बुधवार, 29 दिसंबर 2010

जद्दोजहद भरी यात्रा !

                     घर से कहीं बाहर जाने के लिए निकलते हैं तो सोचते हैं कि यात्रा सुखद ही होगी. लेकिन हम ये नहीं सोच पाते हैं कि ये कैसे किसकी कृपा से जद्दोजहद में बदल जाती है. इस बार तो हमारे रेलवे के भेंट ही चढ़ गयी हमारी यात्रा और हम जिन्दगी भर नहीं भूल पायेंगे. किसी खेल के तरीके से या मैच के दौरान जब हमारी जीत और हार कुछ ही रनों के ऊपर निर्भर होती है और हम सब खेल प्रेमी हाथ जोड़ कर भगवान से मनाते हैं कि ये मैच हम जीत जाएँ. उनका हो तो उनका ये विकेट जल्दी से गिरे और हमारा हो तो बचा रहे. बस एक छक्का लग जाये . रन और बाल के बीच के अंतर को तौलते हुए चलते रहते हैं ठीक वैसे ही हम भी दो ट्रेनों के बीच के अंतर को तौलते हुए चल रहे थे.
                    हम कानपुर से चले कि किसी भी ट्रेन से झाँसी पहुँच जायेंगे और वहाँ से हमारा रिजर्वेशन गौंडवाना एक्सप्रेस में था, जो कि रात ९:५७ पर नागपुर के लिए जाती है. हम १ बजे स्टेशन पहुंचे तो पता चला कि झाँसी के लिए ८ बजे से कोई ट्रेन नहीं आई. राप्ती-सागर आने वाली है लेकिन वह भी ३ घंटे लेट है. हम ने बीच का अंतर निकल कर मन को समझा लिया कि अगर ५ घंटे में भी पहुंचा दिया तो हम समय से पहुँच जायेंगे. किसी तरह से राप्ती-सागर आई और हम उसमें बैठे. अभी तक तो निश्चिन्त थे कि हमारी ट्रेन मिल ही जाएगी. अब गाड़ी कि गति धीरे धीरे कम होने लगी . कानपुर से उरई के बीच के लड़के जहाँ उतरना हुआ आराम से चेन खींची  और उतर गए. हम अभी भी मन में समय का तालमेल बैठाये दिल को तसल्ली दे रहे थे कि ट्रेन तो हमको मिल ही जाएगी. हम झाँसी के किनारे तक पहुँच गए और हमें आशा थी कि अभी भी हमें दस मिनट  का समय मिल जायेगा और हम ट्रेन पकड़ ही लेंगे लेकिन ये क्या? ट्रेन एक नए बने स्टेशन पर खड़ी हो गयी और हमारे दिल की धडकनें भी तेज हो गयीं किअब हमें हमारी ट्रेन नहीं मिल पायेगी. पता नहीं कितने सारे भगवान याद कर लिए कि किसी तरह से ये ट्रेन समय से पहुँच जाये नहीं तो हम क्या करेंगे? वैसे भी तत्काल में लिया हुआ रिजर्वेशन उसके बाद कोई और सूरत नहीं होगी. लेकिन अब भगवान भी कोई सहायता नहीं कर सकता था क्योंकि झाँसी outar पर आ कर ट्रेन खड़ी हो गयी. अब हम कोई और सूरत तो सोच ही नहीं पा रहे थे. हमारी ट्रेन जो ६:४५ पर झाँसी स्टेशन आनी थी ठीक ९:५६ पर आ कर खड़ी हुई और हमारी ट्रेन का समय था ९:५७. दो प्लेटफार्म पार करके ट्रेन पकड़ना आसान नहीं था. फिर कोशिश कर ली जाये और हम लोग भागे. जब प्लेटफार्म की सीढियां उतर रहे थे तो सामने ट्रेन खिसकने लगी और B1 कोच एकदम सामने थी. पतिदेव बोले कि अपनी कोच सामने है जल्दी से चढ़ लो. हम दोनों ही गिरते पड़ते उसमें चढ़ गए. उसमें खड़े लोगों ने पूछा कि कहाँ जाना है? हमने बता दिया कि इस कोच में हमारा रिजर्वेशन है और हमें नागपुर जाना है.
"ये तो जबलपुर जा रही है."  उनमें से एक ने बताया. हमें तो काटो खून नहीं.
"लेकिन ये गोंडवाना एक्सप्रेस है न."
"जी, लेकिन ये आगे दो भागों में बाँट जायेगी और आगे वाला नागपुर जाएगा और ये जबलपुर. "
 अब समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें? ट्रेन पूरी गति पर थी. और उन लोगों ने ये भी बताया कि ये ट्रेन ठीक समय से चल दी थी लेकिन पता नहीं क्यों २ मिनट के बाद रुक गयी नहीं तो आप को मिल ही नहीं सकती थी.
             अब ट्रेन आगे बीना में ही रुकेगी तब ही कुछ हो सकता है, अब ये डर कि हमारे न पहुँचने पर TT हमारी सीट किसी और को न दे दे. खैर AC   का टिकेट लेकर हम दरवाजे के पास दो घंटे खड़े रहे. बीना में हम १२ बोगी पार करके अपनी कोच में पहुंचे तो TT महाशय हमारे ही इन्तजार में खड़े थे क्योंकि वे तो रोज ही हम जैसे गलती करने वालों से दो चार होते होंगे.
"आपको कहाँ जहाँ है? " उन्होंने हमें देखते ही सवाल दगा.
"हमें नागपुर जाना है और हमारा इसी में रिजर्वेशन है." हमने बताया.
"आप दो स्टेशन तक नहीं आये तो हमने वो सीट RAC वालों को दे दी. अब ये तो नियम है तो हम कुछ नहीं कर सकते हैं.


"ठीक है, फिर हमें क्या करना होगा? हम नीचे उतर जाएँ." मैं पहले से ही मानसिक रूप से इस बात के लिए तैयार थी कि ये स्थिति जरूर आएगी क्योंकि TT महोदय हमारी सीट किसी और के बेच चुके होंगे.
"ठीक है, आप हमारे टिकेट पर लिख दीजिये कि हमारी सीट नियमानुसार दूसरे को दे दी गयीं हैं और हमारी टिकेट अब अवैध है." मैंने उनसे कहा.
"जी, ये तो मैं लिख कर नहीं दे सकता हूँ."
"फिर हम क्या करें? नीचे उतर जाएँ या फिर इतने पैसे खर्च करने के बाद जमीन पर बैठ कर जाएँ."  मामला बिगड़ता देख कर उन्होंने इसी में भलाई समझी कि हमें कुछ व्यवस्था करके बैठा दिया जाय. फिर उन्होंने हमें दूसरी सीट पर जाने की व्यवस्था की और हम रात १२:३० पर किसी भी सीट पर जाकर लेट सकें.
                रेलवे कि ये सौगात जीवन में पहली और आखिरी सौगात बन गयी. लेकिन एक प्रश्न जरूर छोड़ गयी कि अगर रेलवे की गलती से लिंक ट्रेन देरी से आती है या उसके ३-४ घंटे देरी से आने पर अगर किसी कि ट्रेन छूट जाती है तो रेलवे को इसके लिए कोई विकल्प सोचना होगा. फिर ऐसे यात्रियों का टिकट दूसरी ट्रेन में वैध मान कर उनको यात्रा करने की अनुमति प्रदान की जानी चाहिए. उस समय जब कि यात्री कि कोई भी गलती न हो.

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

'फंसा लिया होगा'!

                     क्या आर्थिक दृष्टि से कमजोर कहे जाने वाले लोग (ये दृष्टिकोण है तथाकथित पैसे वाले होने का दंभ रखने वालों का ) लोगों को एक सुखद और सुंदर भविष्य का सपना देखने का भी हक़ नहीं है और अगर वे बेहतर जीवन   की ओर कदम बढ़ाते हैं तो लोगों को लगता है कि 'फंसा लिया होगा'!
           पिछले हफ्ते मेरी एक परिचित अपनी बेटी कि शादी का कार्ड लेकर आयीं , शादी उन्होंने काफी महंगे होटल से करने का संकेत दिया था. अन्दर जब कार्ड में पढ़ा तो पता चला कि वे लड़की की शादी अंतरजातीय कर रही थीं. लड़की उनकी एक बैंक में नौकरी कर रही थी. पहले तो लोगों ने कार्ड देख कर ही कहा - ' इनकी तो औकात नहीं कि इस होटल से शादी करें. जरूर लड़के वालों ने पूरा खर्चा उठाया होगा. अच्छे घर का लड़का फंसा लिया होगा. '
                      अभी तक न लड़का सामने था और न ही उसका घर,  लेकिन लोगों के व्यंग्य चलने लगे थे. ऐसा नहीं ये सिर्फ लड़की के लिए ही व्यंग्य चलता है , इसके विपरीत भी होता है अगर लड़की पैसे वाले परिवार की या फिर अच्छी नौकरी वाली हुई तब भी लोग ऐसे ही बोलते हैं. खुद मैंने कई बार सुना है. इस बार तो सुन कर लगा कि क्या दो लोगों का आपसी सामंजस्य की धुरी पैसा ही होता है. अगर आज लड़के और लड़की अपनी रूचि या फिर अपने जॉब के अनुरुप लड़के देख रहे हैं तो बुरा क्या है? जीवन उनको बिताना होता है और ये तो अभिभावकों कि समझदारी होती है कि वे बच्चों कि पसंद पर अपनी स्वीकृति कि मुहर लगा देते हैं. ऐसा नहीं पहले भी ऐसा ही होता था हाँ बहुत अधिक न था किन्तु गुण और रूप के कद्रदान लड़की या लड़के के घरवालों के पैसे को नहीं बल्कि उस व्यक्तित्व को महत्व देते थे. वही आज भी है. घर वाले चाहे इस बात को न सोचें लेकिन ये तथाकथित शुभचिंतक जरूर ऐसे संबंधों को शोध विषय बना देते हैं. मैंने  तो  इस  विषय  में  भी  लड़के के घर वालों कि विनम्रता देखी कि वे कह रहे थे कि हम नहीं आप अधिक बड़ी हैं क्योंकि आप हमें अपनी बेटी दे रहे हैं. लेने वाला कभी बड़ा हो ही नहीं सकता है.
                     तब लगा कि बेकार में लोगों के पेट में दर्द होने लगता है कि अगर शादी अंतरजातीय है तो जरूर किसी ने किसी को फंसाया ही होगा.

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

मुँह छिपाना पड़ता है!

                  पिछली पोस्ट में तो अपने बीच रहने वाले कुछ अनजाने चेहरे की छवि को देखा लेकिन ऐसे काम हमें तब शर्मिंदा कर देते हैं जब कि हम उसमें कोई भागीदारी  नहीं रखते हैं. पर अपना चेहरा नहीं दिखा पाते हैं दूसरों के कर्मों से. जिनसे हमारा कोई लेना देना नहीं है लेकिन वे हमारे भाई हैं इसलिए और सिर्फ इसलिए शर्मिंदगी हमें घेर लेती है.
                         कुछ साल पहले तक कानपुर में दंगे हो जाना कोई बड़ी बात नहीं थी. इधर कुछ वर्षों से शांति है और ईश्वर करे कि ये शांति हमेशा बरक़रार रहे. एक बार के दंगों के बाद की बात है - दंगे ख़त्म हो गए लेकिन मेरे पति के एक बचपन के दोस्त है - जावेद हुसैन वारसी. वे बैंक में काम करते हैं . मैंने तो अपनी शादी के बाद ही जाना कि ऐसी दोस्ती होती है, जावेद भाई की अम्मी जब तक रही मुझे बहू माना (जावेद भाई की शादी काफी बाद में हुई) . हर सुख दुःख बाँटते रहे हैं. अम्मी को कैंसर हुआ तो जावेद भाई को चिंता नहीं थी सब आदित्य देख लेंगे दिन में कुछ घंटे मुक़र्रर थे कि इनको अम्मी  के पास रहना ही है. कभी तकलीफ बढ़ी तो फ़ोन आ जाता और फिर हम लोग हाजिर. अगर मेरे ससुर जी अस्पताल में हैं तो फिर खाना घर से नहीं बल्कि जावेद भाई के घर से आता. बाकी सारी चीजें भी वही से. ऐसा नहीं  जावेद भाई भी मेरी सास के दुलारे हैं और अब जब कि उनको दिखाई कम देता है सुनाई भी नहीं देता लेकिन अगर जावेद भाई आ कर खड़े हो जाएँ तो तुरंत पहचान लेंगी.
                    कोई भी सुख दुःख हो रिश्तेदारों को बाद में पहले इधर की खब़र जावेद भाई को और वहाँ की खबर हमारे घर आती है.
               एक बार दंगों के बाद बहुत दिनों तक जावेद भाई का कोई फ़ोन नहीं कोई खबर नहीं. मेरे पतिदेव को अधिकारवश गुस्सा जल्दी आता है तो कहने लगे कि इसने इतने दिनों से कोई खबर नहीं ली. मैं भी नहीं करूंगा फ़ोन. मुझे लगा कि हो सकता है  कुछ गड़बड़ न हो.
                मैंने इनसे चुपचाप जावेद भाई को फ़ोन किया तो पता चला कि बेटे कि तबियत ख़राब है और हम लोगों को खबर नहीं , ये पूरी दोस्ती में पहली बार हुआ और वह भी तब जब कि उनका बेटा इनका बहुत दुलारा है.  मैंने इनको बताया. हम दोनों जावेद भाई के घर पहुंचे. इनकी तो गुस्सा काबू में नहीं - 'तुमने समझ क्या रखा है. ताबिश की इतनी तबियत ख़राब और मुझे खबर तक नहीं दी. तुमने क्या सोचा? क्यों नहीं दी मुझको खबर अगर इसके तकलीफ होती है तो मुझे नहीं होती. ये तुम्हें पता है कि मेरा बेटा है. ( जावेद भाई का बेटा उनकी बड़ी बेटी के १४ साल बाद हुआ और उनकी पत्नी की बीमारी के लिए उन्हें मेरे पति के सहयोग से ही रोग का पता चला और उसके बाद बेटा हुआ सो वह इनका बेटा कहा जाता है.)
                 जावेद भाई सिर झुकाए कुछ बोले नहीं, फिर हिम्मत करके बोले - 'आदित्य इस दौरान जो हादसे हुए उसके बाद मेरी हिम्मत तुमसे बात करने की नहीं हुई , पता नहीं तुम क्या सोचो मेरे बारे में.' उनका गला भर्रा गया था. ' और फिर दोनों मित्र गले लग कर रो पड़े.
                'अरे , तुमने  ये सोचा भी कैसे ? हम दो कब हैं, फिछले ५० साल की दोस्ती में बस इतना ही समझा तुमने.'
             उन लोगों कि प्यार भरी लड़ाई और रोना देख कर हमारी भी आँखें भर आयीं थी. तब से आज तक चाहे कुछ भी हो, उनकी दोस्ती वहीं है. बस एक बार कैसे जावेद भाई को ये अहसास हुआ? ये मैं नहीं जानती लेकिन ईश्वर ये प्रार्थना है की ऐसा प्यार सभी दोस्तों में हो.

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

मैं भी थी उनके बीच .....

                     सब कहते हैं कि आतंकवादियों  का कोई मजहब या ईमान नहीं होता. हम पहचान भी नहीं पाते हैं उनको और वे हमारे साथ रहते हैं. ऐसे ही लोगों के बीच में भी रही और नहीं पहचान पाई. पहचानने की कोई  गुंजाईश भी नहीं थी क्योंकि पढ़े लिखे इंजीनियर आप उनसे क्या उम्मीद कर सकते हैं?
                                  आई आई टी में भी २००२ की बात हम सब अपने लैब में काम कर रहे थे कि हमारे साथियों में से एक बोला - 'आज शहर में कुछ होने वाला है.'
"क्या होने वाला है?" सबने पूछा.
"कुछ गड़बड़ हो सकती है."
           उस समय बात आई गयी हो गयी और हमने अधिक ध्यान भी नहीं दिया.  दिन में २:३० पर शहर से उसके पास फ़ोन आया कि शहर में दंगा हो गया  और कर्फ्यू  लगा दिया गया है. शहर के कुछ इलाके बेहद संवेदनशील हैं. उनमें से एक उसी इलाके में रहता था. सभी जगह ये होने लगा कि किस तरह से सुरक्षित घर पहुंचा जा सकता है. मेरे भतीजी की एक सहेली उस समय आई आई टी में प्रोजेक्ट कर रही थी. उसकी माँ ने फ़ोन किया कि आप इंदु को अपने साथ घर लेती जाएँ क्योंकि मेरा घर आई आई टी से पास भी था और सुरक्षित रास्ते थे. उसका घर बहुत दूर था.
                  मैं उसके साथ बस स्टॉप पर खड़ी थी कि किसी तरह यहाँ से निकला जाय. तभी मेरे साथ काम करने वाले एक युवक जो कि इंदु के इलाके में ही रहता था. अपनी गाड़ी से निकला. दरअसल कर्फ्यू के बाद उसका मित्र उसको लेने आ गया था. चूँकि इंदु उसी बस से आती थे जिससे वह आता था. मुझसे बोला कि आप इनको मेरे साथ भेज दीजिये. फिक्र न करें मैं इसको सुरक्षित घर पहुंचा दूंगा. उसने गाड़ी रोक दी . मैं संशय में पड़ी कि दो लड़को और वे भी दूसरे संप्रदाय से जुड़े क्या अकेली लड़की को उनके साथ भेजना उचित है? मुझे तुरंत निर्णय लेना था क्योंकि उसने गाड़ी रोक रखी थी.
"नहीं, इसको मैं अपने घर ले जा रही हूँ, सुबह इसको घर भेज दूँगी या फिर मेरे घर पर ही एक दो दिन बनी रहेगी. "
"नहीं , आप परेशान न हों, मैं सुरक्षित पहुंचा दूंगा."
                 मैंने उसको मना कर दिया और वह चला गया. उसको लेकर मैं घर आ गयी और दूसरे दिन उसका भाई आकर ले गया.
             चार दिन तक कर्फ्यू लगा रहा. बहुत बवाल शहर में मचा रहा कितनी जाने गयीं और कितना नुक्सान हुआ. शांति होने बाद ऑफिस खुला और हम सब लोग पहुंचें. उनमें से करीब सभी आई आई टी के रहने वाले या फिर होस्टल के रहने वाले थे. मैं और वे दोनों शहर से आते थे. अपना लंच साथ लाते थे. इसलिए हम लोग लैब में ही रहते थे. लंच लेने के बाद मैंने अपनी टेबल पर सिर रख कर रेस्ट करती थी.
                        शायद उन लोगों में से एक ने सोचा कि मैं  सो गयी हूँ. कहने लगा - 'तीन दिन बाद हमारे पास सारी बारूद ख़त्म हो चुकी थी और हम पैसे लिए घूम रहे थे लेकिन हमें न बम मिले और न बारूद. नहीं तो ये लड़ाई अभी कई दिन तक चलती. '
                         मेरा दिमाग तेजी से काम करने लगा कि कितना अच्छा हुआ उसदिन मैं इंदु को इन लोगों के कहने पर नहीं भेजा. नहीं तो कुछ भी संभव था. उस दिन मैं ईश्वर का शुक्रिया अदा कर रही थी कि उसने ऐन वक्त पर मुझे संशय से बाहर निकल लिया और मैं किसी के विश्वास की रक्षा कर सकी.
                        इस तरह से हम नहीं पहचान पाते हैं ऐसे लोगों के असली चेहरे. वे हमारे बीच ही रहते हैं और हमें सोया  समझ कर सामने आ जाते हैं.

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

सामान सौ बरस का ..........

                        एक हप्ते बाद जब वापस आई तो सोचा पहले सबको पढ़ लूंगी तब कुछ लिखूंगी लेकिन अभी खोल कर बैठी और कुछ पढ़ा ही था कि खबर मिली कि मेरी लेखन क्षमता को पहचानने वाली मेरी मित्र कम बहन अधिक प्रतिमा श्रीवास्तव  हर मध्यम वर्गीय परिवार के संघर्ष से जूझती हुई अभी अभी स्थापित हुई है. नौकरी , घर , बच्चे और पति के बीच सामंजस्य बिठाते हुए सुकून कि सांस ले भी नहीं पाई थी कि वो कुछ इस लड़ाई में ऐसी घायल हुई कि अभी मेरे  ऑपरेशन के बाद मुझे देखने आई और आज वही किसी व्याधि के कारण व्हील चेयर पर हॉस्पिटल लायी गयी.
                        अपने इस दर्द को शब्दों में ढाल दिया और अब चलती हूँ. अब उसके पैरों पर खड़े होने के लिए दुआ करती हूँ. और उसके ठीक होने तक तो वापस आना मुश्किल है. फिर मिलती हूँ. और सबसे कहती हूँ कि उसके लिए दुआ करें.

गुरुवार, 18 नवंबर 2010

संस्कारों का ढोंग !

                         हमारी संस्कृति में मनुष्य के गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि तक सोलह संस्कार होते हैं. आज के जीवन में और बदलते मूल्यों के अनुसार पूरे सोलह संस्कार तो कोई भी नहीं कर पाता है लेकिन कुछ महत्वपूर्ण संस्कार जीवन में पूरे किये ही जाते हैं. इनमें से अब कुछ ही रह गए हैं जैसे - जन्म पर होने वाले, नामकरण , मुंडन, कर्णछेदन, विद्यारम्भ, विवाह और अंत्येष्टि एवं उसके बाद त्रयोदशी आदि. 
                          ये सारे संस्कार हमारी अपनी मान्यताओं के अनुरुप होते हैं और इस बात पर भी कि  हम इनको कितना महत्व देते हैं. अब कुछ नए संस्कार भी जुड़ गए हैं जैसे बर्थडे , एनिवर्सरी  जैसे कार्यक्रम. बड़े धूमधाम से मनाते हैं. अपनी हैसियत के अनुसार लोगों को भी बुलाते हैं. लेकिन पुराने संस्कारों के प्रति हमारा दृष्टिकोण पुरातन पंथी कह कर बदलता जा रहा है. उसको भी हम सुविधानुसार  ढाल कर पूरा करने लगे हैं. 
                          कल मैं अपने पति के एक मित्र के पिता की तेहरवी में गयी थी. तीन बेटे और तीनों बहुएँ एकदम आधुनिक लेकिन कुछ अवसर ऐसे होते हैं कि  आधुनिकता हमें ये नहीं सिखाती है कि  हम अपनी कुछ परम्पराओं को भूल कर चलें या तो हम कुछ भी नहीं करें. हम इस वैदिक रीति के कार्यक्रम को मानते ही नहीं है और होता भी है आर्यसमाज रीति से आप संस्कार कीजिये और उसकी विधि के अनुसार शांति हवन कीजिये. वह भी सर्वमान्य पद्धति है. लेकिन अगर वैदिक रीति से चले तो फिर उसके प्रत्येक नियम को कुछ हद तक तो पालन करना अनिवार्य है. 
                          सुबह हवन होना था और पंडितों को खिलाना भी था. पंडित जी से पूछ कर सारा समान पैकेट बना कर उनको सौप दिया गया कि  आप ब्राह्मण खोज कर उनको दे दें. सारी चीजों के पैकेट थे साथ ही खाने के पैकेट भी थे. कुछ काम घर में बहुओं के द्वारा भी किये जाते हैं तो वह कौन करे? खुद खाना घर में तो बनाती नहीं है तो यहाँ पूरियां कौन तलेगा? बड़ी ने छोटी से कहा और छोटी ने और छोटी से . फिर छोटी ने एप्रन पहना और डरते डरते गैस तक गयीं सिर्फ ७-८ पूरियां ताली . बस हो गया भाभी जी. 
                        हम  काफी अंतरंगता रखते हैं तो वहाँ हम दिन भर थे. शाम को जिन्हें कार्ड दिया गया था तो लोग आने शुरू हो गए. दोपहर में ही मुझसे पूछा गया कि  इतने लोगों को कार्ड दिया गया है तो किस हिसाब से हलवाई को आर्डर दें कि क्या चीज कितनी होनी चाहिए?फिर सोचा गया कि अलग अलग चीजों के आने से झंझट बढेगा और फिर थाली कटोरी का भी काम बढ़ जाएगा.  फिर पैक्ड  थालियों का व्यक्तियों के हिसाब से आर्डर कर दिया गया. पैक्ड थालियाँ आ गयी और जैसे जैसे लोग आते जा रहे थे. मेजों पर थालियाँ रख दी जाती और लोग खाकर चलते जा रहे थे. हम भी उनमें से एक थे और खा पीकर हम भी घर आ गए. रात में देर तक नीद नहीं आई कि क्या इस तरह से भी होने लगा है. क्या सिर्फ एक संस्कार हम पूरी श्रद्धा से और नियमानुसार  नहीं कर सकते हैं. पुरुष वर्ग शायद ऐसा करता भी लेकिन स्त्रियाँ जब कुछ करने के लिए राजी ही नहीं तो वे क्या करें? उनके लिए बर्थडे पार्टी और तेरहवी बराबर हो गयी . बाहर से आर्डर कर दिया और खुद तैयार होकर होस्ट बनी सबको अटैंड कर रहीं है. वही यहाँ था, सारी बहुएँ तैयार पूरे मेकअप में बाबूजी के गुणगान कर रही थी. और कुछ हम जैसी दकियानूसी महिलायें इस संस्कार की परंपरागत तरीके पर रो रही थीं.

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

ऐसा भी होता है !

                        जीवन में मूल्य और सिद्धांतों की बलि चढ़ा मेरा करियर में एक महत्वपूर्ण घटना यह भी है , मुझे इससे कोई शिकायत नहीं है लेकिन ये आज भी मुझे कसक दे जाती है तो सोचा आप सबसे बाँट लूं. 
                         मैं उस समय एक डिग्री कॉलेज में राजनीति शास्त्र विभाग में मानदेय पर प्रवक्ता पद पर कार्य कर रही थी. शायद विभाग में सबसे अधिक डिग्री मेरे पास ही थीं लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था. क्योंकि मानदेय प्रवक्ता किस दृष्टि से देखे जाते हैं ये इसके मुक्तभोगी अधिक अच्छी तरह से बता सकते  है. मेरे विभागाध्यक्ष ने कहा कि मैं इस साल रिसर्च का पेपर लगवाना चाहता हूँ क्योंकि अभी तक इसको पढ़ाने वाला कोई नहीं था और आप रिसर्च पढ़ा सकती हैं. पेपर भी स्कोरिंग होता है रिजल्ट भी अच्छा रहेगा. मुझे रिसर्च में अधिक रूचि थी तो मैंने उनसे सहमति व्यक्त कर दी. जब कि मुझे मालूम था कि इस पेपर को लेने वाले बच्चों को पढ़ाई से लेकर उनके लघुशोध  तक का काम मुझे ही अकेले देखना होगा . पर मेरा अपने काम के प्रति समर्पण कभी भी कम नहीं रहा. मैंने जो भी काम किया पूरी लगन और रूचि से ही किया. 
                        करीब २० बच्चों ने रिसर्च का पेपर लिया और उन सबको मैंने उनके लघुशोध के लिए पूरा पूरा सहयोग किया. उनको उनके काम के लिए अगर कहीं और लेकर जाना पड़ा तो मैं बराबर उनके साथ जाकर काम करवाने का प्रयास किया. ऐसा नहीं है कि मेरे इस सहयोग और प्रयास के लिए मेरे छात्र आज भी अगर कहीं मिल जाते हैं तो पूरा सम्मान देते हैं. बात उनके लघुशोध के वायवा की है. परीक्षक ने छात्रों के प्रयास को काफी सराहा. उस समय विभाग के सभी शिक्षकों के अतिरिक्त एक अन्य विभाग के प्रवक्ता जो कि मेरे विभाग के एक प्रवक्ता के मित्र थे वह भी उपस्थित थे. उन्होंने वे लघुशोध उठा कर  देखे उनमें पर्यवेक्षक के स्थान पर सभी में मेरा ही नाम था. ये बात उनको कुछ ठीक नहीं लगी. इससे पहले हमारे विभाग के किसी भी शिक्षक को इस बात पर कोई आपत्ति नहीं लगी क्योंकि सभी को कार्य मैंने ही करवाया था. 
                         परीक्षक के जाने के बाद उन प्रवक्ता महोदय ने अपने मित्र को सुझाव दिया कि ये तो मानदेय पर हैं इस शोध कार्य से इनको कोई लाभ नहीं मिलेगा लेकिन अगर इन सभी शोधों पर आप लोगों के नाम पड़ जाएँ तो ये कार्य आगे आपके वेतनमान के लिए और शोध की दिशा में लाभकारी सिद्ध होगा. फिर क्या था. रातों रात विश्वविद्यालय जाने वाली प्रतियों पर कवर बदले गए और उन पर वहाँ पर स्थायी रूप से काम करने वाले लोगों के नाम डाल दिए गए. ये काम मेरे सामने जब आया तो कहा गया कि विश्वविद्यालय में मानदेय प्रवक्ताओं के शोध मान्य नहीं होंगे. इसके आगे मैं कुछ कह नहीं सकती थी वैसे मुझे वास्तविकता का ज्ञान तो था ही. कॉलेज में रखी गयीं प्रतियों पर आज भी मेरा ही नाम पड़ा हुआ है क्योंकि अगर ये बात छात्रों को पता लग जाती तो शायद बहुत बड़ा बवाल हो सकता था. इस लिए कॉलेज की प्रतियों को जैसे के तैसे ही रहने दिया गया. 
                       ये बात छोटी थी या फिर बड़ी मैं नहीं जानती लेकिन मेरे सिद्धांतों के खिलाफ थी सो मैंने वह कॉलेज छोड़ दिया. फिर भी कॉलेज की इस राजनीति से मेरा मन बहुत दुखी हुआ. क्यों छात्र शिक्षकों के प्रति सम्मान का दृष्टिकोण नहीं रखते हैं शायद ऐसी ही कोई बात उनके सामने भी आ जाती होगी और अपने गुरु के इस तरह से नैतिक रूप से गिरा हुआ देख कर वे सम्मान भी नहीं कर पाते हैं. हम दोष छात्रों को देते हैं.

रविवार, 24 अक्तूबर 2010

छाछ और दूध!

                        वह स्टाफ रूम में पानी के गिलास लेकर जा रही थी और उसके आँचल से टप टप करके दूध टपकने लगा. उसका कलेजा धक् से हो गया. क्या छोटा भूखा है? बड़के ने उसको दूध नहीं दिया होगा? भूल गया होगा? अरे अभी है ही कितने साल का? कुल ४ साल ही का तो है. फिर आँचल लपेट कर वह स्टाफ रूम में घुस ही गयी और टेबल पर गिलास रख कर वापस आ गयी. 
                       अभी कुल ४ महीने का ही तो छोटा है, उसको अभी माँ का ही दूध चाहिए लेकिन किस्मत की मार ने उसके दूध को भी उससे छीन लिया. कैलाश इसी स्कूल में चपरासी था और एक दिन साईकिल  से जाते समय उसको एक ट्रक ने कुचल दिया. वह उस समय १५ दिन के छोटे को गोद में लिए थी. उसका तो घर ही बिखर गया. घर में अब बचा कौन ? बूढी अंधी सास और दो छोटे बच्चे. स्कूल वालों ने कहा कि अभी तुम्हें उसी जगह नौकरी मिल जाएगी तो तुम्हारे बच्चे पल जायेंगे नहीं तो दर दर भटकोगी और ये दुनियाँ वाले तुम्हें जीने नहीं देंगे. तभी उसने छोटे के २ महीने के होते ही नौकरी पर आना शुरू कर दिया था.

                 सुबह खाना बना कर रख देती और खुद रोटियां बाँध लाती. बड़ा दादी को खाने को दे देता और छोटे को दूध बोतल में भर कर पिला देता था. बस इसी तरह से जिन्दगी चलने लगी थी. महीने में इतना मिल जाता कि बच्चों का पेट भर लेती. स्कूल जरूर दूर था पैदल चल कर आती तो एक घंटा लग जाता था लेकिन दो रोटी का सहारा तो था .
                उसका मन आज स्कूल में  नहीं लग रहा था. पता नहीं क्यों छोटा भूखा रो रहा है? छुट्टी की घंटी बजाते ही , वह प्रिंसिपल से बोली की 'बहनजी , हमारी तबियत ठीक नहीं है, हम आज अभी घर चले जाएँ.' उसके व्यवहार और उसकी व्यथा  से सब परिचित थे कि वह नन्हा सा बच्चा घर छोड़ कर आती है इस लिए कोई कुछ न कहता और उसको घर आने की अनुमति मिल गयी.
                घर में कदम रखते ही बड़ा बोला - 'अम्मा आज छोटे ने दूध नहीं पिया और अम्मा खूब रोया , मैंने तो झूले में लिटा कर जोर जोर से झुलाया तो रोते रोते सो गया. छोटे के गालों पर बहे आंसू अब सूख चुके थे. वह दूध के पास गयी तो दूध का बर्तन तो उतना ही भरा था जितना वह छोड़ गयी थी फिर बड़े ने क्या पिलाया? उसने छाछ का बर्तन खोला तो उसमें कम था. आज बड़े ने अनजाने में दूध की जगह बोतल में छाछ भर कर उसको पिला रहा था तभी तो उसने पिया नहीं और भूखे छोटे की भूख उसके आँचल में ढूध के साथ बहने लगी थी. उसने छोटे को उठा कर अपना ढूध पिलाना शुरू तो बड़ा भी आकर वहीं खड़ा हो गया. 'अम्मा मैंने इसको दूध पिलाया था इसने पिया नहीं - अम्मा क्यों नहीं पिया इसने? ' उसने बड़े को भी खींच कर अपने गले से लगा लिया और उसकी आँखों से आंसूं बहने लगे. माँ को रोता देख कर बड़ा बोला - 'सच्ची अम्मा मैंने इसको दूध पिलाया था. तुम क्यों रो रही हो? मैं बोतल लाता हूँ.' 

'नहीं मेरे लाल , मैं जानती हूँ कि तूने इसे दूध पिलाया था और इसने नहीं पिया.' पर  वह  इस लिए नहीं रो रही थी . वह  तो अपनी किस्मत पर रो रही थी . इतना छोटा बच्चा छाछ और दूध का अंतर क्या जाने?

बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

न आया वो दिन.........!

                पिछले चौदह वर्षों से जिस माँ का बेटा अपनी बचपन की एक नादानी के कारण जेल की सलाखों के पीछे जीवन गुजार रहा हो, उसके लिए ये राम के वनवास जैसा पहाड़ सा कालखंड कितना कष्ट देता होगा . इस बात का अहसास उस माँ के अतिरिक्त कोई भी नहीं लगा सकता है. उसने अपने बेटे के जेल से बाहर आने के दिन को सौ सौ साल के बराबर लम्बा मान  कर काटे और जब वह दो दिन बाद जेल से बाहर आने वाला था घर में तैयारी चल रही थीं. वह बेटा जो सिर्फ १८  वर्ष २ दिन का था तब जेल चला गया था और अब ३२ साल का होकर बाहर आ रहा है. इतने वर्षों में कोई ख़ुशी नहीं मनाई गयी - कोई शादी ब्याह नहीं , कोई त्यौहार नहीं , दिवाली तो पर्व है सो दीपक जला लिए लेकिन होली खेलना ही भूल चुके थे. 

                  **चित्र  गूगल   के  साभार 
    घटना के बाद पिता की अकूत संपत्ति भी ख़त्म होने लगी थी. बहुत पैसा कमाया था - आयकर अधिकारी जो थे, किन्तु वो ऐसे जाएगा ऐसा नहीं सोचा था. मुकदमेबाजी में सब कुछ ख़त्म होने लगा और इस घटना के बाद तो उनकी प्रतिष्ठा भी गिरने लगी थी. मोहल्ले में कटाक्ष और व्यंग्य सुने नहीं जाते थे . संयुक्त परिवार के चारों भाइयों ने पैतृक मकान बेच कर अलग अलग दिशाओं में रुख कर लिए और मकान के ख़त्म होने के साथ ही शायद दिल भी दूर हो गए. जिन्दा सभी थे क्योंकि जीवन और मृत्यु अपने हाथ में नहीं होती और वह इस आशा में जी रहे थे कि रवि लौटेगा तो यह घर फिर से खुशियों से भर जाएगा. 
         *                  *                   *                    *                    *
        चौदह साल पहले सब भाई एक साथ एक ही घर में अपने माता पिता और बच्चों के साथ रह रहे थे. बड़ा सा पैतृक मकान और सभी भाइयों के बच्चे ऐसा सोच ही नहीं पाते थे कि हमारे पिता अलग अलग हैं. सबमें गहरा प्यार था. सभी बच्चे लगभग हमउम्र थे, साथ खेलना और साथ स्कूल जाना, खाना पीना वे अलग होते ही कब थे. सब एक कमरे में सोते और धमाचौकड़ी मचाया करते. अगर कोई छोटा लड़ता तो बड़े भाई रवि के पास पहुँच जाते और वह सबका निपटारा करता था. 
           रवि १८ साल और २ दिन का हुआ था. अभी परसों ही उसका जन्मदिन धूमधाम से मनाया गया था. उस दिन वह अपने कॉलेज से आया था. उसका बी एस सी में एडमीशन हुआ था. घर के बाहर पड़ोसी के बच्चे और उसके छोटे भाई खेल रहे थे. खेलते खेलते बच्चों में लड़ाई हो गयी और वे गुत्थमगुत्था होने लगे और देखते ही देखते रवि के चचेरे भाई के सीने पर पड़ोसी का बेटा चढ़ गया और उसका गला दबाने लगा. उसे लगा कि ये तो मर जाएगा. उसने उसको तितर बितर करने के लिए एक ईंट का बड़ा सा टुकड़ा ऊपर से नीचे फेंका और ये क्या वह टुकड़ा तो सीने पर बैठे हुए बच्चे के सिर पर ही लगा और सिर से खून का फव्वारा बह निकला. सारे बच्चे भाग गए. उस बच्चे को लेकर अस्पताल भागे किन्तु उसने बीच में ही दम तोड़ दिया और बच्चों के खेल में हत्या का इल्जाम रवि के सिर पर आ गया. 
          पड़ोसी भी बड़ा व्यापारी था उसने रवि और उसके एक सगे और एक चचेरे भाई को नामजद किया. सभी बच्चे जेल में पहुँच गए.
            उस बच्चे की अंत्येष्टि में सभी लोग गए क्योंकि यहाँ कोई दुश्मनी नहीं थी. मृत बालक के पिता ने उसी जगह सबके सामने कसम खाई कि "जैसे मैं अपने बच्चे को खोकर रो रहा हूँ, एक दिन वैसे ही तुमको भी रुलाऊंगा."
             ये बात सब लोगों ने एक पिता के ह्रदय पर लगे आघात का असर समझ कर भुला दी. फिर मुकदमे बाजी शुरू हो गयी. कोई भी पैसे से कमजोर न था . इनके तीन बच्चों में दो नाबालिग थे सो उनको छोड़ दिया गया किन्तु रवि बालिग ही नहीं उसको अपराधी भी मना जा रहा था , उसकी जमानत नहीं होने दी उनलोगों ने. पड़ोसी के प्रभाव से भयभीत होकर और बच्चों के जीवन को देखते हुए ही उस घर को बेचने का निर्णय लिया गया. रवि को आजीवन कारावास कि सजा सुना दी गयी.
                                **चित्र  गूगल   के  साभार         *                   *                 *                      *                    *
              रवि जेल के जीवन में रम गया क्योंकि वह कोई अपराधी प्रवृत्ति का लड़का नहीं था, उसको जमानत मिल सकती थी लेकिन अपने पैसे और प्रभाव से दूसरे पक्ष ने उसको बाहर नहीं आने दिया. अपने भाग्य के लेख मान कर वह वही आगे पढ़ने की तैयारी करने लगा और उसने ग्रेजुएशन कर ली. एक सभ्य परिवार का लड़का अपने आचरण से जेल में बहुत पसंद किया जाता था. उसको जेल के अस्पताल में दवा बांटने का काम दे दिया गया. उसने अपने काम में ही रूचि लेनी शुरू कर दी. कभी जब भी माता पिता आते तो वह हमेशा यही कहता - 'पापा मैं बिल्कुल ठीक हूँ, आप चिंता न करें.'
'मम्मी आप अब रोया मत कीजिये, शायद यही मेरे भाग्य में लिखा था. आप खुश रहिये कि आपका बेटा यहाँ भी सबके लिए काम कर रहा है.'
                  उसकी पसंद का खाना बनता तो माँ से खाया न जाता और वह चुपचाप खिसका कर उठ जाती. उसके दिन तो बेटे के घर वापस आने के इन्तजार में  कट रहे थे.  दिन , महीने, और वर्ष अपनी गति से गुजरते जा रहे थे. न काल की गति रुकी और न ही जीवन चक्र. छोटे भाई बहन सब पढ़ लिख कर तैयार हो गए थे. सब इसी इन्तजार में थे कि रवि घर आएगा तो उसकी शादी कर देंगे. वह कोई अपराधी तो है नहीं और कई लोग तैयार भी थे. फिर कोई बिजनेस करवा देंगे. 
                  उस दिन के आने के ठीक दो दिन पहले जेल से फ़ोन आया कि ' आप लोग जेल पहुँचिये , आपके बेटे कि तबियत ख़राब हो गयी है.'
               वह सब बदहवास से जेल की तरफ भागे तो उन्हें वहा अपना बेटा नहीं मिला बल्कि उसका शव मिला. सारा परिवार स्तब्ध कि आख़िर हुआ क्या था? जेल अधिकारियों के पास इसका कोई भी जबाव नहीं था . शायद फूड प्वाजनिंग हो गयी थी या फिर कुछ और वे नहीं बता सके. आखिर दौलत के लम्बे हाथों के नीचे जेल प्रशासन  दब गया और दुश्मनों ने जो शायद इसी दिन के इन्तजार में थे अपनी चाल चल ही दी. वे ठगे से रह गए. किससे क्या कहें? किसको गालियाँ दें? किसको कोसें? कौन अब उनके बेटे को वापस लगा सकता है?
                 ये सिर्फ फिल्मों में ही देखा जाता है , किन्तु ये एक उस जीवन कि हकीकत है - जो अपने जीवन में कुछ देख ही नहीं पाया और माँ बाप जीवन भर का सदमा लेकर टूटे हुए जीवन के दिन पूरे कर रहे हैं और अब तो कोई इन्तजार भी नहीं बचा है. 
                आख़िर वह दिन आया ही नहीं.......................
             

रविवार, 17 अक्तूबर 2010

आज भी ...........!

                   क्या आज भी  हम वहीं है , जहाँ हम आज से पचास साल पहले थे. इसका ताजा उदाहरण मैंने देखा --
मेरी बहुत करीबी की बहू अपने विवाह के २ साल बाद ही विधवा हो गयी. उसके पास एक साल का बेटा भी था. सारे घर वालों और रिश्तेदारों में एक प्रश्न चिह्न था कि अब क्या होगा? इतनी सी उम्र में लड़की विधवा हो गयी वह  माँ भी है. लेकिन मेरी उन रिश्तेदार ने बहुत ही बहादुरी से काम लिया, उन्होंने संस्कार के समय बहू को छोटी सी बिंदी और दो दो चूड़ियाँ दीं और कहा  कि तुम मेरी बहू ही रहोगी. लेकिन उन्होंने अपने मन में बेटे के शव उठाने से पहले ही संकल्प कर लिया था कि वे अपनी बहू को छोटे बेटे से ब्याह कर इसी घर में रखेंगी और उसके बेटे को बाप का प्यार मिलेगा और बहू को जीवन भर एक अभिशप्त जीवन नहीं गुजरना पड़ेगा. 
              उस दिन उस स्थिति में पड़ोसी और रिश्तेदार कितने प्रश्नों के साथ वहाँ खुसर पुसर कर रहे थे --
'पता नहीं कैसी किस्मत है इस लड़की की?'
'अब इसका क्या होगा?'
'बच्चा ले जाएगी या फिर छोड़ जाएगी?'
'दूसरी शादी कौन करेगा? बच्चे वाली है.' 
               इन प्रश्नों से जुड़े लोग पढ़े लिखे और समझदार कहे जाने वाले थे. लेकिन वे उस माँ के निर्णय से वाकिफ न थे.
उन्होंने बहू को मायके भी नहीं भेजा और स्वयं  भी बहू की तरह ही सादा रहने लगी, उन्होंने एक साल तक कोई शादी विवाह या अन्य उत्सव में जाना बंद रखा क्योंकि वह जानती थी कि कहीं भी जाने पर उनको कम से कम अच्छे कपड़े और जेवर तो पहने ही पड़ेंगे और इससे उनकी बहू को दुःख होगा. एक साल बीतने पर उन्होंने अपने बड़े बेटे की बरसी की और फिर आर्य समाज मंदिर में छोटे बेटे के साथ शादी कर दी. 
              इस शादी के बाद उनकी देवरानी ने अपने घर में पूजा रखी , जिसमें सुहागन औरतें ही शामिल होती हैं. उसमें अपनी जिठानी को भी बुलाया और बहू को भी, लेकिन पूजा में शामिल होने के वक्त अपनी जेठानी से बोली - "इसमें आप शामिल हो जाइये और बहू को रहने दीजिये." 
              उनका आशय यह था कि बहू तो विधवा हो चुकी है तो उनको अभी भी सधवा स्वीकार्य नहीं है. उनकी जेठानी एकदम उठ कर खड़ी हो गयी - "मैं क्यों और मेरी बहू क्यों नहीं? अगर बहू नहीं तो मैं भी नहीं. तुमने क्या इसका अपमान करने के लिए यहाँ बुलाया था. वह मेरे छोटे बेटे कि पत्नी है और आइन्दा से मुझे भी बुलाने की जरूरत नहीं है." 
               हम कहाँ से कहाँ पहुँच रहे हैं और हमारी सोच कहीं कहीं हमें कितना पिछड़ा हुआ साबित कर देती है? हमें अपने पर शर्म आने लगती है.

बुधवार, 6 अक्तूबर 2010

वसीयत !

           सबसे पहले मैं बता दूं किये कहानी बिल्कुल भी नहीं है बल्कि हाल ही में घटी एक सच्ची कहानी है. वैसे कहानियां आती कहाँ से हैं? लेकिन जब अपने घर और परिवार के करीब घटती है तो लिखना अधिक मुश्किल होता है. फिर भी कलम जब मुझे नहीं छोड़ती है तो फिर रिश्तों का लिहाज कर करेगी.

                        कभी कभी ऐसा होता है कि जिसके लिए कोई तैयार नहीं होता, शायद भाग्य के लेख ऐसे होते हैं या ईश्वर कि मर्जी ऐसी होती है कि इंसान को उसकी नेकी और खुद्दारी के जीवन जीते हुए ही बिना किसी के हाथ से कुछ भी मांगे चल देता है और तब यही कहना होता है कि उस ईश्वर ने उसका मान रख लिया. यह भी कहने का मन होता है कि हाँ इस तरह तूने न्याय किया भगवान. 
                     उस दिन सुबह फ़ोन कि घंटी से ही नीद खुली --"रात में ....मामाजी नहीं रहे."
"अचानक?" इनके मुँह से निकला .
"हाँ कुछ ऐसा ही समझ लो."
"उनके पास कौन था?" हमें पाता था कि मामाजी अकेले ही रहते थे.
"मैं."
                सूचना देने वाले इनके मामा के बेटे थे. दिवंगत आत्मा के हमराज और हमउम्र भांजे थे. मामाजी का बचपन और पढ़ाई अपनी बहन के यहाँ हुई थी और इससे भांजे से उनके आत्मीय सम्बन्ध आरम्भ से ही थे. मेरे पतिदेव भी और बच्चों कि तरह से ननिहाल जाते ही थे तो उनसे बहुत छोटे होने पर भी उनकी आत्मीयता अच्छी ही थी.
                  यहाँ के पौश  इलाके में उनकअ तीन मंजिल का मकान है और उसमें वे और उनके किरायेदार ही रहते थे. उनके तीन बेटे - एक आयकर अधिकारी (परिवार यही पर रहता है). दूसरा आई जी बाहर तैनात और तीसरा सी बी आई अफसर और वह भी बाहर. बेटे और डॉक्टर दामाद यहीं पर हैं. प्रशासनिक पद से सेवानिवृत - अपने जीवन में बहुतों का जीवन संवर दिया, जिनको लगवा सके नौकरी में लगवा दिया. करोड़ों कि संपत्ति. जिस रिश्तेदार को जरूरतमंद समझ दिल खोलकर सहायता की. बच्चों कि शादी के बाद ही मामी का निधन हो गया था सो वह अकेले ही रहते थे.
                  कोई उनके साथ रहने को तैयार नहीं था, जो बाहर थे वो बाहर थे. कभी जाना हुआ और लगा कि इनको लग रहा है कि उनकी स्वतंत्रता में खलल पड़ रही है तो तुरंत ही चल दिए. फिर अपने शहर और घर से प्यार किसे नहीं होता? शहर वाले भी नहीं रखना चहेते थे रखते क्या उस घर में ही नहीं रहना पसंद था. सो अलग अपनी कालोनी में रहते थे. हम ठहरे रिश्तेदार सो मामा कि भी सुनी और उनके बेटों कि भी लेकिन निर्णय लेने कि क्षमता थी .
                   मौत  वाले दिन का वाक्य  था, उन्होंने  अपने भांजे को फ़ोन किया कि मैंने  डॉक्टर से समय  ले  लिया है और aaj रात १० बजे का समय दिया है. तुम आ जाना तो मेरे साथ चलना. पास ही बहू और पोते सब रहते हैं लेकिन किसी को बताने कि जरूरत नहीं समझी और न ही सूचना देने कि जरूरत समझी. जब भांजे पहुंचे तो उन्होंने बताया कि आज सुबह मुझे खून कि उलटी हुई है इसी लिए मैंने डॉक्टर से समय लिया . लौटने में हमें देर हो जाएगी इस लिए तुम रात मेरे पास ही रुक जाना. स्थिति गंभीर समझ कर भांजे ने उनके बेटे को फ़ोन किया तो पाता चला कि वे बाहर से अभी आये हैं और थके हुए हैं. इसलिए डॉक्टर को आप ही दिखा आइये मैं सुबह आऊंगा .
                   जब रात जाने का समय आया तो भांजे से बोले - 'देखो सुबह से दुबारा तो मुझे कोई परेशानी हुई नहीं है, अब लौटने में भी बहुत देर हो जाएगी फिर रिक्शे से चलना होगा. सुबह चलेंगे . '
                   खाना खाकर बोले टी अब तुम भी सो जाओ और मैं भी सोता हूँ. दोनों ही सो गए. पता नहीं कब रात उन्हें एक बार खून कि उलटी हुई , वह उठकर बेसिन तक गए और फिर जब दुबारा हुई तो वे लौटकर  सोफे  पर ही बैठ  गए और भांजे को हिलाया  भर भांजे उठ  गए तो वे होश  में थे और बोले मुझे फिर उलटी हुई है और आँखें   बंद   कर ली . फिर वे चिरनिद्रा  में चले  गए. भांजे घबरा  गए और उन्होंने किरायेदार को बुलाया  . उसके  बाद  उनके बेटे को फ़ोन किया, वह गाड़ी  लेकर  आया और नर्सिंग  होम  ले  गए वहाँ  डॉक्टर ने उन्हें मृत  घोषित  कर दिया.
                        रात के दो  बजे थे , बाकी  बेटे और बेटी  को भी खबर  कर दी  गयी . जो जहाँ  था वहाँ  से अपनी गाड़ी  से या फ्लाईट  पकड़  कर आ गए. शाम  4 बजे वह पंचतत्व  में विलीन  हो गए.
                        सभी  बच्चे  अच्छी  ही नहीं बल्कि बहुत अच्छी  स्थिति में थे लेकिन शायद पैसा  ऐसी चीज होती है कि जहाँ  सारे  रिश्ते  पड़ोसियों  से भी बदतर  हो जाते हैं. उन्हें पंचतत्व  में विलीन  हुए अभी कुछ ही घटे  हुए थे. सभी  बेटे बहुएँ  और बेटी  घर में थे. बड़े  होने के नाते  और मामाजी से सबसे घनिष्ठ  और आत्मीय होने के नाते  भांजे भी रात में वहीं  रुके   हुए थे.  वे मामा के राजदार   भी थे.
                       वे सो गए तो हाल में जोर  जोर  से बोलने  की  आवाजें  आ रही थी, बीच  में नीद टूटी  तो सोचा  कि पिता  और ससुर  की मृत्यु  के बाद  नीद नहीं आ रही होगी  तो सभी  एक साथ बातें  कर रहे होंगे . तब तक वे भी चैतन्य  हो चुके  थे और आवाजें उनको साफ साफ उन्हें  देने लगी थीं.
---मम्मी के मरने पर सारी सदियाँ आप ही लेकर गयीं थी.
==वो मम्मी ने पहले ही पापा को बोल दिया था कि ये सदियाँ मुझे दे दी जाय.
--अब क्या और चाहती  हैं , आपके  तीनों  बच्चों  की  शादी  में  पापा ने कितना  खर्च  किया  था? अब भी  लेना  चाहती  हो .
--उससे  क्या? वो उन्होंने  अपनी  मर्जी   से  खर्च  किया  था.
--अब मम्मी के जेवर  से  भी   कुछ  और चाहिए  ?
--देखती हूँ  कि क्या लेना  है ?
--पापा कि वसीयत  जो  भी  हो , हम  सब  आपस  में  सहमति  से  बाँट  लेंगे .
--ऐसा  क्यों ? फिर  वसीयत  का  मतलब   क्या हुआ ?
--कुछ  भी  हो , उन्होंने  हम  सबको  कभी बराबर  नहीं  समझा , हमेशा  मुझे दूर  दूर  रखा 
--क्यों कभी ये सोचा तुमने?
--  हाँ , क्योंकि हम उनकी तानाशाही के नीचे सांस नहीं लेना चाहते थे, हम यहाँ होकर भी उनसे अलग रहे. क्या बुरा किया तुम लोग तो बाहर रहकर स्वतन्त्र हो कर जी रहे हो और हम उनके शासन  में रहें.
--एक जगह रहने से कुछ तो तकलीफ होती ही है लेकिन फर्ज भी कोई चीज होती है.
--फर्ज तो सभी के हैं, दीदी भी तो यहाँ है कभी ले जाती उनको और रखती अपने पास.
--वो मेरे घर रहना नहीं चाहते थे, बेटी का घर जो था.
--वाह ! देने के लिए बेटी पहले और करने  के लिए बेटे . ये अच्छा सिद्धांत है.           
--मेरे पापा को देखो रिटायर  होने पर दोनों बेटों को बराबर बराबर बाँट दिया है.
--और आगे उसके बाद वृन्दावन में आश्रम में रह रहे हैं, अब कोई पूछता भी नहीं है उंको.
--वो तो अपनी मर्जी से गए हैं, सेवा भाव से  वर्ना उन्हें क्या कमी है?
--बस बस रहने दो.
              भांजे इन सब बातों आजिज आ गए और वह हाल के दरवाजे पर आकर खड़े   हो गए.   उनसे  रहा नहीं गया  -- 'बस करो  तुम  लोग  इतने  अच्छे   अच्छे   जगह  पर हो  और पैसे  की  भी कोई कमी नहीं है, फिर  भी इस  तरह  से लड़  रहे  हो . are  उनकी  चिता  की  रख  तो ठंडी  हो  जाने  देते  . अरे  लड़ो  तो इसपर  की उनकी  अश्थियों  को ठिकाने  कौन  lagayega . तुम्चार  हो  अरे  सब उसको  बाँट कर  चारों  धाम  में जाकर  विसर्जित  करते  तो शायद  उन्हें अब तो शांति  मिल  जाती . अगर  वह भी न  कर  सको  तो   मुझे  दे  देना  मैं  कर  दूंगा .'
                 उनको  गुस्से  में देख  कर  सब धीरे  धीरे  खिसक   लिए  क्योंकि  मामा  के अन्तरंग  और हमराज  होने के नाते  सभी  उनकी  इज्जत  तो करते  ही थे . वे  सोफे  पर सिर  पकड़  कर  बैठ  गए. उनके  दिमाग में ये चल  रहा  था  कि  अभी  जब  इनको  वसीयत  के बारे  में कुछ  पता नहीं है  तब  तो ये हाल है और अगर  इन्हें  उसके बारे  में पता  चल  गया  तो क्या होगा ? 
  वास्तव   में मामा  की  वसीयत  के एक  गवाह  वह भी थे  और मामा  ने  अपने  बच्चों  को उसमें  कुछ  भी नहीं दिया था . मामा  की  वसीयत  थी  --
                                          'मेरी  चल  अचल  संपत्ति  से मेरे बेटे और बेटी  को कुछ  भी  नहीं दिया जाएगा . मेरी  जो  भी संपत्ति  शेयर , मकान और बैंक बैलेंस है वह अमुक  ट्रस्ट  में जमा  कर  दिया जाएगा  और उसकी  जिम्मेदारी  है कि  मेरे मकान  के नीचे  के हिस्से  में एक  वृद्धाश्रम  खोल  दे . जिसमें  मेरे जैसे  उपेक्षित  वृद्धों  को रहने दिया जाएगा  और वे  सभी  वृद्ध   अगर  सक्षम  हैं तो अपनी संपत्ति  इस  ट्रस्ट  में जमा  कर  दें  ताकि  इसका  खर्च  उठाने  में को भी परेशानी  न  हो . शेष  मकान  का  किराया  और इस  आश्रम की व्यवस्था  ट्रस्ट ही  देखेगा  . मेरे पैसे  से ट्रस्ट  गरीब  लड़कियों  की  शादी  की   व्यवस्था  भी करेगा . इस  धन  के संचय  और व्यय  की  जिम्मेदारी  इस  ट्रस्ट  की  रहेगी  . अगर  मेरे बच्चों  में से कोई इसके  बाद इस  ट्रस्ट  में अपनी सहयोगत्मक  सेवाएं  देना  चाहें  तो उनको  इसमें  सदस्यता  प्रदान  की  जा  सकती  है. '

शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

शास्त्री जी को नमन !

      
         आज का दिन जितने जोर शोर से गाँधी जयंती के लिए तैयार किया जाता है तो उसकी धूमधाम  में देश का ये छोटे कद का सपूत कहीं दिखाई नहीं देता है. गाँधी की छवि ने उसकी छवि को धूमिल कर दिया हो ऐसा नहीं है लेकिन हम ही उसको भूल जाते हैं . वे एक ऐसे महापुरुष थे , जो खामोश रहते हुए बहुत कुछ कर गए. महापुरुष कहलाने के लिए अनुयायिओं की एक सेना लेकर चलने कि जरूरत नहीं होती बल्कि एक व्यक्तित्व होता है और ओजस्वी वाणी. बहुत थोड़े समय के लिए वे प्रधानमंत्री बने लेकिन वे देश के अब तक के सबसे गरीब प्रधानमंत्री हुए. जब देश की बागडोर उन्होंने संभाली तो देश एक साथ कई विभीषिकाओं से जूझ रहा था , जिनमें खाद्य समस्या और सीमा पर पाकिस्तानी गतिविधियाँ प्रमुख थी. उन्होंने देश को जिस ढंग से एक सूत्र में बाँध  कर सिर्फ युद्ध ही नहीं जीता बल्कि खाद्य समस्या से लड़ने के लिए देशवासियों को इस तरह से तैयार किया कि हम जीत गए. 
                          मैं अपने बचपन की उनके इस प्रयास से जुड़ी एक घटना प्रस्तुत कर रही हूँ. बात १९६५ की है, मैं बहुत छोटी थी किन्तु स्मृति में अभी भी शेष है. शास्त्री जी का आगमन हमारे गृह नगर जालौन में हुआ था और मैं अपने माँ और पापा के साथ उरई से जालौन उनका भाषण सुनने के लिए गयी थी. वह कोई चुनावी भाषण नहीं था, वादों की श्रंखला लिए कोई बहलाने वाली सभा भी नहीं थी. वह तो था उस समय देश में विकराल रूप लिए हुए खड़ी "खाद्य समस्या" से लड़ने का आह्वान . शास्त्री जी ने उस विशाल जनसमूह के सामने आग्रह किया कि अगर आप सभी लोग सप्ताह में एक दिन व्रत रखने का संकल्प करें तो इससे बचने वाले अन्न से हम अपनी समस्या को कुछ कम कर सकते हैं. उन्होंने उन लोगों से हाथ उठाने को कहा जो इस कार्य के लिए संकल्प ले रहे थे. मैंने भी हाथ उठाया था. मैंने सोमवार को व्रत रखने की सोची . माँ पापा ने समझाया कि उन्होंने तो बड़ों से कहा था तुम तो बहुत छोटी हो लेकिन मैंने हाथ उठाया था तो मैंने कहा कि मैंने भी हाथ उठाया था तो मैं भी व्रत करूंगी. उसके बाद मैंने कई वर्षों तक व्रत रखा. वह घटना मुझे आज भी याद है और उस तेजस्वी व्यक्तित्व की छवि आज भी मन में उसी तरह से अंकित है. 
                          अपने प्रधान मंत्रित्व काल में जब पाकिस्तान ने युद्ध छेड़ा तो कमान उनके हाथ में थी और उस समय देश की सीमा पर अपने दायित्व निभाने वाले जवानों और देश के लिए अन्न उपजाने वाले किसानों दोनों को ही उनके  दायित्व से जुड़े कर्तव्यों को सम्मान देते हुए "जय जवान जय किसान " का नारा दिया था.  शत्रु को परास्त करने के बाद विजय पताका भारत ने फहराई थी और इसके बाद भी रूस के मध्यस्थता में भारत और पाकिस्तान के मध्य युद्ध संधि हुई और जीते हुए क्षेत्र को उन्होंने लौटा दिया. रात संधिपत्र पर हस्ताक्षर हुए और फिर वे सदा के लिए १० जनवरी १९६६ की रात सो गए. वह कोई षड़यंत्र था या हमारा दुर्भाग्य कि हम देश के उस होनहार लाल को खो बैठे. 
                         उनके निधन के बाद उनकी पत्नी ललिता शास्त्री ने "मेरे पति मेरे देवता " नाम से  उनके सम्पूर्ण जीवन का वृतांत लिखा जो "साप्ताहिक हिंदुस्तान " में धारावाहिक के रूप में प्रकाशित हुआ. उससे उनके सम्पूर्ण जीवन वृतांत पढ़कर और मन श्रद्धा से भर उठा. वे ही एक ऐसे प्रधानमंत्री थे जो कर्जदार ही चले गए. बहुत वर्षों बाद ये मामला संज्ञान में आया कि शास्त्री जी ने शायद अपनी बेटी के शादी के अवसर पर स्टेट बैंक से कर्ज लिया था जो वे नहीं चुका पाए और उनका निधन हो गया. जब पता चला तो देने वाला जा चुका था. और बैंक ने वह कर्जा माफ कर दिया.
                        आज मैं उनके जन्म दिन पर शत शत नमन करती हूँ और सोचती हूँ कि काश उसके बाद और एक शास्त्री भारत को मिला होता तो आज इसकी तस्वीर शायद कुछ और होती.

सोमवार, 13 सितंबर 2010

हिंदी दिवस २००६ : मौत के साए में !

        किसी दिन से ऐसी यादें जुड़ जाती हैं कि कभी पीछा नहीं छोड़ती हैं. ऐसा ही था २००६ का हिंदी दिवस.  उस बार मुझे हिंदी दिवस पर निर्णायक के लिए आमंत्रित किया गया था और मैं खुश थी. 
            उसके ठीक कुछ दिन पहले ही २ सितम्बर को हम अपनी छोटी बेटी सोनू का दिल्ली में एडमिशन करवा कर आये थे. बड़ी बहन फ़ाइनल इयर की परीक्षा दे रही थी और इसने प्रवेश लिया. हॉस्टल नहीं मिला था सो बहन के साथ ही रह रही थी. कुल एक हफ्ता ही हुआ था कि उसको वहाँ पर बुखार और उलटी ने घेर लिया. पहले वही इलाज करवाया लेकिन जब स्थिति बहन के वश के बाहर हो गयी तो एक रात फ़ोन आया - 'पापा आप सोनू को यहाँ से ले जाइए, हम अब नहीं संभल पा रहे हैं, पेपर भी हो रहे हैं.' 
हम दोनों दूसरे ही दिन १० सितम्बर को जाकर उसे कानपुर ले कर आये. उसकी अपने से चलने की भी स्थिति नहीं रह गयी थी फिर भी ट्रेन में लिटा कर किसी तरह से कानपुर लाये और स्टेशन से ही ambulance से सीधे नर्सिंग होम ले गये. उसको डॉक्टर ने देखते ही HDU ( High Dependency Unit ) में भेज दिया. उस नर्सिंग होम से मेरे पतिदेव जुड़े हैं इस लिए सब कुछ घर जैसा ही था. दो दिन तक डॉक्टर ने प्रयास किया लेकिन हालात लगातार बिगडती जा रही थी और स्थिति ये कि उसके पूरे शरीर में मशीनें ही मशीनें  लगीं थी. हमारी नजर उस पर नहीं बल्कि  उसके शरीर से जुड़ी मशीनों पर रहती थी कि नाडी , ब्लड प्रेशर, दिल की धड़कन सब कैसे चल रहे हैं? फिर १४ सितम्बर का वह दिन डॉक्टर ने कहा - 'हम पूरी कोशिश कर रहे हैं, अगर मनमोहन सिंह भी इस स्थिति में होते तो उनका भी यही सबसे अच्छा ट्रीटमेंट होता.' 
              किसी डॉक्टर का ये कथन मरीज के माँ बाप के लिए क्या हो सकता है? फिर वह बाप जो इन स्थितियों से रोज ही दो चार होता रहता हो. उसके प्लेटलेट्स बराबर गिर रहे थे और उसका ब्लड ग्रुप AB + था , फिर हमें फ्रेश प्लाज्मा ही चाहिए था.
इतना आसन नहीं होता कि इस तरह से ब्लड डोनर को खोजना. पहले डोनर थे मेरी बेटी के सहेली के मामाजी, लेकिन एक से क्या होता? उसी दिन आई आई टी से मेरी सहेली देखने के लिए आई और उनसे आई आई टी में ब्लड के लिए मर्सी अपील मेल भेजने के लिए कहा. उनके पतिदेव डॉ. के. के सक्सेना ने अपना संपर्क देकर मेल भिजवाई और फिर शायद ये हमारा भाग्य था कि वहाँ के छात्रों ने संपर्क किया और डॉ. सक्सेना उनको अपनी गाड़ी से लेकर मेडिकल कॉलेज तक लाते और ब्लड देने के बाद वापस ले जाते . प्लाज्मा मेरे पतिदेव वहाँ से नर्सिंग होम तक लाते . ये क्रम पूरे एक दिन चला शाम तक उसके प्लेटलेट्स गिरने कम हो गए और फिर देर रात एक बाद उनमें बढ़ोत्तरी होना शुरू हो गयी. हर आधे घंटे में ब्लड का सैम्पल लिया जाता था और उसकी सिसकी ही इस बाद की गवाह होती कि वो हमारे बीच है. फिर इस जंग से जीत की घोषणा डॉक्टर ने आकर की - 'अब हम जीत गए , सोनू के प्लेटलेट्स बढ़ने शुरू हो गए.' वहाँ से उसको लाने की स्थिति में हमें ३ दिन और लगे . हम १७ सितम्बर को सोनू को घर लेकर आये. इस बीच पूरे एक हफ्ते मैं ऐसे ही उसके सामने पड़ी एक कुर्सी पर बैठी रही शायद इस माँ की तपस्या पर भगवान को दया आ गयी और हम मौत के पंजों से अपनी बेटी को वापस ले आये .

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

सात फेरों का बंधन

              बीमार पति की दवा और १ साल के बच्चे का दूध यही तो उसकी प्राथमिकता थी. सास मालकिन थीं लेकिन लाकर देने वाली वह अकेली थी . मीलों पैदल चलकर मोजा फैक्ट्री की बस मिलती थी तब वह फैक्ट्री पहुँचती थी. घर से निकलने से पहले सास और पति के लिए रोटियां भी तो बना कर रखनी होती थीं और लौटकर फिर वही काम. वह बैल की तरह दौड़ती रही किन्तु कोई उसकी पीठ  पर हाथ फिराकर पुचकारने वाला न था. सात फेरों का बंधन निभा रही थी. हाते में रहने वाले सभी तो उसकी तारीफ करते लेकिन जब सास हाते में बैठ कर कमियों की झड़ी लगा देती न तो सब उठकर चल देते.
                        फिर एक दिन फैक्ट्री से लौटते समय दुर्घटना का शिकार हो गयी. एक हाथ और दोनों पैर में फ्रैक्चर . बस सब कुछ वही रुक गया. बैल की सी दौड़ और सबकी सेवा सुश्रुषा . कुछ मुआवजा मिल गया और सास की जेब में चला गया - मालकिन जो थी. उसके हिस्से में आया -- 'भैंसे कि तरह पड़ी रहती है, दोनों टाइम खाने को चाहिए. तेरे बाप ने नौकर नहीं भेज दिए हैं , जो तुझे बिस्तर पर लिटा कर खिलाएं.'
                       वही पति भी अलग - 'ठीक से सड़क पर चलती होती तो ये दिन न देखना पड़ता .  सारी देह पिराती है ये नहीं कि पूछ  ही ले. कौन कब तक लेटे लेटे खिलायेगा?
                       सुनती और चादर में मुँह ढक कर रो लेती.  उसका बैल से जुटे रहना किसी को नहीं दिखा अब बेबस हैं  तो भेंसे सी लगने लगी  और फिर एक दिन उठी ही नहीं - सात फेरों के बंधन से खुद को मुक्त कर लिया था. जितनी दवाये उसको १५ दिन के लिए दीं गयीं थी. उसने सब एक साथ खा लीं. और कुछ तो कर नहीं सकती थी. अब न भैंसे सा जीवन रहा न बाप का ताना. कुछ बोले उसने गलत किया और कुछ ने कहा - 'आखिर कहाँ तक अकेले लड़ती, लड़ाई तो लड़ी जा सकती है अगर कोई एक भी उसके आंसुओं को पोंछने वाला होता. '

शनिवार, 4 सितंबर 2010

गुरु तुम्हें नमन !

                     वैसे तो जीवन में मनुष्य के लिए पहली गुरु माँ होती है. सबसे पहले उसको ही नमन करती हूँ.
कोई गुरु इतना प्रभावशाली होता है कि जीवनभर याद रह जाता है. वो मेरी गुरु मेरे मानस पटल पर आज भी अंकित हैं और शायद आज मैं जो भी हूँ या कर पा रही हूँ यही उनका सपना था. उनका नाम था "प्रवेश प्रभाकर".
                    वह मेरी क्लास टीचर थी. जब  मैं नवें में थी. वे एक डॉक्टर की  बेटी थी और मेरे घर के ठीक बगल वाले घर में रहती थी. मैं मध्यम वर्गीय परिवार की  लड़की थी और वे हमारी टीचर और उच्च वर्ग से थी लेकिन उन्होंने मुझे हमेशा क्लास में सबसे अधिक पसंद किया और उनकी ये कोशिश रहती कि मैं हर काम में आगे रहूँ. वे मेरी होम साइंस की  टीचर भी थीं. मेरी प्रक्टिकल की  सारी तैयारी में उनका पूरा सहयोग था क्योंकि मैं उतनी तैयारी खुद नहीं कर पाती.. ये बात किसी को भी पता नहीं थी. स्कूल का कोई भी प्रोग्राम हो मेरे को आगे करतीं. मैं उस समय संकोची स्वभाव की थी इसलिए मुझे आगे बढ़ने में संकोच होता था.
                         जब मैं फर्स्ट इयर में आई तो वे फिर मेरी क्लास टीचर बनी. अब उनके पास मुझे प्रोमोट करने का पूरा पूरा मौका था. वे हर स्कूल फंक्शन में मुझे आगे रखने कि चेष्टा करती. मैं कुछ संकोची स्वभाव के कारण आगे कम ही बढती थी, अपने आप तो बिल्कुल ही नहीं. वे कुछ करें या न करें अगर डिबेट प्रतियोगिता होती तो मेरा नाम जरूर देती. मुझे वह घटना याद है जब कि उन्होंने मुझे साफ शब्दों में कह दिया कि वे मुझे बहुत आगे जाने के e सम्भावना देख रही हैं. हम लोग final इयर वालों को farewell दे रहे थे . सभी सीनियर के नाम के साथ टाइटल बोल कर उनको स्टेज पर बुलाना और कार्ड देने का काम होना था. मैं पीछे छिप  गयी थी कि मुझसे न कह दें. उन्होंने सबके पीछे देख कर आवाज डी - 'रेखा , चलो ये टाइटल तुम्हें पढ़ कर देने हैं. ' मुझे नहीं मालूम मेरी चेहरे से प्रतिक्रिया क्या थी? उन्होंने मुझे डांटा - 'क्या ३६ कोने का मुँह बनाती  हो? चलो और पढो.' मैं चुपचाप स्टेज पर पहुँच गयी. तो वह मुझसे बोली - मैं तुममें कुछ देख रही हूँ और चाहती हूँ कि तुम इसको बाहर लाओ. मैं यूँ तुमको नहीं डांटती रहती हूँ.'
                    वह मुझे जीवन भर याद रहा और मैं जहाँ भी पढ़ी मेरी पहचान अपने कॉलेज में इंस्टिट्यूट में अलग रही. अब वो पता नहीं कहाँ होंगी? लेकिन मेरी आदर्श और मुझे सबसे अधिक समझने वाली गुरु मेरी वही थीं और मेरे लिए आज भी श्रद्धा का पात्र  हैं. मैं आज उन्हें याद करके इस दिवस को अपने लिए सार्थक बना रही हूं.

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

क़ानून और जिन्दगी !

           
कुछ हादसे ऐसे हो जाते हैं जो कि सोचने पर ही नहीं लिखने पर भी मजबूर कर देते हैं, वह भी जब कोई बहुत अपना हो.
                  घटना कल ही रात की है, रात १२ बजे हमारे मोबाइल की घंटी बजी - हम सो चुके थे - 'अंकल मेरा एक्सिडेंट हो गया है और मेरे दोस्त मुझे कुलवंती हॉस्पिटल  ले गए उन्होंने वापस कर दिया कि पुलिस केस है. पहले FIR   दर्ज करवाओ फिर आना. अब main रीजेंसी पहुंचा हूँ, बतलाइए मैं क्या करूँ?'
            मेरे पति ने उससे पूछा कि कोई ब्लीडिंग तो नहीं है, ब्लीडिंग नहीं थी उसको शायद fracture हुआ था लेकिन वह बहुत डरा हुआ था. मेरे पति ने कहा कि तुम घर आ जाओ, अगर वहाँ भी गए तो वे लोग तुमसे २-४ हजार रुपये ऐंठ लेंगे और कुछ भी नहीं करेंगे. मैं घर पर देख लूँगा. वह जब घर आया तो उसको काफी चोट थी. उसकी फर्स्ट ऐड करके दवा दे दी गयी और हम घर वापस आ गए.
                   इसके ठीक एक दिन पहले की बात है, एक विधवा परिचित का बेटा अपनी बहन को लेकर शहर में जा रहा था और किसी दूसरी बाइक ने गलत मोड़ लेकर उसको टक्कर मार दी. वह गाड़ी से घिसटता हुआ २ मीटर तक चला गया. उसके दोनों हाथ चेहरा और पैर बुरी तरह से जख्मी हो चुके थे और वह बाइक के नीचे दबा बेहोश हो गया. उसकी छोटी बहन ने बाइक उठा कर निकालने की कोशिश की लेकिन बेकार गयी उसकी कोशिश. उसके चारों ओर काफी भीड़ लग गयी थी. लेकिन कोई भी उस लड़की की सहायता करके उसे गाड़ी के नीचे से निकालने वाला नहीं था. . इतने में कोई दो लड़के वहाँ आये और उन्होंने बाइक हटा कर उसे बाहर निकला और सामने नर्सिंग होम ले गये कि इसकी पट्टी कर दो. लेकिन उन लोगों ने पट्टी करने से भी इंकार कर दिया कि ये पुलिस केस है उसको थाने में लेकर जाओ और FIR करवाओ तब करेंगे. और भी एक दो जगह गए पर सब ने इंकार कर दिया . लड़के की बेहोशी और बहता हुआ खून देख कर लग रहा था कि  अगर और देर हुई तो ये बच नहीं पायेगा. उन लड़कों ने कहा कि  हम अपने इलाके में ले जाकर पट्टी कराएँगे नहीं तो ये मर जाएगा.  उन दोनों ने भाई बहन को रिक्शे में बैठा कर अपने साथ ले गए और फिर उसकी मरहम पट्टी करवा कर उनके घर छोड़ गए.
                            क़ानून अपने स्थान पर सही है लेकिन ये कैसा कानून ki  मरते हुए की सहायता करने में भी परेशान किया जाय. कोई भी आदमी कोर्ट और थाने के चक्कर लगाना नहीं चाहता है. इंसानियत होते हुए भी कानून उससे हाथ बांध देता है. इतनी जिंदगियां सिर्फ इसी झंझट के कारण ख़त्म हो जाती हैं कि  कोई उनको हाथ नहीं लगाता. ऐसी स्थिति के लिए कानून को कुछ ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि कुछ ऐसे सचल ट्रौमा सेंटर और उनके साथ पुलिस हो जो FIR  दर्ज करे  और फिर उसको त्वरित मेडिकल सहायता उपलब्ध करवा सके . इन ट्रामा सेंटर के लिए कानून कुछ ढीले होने चाहिए. आदमी की  को सही ढंग से चलाने के लिए कानून है. कानून की बलि चढ़ने के लिए इंसानी जिन्दगी नहीं है. इसके साथ ही सभी नर्सिंग होम और अस्पतालों में घायलों की मरहम पट्टी के लिए कानून के दायरे में रखने की जरूरत नहीं होनी चाहिए. अगर ऐसा है तो ये औपचारिकताएं उस महरम पट्टी के बाद की जा सकती हैं. 
                             एक तो अनियंत्रित वाहनों ने इंसां की जिन्दगी को खिलौना बना रखा है, पता नहीं कब किसका आखिरी क्षण किसी ट्रक या बस के नीचे आकर आ जाय, इस बात को घर से निकलने वाला खुद नहीं जानता है. और अगर उसके बचने की कोई उम्मीद भी हो तो कानून सबके हाथ बाँध देता है. इसके लिए कोई सार्थक हल निकालने की जरूरत है. ये एक सुझाव नहीं बल्कि कार्यरूप देने के लिए एक प्रस्ताव है और ये जितनी जल्दी कार्यान्वित हो उतनी जल्दी कुछ जिंदगियों के दिन बढ़ने लगेंगे.

शनिवार, 21 अगस्त 2010

माटी का मोह !

जिस धरती और जिस देश में हमने जन्म लिया है, वह हमें क्यों इतना प्यारा होता है? हम कहीं भी रहें उसकी बुराई न सुन सकते हैं और कर सकते हैं.  आखिर करें भी क्यों ? जिस मिट्टी और धरती पर हम पैदा हुए और हमने उसको अपने तन पर लपेट कर जीवन जिया है, उससे अलग कब हो सकते हैं. वक्त हमें कहीं भी पहुंचा दे लेकिन उससे मोह कभी ख़त्म नहीं होता. ये घटना सबक है उन लोगों के लिए जो कहते हैं कि इंडिया में रखा ही क्या है? जो यहाँ है वो कहीं भी नहीं मिलेगा, यहाँ की हवा और मिट्टी में जो प्यार है जो सात समुन्दर पर जाकर भी बरक़रार रहता है. 
                                    आज सुबह मेरे पास न्यूयार्क से एक फ़ोन आया - 'रेखा तुम मुझे अपने ब्लॉग मत भेजा करो , जिनमें की देश की राजनैतिक गतिविधियाँ , भ्रष्टाचार और ख़राब हालात के बारे में लिखा  गया  हों. भैया इसके लिए मना करते हैं क्योंकि सभी बच्चे तुम्हारे ब्लॉग पढ़ते हैं और इससे उनके मन में एक निगेटिव इमेज  बन जाएगी और बच्चे फिर इससे सम्बंधित सवाल करने लगते हैं. '
                                 ये फ़ोन मेरे चचेरे ननदोई का था , जो कि उम्र में मुझसे बहुत बड़े हैं , उनका सबसे छोटा बेटा हमारा हमउम्र है. वह मुझसे बहुत लगाव रखते हैं और मेरे लिखने को शुरू से ही पसंद करते थे. जब मैंने ब्लॉग बनाये तो उन्होंने कहा कि मैं उनकी लिंक दे दूं जिससे कि उनको मेरे ब्लॉग की सारी गतिविधियों से जानकारी मिलती रहे.  
                               मेरे नन्द और ननदोई दोनों ही यही पर नौकरी करते थे. उनका बड़ा बेटा बहुत पहले एम टेक करने के बाद अमेरिका चला गया था और बाद में यही शादी की और परिवार सहित चला गया. जब जक इन लोगों की नौकरी रही छोटा बेटा यही था और retirement के बाद  सभी लोग वही चले गए और बस गए. जीजाजी बड़े बेटे के साथ रहते हैं. उनके बच्चे कभी कभी घूमने के लिए ही यहाँ आते हैं. मेरे ब्लॉग उनके घर में सभी लोग पढ़ते हैं. बच्चे अब छोटे तो नहीं हैं लेकिन उनके पोते पोतियाँ जो वही पले और बढे हैं, यहाँ के सारे माहौल से परिचित नहीं है लेकिन ब्लॉग में जो तस्वीर उनको मिल जाती है तो वे सवाल करने लगते हैं कि  'आप तो ऐसा कहते हैं, और इससे ऐसा पता चलता है. ' बहुत सारे सवाल जिनका जबाव उन लोगों के पास होता भी है और नहीं भी होता है. बच्चों के दिमाग में देश के प्रति ख़राब छवि न बने इस लिए वे चाहते हैं कि  देश की निगेटिव इमेज वाले ब्लॉग न भेजू.
                         बहुत साधारण सी बात है लेकिन अगर इसको गहराई से सोचा जाय तो अपनी माटी की कमियों को वे अपने बच्चों(पोते पोतिओं )  के सामने भी उजागर नहीं करना चाहते हैं. वे अस्सी साल के हैं फिर भी समय और साथ मिलने पर अपनों से मिलने और अपनी माटी से मिलने चले आते हैं. 

सोमवार, 9 अगस्त 2010

१० अगस्त १९९१ !

                                 आज का ही वह मनहूस दिन था जब कि मेरे पापा हमें छोड़ कर अचानक चले गए थे. उन्नीस साल के इस लम्बे अन्तराल में उनकी कमी हमेशा खाली है , लेकिन वे  अपने  आदर्शों  , कृत्यों  और  बनाये  गए  प्रतिमानों  के साथ  आज  भी मेरे प्रेरणास्रोत बन कर मेरे साथ साथ चल रहे हैं.
                                मैं उन दुर्भाग्यशाली बेटियों में से हूँ, जिन्हें अपने पिता के अंतिम दर्शन भी नसीब नहीं हुए. उनके निधन की सूचना तक नहीं मिल सकी समय से. उनका निधन अचानक किडनी फेल होने के कारण हुआ था. उस समय उनकी आयु ६१ वर्ष की ही थी, बहुत से कार्य बाकी थे. मेरी उनसे बहुत दिनों से मुलाकात नहीं हुई थी. मेरे ससुर भी उस समय कैंसर की,  अंतिम अवस्था में पड़े थे और मेरे ऊपर ही पूरी तरह से निर्भर थे. भाई साहब ने टेलीग्राम दिया क्योंकि उस समय त्वरित सूचना का यही एक साधन था. जो मुझे आज तक नहीं मिला. फ़ोन उस समय कॉमन न थे और हमारे दोनों ही घरों में फ़ोन नहीं थे. उनके जाने के ४ दिन तक जब मैं नहीं पहुँची तो भाई साहब ने किसी को भेजा की रेखा को खबर नहीं मिली है, मिलती तो वह आ जाती जाकर उसको खबर करो. वह दिन वह क्षण भी मुझे अच्छी  तरह से याद है - उस दिन नागपंचमी का दिन था और मेरे ससुर का जन्मदिन भी , मैं उनको खाना खिला रही थी, हम इस बात से वाकिफ थे की हम उनका अंतिम जन्मदिन मना रहे हैं. इतने में  मेरी चचेरी बहन आई और बाहर ही मेरे पतिदेव से बोली कि ताऊ जी की तबियत ख़राब है दीदी को लेकर चले जाइए. मेरे कानों में ये शब्द पड़े तो मेरे हाथ से खाने की प्लेट छूट गयी . मुझे पूरा आभास हुआ कि पापा अब है ही नहीं और मैं जोर जोर से रोने लगी. किसी तरह से समझा कर पतिदेव मुझे उसी समय बस से उरई ले गए. रास्ते भर मेरी ख़ामोशी के बाद भी आँखों से आंसूं बंद नहीं थे.
                         लोग कहते हैं कैसे गंवारों  की तरह से रोने लगी लेकिन जब कोई बहुत अपना जाता है तो दिमाग का  सारे शरीर से नियंत्रण ख़त्म हो जाता है और हर अंग बेकाबू हो जाता है - आंसू, आवाज और ह्रदय सब कुछ. मेरे इम्तिहान  की सीमा यही तक नहीं थी. पतिदेव मुझे छोड़ कर शाम को जब वापस हुए क्योंकि ससुर के लिए उनकी उपस्थिति जरूरी थी. चलते समय कहा - 'देखो एक पिता तो चले ही गए हैं, जो हैं उन्हें तुम्हारी बहुत जरूरत है . उनके बारे में सोचना और परसों कानपुर वापस आ जाना.'
                       ये उन्हें शब्द कहने में और मुझे सुनने में कितना जो कष्ट हुआ वो सोच से परे था किन्तु समय और हालात का तकाजा यही था. मैं सिर्फ एक दिन माँ के पास रुक कर वापस आ गयी. वह  मेरी  परीक्षा का समय था. मैं अपनी माँ को छोड़ कर कैसे आई? मेरी माँ उससे भी महान बोली - 'जाओ बेटा अपने ससुर को देखो उनको तुम्हारी ज्यादा जरूरत है.'
                      और फिर २० अक्तूबर को हमने अपने दूसरे पिता को भी  खो दिया. हम दोनों ही एक साथ पित्र शोक का सामना कर रहे थे. 

रविवार, 1 अगस्त 2010

Happy Friendship Day!

मेरे सभी प्रिय मित्रों को इस दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं?



इस दोस्ती से बढ़कर कोई नेमत नहीं होती,


ये वो जज्बा है जिसकी कोई कीमत नहीं होती,


मिला न बढ़कर तुमसे जिन्दगी में कोई ए दोस्त,

क्योंकि हर एक की मेरी सी किस्मत नहीं होती.

शनिवार, 31 जुलाई 2010

विदेश में नौकरी : एक खूबसूरत धोखा !

                            आज कल ही नहीं बल्कि कई महीनों से पढ़ती आ रही हूँ, इस तरह के विज्ञापन:
                कनाडा, दुबई, खाड़ी  देशों में नौकरी के लिए अनपढ़/हाईस्कूल/ग्रेजुएट चाहिए. . बिना वीजा फीस , टिकट आदि का कोई पैसा नहीं. अच्छी तनख्वाह, रहना + खाना मुफ्त. संपर्क करें?  कमीशन वहाँ पहुँचने के बाद दें. और कुछ फ़ोन नंबर.

                       इन विज्ञापनों की हकीकत कोई नहीं जानता, अख़बार को पैसे चाहिए और फिर उनको इससे क्या लेना देना कि इसके पीछे क्या है? एक बहुत बड़ा रैकेट काम  कर रहा है? मेरी मृग मरीचिका कविता उसकी ही अभिव्यक्ति है.
                    यहीं कानपुर के कितने लड़के गरीबी के और बेकारी के मारे इन झांसों में आ जाते हैं कि अच्छा वेतन मिलेगा और खाना रहना मुफ्त तो फिर घर में माँ की बीमारी , बहन की शादी और छोटे भाई बहनों की परवरिश में माँ बाप का हाथ बँटवा लेंगे.  लेकिन उन्हें नहीं मालूम कि वे किस दलदल में फंसे जा रहे हैं. यहाँ से हर विज्ञापन में कुछ न कुछ तो लड़के फँस ही जाते हैं.
                  पिछले दिनों वहाँ मई में गए एक लड़के का  फ़ोन आपने घर आया कि मुझे यहाँ से किसी भी तरह से निकलवा लीजिये. यहाँ पर १२ घंटे काम करवाते हैं और उसके बाद मालिक के घर पर भी काम करना पड़ता है. खाना माँगने पर पिटाई होती है. कई कई दिन भूखा रख कर काम करवाते हैं.
दो महीने से कोई पैसा भी नहीं दिया है. पैसा माँगने पर पिटाई करता है. वीसा और पासपोर्ट सभी मालिक ने अपने कब्जे में कर रखे हैं. इस तरह से तो ये लोग मुझे यहाँ मार डालेंगे. खाने को भी नहीं देते हैं और पैसे भी नहीं देते हैं.
                   यहाँ से गए युवकों को वहाँ बंधुआ मजदूर बनाकर रखा जाता है. देश में फैली बेकारी, भुखमरी और महंगाई ने इतना त्रस्त कर रखा है कि युवकों कि कहीं से भी पैसे मिलने की उम्मीद जगती है तो वे उसी तरफ दौड़ पड़ते हैं. आखिर वे क्या करें? हमारी सरकार तो इतना भी नहीं कर सकती है कि अपने देश कि प्रतिभा और इन गरीबों के लिए इतनी व्यवस्था कर सके कि वे घर छोड़ कर भागें नहीं.
                   जो भी इसको पढ़े कम से कम अपने जानने वालों को अवश्य बताएं इन विज्ञापनों की हकीकत कि ये कितने घातक है? इनकी सोने से मढ़ी भाषा बेचारे मुसीबत के मारे युवकों को आकर्षित कर लेती है. उनके पास ऐसा कोई स्रोत भी नहीं होता है कि वे इसके बारे में किसी से कुछ पता भी कर सकें. सरकार को इस तरह कि एजेंसियों के बारे में पता लगाया जाय और उनके खिलाफ कम से कम जांच तो करवा ही सकती है..
                         मृग मरीचिका में फंसे युवकों के प्रति हम लोग तो सिर्फ आवाज उठा कर जानकारी दे सकते हैं.
विदेश में नौकरी

बुधवार, 28 जुलाई 2010

आनर किलिंग का विकल्प !

              'आनर किलिंग ' के प्रति समाज जागरुक हो उठा है और इसके खिलाफ आवाजें उठने लगीं हैं - समाज के हर तबके और कोने से. पर क्या ऐसा करने वाले डर गए हैं नहीं और विकल्प खोज लिए. खरीद लिया उसने पैरोकारों को और सब शांत. बिना मौत कि खबर और पोस्टमार्टम   के वो जमीदोश कर दी गयी और उसके साथ ही एक वह शख्सियत ख़त्म हो गयी जिससे कभी किसी को शिकायत नहीं हुई.
                वह एक संस्थान में HR थी और उससे करीब करीब रोज का मिलना जुलना था. परसों ही शाम को उससे मुलाकात हुई - अपने चैंबर में बैठी थी कि मैं पहुँच गयी , वह फ़ोन पर बात कर रही थी और उसने यह कह कर कि "कल शाम को मिलते हैं." फ़ोन रख दिया. मुझे पता था कि वह किसी से प्रेम करती है और शादी करना चाहती है. अन्य जाति का होना आज सामान्य सी बात है. वह लड़की बेहद प्यारी थी - हंसमुख, मिलनसार और संवेदनशील.
                 कल जब संस्थान जाना हुआ तो पता लगा कि उसने फाँसी लगा ली. संस्थान में सन्नाटा पसरा था. हर चेहरा ग़मगीन और शोक सभा के बाद सब अपने अपने काम में लग गए क्योंकि उसे बंद नहीं किया जा सकता है.
                 मैं सोच रही थी कि निश्चित रूप से यह घटना कल के पेपर में देखने को मिलेगी कि ऐसा क्यों किया? वह उस दिन  मिली थी तो कोई तनाव नहीं था, अच्छी तरह से बात कर रही थी और दूसरे दिन शाम मिलने की बात कह कर फ़ोन रखा था.  दूसरे दिन अखबार में कोई कहीं खबर नहीं थी. मामला पुलिस तक गया ही नहीं था या फिर पुलिस बिक गयी. ऐसा तो संभव ही नहीं कि इतने बड़े हादसे की खबर घर वाले छिपा जाएँ लेकिन क्या उसके आसपास कोई ऐसा नहीं होगा कि ये खबर पुलिस तक पहुँच जाती. संस्थान में भी सभी स्तब्ध थे कि ये किस्सा आत्महत्या का नहीं हो सकता क्योंकि वह निराशावादी  नहीं थी. सबसे लड़ने का हौसला रखने वाली लड़की थी.
                    'आनर किलिंग ' का ये विकल्प जो सामने आया वह पहले भी होता रहा है लेकिन इसके प्रति जागरूकता के बाद खरीदार और बिकाऊ लोगों के आगे मानवता, जागरूकता और रिश्ते सब शर्मसार हैं. उन्होंने सोचा कि इज्जत बच गयी. मामला मीडिया में पहुंचकर निरुपमा जैसा बन जाता किन्तु अपराधी तो वे हैं ही और इसके लिए जीवन भर इस अपराध बोध से ग्रस्त रहेंगे. हम अपनी सोच कब बदल पायेंगे और कब उस लड़की जैसे लोगों को अपना जीवन जीने देंगे.  

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

सिर्फ वंश के लिए ?

                         वह मेरे पास मेरे काउंसलर होने के नाते सलाह लेने आया था. प्रथम श्रेणी अधिकारी था लेकिन उसकी सोच का कहीं भी उसके पद और जिम्मेदारियों के साथ मेल नहीं खा रहा था. उससे बात करने पर और उसकी समस्या सुनने पर उसको सलाह देने के स्थान पर मेरी इच्छा हो रही थी कि मैं उसको धक्के मार कर निकाल दूं, लेकिन अपने काम के अनुरुप मुझे संयम और धैर्य से काम लेना था और इस काम के लिए शायद मेरा जमीर अनुमति नहीं दे रहा था.

                    बकौल उसके - मैं अमुक स्थान पर प्रथम श्रेणी अधिकारी हूँ. मेरे दो बेटियाँ हैं और मेरी पत्नी की उम्र ३५ वर्ष है. वह बहुत समझदार और उच्च  शिक्षित है. मेरी दोनों बेटियाँ सिजेरियन हुई हैं. मैं अपनी पत्नी को बहुत प्यार करता हूँ और उसका दिल नहीं दुखाना चाहता. वह अगले गर्भ के लिए तैयार तो है लेकिन गर्भ परिक्षण से बिल्कुल भी सहमत नहीं है. अगर मेरे एक बेटी और हो गयी तो मेरे घर वाले मेरी दूसरी शादी करवा देंगे.
"दूसरा विवाह किस लिए?" मुझे सब समझ आ चुका था लेकिन मैं उससे ही सुनना चाहती थी.
"मेरे माँ बाप चाहते हैं कि वंश का नाम चलने के लिए एक बेटा तो होना ही चाहिए."
"इसके लिए आप दूसरा विवाह करेंगे, आपको पता है कि आप सरकारी नौकरी करते हैं और जो आपको इस बात अनुमति नहीं देगी."
"क्या ये जरूरी है की दोसरे विवाह के बाद आपको बेटा मिल ही जाएगा?" मैं उससे जानना चाहती थी की इसकी सोच कहाँ तक जाती है?
"क्या उसको भी लड़कियाँ ही होती रहेंगी?"
"माँ लीजिये, तब आप क्या करेंगे?"
"मैं दूसरी  शादी नहीं करना चाहता. तभी तो मैं चाहता हूँ कि सरोगेट मदर के जरिये बेटा हो जाए."
"क्या बेटा बहुत जरूरी है?"
"हाँ, इतनी जमीन जायदाद है - सब कुनबे वालों को देनी पड़ेगी."
"और ये जो आपकी बेटियां है?"
"बेटियां अपने अपने घर चली जाएँगी, घर की  जायदाद दूसरों को तो नहीं दे दूंगा."
"मतलब? दूसरा कौन है? आपकी बेटियां आपकी संतान नहीं हैं?"
"वो बात नहीं - हम ठाकुरों में वंश का नाम बेटे से ही चलता है और दामाद तो दूसरे का बेटा होता तो मेरा नाम कैसे चलेगा?"
"फिर आप बेटे के लिए कुछ भी करेंगे?"
"हाँ, दो चार लाख रुपये खर्च भी हो जाए तो  कोई बात नहीं." उसने अपनी मंशा कि हद जाहिर कर दी थी.
"आप किसी अनाथालय से बच्चा गोद ले सकते हैं."
"कैसी सलाह दे रही हैं? पता नहीं किसका खून हो और किस जात का होगा?"
"तब मेरे पास आप जैसो के लिए कोई सलाह है ही नहीं. आप जा सकते हैं."
                      मैं उसकी दलीलों से झुंझला गयी थी. वह किसी गाँव के परिवेश से जुड़ा था. जिससे शादी हुई वह Ph . D थी और शहरी परिवेश में पली थी. घर वालो ने लड़के कि नौकरी देखी और कुछ जानने की  जरूरत नहीं समझी. किसी की सोच की जड़ें इतनी गहरी होती हैं कि शिक्षा और परिवेश उसके आगे बौना हो जाता है. ये उदहारण मैंने कोई नया नहीं देखा था लेकिन उच्च पदस्थ लोग भी ऐसा सोच सकते हैं ये पहली बार देखा था. सिर्फ वंश का नाम चलाने  के लिए उसे सरोगेसी या दूसरा विवाह स्वीकार्य था. लेकिन बेटा जरूर होना चाहिए. मुझे तरस आता है कि ये आज की  पीढ़ी है जो वंश के नाम पर बेटे होने के पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं? कब इनको पता चलेगा कि वंश बेटे या बेटियों से नहीं चलता है. अपने ही कर्मों से चलता है.
                 अगर आपके पास बहुत दौलत है तो आप अपने नाम से स्कूल, मंदिर या ट्रस्ट बनवा दीजिये. सदियों तक ये आपके नाम को जीवित रखेंगे. बेटे ऐसा न हो कि इस दौलत के मद में आपका नाम रोशन करने के स्थान पर कलंकित ही न कर दें. मेरी तो यही सलाह है कि वंश का नाम न बेटे चलाते हैं और न ही बेटियां. आपके अपने सत्कर्म ही आपको जीवित रखेंगे. अपनी सोच बदलिए और यथार्थ के साथ जुड़िये.

सोमवार, 14 जून 2010

विश्व रक्त दान दिवस !

                         आज विश्व रक्त दान दिवस है , रक्त जो जीवन का आधार है और इसके निर्माण की प्रक्रिया निरंतर जारी रहती है. यदि इसका उपयोग दूसरे के लिए कर दिया जाय तो एक जीवन को बचा लिया जाता है किन्तु क्या इसके लिए रक्त सम्बन्ध की सीमा निश्चित की  जा सकती है ? नहीं - कहते हैं न कि  आखिर खून ही खून के काम आता है लेकिन ऐसा भी नहीं है. कहीं कहीं अपना खून होता है और पराया खून उसको बचा ले जाता है. तब इसको यही कहेंगे न कि खून को किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता है, वह तो जिसमें मिल जाए उसका ही खून बन कर दौड़ने लगता है और जीवन की साँसें फिर से चलने लगती है. 
                     आज इस दिवस पर मैं कुछ उन अनजाने बच्चों को धन्यवाद देती हूँ जिन्होंने न मुझे देखा और नहीं उन्हें मैंने देखा बल्कि हम तो जानते ही नहीं है एक दूसरे को. बात आज से करीब ५-६ साल पहले की है. मेरी बेटी की तबियत भी उस समय बहुत ख़राब चल रही थी और ठीक उसी समय मेरी छोटी बहन के पति को कैंसर हो गया. उस समय उसके मात्र एक ४ साल की बेटी थी और मेरी बहन एक गृहिणी. उनको मुंबई टाटा मेमोरिअल ले जाया गया , उनका ऑपरेशन होना था और उसके लिए उन्हें खून की जरूरत थी. एक अनजानी जगह में खून कहाँ से लाया जा सकता है? कुछ ईश्वर की कृपा हुई और मुझे यह विचार आया कि मेरे साथ कुछ साल पहले एक इंजीनियर काम करता था और उस समय वह मोहाली में जॉब कर रहा था. वह भी मुझे बहुत मानता था ( आज भी वैसे ही मानता है) मैंने उसको सारे डिटेल के साथ मेल की - और उससे कहा  कि वह ये मेल अपने मित्रों को फॉरवर्ड कर दे जिससे यदि उनके कोई मित्र मुंबई में हों और सहायता कर सकें तो उनके लिए हम कुछ कर सकते हैं. उसने वैसा ही किया और मेरी मेल अपने मित्रों  को फॉरवर्ड कर दी. उसमें मैंने अपनी बहन का मुंबई का मोबाइल नंबर भी दे दिया था. 
                    जब मेरे बहनोई का ऑपरेशन होना था तो बहन के पास कई फ़ोन आये कि वे खून देने के लिए तैयार है और जैसे ही जरूरत हो उनको कॉल कर लिया जाय. उनकी खून की जरूरत पूरी  हो गयी और ईश्वर की कृपा से आज वे पूर्ण रूप से स्वस्थ होकर अपने परिवार के साथ खुशहाल हैं. मेरी उन अनदेखे और अनजाने बच्चों के लिए आज यही दुआ है कि ईश्वर उनको हमेशा सुखी रखे और मानवता का ये जज्बा जो उनको दिया है वो हमेशा हमेशा बुलंद रहे.

शनिवार, 12 जून 2010

कुछ ऐसे भी हैं?

             जिन्दगी के मेले में कितने तरह से लोग मिलते हैं और हम सबसे दो चार हो कर या तो उन्हें भूल जाते हैं या फिर ऐसा कुछ घटित हो जाता है कि हम उन्हें भूल ही नहीं पाते हैं बल्कि एक अजीब से वितृष्णा मन में पैदा हो जाती है कि उनको शिक्षित और सभ्य लोगों की श्रेणी में रखने के लायक भी नहीं समझा जाता है.
              मैं अपना एम एड पूरा करके निवृत हुई थी कि मेरे पति के मित्र , जिनका कि एक स्कूल चल रहा था , इनसे बोले कि रेखा तो फ्री ही है क्यों न मेरे स्कूल  में  प्रिंसिपल कि जगह पर आ जाये. मुझे प्रिंसिपल की जरूरत है. वह दोनों लोग किसी महाविद्यालय में प्रवक्ता थे सो उन्हें कोई परिचित व्यक्ति ही चाहिए था जो कि स्कूल देख सके. उनमें पतिदेव तो काफी सज्जन पुरुष थे लेकिन पत्नी किसी पहुँच के कारण महाविद्यालय तक पहुँच गयी थी सो उनमें अपने पद और धन दोनों का भी बहुत घमंड था. 
                           मेरी एक परिचित अचानक आर्थिक परेशानी में फँस गयीं - पति की नौकरी छूट गयी , वह तो गृहिणी ही थी लेकिन उच्च शिक्षित थी. उनको मदद की जरूरत थी सो मैंने उन्हें प्राइमरी टीचर की तरह से नियुक्त कर लिया. यद्यपि वो उस काम से लिहाज से काफी अधिक शिक्षित थी लेकिन मेरे पास और कोई विकल्प उस समय नहीं था.  वे सीधी सादी  महिला थीं सबसे बड़ी बात कि उनके पास सीमित साड़ियाँ थी.  वे उन्हीं को बदल बदल कर पहन कर आती थी. मेरी दृष्टि में ऐसी कोई बात नहीं थी और न ही मैंने इसको ध्यान दिया क्योंकि मुझे ये अपराध बोध होता था कि इनकी  विद्वता का उपयोग नहीं हो पा रहा है. 
                           एक दिन श्रीमती मैनेजर साहिबा ने स्टाफ रूम में सभी के सामने उनसे कहा - 'देखो तुम्हारी यह साड़ियाँ अब अच्छी नहीं लगती हैं - तुम इनको अब गद्दे या रजाई पर चढ़ा दो. तुम्हें ऊब नहीं होती वही साड़ियाँ पहनते हुए.'
(उनके  ये शब्द मुझे आज भी जस के टस याद हैं.)
                हो सकता है कि उन्होंने वह बात मजाक के लहजे में कही हो या फिर अपने दंभ में. वह महिला इस बात को सहन नहीं कर सकी और वह सभी के सामने अपमानित महसूस करके रो पड़ी. श्रीमती मैनेजर एकदम सकपका गयी और तुरंत बोली - मेरा यह मतलब था कि एक ही साड़ी पहन कर हम ऊब जाते हैं तो उठाकर रख देते हैं और फिर कुछ महीनों के बाद निकल लेते हैं. तो तबियत उबती नहीं  हैं.
                 उनको ये पता था कि वह महिला किस समस्या का सामना कर रही है? फिर अगर हम ये महसूस न कर सके कि कोई किस तरह से अपनी जिन्दगी अपनी समस्याओं के साथ गुजर रहा है. वह एक प्राध्यापिका है , उनमें वह गरिमा और दूसरों को प्रभावित करने का गुण होना चाहिए न कि किसी को अपमानित करने का . फिर हम किसी के व्यक्तिगत मामलों में सार्वजनिक टिप्पणी करें तो ये हमारी समझदारी नहीं है. लेकिन मैं खुद बहुत अधिक दिन वहाँ नहीं रह पायी और मैंने उनका स्कूल छोड़ दिया. 
               वक्त ने अपना दूसरा रूप दिखाया और वह परेशान महिला आज एक सफल व्यवसायी  बन चुकी हैं  और उनके जीवन का रूप ही बदल गया है लेकिन आज भी वह उतनी ही विनम्र है. पैसे से इंसान अपना स्तर तो बड़ा सकता है लेकिन उसका मानसिक स्तर और सोच सिर्फ और सिर्फ उसके संस्कारों से ही बनती है.

बुधवार, 9 जून 2010

ये दर्द न होगा कम !

                        

  सदियों से बेटियों को हाशिये में रखने वालों के लिए - वे देखे कि एक बेटी की कमी कितनी दर्द देने वाली होती है. खोजते तो हम बेटी को बहू में भी हैं लेकिन क्या बहू बेटी बन पाती है? या सास माँ सी हो तो उसे वो अहसास दिला पाती है जो उसे अपनी बेटी से मिलता. 
                            मैं अपने एक मित्र परिवार में मिलने के लिए गयी थी. हम तब से मित्र है जब मेरी  शादी हुई थी. पतिदेव की मित्रता ने हमें भी मित्र बना दिया और फिर कुछ शौक और स्वभाव समान रहा तो कुछ ज्यादा ही निकट आ गए.  वो मंजू उसके आज दो बेटे और दोनों डॉक्टर हैं, बहुएं भी डॉक्टर हैं. आज से ३५  वर्ष पूर्व एक मध्यमवर्गीय परिवार के संघर्ष कि गाथा एक जैसी ही थी. उसने भी अपनी सीमित आमदनी में सब कुछ किया. बच्चों की पढ़ाई , सास ससुर की देखभाल और अंत में अपनी माँ की १२ साल तक बीमारी में अपने पास रखा कर सेवा. 
                          बहुत दिन बाद में उससे मिली थी. अब पतिदेव भी उसके रिटायर हो चुके हैं , दोनों बेटे बाहर नौकरी कर रहे हैं और छोटी बहू भी. सिर्फ बड़ी बहू यहाँ पर है. उसकी बच्ची के साथ समय काट लेती है. सारे सुख हैं लेकिन मानसिक शांति नहीं. वह भी बहुत संवेदन शील है. लिखने का शौक है पर लिख नहीं पाई कभी . इस मुलाकात पर तो जैसे बस भरी बैठी थी कि विस्फोट हो गया. पतिदेव उनके अंतर्मुखी प्रवृत्ति के हैं सो उनसे भी कुछ बाँट नहीं पाती. 
                   मुझसे बोली - रेखा मैंने सोचा था कि मेरी बेटी नहीं है तो बहू आ जाएगी तो मेरी बेटी के तरह से मेरे साथ व्यवहार करेगी मुझे एक साथी मिल जाएगा. इनसे तो कुछ कभी बाँट ही नहीं पायी, सारी जिन्दगी अपने गुबारों को अपने मन में ही लिए रही. सबसे बांटने कि अपनी आदत नहीं है. उससे सब कुछ बाँटूँगी. पर मेरा ये सपना चूर चूर हो गया.  जब मैं कभी उससे अपने जीवन के संघर्ष की बात करती हूँ तो कहती है कि आप तो अपने मुँह मियां मिट्ठू बनती हो. ऐसा कहीं होता भी है. 
                
                 सबसे बड़ा कष्ट तो तब होता है जब कि बेटे के आने पर बहुत परवाह करने का नाटक करने लगती है.  जब से एंजियोप्लास्टी हुई है मुझसे बर्दास्त नहीं होता. बहुत गुस्सा आता है ऐसी बातों पर. मैं क्या करूँ? मैं कल भी अकेली थी और आज भी अकेली हूँ. 


                      मैंने उसके दर्द को समझा उसके भरे गले से बयान किये गए दर्द को मैंने महसूस किया. कितनी अनमोल चीज होती है बेटी भी. दर्द तो बाँट लेती है. मंजू ये भूल गयी थी कि बहू बेटी तो किसी और की है. उसकी कैसे हो सकती है?  लेकिन ऐसा होना नहीं चाहिए.  क्या बहू सिर्फ और सिर्फ अपनापन भी नहीं दे सकती है. अरे डॉक्टर को तो दया और सहानुभूति का पाठ पढ़ाया जाता है. बाहर न सही घर में तो इसको अपना ही सकते हैं. 
            मैंने मंजू को सलाह दी कि तुम कंप्यूटर लो और बाकी चीजें मैं तुमको सिखाती हूँ. अपना ब्लॉग बना और उसको बना अपना साथी, ये अकेलापन और घुटन सब ख़त्म हो जायेगी. तुम्हारा अपना एक संसार होगा जिसमें इतने सारे लोग होंगे कि कभी लगेगा ही नहीं कि तुम अकेली हो.  वह इसके लिए राजी हो गयी और हो सकता  है कि एक और ब्लॉगर हमारे सामने हो.

रविवार, 6 जून 2010

एक और बागवाँ !

               जब बागवाँ फ़िल्म आई तो बहुत पसंद की गयी थी. एक आयु वर्ग ने इसको सराहा और एक ने इसकी आलोचना की. ये तो बात साफ है की किसने सराहा और किससे आलोचित हुई. ऐसे एक बागवां की पुनरावृत्ति फिर सामने आ गयी.
                              वो मेरे दूर के रिश्ते में हैं, कभी कभी उनसे मुलाकात भी हुई. भले लोग लगे थे. कल खबर आई कि उनकी माँ का निधन हो गया? ये बात तो मुझे पहले से ही पता थी कि वे अपनी बेटी के यहाँ रह रही थीं. माँ के लिए बेटे और बेटी दोनों ही बराबर होते हैं, दोनों को वह अपने गर्भ में धारण करके जन्म देती है और वही कष्ट उठाती है. फिर माँ के प्यार को बांटने की बात कैसे सोच लेते हैं लोग. सिर्फ इसलिए की बेटी को उस घर से विदा कर दिया तो उसकी माँ माँ नहीं रही. वो अपनी बेटी को याद नहीं कर सकती है और न ही उसके प्रति अपना प्यार ही प्रकट कर सकती है. ऐसा ही कुछ था. एक बेटा और एक बेटी ही थी.
                               अपने समाज की परंपरा के अनुसार वे भी अपने बेटे के साथ ही रहती थी, किन्तु जो दूर होता है उससे स्नेह अधिक होता है या फिर याद आती है. जो आँखों के सामने होता है उसको तो स्नेह मिलता ही रहता है. किन्तु शायद विवाह के बाद ये परिभाषा बदल जाती है. बेटा चाहे कम लेकिन बहू को अपनी ननद के प्रति सास का प्रेम अच्छा नहीं लगता. हर जगह ऐसा ही हो ऐसा नहीं है. तभी हर घर में बागवान जैसी कहानी नहीं होती.  एक बार जब वे बहुत बीमार हुई तो उन्होंने बेटी को बुलाने की बात कही, उसको सुन कर अनसुना कर दिया. कई दिन बार बार कहने पर भी जब उन्हें बेटी को बुलाने की बात समझ नहीं आई. उनकी हालत बिगड़ रही थी. बहू ने क्या सोचा नहीं जानती ? उनके नाम बहुत सी जायदाद थी. आखिर उनके कोई रिश्ते डर उनसे मिलने आये तो उन्होंने उनसे कहा की मेरी बेटी को बुला दो. उनका यह कहना ही तो उनके लिए देश निकाले का फरमान बन गया.
            "बेटी बेटी की रट लगाये रहती हो, जब बेटी इतनी प्यारी है तो उसके साथ ही जाकर क्यों नहीं रहती?"
     एक तो बीमार और फिर लाचार माँ को इन शब्दों ने कितना आहत किया होगा ये तो वही बता सकती है लेकिन बेटी आई तो उन्होंने उसके साथ चलने की बात कही. थोड़ी सी शर्म और समाज के डर से कहा गया कि यहाँ कौन सा कष्ट  है जो वहाँ जाना चाहती हो. पर मन ही मन वे सब चाह रहे थे कि ये चली जाएँ. पता नहीं कितने दिन बीमार रहेंगी?
                  वे अपनी बेटी के साथ चली आई और आने के बाद उन्होंने अपनी बेटी से वचन लिया की अब वह उन्हें कभी उन लोगों के पास नहीं भेजेगी. बेटी ने और उसके पति व बच्चों ने उनको वचन दिया और पूरी पूरी मानसिक सुरक्षा का अहसास भी दिलाया.
                  वे दो साल वहाँ रहीं और स्वस्थ रहीं, फिर अचानक चल बसी. बहन ने भाई को खबर भेजी और वह सपरिवार वहाँ आया भी , पर मरते समय उन्होंने अपनी वसीयत खोलने के लिए कहा था. उनकी वसीयत वकील के पास ही थी और वह खोली गयी तो उन्होंने लिख था - 'मेरी पूरी संपत्ति मेरे बेटे को ही मिलेगी क्योंकि मेरी बेटी को उसकी कोई भी जरूरत नहीं है. बस मेरे मरने के बाद  ये मेरी देह मेरी बेटी को मिलेगी, जिसका क्रिया कर्म करने का अधिकार मैं अपने बेटी के बेटे को देती हूँ.  मेरी अर्थी में कंधा लगाने के लिए भी मेरे बेटे या उसको बेटों को इस्तेमाल न किया जाय. यही मेरी आखिरी इच्छा होगी.'
                      और उनकी बेटी और उसके बेटों ने उनकी इस इच्छा का पूरा सम्मान किया , उनके बेटे या पोतों को कंधा लगाने का भी हक नहीं दिया. सब साथ गए और उनका अंतिम संस्कार भी उनके दौहित्र ने ही किया.
                       जहाँ बेटा रहता था वहाँ सब लोग इन्तजार कर रहे थे की बेटा माँ की शव को लेकर पैतृक घर लाएगा और वही पर उनका अंतिम संस्कार होगा किन्तु वह तो खाली हाथ लौट आया.  माँ ने उसको माफ नहीं किया था और ये बोझ वह सारी जिन्दगी ढोता रहे या न रहे लेकिन ये माँ के दिल के दर्द को शायद ही समझ पाए.  इतना कठोर निर्णय कोई माँ कब लेती है? इसको वही जान सकती है लेकिन बेटे के लिए ये समाज में और सबके सामने अपने कर्त्तव्य च्युत होने का ये दंड हमेशा याद रहेगा.