शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

बेहतरीन अदाकारी !

                   उस दिन एक मेल मिली कि प्रो. साहब की माँ का निधन हो गया. जो उनसे परिचित थे सब ने कहा - 'बहुत अच्छा हुआ , अब प्रो. साहब को अपने जीवन में चैन मिलेगा.'  वैसे तो बेटे और बहुओं का माँ बाप के प्रति दुर्व्यवहार अब समाज में स्वीकार्य हो चुका है. कोई बात नहीं ऐसा अब हर दूसरे घर में होता है. पहले कहा जाता था कि पैसा बुढ़ापे का सहारा होता है , न होने पर बहू बेटे दुर्व्यवहार करते हैं लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है. पैसे से इंसान सब कुछ नहीं कर सकता है. सुख और शांति पैसे नहीं खरीद सकते हैं. 
                             ६ कमरों के बड़े मकान में प्रो. साहब , उनकी पत्नी और माताजी रहती थी. पता नहीं क्या बात थी? उनकी पत्नी को माताजी की शक्ल देखना तक गवारा नहीं था. माताजी का सारा काम वे खुद करते थे. जब क्लास के लिए जाते तो एक नर्स की भी व्यवस्था कर रखी थी. अपने घर पर होने पर वे ही सब करते . माँ को खाना खिलाने से लेकर उनको व्हील चेयर पर लेकर बाहर बिठाना और अन्दर करना वे खुद ही करते थे. इस उम्र में कई बार उनको अस्पताल में भर्ती भी करना पड़ा तो प्रो. साहब के छात्र उनका पूरा पूरा साथ देते रहे. पर पत्नी से इस बारे में उन्हें कभी कोई सहयोग नहीं मिला. उन्होंने कभी किसी से कोई शिकायत भी नहीं की. 
                              उनके पड़ोसी उनके प्रति पत्नी के व्यवहार के साक्षी थे और माताजी के प्रति भी. पड़ोसी इस बात के गवाह थे कि जो समर्पण, सेवा और श्रद्धा प्रो. साहब में थी ठीक इसके विपरीत उनकी श्रीमती जी थी.
                              उनके निधन के बाद विभाग के लोग और उनकी पत्नियाँ प्रो. साहब के घर गयीं तो मिसेज प्रो. सफेद साड़ी में बैठी थीं. माताजी की तस्वीर पर फूल मालाएं चढ़ी हुई थी. उनके घर में उनकी देवरानी और जेठानी भी आई हुईं थी. आने वाले में कैम्पस के तमाम लोग , उनके अगल बगल के पड़ोसी जो गवाह थे सब लोग मौजूद थे. और वे अपनी लम्बी चौड़ी बातें सुना रहीं थी. 
-सारे दिन मुझे ही बुलाया करती थीं.
- उन्हें मुझसे बहुत प्यार था,  लाडली बहू जो थी , उन्होंने मुझे हमेशा बेटी समझा -और मैंने माँ. 
--माताजी सारे दिन मेरे बिना रहती ही नहीं थी.
--सभी भाइयों में उन्हें प्रो. साहब से बहुत प्यार था.
--खाली घर अब खाने को दौड़ता है.
--घर में बुजुर्गों से रौनक रहती है. आदि आदि ....
                  सब लोगों के बीच उनकी ऐसी बातें सुनकर मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था क्योंकि पड़ोसी होने के नाते मैं बहुत सी बातों की मूक गवाह थी किन्तु कोई इंसान इतना बड़ा नाटक कर सकता है ऐसा मैंने अपने जीवन में नहीं देखा था. वैसे भी जमाना ऐसे ही लोगों का है. चिल्ला चिल्ला कर गलत को भी सच साबित करने वाले लोग ऐसे ही होते हैं और उनकी बेहतरीन अदाकारी के लिए वे पुरुस्कृत भी किये जाने चाहिए.