मंगलवार, 30 नवंबर 2010

सामान सौ बरस का ..........

                        एक हप्ते बाद जब वापस आई तो सोचा पहले सबको पढ़ लूंगी तब कुछ लिखूंगी लेकिन अभी खोल कर बैठी और कुछ पढ़ा ही था कि खबर मिली कि मेरी लेखन क्षमता को पहचानने वाली मेरी मित्र कम बहन अधिक प्रतिमा श्रीवास्तव  हर मध्यम वर्गीय परिवार के संघर्ष से जूझती हुई अभी अभी स्थापित हुई है. नौकरी , घर , बच्चे और पति के बीच सामंजस्य बिठाते हुए सुकून कि सांस ले भी नहीं पाई थी कि वो कुछ इस लड़ाई में ऐसी घायल हुई कि अभी मेरे  ऑपरेशन के बाद मुझे देखने आई और आज वही किसी व्याधि के कारण व्हील चेयर पर हॉस्पिटल लायी गयी.
                        अपने इस दर्द को शब्दों में ढाल दिया और अब चलती हूँ. अब उसके पैरों पर खड़े होने के लिए दुआ करती हूँ. और उसके ठीक होने तक तो वापस आना मुश्किल है. फिर मिलती हूँ. और सबसे कहती हूँ कि उसके लिए दुआ करें.

गुरुवार, 18 नवंबर 2010

संस्कारों का ढोंग !

                         हमारी संस्कृति में मनुष्य के गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि तक सोलह संस्कार होते हैं. आज के जीवन में और बदलते मूल्यों के अनुसार पूरे सोलह संस्कार तो कोई भी नहीं कर पाता है लेकिन कुछ महत्वपूर्ण संस्कार जीवन में पूरे किये ही जाते हैं. इनमें से अब कुछ ही रह गए हैं जैसे - जन्म पर होने वाले, नामकरण , मुंडन, कर्णछेदन, विद्यारम्भ, विवाह और अंत्येष्टि एवं उसके बाद त्रयोदशी आदि. 
                          ये सारे संस्कार हमारी अपनी मान्यताओं के अनुरुप होते हैं और इस बात पर भी कि  हम इनको कितना महत्व देते हैं. अब कुछ नए संस्कार भी जुड़ गए हैं जैसे बर्थडे , एनिवर्सरी  जैसे कार्यक्रम. बड़े धूमधाम से मनाते हैं. अपनी हैसियत के अनुसार लोगों को भी बुलाते हैं. लेकिन पुराने संस्कारों के प्रति हमारा दृष्टिकोण पुरातन पंथी कह कर बदलता जा रहा है. उसको भी हम सुविधानुसार  ढाल कर पूरा करने लगे हैं. 
                          कल मैं अपने पति के एक मित्र के पिता की तेहरवी में गयी थी. तीन बेटे और तीनों बहुएँ एकदम आधुनिक लेकिन कुछ अवसर ऐसे होते हैं कि  आधुनिकता हमें ये नहीं सिखाती है कि  हम अपनी कुछ परम्पराओं को भूल कर चलें या तो हम कुछ भी नहीं करें. हम इस वैदिक रीति के कार्यक्रम को मानते ही नहीं है और होता भी है आर्यसमाज रीति से आप संस्कार कीजिये और उसकी विधि के अनुसार शांति हवन कीजिये. वह भी सर्वमान्य पद्धति है. लेकिन अगर वैदिक रीति से चले तो फिर उसके प्रत्येक नियम को कुछ हद तक तो पालन करना अनिवार्य है. 
                          सुबह हवन होना था और पंडितों को खिलाना भी था. पंडित जी से पूछ कर सारा समान पैकेट बना कर उनको सौप दिया गया कि  आप ब्राह्मण खोज कर उनको दे दें. सारी चीजों के पैकेट थे साथ ही खाने के पैकेट भी थे. कुछ काम घर में बहुओं के द्वारा भी किये जाते हैं तो वह कौन करे? खुद खाना घर में तो बनाती नहीं है तो यहाँ पूरियां कौन तलेगा? बड़ी ने छोटी से कहा और छोटी ने और छोटी से . फिर छोटी ने एप्रन पहना और डरते डरते गैस तक गयीं सिर्फ ७-८ पूरियां ताली . बस हो गया भाभी जी. 
                        हम  काफी अंतरंगता रखते हैं तो वहाँ हम दिन भर थे. शाम को जिन्हें कार्ड दिया गया था तो लोग आने शुरू हो गए. दोपहर में ही मुझसे पूछा गया कि  इतने लोगों को कार्ड दिया गया है तो किस हिसाब से हलवाई को आर्डर दें कि क्या चीज कितनी होनी चाहिए?फिर सोचा गया कि अलग अलग चीजों के आने से झंझट बढेगा और फिर थाली कटोरी का भी काम बढ़ जाएगा.  फिर पैक्ड  थालियों का व्यक्तियों के हिसाब से आर्डर कर दिया गया. पैक्ड थालियाँ आ गयी और जैसे जैसे लोग आते जा रहे थे. मेजों पर थालियाँ रख दी जाती और लोग खाकर चलते जा रहे थे. हम भी उनमें से एक थे और खा पीकर हम भी घर आ गए. रात में देर तक नीद नहीं आई कि क्या इस तरह से भी होने लगा है. क्या सिर्फ एक संस्कार हम पूरी श्रद्धा से और नियमानुसार  नहीं कर सकते हैं. पुरुष वर्ग शायद ऐसा करता भी लेकिन स्त्रियाँ जब कुछ करने के लिए राजी ही नहीं तो वे क्या करें? उनके लिए बर्थडे पार्टी और तेरहवी बराबर हो गयी . बाहर से आर्डर कर दिया और खुद तैयार होकर होस्ट बनी सबको अटैंड कर रहीं है. वही यहाँ था, सारी बहुएँ तैयार पूरे मेकअप में बाबूजी के गुणगान कर रही थी. और कुछ हम जैसी दकियानूसी महिलायें इस संस्कार की परंपरागत तरीके पर रो रही थीं.

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

ऐसा भी होता है !

                        जीवन में मूल्य और सिद्धांतों की बलि चढ़ा मेरा करियर में एक महत्वपूर्ण घटना यह भी है , मुझे इससे कोई शिकायत नहीं है लेकिन ये आज भी मुझे कसक दे जाती है तो सोचा आप सबसे बाँट लूं. 
                         मैं उस समय एक डिग्री कॉलेज में राजनीति शास्त्र विभाग में मानदेय पर प्रवक्ता पद पर कार्य कर रही थी. शायद विभाग में सबसे अधिक डिग्री मेरे पास ही थीं लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था. क्योंकि मानदेय प्रवक्ता किस दृष्टि से देखे जाते हैं ये इसके मुक्तभोगी अधिक अच्छी तरह से बता सकते  है. मेरे विभागाध्यक्ष ने कहा कि मैं इस साल रिसर्च का पेपर लगवाना चाहता हूँ क्योंकि अभी तक इसको पढ़ाने वाला कोई नहीं था और आप रिसर्च पढ़ा सकती हैं. पेपर भी स्कोरिंग होता है रिजल्ट भी अच्छा रहेगा. मुझे रिसर्च में अधिक रूचि थी तो मैंने उनसे सहमति व्यक्त कर दी. जब कि मुझे मालूम था कि इस पेपर को लेने वाले बच्चों को पढ़ाई से लेकर उनके लघुशोध  तक का काम मुझे ही अकेले देखना होगा . पर मेरा अपने काम के प्रति समर्पण कभी भी कम नहीं रहा. मैंने जो भी काम किया पूरी लगन और रूचि से ही किया. 
                        करीब २० बच्चों ने रिसर्च का पेपर लिया और उन सबको मैंने उनके लघुशोध के लिए पूरा पूरा सहयोग किया. उनको उनके काम के लिए अगर कहीं और लेकर जाना पड़ा तो मैं बराबर उनके साथ जाकर काम करवाने का प्रयास किया. ऐसा नहीं है कि मेरे इस सहयोग और प्रयास के लिए मेरे छात्र आज भी अगर कहीं मिल जाते हैं तो पूरा सम्मान देते हैं. बात उनके लघुशोध के वायवा की है. परीक्षक ने छात्रों के प्रयास को काफी सराहा. उस समय विभाग के सभी शिक्षकों के अतिरिक्त एक अन्य विभाग के प्रवक्ता जो कि मेरे विभाग के एक प्रवक्ता के मित्र थे वह भी उपस्थित थे. उन्होंने वे लघुशोध उठा कर  देखे उनमें पर्यवेक्षक के स्थान पर सभी में मेरा ही नाम था. ये बात उनको कुछ ठीक नहीं लगी. इससे पहले हमारे विभाग के किसी भी शिक्षक को इस बात पर कोई आपत्ति नहीं लगी क्योंकि सभी को कार्य मैंने ही करवाया था. 
                         परीक्षक के जाने के बाद उन प्रवक्ता महोदय ने अपने मित्र को सुझाव दिया कि ये तो मानदेय पर हैं इस शोध कार्य से इनको कोई लाभ नहीं मिलेगा लेकिन अगर इन सभी शोधों पर आप लोगों के नाम पड़ जाएँ तो ये कार्य आगे आपके वेतनमान के लिए और शोध की दिशा में लाभकारी सिद्ध होगा. फिर क्या था. रातों रात विश्वविद्यालय जाने वाली प्रतियों पर कवर बदले गए और उन पर वहाँ पर स्थायी रूप से काम करने वाले लोगों के नाम डाल दिए गए. ये काम मेरे सामने जब आया तो कहा गया कि विश्वविद्यालय में मानदेय प्रवक्ताओं के शोध मान्य नहीं होंगे. इसके आगे मैं कुछ कह नहीं सकती थी वैसे मुझे वास्तविकता का ज्ञान तो था ही. कॉलेज में रखी गयीं प्रतियों पर आज भी मेरा ही नाम पड़ा हुआ है क्योंकि अगर ये बात छात्रों को पता लग जाती तो शायद बहुत बड़ा बवाल हो सकता था. इस लिए कॉलेज की प्रतियों को जैसे के तैसे ही रहने दिया गया. 
                       ये बात छोटी थी या फिर बड़ी मैं नहीं जानती लेकिन मेरे सिद्धांतों के खिलाफ थी सो मैंने वह कॉलेज छोड़ दिया. फिर भी कॉलेज की इस राजनीति से मेरा मन बहुत दुखी हुआ. क्यों छात्र शिक्षकों के प्रति सम्मान का दृष्टिकोण नहीं रखते हैं शायद ऐसी ही कोई बात उनके सामने भी आ जाती होगी और अपने गुरु के इस तरह से नैतिक रूप से गिरा हुआ देख कर वे सम्मान भी नहीं कर पाते हैं. हम दोष छात्रों को देते हैं.