मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

वो एक रिश्ता!

                                    इस जीवन में कुछ रिश्ते ऐसे बन जाते हैं, जो न हम जन्म से लेकर आते हैं, न वे हम उम्र होते हैं और नहीं वे हमारे मित्र की श्रेणी में आते हैं. ऐसा ही एक रिश्ता इस आफिस में ही बना और वो आई थी यहाँ काम करने. उसके बारे में पहले से सुनती आ रही थी क्योंकि एक दुखद घटना उसके जीवन में घट चुकी थी. उस समय उसका पूरा परिवार अस्पताल में भर्ती था और सिर्फ माँ थी जो सबको देख रही थी. ऐसा अजीब समय था कि घर के ३ सदस्य कोमा की स्थिति में थे. घर और अस्पताल के बीच वह दौड़ती रहती थी. कभी पति, कभी बेटी और कभी बेटे के बैड पर जाती और फिर किसी एक के पास बैठ जाती थी.
                                    फिर एक दिन वो भी उन्हीं में से एक बैड पर पड़ गयी और सब को उसी हालत में छोड़ कर खुद चली गयी, बड़ी बेटी कहीं बाहर पढ़ रही थी उसको बुलाया गया. मुखाग्नि देने के लिए न पति और न बेटा कोई भी मुहैय्या न था. फिर वह यूँ ही विदा कर दी गयी. हफ्तों तक किसी को नहीं मालूम कहाँ है? फिर बड़ी बेटी ने सब संभाला और कहा कि माँ घर में है. जब वे सब ठीक होकर घर आ गए तो पता चला कि वो सबकी सेवा करते करते सबके लिए जीवन मांग कर खुद चली गयी. सब बिखर गए , एकबारगी लगा कि अब क्या होगा?  बहुत छोटी थी उस समय. माँ के बिना जीना सीख लिया था उसने भी. पर एकाएक  माँ का जाना सबके लिए असह्य था.
पिता ने दोनों कि जिम्मेदारी संभाली.
                                 अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद वह मेरे यहाँ तक पहुँची, पहले ट्रेनिंग के लिए और फिर नौकरी के लिए. बहुत से  लोग आते हैं  और आकर चले जाते हैं, वह आई और गयी भी पर इस बीच उसने मुझसे माँ का हक ले लिया. कुछ निर्णय और बातें ऐसी भी होती हैं , जिन्हें बेटी सिर्फ अपनी माँ से बांटती है. वो मुझसे बांटी. हर लड़की की तरह से उसके जीवन में भी शादी जैसे मुद्दे के लिए जद्दोजहद शुरू हुई. वह भी गुडिया के तरह से कई लोगों के सामने ले जाई गयी और फिर इससे वह परेशान होने लगी. बिना माँ के बेटी पिता को अपने निर्णय न बता सकती थी और जो उसके सगे थे वे बहुत दूर थे.
                                   फिर उसे मिला एक दोस्त जो उसके लिए चेहरे कि हंसी लेकर आया. उसने समझा और समझाया भी. मैं साक्षी थी उसके हर पल की. मैंने भी दिल से चाहा कि जो इसने अपने जीवन में खोया है वह उसको मिल जाया. एक माँ मिलनी चाहिए, जो इसको बहुत बहुत प्यार दे. बहुत लम्बी हाँ और न के बीच तनाव के पल जीते हुए उसको वो भी मिला जिसके लिए वह तृषित थी.
                               फिर एक दिन उसने मुझसे कहा - आप मेरे लिए एक कविता लिखिए. ये कविता उसी के लिए लिखी गयी थी और आज जब अचानक डायरी में मिली तो सोचा कि इसको उसके नाम ही डाल दूं.

हर जीवन
गौर से देखो
एक कविता है.
तुम खुद एक कविता ओ
बस उसको पढ़ने वाला हो.
आज तुम्हारी खिलखिलाती हंसी में,
अतीत के ढरकते  आंसू
सहम कर लौट जाते हैं.
ईश्वर न करे
कभी सपने में भी
वे भयावह दिन आयें.
जब  खुशियाँ सपनों में आतीं
और नींद टूटने के साथ
सपने में ही बिखर जाती थीं.
उन भयावह दिनों को झेलकर
आज कीमत खुशियों की जानी है.
उन्हें समेट लो
भर लो अपने आँचल में
खुश और बहुत खुश रहो
फूल खिले रहें
तेरी जीवन बगिया में
और महकता रहे जीवन
खूबसूरत उपवन कि तरह.
खूबसूरत उपवन की महक
बस मुझ तक आती रहे
औ' याद तुम्हारी
दिलाती रहे.

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

शायद हम अब कभी न मिलें!

            परसों ही टीवी पर छत्तीसगढ़ में हुए शहीदों पर आ रहे समाचार देख रही थी. एक शहीद ने उस समय अपने घर फ़ोन किया था और कहा कि हमें नक्सलियों ने चारों तरफ से घेर लिया है , चारों तरफ से गोलियां चल रही हैं. फिर फ़ोन कट गया और फिर जब उसकी पत्नी ने मिलाया तो अंत समय मिला उसने कहा - 'मेरे सीने में दो गोलियां लगी हैं, अब शायद मैं नहीं बचूंगा , मेरे बच्चों का ख्याल रखना. '
                      उस समय उसके इन शब्दों के बारे में सुनकर आँखों से आंसूं गिरने लगे.  क्योंकि ऐसी ही एक अतीत के घटना में मैं चली गयी थी और उस समय लगा कि किसी ने सच ही कहा है.
                    'कौन रोता है किसी और की खातिर ए दोस्त सबको अपनी ही बात पर रोना आया.' 
 ये घटना १९९२-९३  की है, जब मुंबई में भयानक धमाके हुए थे.पूरी मुंबई दहल उठी थी. उस समय मैं आई आई टी में नौकरी के साथ साथ विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस में डिप्लोमा भी ले रही थी. पहली बार ही ये कोर्स वहाँ शुरू हुआ था और वहाँ पढ़ाने वाले मेरे ही विभाग के लोग थे.  सबको मालूम था कि ये जो यहाँ पढ़ाया जा रहा है, उससे मैं अच्छी तरह से वाकिफ हूँ, लेकिन ये सब मैंने यही पर सीखा था.
           उस समय मेरे सेमेस्टर एक्जाम चल रहे थे. मेरे पति अपनी कंपनी की तरफ से मुंबई ट्रेनिंग के लिए गए हुए थे. उसी समय वहाँ पर एकदम से ये स्थिति पैदा हो गयी. वहाँ से न तो कोई फ़ोन ही आसकता था और न तब मोबाइल ही आया था. बस टीवी पर समाचार देख सकती थी और ईश्वर से उनकी सलामत की कामना कर रही थी . मेरी दोनों बेटियां छोटी थी. मेरे सिर पर हाथ रखनेवाले मेरे ससुर का निधन भी हाल ही में हो गया था. 
                  एक दिन मेरे पति ने सोचा की यहाँ से बच कर जाना तो बहुत ही मुश्किल लग रहा है , एक इनलैंड लैटर उनके पास था तो उन्होंने सोचा कि यहाँ से पता नहीं मेरी लाश भी वहाँ पहुँच पाएगी या नहीं, इस लिए मेरे लिए एक पत्र लिखा. जो इस प्रकार था.


 प्रिय रेखा,


               मैं यहाँ बम्बई में एक होटल में हूँ, यहाँ से बाहर नहीं जा सकते हैं, चारों तरफ धुंआ ही धुंआ दिखाई दे रहा है. अगर कंपनी के लिए बाहर जाता हूँ तो सिर झुका कर सड़क पर चलना होता है. वहाँ भी लगता है की कहीं से कोई गोली आकर न लग जाए.
                मैं नहीं जानता की यहाँ से वापस कानपुर पहुँच पाऊंगा या नहीं , फिर भी पता नहीं कोई खबर मिले या न मिले इसलिए ये पत्र लिखा रहा हूँ. कि अगर कुछ अनहोनी हो जाए तो तुम बच्चों को बहुत प्यार के साथ पालना....
अगर बच कर आ गया तो मिलूंगा. ये पत्र एक लैटर बॉक्स में डाल देता हूँ. 
सबको यथायोग्य कहना.
--आदित्य


ये पत्र मुझे मिल चुका था क्योंकि मैं अपने पत्र आई आई टी  के पते पर ही  मंगवाती थी. उस पत्र को पाकर मेरी जो हालत थी मैं नहीं बयां कर सकती. मैं पेपर लेकर बैठी थी और चुपचाप न पेन खोला न कॉपी.    मेरे शिक्षक आर्य जी,  जो आई आई टी में हमारे अच्छे मिलने वालों में थे , मुझे देख कर बोले - अरे कुछ कर क्यों नहीं रही हो?    मेरी पास वाली लड़की से बोले - आद्या आज इनको क्या हुआ है? 
         वह पत्र मेरे हाथ में दबा हुआ था, मैंने चुपचाप उनको पकड़ा दिया और फूट फूट कर रोने लगी. जब उन्होंने पत्र पढ़ा तो फिर समझने लगे -'अरे ये क्या? अब तो वहाँ सब कुछ ठीक होने लग है. ये पहले लिखा होगा आ ही रहे होंगे. परेशान मत हो. '
        इस बात को मैं अपने घर में जाकर किसी को नहीं बता सकती थी. किसी तरह से पेपर दिया और वापस घर आ गयी. मुझे सब कुछ अंधकारमय लग रहा था. वैसे भी मेरे पति टूरिंग जॉब में थे तो अकेले सब करने की आदत तो थी लेकिन इस तरह से कुछ सामने आ सकता है ऐसा नहीं सोचा था. 
                   उसी रात ११ बजे गेट खटका , मेरा उठाने का मन नहीं था. मैं लेटी रही , किसी ने दरवाजा खोला और जब इनकी आवाज सुनी तो मैं एकदम से उठाकर भागी . फिर इन को पकड़ कर जो मैं रोई थी, शायद जीवन में कभी नहीं रोई. 
"इन्होने धीरे से पूछा की चिट्ठी मिल गयी क्या?" 
घर वाले भी नहीं समझ पाए कि मैं क्यों रोई? 
ईश्वर  को लाख लाख धन्यवाद कि उसने मुझे उस विषम स्थिति से जल्दी ही उबार लिया.


पर उस शहीद की आत्मा को ईश्वर शांति प्रदान करे और परिवार वालों को साहस दे की वे उसके सपनों को पूरा कर सकें.

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

रेल तंत्र में बनाया - अप्रैल फूल !

                        



                              ये अप्रैल फूल - बच्चे बना लें, मित्र बना लें, या सहकर्मी  सब सह्य है क्योंकि थोड़ी देर का होता है और अपनी मूर्खता पर हंसी भी आ जाती है. थोड़ी देर के लिए सभी खुश हो लेते हैं. कभी उनकी बारी होती है और कभी हमारी होती है. 
                                अब की बार सोचा कुछ और हुआ कुछ और - २ अप्रैल को गुड फ्राई डे, फिर शनि और रवि एक छुट्टी की लम्बी श्रृंखला मिल गयी तो सोचा कि ३ दिन बच्चों के साथ गुजार कर आते हैं. १ अप्रैल को ९ बजे घर छोड़ दिया १०:५० कि ट्रेन थी. स्टेशन पहुँचने पर पता चला कि ट्रेन ३ घंटे लेट है. बच्चों के साथ समय गुजारने की जो ललक और ख़ुशी थी. बहुत दिन हो चले थे. मैंने पतिदेव से कहा  - "आप घर जाइए, मैं चली जाउंगी. ३ घंटे की तो बात है." 
                        उनको अगले दिन आना था. मैं वेटिंग रूम में बैठ गयी और घोषणा के इन्तजार में थी. काफी देर हो गयी तो आँखें झुकने लगीं, बीच बीच में झपकी भी लेती जा रही थी. एक एक करके सारे यात्री अपनी अपनी ट्रेन के आने पर चले गए और मैं तो जैसे बिन बुलाये मेहमान कि तरह जमी बैठी थी.  वह ट्रेन "गया" बिहार से आने वाली थी और "महाबोधि" था नाम. वह लम्बा इन्तजार - पल पल काटना तो मुश्किल हो रहा था. १ बजे पतिदेव का फ़ोन आया कि क्या पोजीशन है? बच्चे अलग बार बार फ़ोन कर रहे थे. 
                            सुबह ५ बजे से फिर फ़ोन आने शुरू होगये.
"कहाँ पहुंची"
                  मुझे तो आग लगी थी इन रेलवे वालों पर. ३ घंटे लेट ट्रेन अभी तक नहीं आई थी.
"कानपुर सेंट्रल " मैंने बड़े रुआंसे स्वर में कहा.
"स्टेशन आकर वापस ले जाऊं?" पतिदेव ने पूछा.
"नहीं, अब घर छोड़ा है तो बच्चों के पास ही जाऊँगी."  पहली अप्रैल का असर अभी रेलवे तंत्र में खत्म  नहीं हुआ था.
"मम्मा कहाँ हो?" बच्चे बीच बीच में पूछ रहे थे.
                           आखिर १० घंटे के इन्तजार के बाद "महाबोधि " का बोध हुआ और मैं उसमें जाकर बैठ गयी इस उम्मीद के साथ कि बहुत लेगी तो ५ बजे तक तो पहुंचा ही देगी.
                           ट्रेन पर अभी "फर्स्ट  अप्रैल" का भूत खत्म नहीं हुआ था - मंथर गति से मस्त हथिनी की तरह से चल रही थी. जहाँ मन होता वही बिगड़ैल घोड़ी की तरह से अड़ जाती. सारी रात बैठी रही, ये सोच कर चली थी कि नाश्ता घर पहुँच कर कर लेंगे. अब ट्रेन में भी कुछ अच्छा न मिला. चावल खाकर पेट की क्षुधा शांत की और फिर दिल्ली पहुँचने का इन्तजार करने लगी. 
"कहाँ पहुंची?"  का स्वर बीच बीच में सुनाई ही दे जाता था. खीज और झुंझलाहट के मारे बुरा हाल. 
ट्रेन कहीं एक घंटे रुक जाती और कहीं तो इससे भी अधिक. ये भी पता नहीं कि ये रुक क्यों जाती है? बगल से दूसरी ट्रेन मुंह चिढाती हुई धड़धडाती हुई निकल जाती .  हम बिचारे बैठे बैठे देख रहे  थे. कानपुर से दिल्ली का ६ घंटे का सफर आखिर ११ घंटे में पूरा हुआ और हम दिल्ली स्टेशन पर उतर ही गए.
                           इसमें सबसे बड़ा अप्रैल फूल बनने वाली बात ये थी कि ये ट्रेन जब "गया" से रवाना हो रही थी तब कानपुर में ३ घंटे लेट की घोषणा की जा रही थी और रेल तंत्र इस ट्रेन से जाने वाले लोगों को पूरी तरह से अप्रैल फूल बनने कि तैयारी करके बैठा था. हम बनते रहे और सिर पीटते रहे.  यानि कि ये हमारा रेल तंत्र जो  कि हमारी ही संपत्ति है सही जानकरी भी नहीं दे सकता है. उससे भी बड़ी मजाक वाली बात ये है कि ४ घंटे बाद जो टिकट वापस करना चाहे तो अब तो तारीख बदल चुकी है ये वापस भी नहीं होगा. चाहे ट्रेन आई हो या नहीं आई हो. अब तो आपको इसी से जाना पड़ेगा.  अपनी गलती का ठीकरा भी हमारे ही सिर फोड़ेंगे .