शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

होली रे होली !

होली वही जो दिलों में नए रंग भर दे,
 
होली वही जो मायूसों को खुश कर दे,

 
भरो कुछ ऐसे रंग सबके दिलोदिमाग में ,

 
जीवन जो सभी का पल में रंगा-रंग कर दे.



सतरंगी होली के रंगों से सजे थाल में   समस्त  ब्लॉग  संसार के  सदस्यों  को  अपनी   ओर से हार्दिक शुभकामनाएं आपके नजर  करती हूँ. 


 हमेशा आपके सहयोग , आलोचना और मार्गदर्शन के हम आकांक्षी और आभारी हैं.

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

होली में भंग की तरंग !






होली शब्द सुनकर ही कुछ रंग-गुलाल, मौज - मस्ती और हंसी मजाक का मूड बन जाता है. इस में भंग की तरंग हो फिर क्या कहने? कुछ वाकये होली के रंग में ऐसे गुजर जाते हैं कि फिर जीवन भर के लिए यादगार बन जाते हैं.

                 ऐसे ही एक होली का किस्सा आप सब को सुन कर कुछ हंसी आपके चेहरे पर भी बिखर जाए.

     करीब दस साल पहले की बात होगी, तब होली मनाने और खेलने में जो मजा था - अब ख़त्म हो चला है. अब होली में औपचारिकता मात्र देखने के लिए रह गयी है. ये मेरा अपना अनुभव है. तब हम अपने- अपने घरों से निकलते थे और सब जो नहीं निकले उन सबको निकाल कर टोली बना कर पूरे मोहल्ले में घूमा करते थे. महिलाओं की टोली मौज मस्ती करके दिन में 2 बजे तक घर लौटती थी.

                          मैं महिलाओं की टोली में और पतिदेव अपनी टोली में निकल जाते थे.  उस बार पतिदेव टोली में निकले और कहीं से भंग पीकर आ गए.  मैं लौटी नहीं थी और उनको पता नहीं क्या सूझा और पड़ोस में रहने वाले बुजुर्ग के घर जा पहुंचे, एकदम से रोनी सूरत बनाये. उनहोने गुझिया खाने  को दी तो मना कर दिया. वैसे ये रोनी सूरत में कभी नजर नहीं आते. बड़ों के साथ बड़े और बच्चों के साथ बच्चे बन जाते हैं.
"क्या चाचा मेरी तो अब क्या होली और क्या दीवाली?"
"क्यों सब ठीक तो है न?"
"कहाँ? अब रेखा तो घर में मेरे साथ रहना नहीं चाहती है, कल से तलाक की बात कर रही है."
"अरे ! ऐसा नहीं हो सकता ."
"अरे चाचा हो रहा  है, बतलाइए मैं दो बेटियों के लेकर कैसे क्या करूंगा?"
"तुम परेशान मत हो - मैं आकर उससे बात करता हूँ."
"ठीक है चाचा , अब आप बुजुर्गों का ही सहारा है. शायद कुछ समझ आ जाए. नहीं तो मैं तो कहीं का भी नहीं रहूँगा."
                            घर आकर सबने नहा धोकर खाना khaya और फिर हम सब सोने चले जाते हैं. बच्चे अपने ढंग से मस्ती करते हैं. 
                          अचानक ५ बजे बेटी ने आकर जगाया - "मम्मी, अंकल आये हैं और कई लोग हैं. आपको बुला रहे हैं."
        शाम को आना जाना फिर शुरू हो जाता है. मैं उठी और मुंह धोकर उनके पास चली गयी. वे दो और बुजुर्गों के साथ थे. 
"बैठो बेटा, तुमसे कुछ बात करनी है."
    मैं बैठ गयी और सोचने लगी की इस समय ऐसी क्या बात हो सकती है.
"देखो बेटा  तुम्हारी बेटियां अब सयानी हो रही हैं."
"जी"
"तो इनको सही तरह से तुम्हीं गाइड कर सकती हो."
"हाँ, ये तो है."
"देखो, जहाँ चार बर्तन होते हैं तो खटकते तो हैं ही, लेकिन कोई ऐसे नहीं करता."
"बेटा , तुम पढ़ी -लिखी समझदार हो. ये तो है  कि तुम  नौकरी करती हो तो किसी के पैसों से मुंहताज नहीं हो , फिर भी घर तो दोनों लोगों से ही चलता है." दूसरे बुजुर्ग ने बात को और आगे बढाया.
       अब मेरा माथा ठनका की ये माजरा क्या है  ? क्यों इस तरह की बात हो रही है? वह भी होली के दिन सब अच्छे मूड में ही होते हैं.
       फिर वे बेटी से बोले, "बिटिया पापा कहाँ है?"
"अन्दर सो रहे हैं."
"जरा उन्हें भी बुलाकर लाओ."
                थोड़ी देर में ये भी आ गए. इतने लोगों के साथ मुझे देखकर वहीँ बैठ गए.
"अब बताओ आदित्य - क्या कह रही हैं ये?"
"अरे चाचा मैं तो भंग की तरंग में था , पता नहीं क्या क्या कह गया ?"
                 चाचा का तो चेहरा लाल, मैं बताता हूँ तुम्हें और तुम्हारी भंग भी उतरता हूँ.
"अरे बेटा , ये रोनी सूरत बना कर दोपहर में गया और कह रहा था की चाचा रेखा घर छोड़कर जा रही है , तलाक लेने की बात कर रही है. मैं लड़कियों को लेकर कहाँ जाऊँगा?"
                           ये सुनकर तो मेरी हंसी छूट गयी  क्योंकि मुझे इस विषय में कुछ भी नहीं पता था. यहाँ तक की चर्चा भी नहीं की कि  वे चाचा के पास गए थे. 
                            तब से ये मोहल्ले में प्रसिद्ध हो गया और होली में इनसे चुटकी ली जाती है.
                              "चलो तुम्हारा मामला तो नहीं सुलझाना हैं?"

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

दुरूह जीवन संध्या के पल !


वे स्टेशन की सीढ़ियों पर किनारे से बैठे थे और मैं स्टेशन पर ट्रेन का इन्तजार कर रही थीपता नहीं क्यों मेरी आँखें उनके चेहरे को पढने लगीं -- बार - बार छलक रहे आंसुओं को पोंछते जा रहे थे और आंसू भी बार बार रहे थेमन में एक जिज्ञासा सी हुई कि क्यों इस तरह से अकेले बैठे आंसू पी रहे हैं

अचानक घोषणा हुई कि ट्रेन घंटे लेट हो चुकी है, जाना जरुरी था सो इन्तजार करने के अलावा कोई चारा न था। मैं वही किनारे से अपना बैग रख कर बैठ गयी। समझ नहीं आ रहा था कि कहाँ से शुरू करूँ? कुछ सिलसिला बने तो उन्हें पढ़ सकूं, उनके छलकते आंसुओं के प्रवाह को और तेज कर सकूं ताकि वे खुद को हल्का महसूस कर सकें।
"आपको कहाँ जाना है? " मैंने ही बात शुरू की।
"कहीं नहीं? ऐसे ही बैठा हूँ।"
"पर आप तो इस बैग में सामान लेकर बैठे हैं।"
"तुमसे मतलब, कौन हो तुम , - जो मेरे से सवाल पर सवाल किये जा रही हो?"
"कोई नहीं एक मुसाफिर हूँ, सोचा आप भी वही चल रहे हों तो हमसफर हो जायेंगे।"
"तुम्हें कहाँ जाना है?"
"बनारस जा रही हूँ।"
" बनारस" कुछ उत्सुकता से मेरी ओर देखा
"हाँ, बनारस , आपको भी वही जाना है क्या?"
"चलना तो है - पर निश्चित नहीं है।"
"चलना हो तो चलिए मैं पहुंचा दूँगी आपके गंतव्य तक।"
"गंतव्य तक - कौन हो मेरी तुम जो मुझे पहुँचाओगी?" स्वर एकदम तीखा हो गया।
"हूँ तो कोई नहीं - पर एक रिश्ता होता है इंसानियत का सो कह दिया।"
"क्या इंसानियत का ठेका ले रखा है।"
"ऐसा तो नहीं है - पर जिसके लिए मन कहता है उसके लिए कुछ भी कर सकती हूँ।"
"मेरे लिए क्या कर सकती हो?"
"बतलाइए?"
"कल मेरे बेटे बहू ने घर से जाने के लिए कह दिया तो आज कपड़े लेकर निकल लिया।"
"क्यों? क्या वह आपका घर नहीं है?"
"नहीं - मैंने सिर्फ बनवाया है, घर तो बेटे के नाम से ही लिया था मैंने।"
"अब कहाँ जायेंगे?"
"यहाँ तो नहीं ही रहूँगा - बनारस में किसी आश्रम में रह लूँगा। पेंशन मिलती है किसी का मुंहताज नहीं हूँ।"
"पर घर तो घर होता है।"
"घर घर वालों से होता है। - अगर घरवाले ही नहीं तो घर कैसा?"
"बहू बेटे भी घरवाले ही हैं।"
"नहीं , मैं अकेला हूँ, मेरी अब कोई पहचान नहीं, बनारस में बाकी जीवन काट लूँगा।"
इतने में गाड़ी आ गयी, मैंने उनसे पूछा - 'चलेंगे' हाँ और न कि उहापोह में फंसे वे उठ खड़े हुए और मेरे साथ ट्रेन में बैठ गए। अधिक भीड़ न थी सो एक सीट पर हम दोनों बैठ गए।
अपनत्व पाकर या फिर कुछ और सोच कर वे अपनी रामकहानी सुनाने लगे।
'बहुत मेहनत से बेटे को डाक्टरी कि पढ़ाई करवाई। खुद कम खाया लेकिन फीस और किताबों के पैसे जुटाने में जीवन चला गया। डाक्टर बन गया तो बहू बड़े घर की ले आया । उसके तौर तरीके भी उसी तरह के थे। मैं निम्न मध्यमवर्गीय उसमें कहाँ आ सकता था। जब तक पत्नी रही - सब कुछ देखती रही। एक अलग कमरा पीछे मेहमानों के लिए बनवाया गया था वही मुझे मिला। जहाँ किसी का आना जाना न था। ऊब कर बाहर आ जाता। कभी टीवी देखने लगता तो बहू की सहेलियों के बीच अच्छा न लगता । वे सबकी सब बड़े घरों की होती तो संकोच के मारे वही कमरे में पड़ा रहता। पत्नी पिछले वर्ष साथ छोड़ गयी नहीं तो सुख - दुःख की संगिनी थी किसी कि जरूरत ही नहीं होती।
धीरे-धीरे बहू बेटे को खलने लगा कि वह कमरा तो बच्चों का स्टडी रूम बन सकता है , फिर मैं कहाँ जाता? रोज सुनने को मिलता कि एक कमरा घेर रखा है, बच्चों को एकांत नहीं मिलता है। इन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ दिया जाय। वहाँ साथ के हमउम्र मिलेंगे तो समय भी कट जाएगा। मैंने मना कर दिया तो फिर प्रस्ताव रखा कि छत पर एक शेड डलवा देते हैं आप वही शिफ्ट हो जाइए। वहाँ गर्मी सहन नहीं होती - मन करता कि नीचे ए सी में लेट जाऊं, एक दिन गर्मी से बेहाल इसी के लिए ड्राइंग रूम में आकर दीवान पर लेट गया और थोड़ी देर में बहू कि सहेलियां आ गयी।
"चलिए आप ऊपर जाइए - यहाँ हम लोगों की पार्टी होनी है"। बहू ने कड़क आवाज में कहा।
"ओ तो इन्हें भी ए सी चाहिए - जिन्दगी में कभी देखा भी था" उसकी कोई सहेली मेरे जाने के बाद बोली थी।
फिर शाम को इसी बात पर बहस हो गयी और बहू बेटे ने कहा दिया कि आप ऊपर ही रहें , हम वही आपको खाना भेज दिया करेंगे। नीचे आने कि जरूरत नहीं है। हमारे मिलने जुलने वाले आते रहते हैं।
बस दूसरे ही दिन मन घर से निकल लिया और अब बनारस में ही रहूँगा।

उनकी कहानी सुनकर कुछ भी अजीब नहीं लगा, इतना जरूर लगा कि हम कितने स्वार्थी हैं? अपना सुख, अपनी ख़ुशी और अपना स्टेटस ही दिखलाई देता है - कभी ये भी अपना जीवन जिए हैं तो जीवन की इस संध्या में इन्हें अपनी मर्जी से जीने का हक़ हम क्यों नहीं दे सकते हैं? क्या इनके लिए सर्दी और गर्मी का अहसास मर चुका है। उनका मरा हो या नहीं पर हमारे सारे अहसास मर चुके हैं। हमारी दुनियाँ पति-पत्नी और अपने ही बच्चों में केन्द्रित है। वे हमारे जनक - जननी हैं , इस बात को अब बरसों गुजर चुके हैं। कैसे हम अपने अतीत को इतनी जल्दी भूल जाते हैं? हमारे लिए ही न फीस जुटाने के कारण ऑफिस से छूट कर पार्ट टाइम काम भी कर लिया करते थे- ऑफिस से छूट कर किसी के यहाँ लिखा पढ़ी का काम कुछ और पैसे जुटाने कि चाह में अपना आराम गिरवी रख देते थे और हम - कितने खुदगर्ज हो चुके हैं। उनके उन पलों को वापस तो नहीं ला सकते - उस कर्ज को कभी चुका भी नहीं सकते हैं। आज हम सक्षम हैं - लाखों कमा कर गाड़ी में घूम रहे हैं, ये क्रम इसी तरह चलता रहेगा। कल हम उनकी जगह लेंगे और हमारी जगह कोई और होगा। लेकिन इस कल को आज बना कर हम अपने भविष्य को किसी आईने में नहीं देख सकते हैं। लेकिन ये तो इतिहास है स्वयं को सदैव ही दुहराता रहेगा।



गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

फख्र है बेटियों पर!

बेटे और बेटियों के सवाल पर समाज ने हमेशा है प्रश्नचिन्ह खड़े किये हैं। आज भी मैं और मेरा परिवार गाहे बगाहे इस बात पर कटाक्ष सुनते रहते हैं लेकिन ये यथार्थ है कि मेरे संयुक्त परिवार में दो भाइयों के बीच पांच बेटियां हैं। इनके बड़े होने के पहले कोई कहता --
-- कितना कमाओगे कि इन लड़कियों कि शादी कर सकोगे ।
--काश एक लड़का होता तो इन लड़कियों कि शादी में सहारा तो दे सकता।
--जिंदगी गुजर जायेगी इन लड़कियों कि शादी करने में।
-- अभी परेशान नहीं कर किया वे जानती हैं कि बाद में तो परेशान करना ही है।
--मेरे बेटे से बड़ी बेटी शादी कर देना , तुम लोगों को एक बेटा मिल जाएगा और ये मकान और प्लाट उसके नाम कर देना। बाकी लड़कियों कि शादी में तुम्हें सहायता मिल जायेगी।

मेरे पास उन सवालों के कोई जवाब नहीं थे, क्योंकि उस समय अपने बेटियों के भविष्य को मैं खुद नहीं जानती थी। बस उनके लिए जो कर सका किया और आज उनमें से ३ अपने पैरों पर खड़ी हैं।

एक हफ्ते पहले हमें बड़ी बेटी कि शादी बेंगलोर से करनी पड़ी। बड़ी दो बेटियां वही नौकरी कर रही हैं। बेटे कि कमी शायद हमें कभी खली भी नहीं और इस काम को सारे इंतजाम के साथ जिस खूबसूरती से मेरी दूसरे और तीसरे नंबर कि बेटी ने अंजाम दिया है कि हम चारों के लिए बड़े ही फख्र की बात है। हम नहीं जानते थे कि कहाँ क्या इंतजाम हो सकता है, लेकिन सब कुछ शादी जैसे बड़े काम को अंजाम देने के लिए पिन से लेकर सारे इंतजाम करके मेरी बेटियों ने ये साबित कर दिया कि बेटे को सहारा कहने वाले गलत होते हैं। ये काम तो कोई भी जिम्मेदार संतान कर सकती है।
हम वहाँ थे और सब मूक दर्शक कि तरह ही उनके कार्यों को देखते रहे। कुछ करने के लिए कहा तो आप बस देखते रहिये और जरूरत बतलाइए सारा कुछ हो जाएगा। परसों जब बेटी कि विदाई करके घर लौटे तो लगा कि क्यों ये समाज बेटियों को आज भी बोझ समझता रहता है।

ऐसी बेटियां तो माँ-बाप के लिए गौरव का विषय होती हैं और मुझे इस बात पर नाज है।