सोमवार, 8 अक्तूबर 2012

ख़ुशी जीत की !


                        मैंने अपने  जीवन में पता नहीं कितने लोगों की काउंसलिंग की . उसका परिणाम भी मुझे सुखद  ही देखने को मिलता  हैं तो वह  सुखद अनुभूति मेरे लिए किसी मेडल को जीतने जैसी लगती   है। इसके लिए मुझे किसी ऑफिस में बैठ कर काम करने की जरूरत महसूस नहीं हुई  और न ही मैंने  कभी किया  

                            
              कल शाम विशेष मेरे घर आया , विशेष मेरा कोई रिश्तेदार या फिर हमउम्र मित्र नहीं है बल्कि आज से १८ साल पहले मुझे अपनी लैब में ही मिला था. वह अपना प्रोजेक्ट करने के लिए आया था. वह ऐसे तबके से था जहाँ पर शादी जल्दी कर दी जाती थी. उसकी उम्र बहुत अधिक न थी. ६ महीने उसे मेरे साथ काम करना था. धीरे धीरे हमारी लैब के माहौल के अनुसार सब घर की तरह ही अपनी बातें शेयर करने लगते थे. धीरे धीरे उसके साथ ही पढ़ाने वाले एक मित्र से  पता चला कि विशेष की शादी हो चुकी है और उसकी पत्नी उसके साथ नहीं रहती है , वह उसको छोड़ कर मायके चली गयी है और साथ में उसकी चार साल की बेटी भी है.
                  मेरे दिमाग ने उस टूटते हुए घर को बचाने के लिए विशेष के साथ लंच में अपने पास बैठ कर लंच करने को कहा और उस समय में हम लोग ( हम कई लोग थे जो शहर से आते थे और लंच साथ में ही लेते थे. ) विशेष लंच नहीं लाता था , वह कहीं कैंटीन में बैठ कर कुछ खा लेता. लंच बना कर कौन देता? माँ बीमार रहती थी. सुबह जल्दी नहीं उठ पाती थी. एक दिन मैंने उससे पूछ ही लिया.
'विशेष  , तुम शादी क्यों नहीं कर लेते? माँ की परेशानी को समझो.'
'नहीं , मैम मेरी शादी हो चुकी है.'
'फिर तुम्हारी वाइफ कहाँ है?'
'वह अपनी मायके चली गयी है.'
'ले आओ जाकर.'
'वह नहीं आएगी और मैं लाऊंगा भी नहीं.'
'क्यों?'
'वह जो चाहती है वह मैं कर नहीं सकता, '
'वह क्या चाहती है?'
'वह चाहती है कि मैं अपनी तनख्वाह से कुछ पैसे उसे भी दूं, उसे घुमाने ले जाऊं.'
'तुम अपने तनख्वाह किसको देते हो? '
'अपनी अम्मा को, घर वही चलाती हें.'
'पत्नी को कुछ भी नहीं देते.'
'नहीं, घर में सब कुछ तो मिल रहा है, उसे पैसे की क्या जरूरत?'
'वह गाँव की है, पढ़ी लिखी भी है या नहीं.'
'यहीं कानपुर की है, हाई स्कूल तक पढ़ी है. शादी बचपन में हो गयी थी . हाई स्कूल के बाद गौना हुआ था.'
'वह गलत क्या चाहती है? उसे कभी कभी घुमाने तुम नहीं ले जाओगे तो वह किसके के साथ जायेगी.? कुछ पैसे तो उसको भी चाहिए होंगे, हर वक्त तो वह माँ से अपनी जरूरत के लिए नहीं कहेगी. उसका कुछ तो हक है तुमसे पैसे लेने का. तुम उसके जाने के बाद कभी गए उसको लेने.'
'नहीं, वह अपने से गयी है अपने से आये तो आये नहीं तो कोई जरूरत नहीं है.'
'तुम जब अपने भाई , बहन और बाकी लोगों पर खर्च करते हो तो वह कुछ कहती थी?
'नहीं, कभी उसने कुछ नहीं कहा? वह तो अपने लिए पैसे मांगती थी. '
'बस इतनी सी बात पर तुमने उसे न लाने का फैसला  कर लिया, अपने आप से सोचो कि वह तुमसे नहीं मांगेगी तो किससे मांगेगी और तुम्हारी कमाई पर थोड़ा सा हक उसका भी है. '
                                 मैं ये सारी बातें उसको धीरे धीरे बैठ कर समझाती रही और फिर एक दिन वह अपनी पत्नी को ले आया. और हमारे यहाँ से उसका प्रोजेक्ट ख़त्म हो गया. लेकिन वह कभी कभी फ़ोन से बात कर लेता था. एक दो साल बाद पता चला कि उसके घर में एक बेटे ने भी जन्म लिया है और वह अपनी पत्नी के साथ खुश है.
                                  फिर एक लम्बे अरसे तक कोई खबर नहीं मिली. जैसे जीवन में ढेरों बच्चे आये और चले गए. कोई  कहीं से और कोई कहीं से.
                               कल शाम विशेष घर आया. उसकी बेटी की शादी तय हो चुकी थी और यहाँ से गुजर रहा था तो आ गया और बताने लगा कि उसकी बेटी की शादी है. मुझे आना जरूर पड़ेगा. बेटा भी अब हाई स्कूल में पढ़ने लगा है और वह एक पब्लिकेशन में काम कर रहा है. उसके जाने के बाद से मैंने कितनी बार उन दिनों में उसके साथ गुजरे उसके नैराश्य के क्षणों को बार बार रिप्ले करके देखा और पाया कि अगर इंसान को सही दिशा मिल जाए और वह खुद भी चाहे तो कितने जीवन बर्बाद होने से बच जाते हैं और एक खुशहाल परिवार बना रहता है. 

गुरुवार, 4 अक्तूबर 2012

अपनी पसंद !

                        हम लड़कों और लडाकियों  के भेद  को ख़त्म करने के लिए सतत प्रयास कर रहे है लेकिन आज भी और आज की पीढी में ऐसे लोग हैं जिन्हें सिर्फ और सिर्फ लडके चाहिए। इसके पीछे उनकी क्या मानसिकता है ? इसको इस घटना से समझा जा सकता है। 
                       बात अभी कल की ही है मेरे एक रिश्तेदार मेरे घर आई और कुछ समय बाद उन्होंने बात शुरू की कि 'आपके तो सम्बन्ध कई संस्थाओं से है , आप तो जानती हैं की मेरी शादी के इतने दिन बाद भी एक बच्चा भी मुझे नहीं मिल पाया। (वैसे उनको कई बच्चे हुए लेकिन कुछ कारणों से वे पूर्ण नहीं हो सके थे ). मैं अब एक बच्चा गोद लेने के बारे में सोचने लगी हूँ। वैसे तो मैं अभी भी एक डॉक्टर से इलाज करवा रही हूँ , मेरी उम्र भी अब बढती जा रही है तो मैं दो साल तक इन्तजार कर सकती हूँ। 
                   मैं बताती चलूँ कि उनकी उम्र पैंतीस  के आस पास होने वाली है। 
'फिर मुझसे क्या चाहती हो?'
'यही कि आप किसी संस्था में बच्चा  गोद मिल जाए तो मैं ले लूं , लेकिन मुझे लड़का ही चाहिए। '
'लड़का ही क्यों?' 
'देखिये आप जानती हैं कि मैं पैसे से बहुत अधिक सम्पन्न तो हूँ नहीं इनके पास प्राइवेट नौकरी है। मुझे आगे के खर्च के बारे में सोचना तो पड़ेगा ही। '
'क्या ये जरूरी  है कि  लड़का ही मिल जाए। '
'मैं  लिए दो साल तक इन्तजार कर सकती हूँ।' 
                        मुझे उनकी  से बहुत अधिक गुस्सा  आया - ' अच्छा  अगर तुम्हारा अपना बच्चा बेटी हो  जाए तो क्या उसको तुम भी औरों की तरह से बाहर फ़ेंक दोगी? तुम्हारे पास तो लड़की का खर्च उठाने के लिए पैसे की कमी है.'
'नहीं अपना जब होता है तो सभी पाल लेते हैं लेकिन अगर बाहर से लेना है तो फिर लड़की क्यों ली जाय?'
'अगर तुम्हें गोद लेने में भी अपनी पसंद का बच्चा चाहिए तो ये कोई आर्डर नहीं है कि जो आप चाहे वह आर्डर कर दिया जाय और तैयार करके दे दिया जाय.'
'आप समझिये मेरे ससुराल वाले भी चाहते हें कि लड़का ही लिया जाय, वैसे मेरी ननद की एक सहेली है किसी हॉस्पिटल में काम करती है उसने कहा है कि आपको लड़का भी मिल सकता है लेकिन इन्तजार करना पड़ेगा और बच्चा अपरिपक्व मिलेगा क्योंकि वह बच्चा ऐसे लोगों का होगा तो ६-७ महीने पर गर्भपात करवाने आते हें तो फिर उस बच्चे को नर्सरी में रखना पड़ेगा और दो महीने तक उसका खर्च तुम्हें उठना पड़ेगा . '
   'फिर वही विकल्प तुम्हारे लिए सबसे अच्छा होगा. अगर तुम किसी बच्चे के लिए मन में ममता नहीं रख सकती हो तो फिर कहीं से भी ले लो उसके साथ न्याय करना मुश्किल है और अगर कहीं ऐसा हुआ कि गोद लेने के बाद तुम्हारा अपना बच्चा भी हो गया तब उस बच्चे के प्रति तुम्हारा क्या व्यवहार होगा? इसके बारे में कहा नहीं जा सकता है. '
'नहीं ऐसा नहीं होगा? '
'क्यों? अगर तुम्हारे बेटा हो गया तो फिर दो बच्चों का खर्च कैसे उठा पाओगी? '
'इसी लिए तो दो साल और ट्राई करना चाहती हूँ उसके बाद ही गोद लूंगी. '
'नहीं मैं इस दिशा में कोई सहायता नहीं कर पाऊँगी ?'
'क्यों?'
'क्योंकि आज भी हमारे समाज में पैदा होने के बाद  लड़कियाँ ही फ़ेंक  दी जाती है, कभी भी सड़क पर पड़े हुए लड़के नहीं मिलते हें. फिर नवजात शिशु लड़का तो मिलने का सवाल ही पैदा नहीं होता है. '
'आप ऐसे क्यों कह रही हें? लड़के भी मिल सकते हें.'
'देखिये फिर आप कहीं और जाकर बात कीजिये, मेरे समझ मैं ऐसी कोई संस्था नहीं है जहाँ पर सिर्फ लड़के ही मिल सकते हों. गोद लेने के लिए भी पसंद और नापसंद नहीं होनी चाहिए . जिनके घर में बच्चे नहीं होते वे कुत्ते और बिल्ली के बच्चे पाल पर वही स्नेह देते हें जो हम अपने बच्चों को देते हें. फिर बेटी भी संतान ही होती है और बेटा भी. सबको एक तरह से पालना होता है और एक जैसे पढाना लिखाना होता है. पहले अपनी सोच को बदल लो फिर किसी भी बच्चे को गोद लोगी तो ज्यादा अच्छा होगा. '
       'मैं तो सोच रही थी कि आप हमारी बात को समझ कर कोई सलाह देंगी.'
'मेरी यही सलाह है कि पहले अपनी सोच बदल लो और फिर किसी बच्चे को गोद लेने के बारे में सोचना. '
    'देखिये मेरे दोनों जेठ के लड़के हें और मेरी दोनों ननदों के भी लड़के हें , इसलिए मैं लड़का ही चाहती हूँ.'
     'एक बार और सोच लो, सूने घर में किलकारियां लड़की और लड़के दोनों से गूंजने लगती हैं , अपनी सोच को बदल सको तो अच्छा है. '
'फिर मैं कहीं और बात करके देखती हूँ.'
'शौक से.'
                     मुझे उस औरत के विचारों और सोच पर तरह आ रहा था कि बच्चा न हो कोई खिलौना हो कि अपने मन से जो चाहा ले लिया. ऐसे लोगों ने ही हमारे समाज में इतनी बड़ी लकीर खींच रखी है लेकिन आज की पीढ़ी से मुझे ये उम्मीद नहीं थी.