुत छोटी घटना हो सकती है, क्योंकि ऐसे एक्सिडेंट रोज ही हुआ करते हैं और हम एक खबर  की तरह  पढ़ कर अखबार रख देते हैं किन्तु ये घटना कितने कानूनों के ठेंगा दिखा रही है.

१. बाल श्रमिक निरोधक क़ानून.
२. अनिवार्य शिक्षा 
३. अधिकारों का दुरूपयोग
                       इतनी कम उम्र के बच्चों को खेत में आलू खोदने के लिए श्रमिक के रूप में प्रयोग करना दंडनीय अपराध है. उस समय और भी दंडनीय बन जाता है जब कि ये कार्य एक शिक्षक के द्वारा अपने खेत में करवाने के लिए हो रहा हो.
वे बच्चे माँ-बाप ने पढ़ने के लिए स्कूल भेजे थे न कि मजदूरी के लिए. बच्चों को पैसे का लालच देकर खेतों पर ले जाना कहाँ और किस क़ानून में लिखा है? दबंगों को तो सुना था कि बेगार और जबरदस्ती अपने खेतों और फार्म हाउस में काम करवाने के लिए ले जाते हैं लेकिन एक शिक्षक ये काम करे तो अपराध कौन तय करेगा और दंड कौन? 

                      अनिवार्य शिक्षा के तहत गाँव के बच्चे स्कूल भेजे जाने लगे हैं, वह भी प्रतिशत अभी बहुत नहीं है . श्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक या शिक्षक मित्र वही गाँव के होते हैं और बहुधन्धी भी होते हैं. अपने अधिकारों का प्रयोग करके उस शिक्षा के कानून पर कालिख पोत दी. बच्चे पढ़ने आते हैं और वे  मजदूरी के लिए ले जाते हैं.  अगर कल वे बिना पढ़े माँ-बाप अपने बच्चों को स्कूल भेजने से इनकार कर दें तो?  बच्चे हर माँ-बाप के लिए जान से ज्यादा प्यारे होते हैं वे सोचेंगे कि अनपढ़ ही सही मेरे बच्चे मेरे पास तो रहेंगे. 

                   शिक्षक के ऊपर पूरे स्कूल का दारोमदार होता है, गाँव में तो और भी क्योंकि वहाँ एक या दो शिक्षक होते हैं. बाकी तो सिर्फ वेतन भोगी होते हैं. अगर शहर के हैं तो कभी एक दिन जाकर दस्तखत करके वेतन उठा लेते हैं. बाकी तो गाँव के लिए लोग देख लेते हैं. स्कूल के जिम्मेदारी होती है शिक्षा देने कि और शिक्षक अपने अधिकारों का दुरूपयोग करते हुए , विद्यालय के समय बच्चों को दूसरे कामों में प्रयोग करते हैं. खेतों के काम के लिए मुफ्त के मजदूर मिल गए या फिर १०-२० रुपयों में काम चल गया और वे तो स्कूल में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा ही  रहे हैं.

इस सब कानूनों के अबहेलना का परिणाम क्या होगा ? 
ये तो नहीं पता लेकिन सोचने पर मजबूर कर रहा है कि क्या शिक्षक , विद्यालय पर विश्वास किया जा सकेगा? 
इन शिक्षकों का दंड कौन निर्धारित करेगा?
क्या वास्तव में ये दण्डित होंगे? 
किस दफा में इनका अपराध रखा जाएगा?