मंगलवार, 6 नवंबर 2012

कुछ लोग ऐसे भी !

                        हमें लगता है कि  आज  युग में  वही कुछ करता है जहाँ से उसका स्वार्थ सिद्ध होता हो या फिर उसको कोई लालच हो बिना इसके तो लोग  गिलास पानी भी न दें। इस कथन में सत्यता है लेकिन आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें देवता नहीं तो हम मानव और मानवता के पुजारी जरूर कह सकते हैं।
                       मेरे साथ काम करने वाली एक महिला का काम  प्रेरणादायक भी है और लोग उसको बेवकूफ भी कहते हैं क्योंकि निःस्वार्थ काम करने के बाद कभी कभी वह आलोचना का शिकार भी होती है लेकिन जैसे गाय मिटटी में बैठ कर उठती  है तो उठने के बाद झाड़  कर चल देती है वैसे ही वह हैं। 
                      उनकी एक पारिवारिक मित्र  का आकस्मिक निधन होगया और उनके पतिदेव एक रूखे स्वभाव के, जिद्दी  और अपने मतलब से मतलब रखने वाले व्यक्ति हैं . यहाँ तक कि  अपने बच्चों से भी उनकी वार्ता कम ही होती थी . अपने अफसरी घमंड में डूबे रहने वाले। उनके घर में जब तक तेरहवीं नहीं हुई सब लोग थे और उसके बाद सब को जाना ही था बच्चों ने कहा की अब आप यहाँ रहकर क्या करेंगे ? हमारे साथ चलिए लेकिन नहीं अभी मैंने नया मकान  बनवाया है ये बरबाद हो जायेगा . बच्चे चले गए वह अकेले कुछ दिनों तक तो छोटे भाई के यहाँ से खाना आया उसके बाद उनसे भी कुछ कह दिया की उसने भी बंद कर दिया। 
                   तीन दिन तक फल आदि खाकर रहे लेकिन कहाँ तक ? एक दिन उनकी बेटी का फ़ोन मेरी मित्र के पास आया की आंटी पापा ने दो दिन से खाना नहीं खाया है आप जरा उन्हें जाकर देख लें . वह कामकाजी महिला लेकिन ऑफिस के बाद अपने पतिदेव के साथ उनके यहाँ गयीं तो पता चला कि  भाई के बेटे ने चोरी की थी और उन्होंने कह दिया तो सब बुरा मान गए। मेरी मित्र ने उनके लिए खाना बनाया और उन्हें खिला दिया। सुबह के लिए कुछ नाश्ता बना कर रख दिया। फिर तो उनके लिए ये रूटीन हो गया कि  वे ऑफिस से पहले उनके घर जाती उनके लिए, अपने पतिदेव और अपने लिए चाय बनाती  तब तक सब्जी काट लेती और उसको बनाने के लिए चढा  देती। चाय पीने के बाद तैयार होने पर उन्हें रोटी बना कर खिलाती और कुछ सुबह के लिए बना कर रख देती ताकि वे दिन में कुछ खा सकें, इसके बाद वे  अपने घर आती  . घर में भी संयुक्त परिवार  शाम को खाना बनाने की उनकी जिम्मेदारी  होती तो घर वाले कमेंट करते इतनी देर हो जाती है खाना बनाने में , कहीं और चली जाती हो क्या? लेकिन उन्होंने घर में भी ये बात किसी को नहीं बताई सिर्फ पति और पत्नी के बीच में रही।
                  वे अपने पतिदेव के सहयोग से ये काम 3 महीने तक करती रहीं उसके बाद उन्होंने एक खाना बनाने वाली खोजी और उनको खाना बनाकर देने से लेकर सारी  सफाई तक के काम उसको करने के लिए कह दिया।
         जब उनकी खाने वाली न आती तो उन्होंने कह रखा था की मेरे ऑफिस निकालने से पहले बता दें ताकि मैं अपने लंच के साथ आपके लिए भी कुछ बना कर आपके घर भेज सकूं . अगर छुट्टी वाला दिन हो तो उनसे घर आने केलिए  कह देती और वे घर आकर खाना खा जाते। 
                          आज वे अपने ही घर में अकेले ही रहते हैं लेकिन अब खाना उनको बना हुआ मिल जाता है तो मित्र शाम को कभी कभी उनके हाल चाल लेने के लिए चली जाती है।