सोमवार, 23 अप्रैल 2012

vah bhalai samane aayi!

                    बचपन से यही सुनती चली आ रही थी की जीवन में किये गए भले कामों का फल जरूर मिलता है और कल कुछ तो ऐसा देखने को मिला तो लगा की  ऐसे गुण और संस्कार हमें सिर्फ अपने से मिलते हैं और वे भी सिखाये नहीं जाते बल्कि हम खुद सीखते हैं .
                   कल मैं अपनी बहन के यहाँ से शादी के बाद अपने शेष भाई बहनों के साथ वापस आ रही थी. झाँसी के बाद उरई और कानपूर आने के लिए हमारे पास कोई रिजर्वेशन नहीं था. क्योंकि जहाँ से हम आ रहे थे वहां से झाँसी तक ही सीधी ट्रेन थी  और वह झाँसी पहुँचने  में एक घंटे लेट हो गयी और हमारी लिंक ट्रेन जा चुकी थी. अब हमारे सामने और कोई चारा न था की हम किसी दूसरी ट्रेन में टिकट लेकर बैठ जाएँ.  हम सभी जल्दी से जल्दी घर पहुंचना चाहते थे. झाँसी हम सुबह सात बजे पहुंचे और फिर पता किया तो हमें ९ बजे ट्रेन मिलनी थी जो की मुंबई से आ रही थी. हमने  टिकट  लिया  और ट्रेन आने पर  एक   बोगी में घुस  गए. उस  बोगी  में तिल  धरने  की  जगह नहीं थी लेकिन  क्या  करते  पहुँचाना जरूरी  था. उसी  में घुस गए की खड़े  खड़े ही सही  पहुँच  तो जायेंगे  ही. वहां पहले  से बैठे  लोग  किसी  भी तरह  से सहयोग  करने  को तैयार  नहीं थे. अपनी अपनी  सीट  पर पालथी  मार  कर बैठे हुए  थे . अगर  उनसे  अनुरोध  भी किया गया  तो उन  लोगों  ने बड़े  ही बेरुखे  ढंग  से उत्तर  दिया  की हम सीट रिजर्व आपके  लिए नहीं करवा कर  आ रहे हैं. बात  भी ठीक  थी.
                       वाही पर मैं , मेरे पति , मेरे बड़े भाई साहब  और bhabhi  जी  हमारे साथ थे. हम सभी किसी तरह खड़े होने  का प्रयास  कर वहां टिके  हुए थे. अचानक  सामने  की सीट पर बैठे हुए एक युवा  ने  मेरे  भाई साहब को देखा  कर पूछा  - 'आप  डी ए वी  कॉलेज  में पढ़ाते  हैं न ? '
'हाँ  वही पढाता  था, अब  रिटायर्मेंट  ले  लिया है.'
'सर  आप मुझे  नहीं पहचान  पाए  होंगे , लेकिन मैं आपको  पहचानता   हूँ . ' वह  यह  कहते  हुए अपनी बर्थ  छोड़ कर उठ खड़ा हुआ और बोला  'सर आप बैठ  जाइए  मैं खड़ा हो जाता  हूँ. भाई साहब ने उसको  बहुत  मना किया लेकिन वह अपनी जगह छोड़ कर उठ कर खड़ा हो गया.
                    फिर उसने अपनी सीट पर बैठे अन्य लोगों से थोडा थोडा खिसकने की बात कह कर हम सभी को बिठा लिया. 
                     फिर वह बातें करने लगा और अपने बारे में बताने लगा की वह अब क्या कर रहा है? भाई साहब से फिर बताने लगा की आप तो हमें जीवन भर याद  रहेंगे   क्योंकि जब  वह हाई स्कूल  में था तो उसके गाँव  में प्रेक्टिकल   लेने  गए थे और उसी दिन   मेरे पिताजी  का निधन  हो गया था मेरा प्रेक्टिकल  छूट   गया था. मैं तीन  दिन बाद आपके  पास पहुंचा था तो अपने घर पर ही मेरी  प्रेक्टिकल  की कॉपी  लिखवा  कर मेरा प्रेक्टिकल  ले लिया था. अगर आप ऐसा न करते तो फिर मैं अपने घर को संभालने   के लिए एक साल बाद तैयार हो पाता.
                       उसके  इतना कहने  पर मुझे वह घटना  याद  आ गयी. मैं उस समय  उरई में ही थी. एक लड़का  ऊपर  चढ़  कर आया  और पूछा मास्साब  घर में हैं क्योंकि प्रेक्टिकल  लेने  के बाद  भाई साहब घर पर ही थे . घर आकर  उसने बताया  था की उसके  पिताजी  का निधन  हो गया था और वह इसा  कारण   वह प्रेक्टिकल देने नहीं आ सका. साब आप अगर मेरा प्रेक्टिकल ले लें तो मेरा साल बच जाएगा.
                       भाई साहब ने उससे  घर पर ही कॉपी  लिखवा  ली  और प्रेक्टिकल की सारी  औपचारिकता  नियमपूर्वक  पूरी  करवाई  और उससे उसकी  उपस्थिति  दर्ज  कर ली. जब वह जाने  लगा तो मेरा भतीजा दो  साल का था वह वही खेल  रहा था. उसने दो रुपये  का नोट  निकल  कर उसको देने का प्रयास किया तो भाई साहब ने कहा की इसकी  कोई जरूरत  नहीं है. वह रुआंसा   हो गया - साब हम बहुत गरीब  हैं , हमारे पास आपको देने के लिए कुछ भी नहीं है. ये  बच्चे  को दे  रहा हूँ. इससे  ज्यादा  मेरे पास नहीं हैं मैं गाँव से यहाँ तक पैदल आया हूँ.
                       भाई साहब ने उससे कहा - 'बेटा  इसकी कोई जरूरत नहीं है, मैं ये सब  नहीं लेता , मैंने  तुम्हारी  परेशानी  देख  कर जो कर सकता  था वह किया. तुम  परेशान मत  हो. '
                  फिर उस लडके  से कभी मिलने  का कोई सवाल  ही नहीं था और आज  वही फिर सामने  आ गया तो लगा की आज  भी लोग किये गए किसी भी भलाई  को सम्मान  देते  हैं.

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

यथार्थ का शतक !

कहीं पढ़ा था इसको और इसके यथार्थ पक्ष को देखा भी है और समझा भी हैकुछ सन्देश देती है ये कथा सो इसको यथार्थ की सौवीं रचना के रूप में आपके नजर कर रही हूँ

एक क्रोधी व्यक्ति एक संत की शरण में आया और कहने लगा कि मुझे बहुत क्रोध आता है और पता नहीं मैं किसको क्या क्या कह जाता हूँ?मुझको इससे निजात चाहिए
साधू ने कहा कि क्रोध पर नियंत्रण इंसान खुद ही कर सकता है ऐसा कोई मंत्र नहीं है कि जिससे आप इससे मुक्त हो जाएँ फिर भी आप को एक बात बताता हूँ जिससे अगर आप प्रयास करें तो शायद कुछ अच्छा प्रतिफल मिल सके
"आप बतलाइये मैं वो करूंगा जो आप बताएँगे।" क्रोधी व्यक्ति ने आतुर हो पूछा
"तुम्हें जब क्रोध आये तो तुम दीवार पर एक कील गाड़ दिया करना , जितनी बार भी क्रोध आये उतनी ही कीलें।" साधू ने उसको रास्ता बताया
"जैसी आपकी आज्ञा " कह कर क्रोधी व्यक्ति अपने घर लौट आया
जैसा साधू ने कहा था उसने वैसे ही वैसे करना आरम्भ कर दियापहले दिन उसको दिन में १५ बार क्रोध आया और उसने कीलें गाड़ दींउसने दस दिन तक ये काम किया और धीरे धीरे कीलों की संख्या अपने आप ही काम होने लगीएक दिन वह भी आया जब कि उसको क्रोध बिल्कुल भी नहीं आयावह उस दिन साधू के पास गया और हाथ जोड़ कर बोला , 'स्वामी जी कल मुझे क्रोध बिल्कुल भी नहीं आया और मैंने दीवार पर एक भी कील नहीं गाड़ी।"
संत ने उससे कहा कि अब तुम ऐसा करो कि अब जिस दिन तुमको बिल्कुल भी क्रोध आये तो उसमें से एक कील रोज उखाड़ते जानाजब सारी कीलें उखड जाएँ तो फिर मेरे पास आना
करीब एक महीने में उसने सारी कीलें उखड डाली और फिर आया तो बोला - "स्वामी जी अब मुझे बिल्कुल भी क्रोध नहीं आता है । "
"ये तो ठीक है लेकिन तुम्हारी दीवार पर जो कीलें गाडीं थी उसके निशान मिट गए या नहीं। "
"स्वामी जी निशान कैसे मिट सकते हें? कीलें निकल लीं लेकिन दीवार पर निशान तो रहेंगे ही।"
"हाँ अब सुनों तुम जो दीवार पर निशान देखते हो , उससे याद करो कि तुमने अपने क्रोध में एक कील गाड़ी और ख़त्म होने पर उखाड़ भी दी लेकिन क्या निशान ख़त्म हुआ ? नहीं, फिर सोचो तुमने क्रोध में कितने लोगों को अपशब्द कहे होंगे, किसी को मारा भी होगा और कितना अपना नुक्सान किया होगाक्रोध समाप्त होने पर सब भूल गए होगे लेकिन जब एक निर्जीव दीवार तुम्हारे क्रोध के कहर के अपने सीने में निशान की तरह संजोये हुए है फिर कोई इंसान जिसमें आत्मा होती है, कितना आहत किया होगा और फिर भूल गएउनके कष्ट का अनुमान तुम इसी से लगा सकते होवे सजीव प्राणी कभी इसको भूल सकते हें शायद नहींकितने शत्रु तुमने अपने पैदा कर लिए होंगे
इसी लिए कहा जाता है कि आदमी का क्रोध उसका सबसे बड़ा शत्रु होता हैअगर चाहते हो कि तुम्हारा कोई शत्रु हो तो सबसे पहले अपने क्रोध पर नियंत्रण पाना चाहिए

शनिवार, 31 मार्च 2012

पैसा नहीं दिल चाहिए !

कल एक प्रोग्राम देखा प्रोग्राम कहें उसे एक समाचार के रूप में यथार्थ को दर्शा रहे थेवैसे हर इंसान इस दुनियाँ में कुछ बन कर आता है और कुछ बन कर जाता है लेकिन उसके भावनाएं और संस्कार कब कैसे बदल जाते हें? ये हम सोच नहीं पाते हें
किस्सा एक फिल्मी दुनियाँ के एक्स्ट्रा कलाकार का हैजो कम से कम एक हजार फिल्मों में काम करने के बाद आज लखनऊ में भीख मांग कर अपना गुजारा कर रहा हैसुरेन्द्र खरे नाम के इस इंसान ने जीवन में खुद शादी नहीं कीपरिवार में बहने और भाई है (भाई रेलवे में एकाउंट ऑफिसर है) । लेकिन रिश्ते अब कोई मतलब नहीं रखते हेंऐसा नहीं कि इस इंसान ने जीवन में बहुत कमाया और सारा का सारा दूसरों की सहायता में खर्च किया और अपने लिए सोचा था कि सारी दुनियाँ के काम रहा हूँ तो मुझसे कौन मुँह मोड़ेगा? इस दिन की तो उन्होंने कल्पना भी नहीं की थीसाथ ही बताती चलूँ कि इस इंसान ने मदर इण्डिया , मुगले आजम, यहूदी की बेटी और पाकीजा जैसी हिट फिल्मों में काम किया था
इस किस्से को एक दूसरे घटना से जोड़ना चाहती हूँमेरी काम करने वाली जिसकी उम्र ६० साल से काम नहीं होगी ने कहलाया कि वह आगे १५ नहीं पायेगी क्योंकि उसके जेठ जी का निधन हो गया हैवह विधवा औरत बेटों की माँ है और अपने खर्च के लिए खुद काम करती है साथ ही एक बहू के रहने के कारण उसकी बेटी को रखती है और अपने बेटों के द्वारा घर से निकाले गए जेठ को भी रखती थी
उसके पास सिर्फ एक कमरा है बाकी बेटों में ले रखा हैउसके बाहर चबूतरे पर उसने एक हाथ ठेला लगा कर और बाहर से तिरपाल डाल कर जेठ को लिटा रखा था क्योंकि अब वह चलने फिरने में भी असमर्थ थाउसने जेठ के निधन पर उनके बेटों को खबर भेजी तो उन लोगों ने कहला दिया कि जब उनकी अर्थी उठे तो हमारे घर हो कर ही ले जाना हम भी साथ हो लेंगेअपने पिता को उन्होंने यह कह कर घर से निकाल दिया था कि जीवन भर खाया उड़ाया है हमारे रहने के लिए जगह भी नहीं कीचाचा अपने बेटों के लिए रहने की जगह तो कर गएफिर पिता भीख मांगने लगे और इसको पता चला तो वह अपने घर ले आई कि मेरे पास चलो आखिर अगर आपका भाई होता तो इस तरह तो भीख माँगने देतामैं जो भी कमाती हूँ उससे पेट तो भर ही सकती हूँ
कई जगह काम करती है और घर जाकर चाहे खुद खाना खाए लेकिन जेठ के लिए कुछ बना कर जरूर दे आती और दूसरे घरों में निकल जातीकभी किसी भी घर से उसने कभी खाने को नहीं माँगा और खाती हैअपनी कमाई का ही खाती है
जेठ की अंतिम क्रिया से लेकर उसकी त्रयोदशी तक के सारे काम उसने कियाजेठ के बेटों ने श्मशान जाने तक की जहमत नहीं उठाई क्योंकि उनके घर से शव ले ही नहीं जाया गयाभतीजों ने स्पष्ट मना कर दिया कि अब जब वे अंतिम समय में हमारे घर में रहे तो काम भी हम ही कर देंगेयद्यपि उसके बेटे भी बहुत समर्थ नहीं है कोई कबाड़ का काम करता है कोई कहीं फैक्ट्री में काम करता है और कोई फेरी लगता हैलेकिन माँ के इस कदम को उन्होंने इतना सहारा दिया कि अगर उसने रखा तो शेष काम हम कर ही लेंगे
कहाँ तो आफिसर होकर अपने भाई को भीख माँगते हुए देख कर भी आत्मा कांपी नहींहो सकता है कि टीवी पर आने के बाद कुछ शर्म आये लेकिन किसी को क्या पता कि ये हें कौन
दूसरे घर घर काम करने वाली ने अपने पति के भाई गर्त से निकल कर अपनी सामर्थ्य के अनुसार रखा खिलाया पिलाया और उसके अंतिम काम भी कर डालेयहाँ खून के रिश्ते काम नहीं आते बल्कि संवेदनाएं होनी चाहिए जो आज अपनों में ही क्या अपने अंशों में भी ख़त्म होती चली जा रही हें

शनिवार, 24 मार्च 2012

बदलते लोग !

आज डॉ मोनिका शर्मा का लेख पढ़ा तो उससे निकल कर एक घटना मेरे जेहन में उभरने लगी - जिसने मुझे उस परिवार से दूर कर दिया

मेरी शादी जब हुए तो मेरा परिवार कानपुर विश्वविद्यालय परिसर में रहता थावहाँ की डिस्पेंसरी मेरे ससुर जी चलाते थेउस समय कालोनी बहुत बड़ी थीएक रजिस्ट्रार का परिवार का था - उनके परिवार में बेटियाँ और बेटा थाउनकी बड़ी बेटी मेरी हमउम्र थी सो मेरी अच्छी दोस्त बन गयीमैं बहू थी सो वह मेरे पास जाती थीहमारे बीच अच्छी अंतरंगता थी और बाद में वह मेरे पति को राखी बांधने लगी और उससे ये सम्बन्ध आज भी जारी है
उसकी शादी हो गयी और हमने विश्वविद्यालय छोड़ दिया लेकिन सम्बन्ध ख़त्म नहीं हुए थेउनकी चौथी नंबर की बेटी जहाँ मैं प्रिंसिपल थी उसी स्कूल में पढ़ाने लगी थी लेकिन उससे हमारे सम्बन्ध बड़ी बहन के अनुसार ही थेमेरी बेटी का मुंडन था और मैं इसका निमंत्रण देने के लिए उनके घर गयी तो घर में उनकी दूसरे नंबर की बेटी मिलीअब उनकी दो बेटियों की शादी हो चुकी थी और बाकी नौकरी करने लगी थींस्थिति में बहुत फर्क गया थावह मुझे देखते ही बोली 'कहिये भाभी कोई काम है क्या?'
मुझे सुनकर बहुत बुरा लगामैंने कहा कि नहीं ऐसा कुछ नहीं मीनू से मिलने आई थी कि सोनू का मुंडन है
'अच्छा मैं तो समझी कि यूनिवर्सिटी का कोई काम होगा यहाँ कोई बिना काम के तो आता नहीं है। '
मुझे सुनकर बड़ा आश्चर्य लगा कि ये लड़कियाँ जब इन्हें कॉलेज जाना होता था तो मेरे पति के घर से निकलने के समय पहले से जाती - 'भाई साहब के साथ निकल जाऊँगी।'
उनको तो शहर जाना ही होता था सो साथ ले जाते और कॉलेज छोड़ देते थेये वही लड़की है जो संबंधों को अब सिर्फ अपने पापा और अपनी हैसियत से तौलने लगी थीअपने पद पर रहते हुए उनके पिता ने अपने बच्चों को विश्वविद्यालय या डिग्री कॉलेज में लगा दिया और देखते देखते ही वे बहुत पैसे वाले हो गए

सोमवार, 12 मार्च 2012

पूत न भये सपूत !

इसे मजाक समझिएगा , एक यथार्थ है ऐसा जिसे अपनी आँखों से देख रही हूँ और हमारे समाज की दकियानूसीपन के मुँह पर एक करारा तमाचा भीहमारे समाज में एक पुत्र होने पर वंश का नाम चलता रहेगा ये अवधारणा आज भी पूरे जोर शोर से बाकी हैफिर हमसे एक पिछली पीढ़ी भी इससे कहीं अधिक सोचती रही है कि वंश का नाम डूब जाए भले ही वंशज कहीं और जाकर रहें और यहाँ कोई नाम लेवा रहे
मेरी एक सहेजी जो उरई में मेरे साथ १९६९ में ग्यारहवीं तक ही पढ़ी
फिर उसके बाद उसके पापा का ट्रान्सफर इटावा हो गया और वह चली गयीउस समय उसके पापा कोर्ट में किसी अच्छी पोस्ट पर थेहमारे बीच १९७२ तक ही संपर्क रहा और उसके बाद उसकी शादी जल्दी कर दी गयी और हम अलग हो गए कोई खोज खबर नहीं रहीजब वह उरई से गयी थी उसके दो भाई और दो बहन थीपिता कई भाई थे सो उन्हें दो बेटों में संतोष हुआ और उसकी शादी के बाद उनके घर में दो बेटे और दो बेटियाँ और हुईंअपने रिटायरमेंट के बाद तक उन्होंने बेटों की इच्छा पूरी कीचार सपूत हुएलेकिन सपूत तो क्या कोई पूत भी निकल पाया
कुछ इत्तेफाक ऐसा था कि जब उसका बेटा पढ़ लिख कर इंजिनियर बन गया तो उसने मेरे बारे में बताया और कहा कि नेट पर खोजो शायद कहीं मिल जाए और इत्तेफाक से वाकई मैं उसको मिल गयी और फिर मेल के जरिये ३३ साल बाद हम एक दूसरे की खबर ले सके और फिर मिल भी सके क्योंकि उसकी मम्मी कानपुर में ही रहती थीं
जब उससे मुलाकात हुई तो पता चला कि हमारे अलग होने के बाद उसके पापा ने और परिवार बढाया था कि उसका नाम दूर दूर चलता रहेगालेकिन अफसोस उनके चारों बेटों में कोई इतना भी नहीं पढ़ा कि वे कहीं नौकरी कर लेतेमाँ जीवित थीं तो उनको पेंशन मिलती थी और एक बहन तलाकशुदा थी जो सबके लिए खाना बनाया करती थी और माँ की सेवा करती थीबेटे अपने जेब खर्च भर के लिए इधर उधर करके कुछ कमा लेते थे लेकिन रोटियां तो माँ को ही खिलानी पड़ती हें
फिर एक साल के अन्दर उसकी माँ का स्वर्गवास होगया और बहन तो जैसे उनके लिए ही जी रही थीमाँ के १५ दिन बाद बहन चल बसीघर में कोई रोटी बनाने वाला थाचार बेटे उनकी किसी की भी शादी हुई थीसिर छुपाने के लिए घर माँ के नाम था सो सब रह भर सकते थेपिता परिवार तो बढ़ाते रहे कि वंश चलता रहे लेकिन उन वंश चलाने वालों के लिए कुछ भी सोचा कि इनका भविष्य बनाया तो क्या होगा? बेटियाँ तो उन्होंने अपने जीवन में ही ब्याह दी थी , उसमें से भी एक का तलाक हो गया था
कल उसका फ़ोन आया कि उसके चाचा का निधन हो गया है और वह नागपुर से सीधे मेरे पास ही आएगी उसके बाद वह उनके घर जायेगीआने पर उसने बताया कि अब घर में कोई इतना भी नहीं है कि जाकर वहाँ इंसान बैठ कर नाश्ता करके निकल जाएअब ऐसे भाइयों के बारे में मैंने सोचना छोड़ दिया क्योंकि ये नाकारा लोगों को कौन अपनी बेटी देगा और किस मुँह से किसी को बताऊँ कि मेरे भाई से अपनी बेटी की शादी कर दीजियेवे करते कुछ ही नहीं हैबस अपने अपने पेट भरने का इंतजाम भर किसी तरह से कर लेते हें
बस यही कहते बनता है कि चिराग तले अँधेरा ऐसे ही होता है कि पिता ने तो चार बेटे पैदा किये कि वंश का नाम चलेगा और बेटों ने नाम जीते जी डुबो दिया

रविवार, 26 फरवरी 2012

एक दिन बिक जाएगा......!

एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल ,
जग में रह जायेंगे प्यारे तेरे बोल .


इन पंक्तियों में छिपा सच एक दिन दिखाई ही दे गया और दो चार हुई इस घटना से .

जीवन में इंसान अहम् से भरा मदमस्त हाथी की तरह से होता है , जिसको अपने सामने कोई और नजर ही नहीं आता है कौन सामने पड़ा और किसको कुचल दिया इससे कोई सरोकार नहीं होता है लेकिन कब तक ? जब तक कि उसको अंकुश करने वाला नहीं मिल जाता लेकिन मनुष्य का अहम् तो इससे भी अधिक खतरनाक होता है अपने इस अहंकार के चलते हम अपनी शक्ति और धन के सामने किसी को कुछ भी नहीं समझते हें चाहे ये इंसान की क्षुद्र बुद्धि हो या फिर मदान्धता
उन्हें मैं मिस्टर जज ही कहूँगी वे सेशन कोर्ट के जज थेपद, सम्मान और पद के अनुरुप सफेद और काले धन की दीवारों ने उनको मानसिक तौर पर अपने में ही कैद कर दिया थाघर में किसी का भी आना जाना उन्हें पसंद था और ही किसी रिश्तेदार या सम्बन्ध रखनाउन्हें शक था कि लोग मेरे पैसे के पीछे मुझसे रिश्ता रखना चाहते हेंउनकी पत्नी चाहकर भी रिश्ते निभा पाती थीं और जोड़ पाती थीउनको अपने स्तर के लोगों से ही मिलने जुलने की हिदायत थी और जीवन भर ऐसे रहते रहते उनकी दुनियाँ भी उन्हीं लोगों के बीच रह गयी थी। ।अपने बच्चों तक उनकी दुनियाँ सीमित थी और उनमें से उन बच्चों से कोई रिश्ता था जिन्होंने उनके अहंकार को चोट पहुंचा कर खुद किसी साधारण परिवार के सदस्य से शादी कर ली थीबच्चे उनकी अनुपस्थिति में माँ से मिलने आते रहते
एक दिन ईश्वर ने उस अहंकार की सजा उन्हें ऐसे दी कि देखने वाले कह उठे सामान सौ बरस का पल की खबर नहींइंसान अगर पैसे और पद के साथ विनम्र और व्यवहार कुशल भी तो उसकी कोई बराबरी नहीं कर सकता लेकिन इन जैसे..........। आलीशान बंगला और गाड़ियों की फौज ने उनका साथ देने से इनकार कर दिया क्योंकि उनके पास सब कुछ था बस नहीं थी तो इंसानियत और रिश्तों को निभाने की चाहत
जज साहब कोर्ट से आये उनके रिटायर होने के कुछ ही महीने बाकी थे कि अचानक उन्हें सीने में दर्द हुआ और किसी भी तरह की सहायता मिलने से पूर्व ही चल बसेउनकी पत्नी तो हतप्रभ हो गयी लेकिन क्या करती? नौकरों से कहा कि रिश्तेदारों को फ़ोन कर दोकुछ त्रासदी ऐसी थी कि उनके बच्चे भी उस शहर में नहीं थे और उनके बच्चे उनकी तरह इज्जतदार होने का तमगा नहीं लगा पाए थेवे अपने परिवार के साथ खुश थेरात भर पत्नी अपने नौकरों के साथ जज साहब के शव के साथ बैठी रहींखुद किसी से रिश्ता रखने के कारण उनकी हिम्मत ही नहीं हुई कि वे किसी को खबर करके बुला लेंसुबह नौकर तो उनके नौकर थे उन लोगों ने जिन्हें बता दिया उन्हें खबर कर दी गयी और कुछ रिश्तेदार मृतक से अब क्या बैर - सोच कर गए लेकिन उनकी प्रथा के अनुसार कुछ रिश्तेदार शव को हाथ नहीं लगा सकते थे और जो लगा सकते थे वे लगाने को तैयार नहीं थेवैसे इस जगह इंसानियत का वास्ता देकर उन्हें भी ऐसा नहीं करना चाहिए था लेकिन इंसान के लिए एक सबकबाजार से चार लेबर बुलाये गए और उनके शव को उन लोगों ने ही शव वहाँ में रखा और फिर श्मशान के लिए रवाना किया गया
लोग अपने घरों को वापस, कितने ही सगे रिश्ते होने के बाद भी वे आगे नहीं बढेपत्नी को क्लब और पार्टियों में जाने की पूरी अनुमति थी लेकिन रिश्तेदार के नाम पर नहीं शायद उन्हें लगता था कि हर रिश्तेदार उनके पैसे और पद से लाभ उठाने के लिए ही जुड़ना चाहता है इसी लिए किसी से भी नहीं सम्बन्ध रखने की सख्त हिदायत थीक्लब और पार्टी वाले मिलने वाले कुछ समय के लिए आये और चले गएशाम को कुछ रिश्तेदार खाना लेकर पहुंचे तो उनके पास सिर्फ उनकी बेटी थीपति के अहंकार के रंग में रंग कर शायद अनजाने में उन्होंने भी बहुत कुछ खो दिया था
ऐसी घटनाओं को देख कर बस यही कहा जा सकता है कि बेशक आप अपने पैसे और पद से किसी को लाभान्वित मत कीजिये लेकिन ये बोल ऐसे हें कि इससे तो इंसान को अपनी ही तरह इंसान समझते रहिये , वे आपको इंसान होने का सबूत आपको अवश्य ही देंगेसमाज के सदस्य होने के नाते उससे काट कर आप अपनी दुनियाँ में जी तो सकते हें और खुश भी रह सकते हें लेकिन सामाजिक सरोकार के वक़्त आप अकेले ही खड़े होंगे

सोमवार, 20 फरवरी 2012

खून के रिश्ते !

बहुत दिनों से व्यस्त थी, पहले एक बेटी (जेठ जी की बेटी) की शादी ११ फरवरी को सम्पन्न हुई और फिर सम्पन्न हुए मेरी बेटी प्रज्ञा की सहेली और मेरी मानस पुत्री कल्पना की। पहली शादी में पूरा परिवार साथ था और काफी लोगों ने शिरकत की भी लेकिन दूसरी बेटी की शादी में तो जन्मदात्री माँ के बिना दूसरे स्वभाव से बागी पिता और उनसे रुष्ट रिश्तेदार और घर वालों के सहयोग और असहयोग ने कुछ जिम्मेदारियों को बढ़ा दिया था लेकिन मैं तो उस माँ से वचनबद्ध थी जिसे मैंने उसके अंतिम समय वचन दिया था।
कल
उसकी विदाई के बाद जब घर आई तो फिर तुरंत ही प्रज्ञा की विदाई करनी थी और रात में सोनू की। सब करके जब रात में सोने चली तो नींद नहीं आई क्योंकि कल्पना का रिसेप्शन था और उसमें हमारे लिए कोई जगह नहीं थी। मुझे बुरा नहीं लगा लेकिन फिर सोचा कि अगर ये अगर खून के रिश्ते होते तो जरूर निमंत्रण मिलता। असहयोगी पिता और गैर जिम्मेदार भाई और भाभी की जगह थी और वे गये और उससे भी बड़ी बात कि वे मेरा दिया हुआ उपहार ही लेकर उसके घर पहुचे मेरे पति बोले कि 'अब भूल जाओ कल्पना को, तुम्हारा काम पूरा हुआ।'
मैं
इसे सोचती रही लेकिन कैसे भूल जाऊं? वो बच्ची जिसे मैंने पिछले दस साल से अपना अंश मना है , वह दिल्ली से कानपुर आई तो उनके पिता को ये चिंता नहीं होती कि वो स्टेशन से घर कैसे आएगी? अगर रात या सुबह की ट्रेन से जाना है तो कैसे जायेगी? ये चिंता हम करते थे और उसको घर हम लाते थे हाँ इतना जरूर कि घर आने के पहले से उसके पिता के फ़ोन आने शुरू हो जाते कि उसको घर पहुंचा दो या फिर घर कब रहीहै?
इसे
मैंने उसी तरह से पूरा किया जैसे अपनी बेटी के लिए करते थे क्योंकि दोनों साथ ही आती और जाती थीं लेकिन जब वह अकेले भी आई तब भी ये काम हम करते रहे क्योंकि वो मेरी बेटी हें।
सगाई
हुई और फिर शादी भी हो गयी लेकिन हम अपना परिचय उसके भावी परिवार को क्या दें? क्योंकि उनकी नजर में मित्रता सिर्फ मित्रता होती है उसके परिवार से इतनी प्रगाढ़ता उनके समझ नहीं आती। ऐसा नहीं है कि वो परिवार पढ़ा लिखा हो लेकिन वो ठाकुर परिवार से हें और उनकी सोच खून से अधिक कुछ सोच ही नहीं सकते हें। पिछले एक हफ्ते से सारे दिन और रात उसके सारे काम पूरे करवाने में बीत गए कैसे घर में व्यवस्था होगी और कैसे उसकी रस्मों के लिए तैयारी करनी होगी? सब कुछ कर लिया और विवाह के सम्पन्न होते ही सब कुछ जैसे सपना सा हो चुका है।
मैं
उसके सामने नहीं रोई लेकिन अब सोचती हूँ कि ये आंसूं क्यों बह रहे हें? शायद एक अंश के छूट जाने का दर्द है लेकिन इंसान इन रिश्तों के लिए सार्थक क्यों नहीं सोच सकता है? क्या इस रिश्ते में भी किसी को कोई स्वार्थ दिख सकता है। नहीं जानती लेकिन ये जरूर लग रहा है कि अब तक तो ये ही सोचा था कि खून के रिश्ते कभी कभी रिश्तों को झुठला देते हें लेकिन ये आत्मा और स्नेह के रिश्ते तो सबसे गहरे होते हें। इनके लिए कोई कैसे ऐसा सोच सकता है?
अब
मेरे इस रिश्ते का भविष्य कल ही पता चलेगा , जब वो इसके लिए सबको तैयार करेगी कि ये रिश्ता कितना अहम् है? नहीं भी स्वीकारा तो भी वो मेरी बेटी तो रहेगी ही। लेकिन ये खालीपण और उदासी कब मेरा साथ छोड़ेगी ये नहीं जानती। इतना कष्ट जो मैंने प्रज्ञा के विवाह के बाद भी नहीं सहा। आज से महीने पहले लिखा "ख़ुशी मिली इतनी ...." और आज ये लिख रही हूँ। सब कुछ बांटती रही तो ये भी बाँट लिया। मन हल्का हो गया