रविवार, 24 अक्तूबर 2010

छाछ और दूध!

                        वह स्टाफ रूम में पानी के गिलास लेकर जा रही थी और उसके आँचल से टप टप करके दूध टपकने लगा. उसका कलेजा धक् से हो गया. क्या छोटा भूखा है? बड़के ने उसको दूध नहीं दिया होगा? भूल गया होगा? अरे अभी है ही कितने साल का? कुल ४ साल ही का तो है. फिर आँचल लपेट कर वह स्टाफ रूम में घुस ही गयी और टेबल पर गिलास रख कर वापस आ गयी. 
                       अभी कुल ४ महीने का ही तो छोटा है, उसको अभी माँ का ही दूध चाहिए लेकिन किस्मत की मार ने उसके दूध को भी उससे छीन लिया. कैलाश इसी स्कूल में चपरासी था और एक दिन साईकिल  से जाते समय उसको एक ट्रक ने कुचल दिया. वह उस समय १५ दिन के छोटे को गोद में लिए थी. उसका तो घर ही बिखर गया. घर में अब बचा कौन ? बूढी अंधी सास और दो छोटे बच्चे. स्कूल वालों ने कहा कि अभी तुम्हें उसी जगह नौकरी मिल जाएगी तो तुम्हारे बच्चे पल जायेंगे नहीं तो दर दर भटकोगी और ये दुनियाँ वाले तुम्हें जीने नहीं देंगे. तभी उसने छोटे के २ महीने के होते ही नौकरी पर आना शुरू कर दिया था.

                 सुबह खाना बना कर रख देती और खुद रोटियां बाँध लाती. बड़ा दादी को खाने को दे देता और छोटे को दूध बोतल में भर कर पिला देता था. बस इसी तरह से जिन्दगी चलने लगी थी. महीने में इतना मिल जाता कि बच्चों का पेट भर लेती. स्कूल जरूर दूर था पैदल चल कर आती तो एक घंटा लग जाता था लेकिन दो रोटी का सहारा तो था .
                उसका मन आज स्कूल में  नहीं लग रहा था. पता नहीं क्यों छोटा भूखा रो रहा है? छुट्टी की घंटी बजाते ही , वह प्रिंसिपल से बोली की 'बहनजी , हमारी तबियत ठीक नहीं है, हम आज अभी घर चले जाएँ.' उसके व्यवहार और उसकी व्यथा  से सब परिचित थे कि वह नन्हा सा बच्चा घर छोड़ कर आती है इस लिए कोई कुछ न कहता और उसको घर आने की अनुमति मिल गयी.
                घर में कदम रखते ही बड़ा बोला - 'अम्मा आज छोटे ने दूध नहीं पिया और अम्मा खूब रोया , मैंने तो झूले में लिटा कर जोर जोर से झुलाया तो रोते रोते सो गया. छोटे के गालों पर बहे आंसू अब सूख चुके थे. वह दूध के पास गयी तो दूध का बर्तन तो उतना ही भरा था जितना वह छोड़ गयी थी फिर बड़े ने क्या पिलाया? उसने छाछ का बर्तन खोला तो उसमें कम था. आज बड़े ने अनजाने में दूध की जगह बोतल में छाछ भर कर उसको पिला रहा था तभी तो उसने पिया नहीं और भूखे छोटे की भूख उसके आँचल में ढूध के साथ बहने लगी थी. उसने छोटे को उठा कर अपना ढूध पिलाना शुरू तो बड़ा भी आकर वहीं खड़ा हो गया. 'अम्मा मैंने इसको दूध पिलाया था इसने पिया नहीं - अम्मा क्यों नहीं पिया इसने? ' उसने बड़े को भी खींच कर अपने गले से लगा लिया और उसकी आँखों से आंसूं बहने लगे. माँ को रोता देख कर बड़ा बोला - 'सच्ची अम्मा मैंने इसको दूध पिलाया था. तुम क्यों रो रही हो? मैं बोतल लाता हूँ.' 

'नहीं मेरे लाल , मैं जानती हूँ कि तूने इसे दूध पिलाया था और इसने नहीं पिया.' पर  वह  इस लिए नहीं रो रही थी . वह  तो अपनी किस्मत पर रो रही थी . इतना छोटा बच्चा छाछ और दूध का अंतर क्या जाने?

बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

न आया वो दिन.........!

                पिछले चौदह वर्षों से जिस माँ का बेटा अपनी बचपन की एक नादानी के कारण जेल की सलाखों के पीछे जीवन गुजार रहा हो, उसके लिए ये राम के वनवास जैसा पहाड़ सा कालखंड कितना कष्ट देता होगा . इस बात का अहसास उस माँ के अतिरिक्त कोई भी नहीं लगा सकता है. उसने अपने बेटे के जेल से बाहर आने के दिन को सौ सौ साल के बराबर लम्बा मान  कर काटे और जब वह दो दिन बाद जेल से बाहर आने वाला था घर में तैयारी चल रही थीं. वह बेटा जो सिर्फ १८  वर्ष २ दिन का था तब जेल चला गया था और अब ३२ साल का होकर बाहर आ रहा है. इतने वर्षों में कोई ख़ुशी नहीं मनाई गयी - कोई शादी ब्याह नहीं , कोई त्यौहार नहीं , दिवाली तो पर्व है सो दीपक जला लिए लेकिन होली खेलना ही भूल चुके थे. 

                  **चित्र  गूगल   के  साभार 
    घटना के बाद पिता की अकूत संपत्ति भी ख़त्म होने लगी थी. बहुत पैसा कमाया था - आयकर अधिकारी जो थे, किन्तु वो ऐसे जाएगा ऐसा नहीं सोचा था. मुकदमेबाजी में सब कुछ ख़त्म होने लगा और इस घटना के बाद तो उनकी प्रतिष्ठा भी गिरने लगी थी. मोहल्ले में कटाक्ष और व्यंग्य सुने नहीं जाते थे . संयुक्त परिवार के चारों भाइयों ने पैतृक मकान बेच कर अलग अलग दिशाओं में रुख कर लिए और मकान के ख़त्म होने के साथ ही शायद दिल भी दूर हो गए. जिन्दा सभी थे क्योंकि जीवन और मृत्यु अपने हाथ में नहीं होती और वह इस आशा में जी रहे थे कि रवि लौटेगा तो यह घर फिर से खुशियों से भर जाएगा. 
         *                  *                   *                    *                    *
        चौदह साल पहले सब भाई एक साथ एक ही घर में अपने माता पिता और बच्चों के साथ रह रहे थे. बड़ा सा पैतृक मकान और सभी भाइयों के बच्चे ऐसा सोच ही नहीं पाते थे कि हमारे पिता अलग अलग हैं. सबमें गहरा प्यार था. सभी बच्चे लगभग हमउम्र थे, साथ खेलना और साथ स्कूल जाना, खाना पीना वे अलग होते ही कब थे. सब एक कमरे में सोते और धमाचौकड़ी मचाया करते. अगर कोई छोटा लड़ता तो बड़े भाई रवि के पास पहुँच जाते और वह सबका निपटारा करता था. 
           रवि १८ साल और २ दिन का हुआ था. अभी परसों ही उसका जन्मदिन धूमधाम से मनाया गया था. उस दिन वह अपने कॉलेज से आया था. उसका बी एस सी में एडमीशन हुआ था. घर के बाहर पड़ोसी के बच्चे और उसके छोटे भाई खेल रहे थे. खेलते खेलते बच्चों में लड़ाई हो गयी और वे गुत्थमगुत्था होने लगे और देखते ही देखते रवि के चचेरे भाई के सीने पर पड़ोसी का बेटा चढ़ गया और उसका गला दबाने लगा. उसे लगा कि ये तो मर जाएगा. उसने उसको तितर बितर करने के लिए एक ईंट का बड़ा सा टुकड़ा ऊपर से नीचे फेंका और ये क्या वह टुकड़ा तो सीने पर बैठे हुए बच्चे के सिर पर ही लगा और सिर से खून का फव्वारा बह निकला. सारे बच्चे भाग गए. उस बच्चे को लेकर अस्पताल भागे किन्तु उसने बीच में ही दम तोड़ दिया और बच्चों के खेल में हत्या का इल्जाम रवि के सिर पर आ गया. 
          पड़ोसी भी बड़ा व्यापारी था उसने रवि और उसके एक सगे और एक चचेरे भाई को नामजद किया. सभी बच्चे जेल में पहुँच गए.
            उस बच्चे की अंत्येष्टि में सभी लोग गए क्योंकि यहाँ कोई दुश्मनी नहीं थी. मृत बालक के पिता ने उसी जगह सबके सामने कसम खाई कि "जैसे मैं अपने बच्चे को खोकर रो रहा हूँ, एक दिन वैसे ही तुमको भी रुलाऊंगा."
             ये बात सब लोगों ने एक पिता के ह्रदय पर लगे आघात का असर समझ कर भुला दी. फिर मुकदमे बाजी शुरू हो गयी. कोई भी पैसे से कमजोर न था . इनके तीन बच्चों में दो नाबालिग थे सो उनको छोड़ दिया गया किन्तु रवि बालिग ही नहीं उसको अपराधी भी मना जा रहा था , उसकी जमानत नहीं होने दी उनलोगों ने. पड़ोसी के प्रभाव से भयभीत होकर और बच्चों के जीवन को देखते हुए ही उस घर को बेचने का निर्णय लिया गया. रवि को आजीवन कारावास कि सजा सुना दी गयी.
                                **चित्र  गूगल   के  साभार         *                   *                 *                      *                    *
              रवि जेल के जीवन में रम गया क्योंकि वह कोई अपराधी प्रवृत्ति का लड़का नहीं था, उसको जमानत मिल सकती थी लेकिन अपने पैसे और प्रभाव से दूसरे पक्ष ने उसको बाहर नहीं आने दिया. अपने भाग्य के लेख मान कर वह वही आगे पढ़ने की तैयारी करने लगा और उसने ग्रेजुएशन कर ली. एक सभ्य परिवार का लड़का अपने आचरण से जेल में बहुत पसंद किया जाता था. उसको जेल के अस्पताल में दवा बांटने का काम दे दिया गया. उसने अपने काम में ही रूचि लेनी शुरू कर दी. कभी जब भी माता पिता आते तो वह हमेशा यही कहता - 'पापा मैं बिल्कुल ठीक हूँ, आप चिंता न करें.'
'मम्मी आप अब रोया मत कीजिये, शायद यही मेरे भाग्य में लिखा था. आप खुश रहिये कि आपका बेटा यहाँ भी सबके लिए काम कर रहा है.'
                  उसकी पसंद का खाना बनता तो माँ से खाया न जाता और वह चुपचाप खिसका कर उठ जाती. उसके दिन तो बेटे के घर वापस आने के इन्तजार में  कट रहे थे.  दिन , महीने, और वर्ष अपनी गति से गुजरते जा रहे थे. न काल की गति रुकी और न ही जीवन चक्र. छोटे भाई बहन सब पढ़ लिख कर तैयार हो गए थे. सब इसी इन्तजार में थे कि रवि घर आएगा तो उसकी शादी कर देंगे. वह कोई अपराधी तो है नहीं और कई लोग तैयार भी थे. फिर कोई बिजनेस करवा देंगे. 
                  उस दिन के आने के ठीक दो दिन पहले जेल से फ़ोन आया कि ' आप लोग जेल पहुँचिये , आपके बेटे कि तबियत ख़राब हो गयी है.'
               वह सब बदहवास से जेल की तरफ भागे तो उन्हें वहा अपना बेटा नहीं मिला बल्कि उसका शव मिला. सारा परिवार स्तब्ध कि आख़िर हुआ क्या था? जेल अधिकारियों के पास इसका कोई भी जबाव नहीं था . शायद फूड प्वाजनिंग हो गयी थी या फिर कुछ और वे नहीं बता सके. आखिर दौलत के लम्बे हाथों के नीचे जेल प्रशासन  दब गया और दुश्मनों ने जो शायद इसी दिन के इन्तजार में थे अपनी चाल चल ही दी. वे ठगे से रह गए. किससे क्या कहें? किसको गालियाँ दें? किसको कोसें? कौन अब उनके बेटे को वापस लगा सकता है?
                 ये सिर्फ फिल्मों में ही देखा जाता है , किन्तु ये एक उस जीवन कि हकीकत है - जो अपने जीवन में कुछ देख ही नहीं पाया और माँ बाप जीवन भर का सदमा लेकर टूटे हुए जीवन के दिन पूरे कर रहे हैं और अब तो कोई इन्तजार भी नहीं बचा है. 
                आख़िर वह दिन आया ही नहीं.......................
             

रविवार, 17 अक्तूबर 2010

आज भी ...........!

                   क्या आज भी  हम वहीं है , जहाँ हम आज से पचास साल पहले थे. इसका ताजा उदाहरण मैंने देखा --
मेरी बहुत करीबी की बहू अपने विवाह के २ साल बाद ही विधवा हो गयी. उसके पास एक साल का बेटा भी था. सारे घर वालों और रिश्तेदारों में एक प्रश्न चिह्न था कि अब क्या होगा? इतनी सी उम्र में लड़की विधवा हो गयी वह  माँ भी है. लेकिन मेरी उन रिश्तेदार ने बहुत ही बहादुरी से काम लिया, उन्होंने संस्कार के समय बहू को छोटी सी बिंदी और दो दो चूड़ियाँ दीं और कहा  कि तुम मेरी बहू ही रहोगी. लेकिन उन्होंने अपने मन में बेटे के शव उठाने से पहले ही संकल्प कर लिया था कि वे अपनी बहू को छोटे बेटे से ब्याह कर इसी घर में रखेंगी और उसके बेटे को बाप का प्यार मिलेगा और बहू को जीवन भर एक अभिशप्त जीवन नहीं गुजरना पड़ेगा. 
              उस दिन उस स्थिति में पड़ोसी और रिश्तेदार कितने प्रश्नों के साथ वहाँ खुसर पुसर कर रहे थे --
'पता नहीं कैसी किस्मत है इस लड़की की?'
'अब इसका क्या होगा?'
'बच्चा ले जाएगी या फिर छोड़ जाएगी?'
'दूसरी शादी कौन करेगा? बच्चे वाली है.' 
               इन प्रश्नों से जुड़े लोग पढ़े लिखे और समझदार कहे जाने वाले थे. लेकिन वे उस माँ के निर्णय से वाकिफ न थे.
उन्होंने बहू को मायके भी नहीं भेजा और स्वयं  भी बहू की तरह ही सादा रहने लगी, उन्होंने एक साल तक कोई शादी विवाह या अन्य उत्सव में जाना बंद रखा क्योंकि वह जानती थी कि कहीं भी जाने पर उनको कम से कम अच्छे कपड़े और जेवर तो पहने ही पड़ेंगे और इससे उनकी बहू को दुःख होगा. एक साल बीतने पर उन्होंने अपने बड़े बेटे की बरसी की और फिर आर्य समाज मंदिर में छोटे बेटे के साथ शादी कर दी. 
              इस शादी के बाद उनकी देवरानी ने अपने घर में पूजा रखी , जिसमें सुहागन औरतें ही शामिल होती हैं. उसमें अपनी जिठानी को भी बुलाया और बहू को भी, लेकिन पूजा में शामिल होने के वक्त अपनी जेठानी से बोली - "इसमें आप शामिल हो जाइये और बहू को रहने दीजिये." 
              उनका आशय यह था कि बहू तो विधवा हो चुकी है तो उनको अभी भी सधवा स्वीकार्य नहीं है. उनकी जेठानी एकदम उठ कर खड़ी हो गयी - "मैं क्यों और मेरी बहू क्यों नहीं? अगर बहू नहीं तो मैं भी नहीं. तुमने क्या इसका अपमान करने के लिए यहाँ बुलाया था. वह मेरे छोटे बेटे कि पत्नी है और आइन्दा से मुझे भी बुलाने की जरूरत नहीं है." 
               हम कहाँ से कहाँ पहुँच रहे हैं और हमारी सोच कहीं कहीं हमें कितना पिछड़ा हुआ साबित कर देती है? हमें अपने पर शर्म आने लगती है.

बुधवार, 6 अक्तूबर 2010

वसीयत !

           सबसे पहले मैं बता दूं किये कहानी बिल्कुल भी नहीं है बल्कि हाल ही में घटी एक सच्ची कहानी है. वैसे कहानियां आती कहाँ से हैं? लेकिन जब अपने घर और परिवार के करीब घटती है तो लिखना अधिक मुश्किल होता है. फिर भी कलम जब मुझे नहीं छोड़ती है तो फिर रिश्तों का लिहाज कर करेगी.

                        कभी कभी ऐसा होता है कि जिसके लिए कोई तैयार नहीं होता, शायद भाग्य के लेख ऐसे होते हैं या ईश्वर कि मर्जी ऐसी होती है कि इंसान को उसकी नेकी और खुद्दारी के जीवन जीते हुए ही बिना किसी के हाथ से कुछ भी मांगे चल देता है और तब यही कहना होता है कि उस ईश्वर ने उसका मान रख लिया. यह भी कहने का मन होता है कि हाँ इस तरह तूने न्याय किया भगवान. 
                     उस दिन सुबह फ़ोन कि घंटी से ही नीद खुली --"रात में ....मामाजी नहीं रहे."
"अचानक?" इनके मुँह से निकला .
"हाँ कुछ ऐसा ही समझ लो."
"उनके पास कौन था?" हमें पाता था कि मामाजी अकेले ही रहते थे.
"मैं."
                सूचना देने वाले इनके मामा के बेटे थे. दिवंगत आत्मा के हमराज और हमउम्र भांजे थे. मामाजी का बचपन और पढ़ाई अपनी बहन के यहाँ हुई थी और इससे भांजे से उनके आत्मीय सम्बन्ध आरम्भ से ही थे. मेरे पतिदेव भी और बच्चों कि तरह से ननिहाल जाते ही थे तो उनसे बहुत छोटे होने पर भी उनकी आत्मीयता अच्छी ही थी.
                  यहाँ के पौश  इलाके में उनकअ तीन मंजिल का मकान है और उसमें वे और उनके किरायेदार ही रहते थे. उनके तीन बेटे - एक आयकर अधिकारी (परिवार यही पर रहता है). दूसरा आई जी बाहर तैनात और तीसरा सी बी आई अफसर और वह भी बाहर. बेटे और डॉक्टर दामाद यहीं पर हैं. प्रशासनिक पद से सेवानिवृत - अपने जीवन में बहुतों का जीवन संवर दिया, जिनको लगवा सके नौकरी में लगवा दिया. करोड़ों कि संपत्ति. जिस रिश्तेदार को जरूरतमंद समझ दिल खोलकर सहायता की. बच्चों कि शादी के बाद ही मामी का निधन हो गया था सो वह अकेले ही रहते थे.
                  कोई उनके साथ रहने को तैयार नहीं था, जो बाहर थे वो बाहर थे. कभी जाना हुआ और लगा कि इनको लग रहा है कि उनकी स्वतंत्रता में खलल पड़ रही है तो तुरंत ही चल दिए. फिर अपने शहर और घर से प्यार किसे नहीं होता? शहर वाले भी नहीं रखना चहेते थे रखते क्या उस घर में ही नहीं रहना पसंद था. सो अलग अपनी कालोनी में रहते थे. हम ठहरे रिश्तेदार सो मामा कि भी सुनी और उनके बेटों कि भी लेकिन निर्णय लेने कि क्षमता थी .
                   मौत  वाले दिन का वाक्य  था, उन्होंने  अपने भांजे को फ़ोन किया कि मैंने  डॉक्टर से समय  ले  लिया है और aaj रात १० बजे का समय दिया है. तुम आ जाना तो मेरे साथ चलना. पास ही बहू और पोते सब रहते हैं लेकिन किसी को बताने कि जरूरत नहीं समझी और न ही सूचना देने कि जरूरत समझी. जब भांजे पहुंचे तो उन्होंने बताया कि आज सुबह मुझे खून कि उलटी हुई है इसी लिए मैंने डॉक्टर से समय लिया . लौटने में हमें देर हो जाएगी इस लिए तुम रात मेरे पास ही रुक जाना. स्थिति गंभीर समझ कर भांजे ने उनके बेटे को फ़ोन किया तो पाता चला कि वे बाहर से अभी आये हैं और थके हुए हैं. इसलिए डॉक्टर को आप ही दिखा आइये मैं सुबह आऊंगा .
                   जब रात जाने का समय आया तो भांजे से बोले - 'देखो सुबह से दुबारा तो मुझे कोई परेशानी हुई नहीं है, अब लौटने में भी बहुत देर हो जाएगी फिर रिक्शे से चलना होगा. सुबह चलेंगे . '
                   खाना खाकर बोले टी अब तुम भी सो जाओ और मैं भी सोता हूँ. दोनों ही सो गए. पता नहीं कब रात उन्हें एक बार खून कि उलटी हुई , वह उठकर बेसिन तक गए और फिर जब दुबारा हुई तो वे लौटकर  सोफे  पर ही बैठ  गए और भांजे को हिलाया  भर भांजे उठ  गए तो वे होश  में थे और बोले मुझे फिर उलटी हुई है और आँखें   बंद   कर ली . फिर वे चिरनिद्रा  में चले  गए. भांजे घबरा  गए और उन्होंने किरायेदार को बुलाया  . उसके  बाद  उनके बेटे को फ़ोन किया, वह गाड़ी  लेकर  आया और नर्सिंग  होम  ले  गए वहाँ  डॉक्टर ने उन्हें मृत  घोषित  कर दिया.
                        रात के दो  बजे थे , बाकी  बेटे और बेटी  को भी खबर  कर दी  गयी . जो जहाँ  था वहाँ  से अपनी गाड़ी  से या फ्लाईट  पकड़  कर आ गए. शाम  4 बजे वह पंचतत्व  में विलीन  हो गए.
                        सभी  बच्चे  अच्छी  ही नहीं बल्कि बहुत अच्छी  स्थिति में थे लेकिन शायद पैसा  ऐसी चीज होती है कि जहाँ  सारे  रिश्ते  पड़ोसियों  से भी बदतर  हो जाते हैं. उन्हें पंचतत्व  में विलीन  हुए अभी कुछ ही घटे  हुए थे. सभी  बेटे बहुएँ  और बेटी  घर में थे. बड़े  होने के नाते  और मामाजी से सबसे घनिष्ठ  और आत्मीय होने के नाते  भांजे भी रात में वहीं  रुके   हुए थे.  वे मामा के राजदार   भी थे.
                       वे सो गए तो हाल में जोर  जोर  से बोलने  की  आवाजें  आ रही थी, बीच  में नीद टूटी  तो सोचा  कि पिता  और ससुर  की मृत्यु  के बाद  नीद नहीं आ रही होगी  तो सभी  एक साथ बातें  कर रहे होंगे . तब तक वे भी चैतन्य  हो चुके  थे और आवाजें उनको साफ साफ उन्हें  देने लगी थीं.
---मम्मी के मरने पर सारी सदियाँ आप ही लेकर गयीं थी.
==वो मम्मी ने पहले ही पापा को बोल दिया था कि ये सदियाँ मुझे दे दी जाय.
--अब क्या और चाहती  हैं , आपके  तीनों  बच्चों  की  शादी  में  पापा ने कितना  खर्च  किया  था? अब भी  लेना  चाहती  हो .
--उससे  क्या? वो उन्होंने  अपनी  मर्जी   से  खर्च  किया  था.
--अब मम्मी के जेवर  से  भी   कुछ  और चाहिए  ?
--देखती हूँ  कि क्या लेना  है ?
--पापा कि वसीयत  जो  भी  हो , हम  सब  आपस  में  सहमति  से  बाँट  लेंगे .
--ऐसा  क्यों ? फिर  वसीयत  का  मतलब   क्या हुआ ?
--कुछ  भी  हो , उन्होंने  हम  सबको  कभी बराबर  नहीं  समझा , हमेशा  मुझे दूर  दूर  रखा 
--क्यों कभी ये सोचा तुमने?
--  हाँ , क्योंकि हम उनकी तानाशाही के नीचे सांस नहीं लेना चाहते थे, हम यहाँ होकर भी उनसे अलग रहे. क्या बुरा किया तुम लोग तो बाहर रहकर स्वतन्त्र हो कर जी रहे हो और हम उनके शासन  में रहें.
--एक जगह रहने से कुछ तो तकलीफ होती ही है लेकिन फर्ज भी कोई चीज होती है.
--फर्ज तो सभी के हैं, दीदी भी तो यहाँ है कभी ले जाती उनको और रखती अपने पास.
--वो मेरे घर रहना नहीं चाहते थे, बेटी का घर जो था.
--वाह ! देने के लिए बेटी पहले और करने  के लिए बेटे . ये अच्छा सिद्धांत है.           
--मेरे पापा को देखो रिटायर  होने पर दोनों बेटों को बराबर बराबर बाँट दिया है.
--और आगे उसके बाद वृन्दावन में आश्रम में रह रहे हैं, अब कोई पूछता भी नहीं है उंको.
--वो तो अपनी मर्जी से गए हैं, सेवा भाव से  वर्ना उन्हें क्या कमी है?
--बस बस रहने दो.
              भांजे इन सब बातों आजिज आ गए और वह हाल के दरवाजे पर आकर खड़े   हो गए.   उनसे  रहा नहीं गया  -- 'बस करो  तुम  लोग  इतने  अच्छे   अच्छे   जगह  पर हो  और पैसे  की  भी कोई कमी नहीं है, फिर  भी इस  तरह  से लड़  रहे  हो . are  उनकी  चिता  की  रख  तो ठंडी  हो  जाने  देते  . अरे  लड़ो  तो इसपर  की उनकी  अश्थियों  को ठिकाने  कौन  lagayega . तुम्चार  हो  अरे  सब उसको  बाँट कर  चारों  धाम  में जाकर  विसर्जित  करते  तो शायद  उन्हें अब तो शांति  मिल  जाती . अगर  वह भी न  कर  सको  तो   मुझे  दे  देना  मैं  कर  दूंगा .'
                 उनको  गुस्से  में देख  कर  सब धीरे  धीरे  खिसक   लिए  क्योंकि  मामा  के अन्तरंग  और हमराज  होने के नाते  सभी  उनकी  इज्जत  तो करते  ही थे . वे  सोफे  पर सिर  पकड़  कर  बैठ  गए. उनके  दिमाग में ये चल  रहा  था  कि  अभी  जब  इनको  वसीयत  के बारे  में कुछ  पता नहीं है  तब  तो ये हाल है और अगर  इन्हें  उसके बारे  में पता  चल  गया  तो क्या होगा ? 
  वास्तव   में मामा  की  वसीयत  के एक  गवाह  वह भी थे  और मामा  ने  अपने  बच्चों  को उसमें  कुछ  भी नहीं दिया था . मामा  की  वसीयत  थी  --
                                          'मेरी  चल  अचल  संपत्ति  से मेरे बेटे और बेटी  को कुछ  भी  नहीं दिया जाएगा . मेरी  जो  भी संपत्ति  शेयर , मकान और बैंक बैलेंस है वह अमुक  ट्रस्ट  में जमा  कर  दिया जाएगा  और उसकी  जिम्मेदारी  है कि  मेरे मकान  के नीचे  के हिस्से  में एक  वृद्धाश्रम  खोल  दे . जिसमें  मेरे जैसे  उपेक्षित  वृद्धों  को रहने दिया जाएगा  और वे  सभी  वृद्ध   अगर  सक्षम  हैं तो अपनी संपत्ति  इस  ट्रस्ट  में जमा  कर  दें  ताकि  इसका  खर्च  उठाने  में को भी परेशानी  न  हो . शेष  मकान  का  किराया  और इस  आश्रम की व्यवस्था  ट्रस्ट ही  देखेगा  . मेरे पैसे  से ट्रस्ट  गरीब  लड़कियों  की  शादी  की   व्यवस्था  भी करेगा . इस  धन  के संचय  और व्यय  की  जिम्मेदारी  इस  ट्रस्ट  की  रहेगी  . अगर  मेरे बच्चों  में से कोई इसके  बाद इस  ट्रस्ट  में अपनी सहयोगत्मक  सेवाएं  देना  चाहें  तो उनको  इसमें  सदस्यता  प्रदान  की  जा  सकती  है. '

शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

शास्त्री जी को नमन !

      
         आज का दिन जितने जोर शोर से गाँधी जयंती के लिए तैयार किया जाता है तो उसकी धूमधाम  में देश का ये छोटे कद का सपूत कहीं दिखाई नहीं देता है. गाँधी की छवि ने उसकी छवि को धूमिल कर दिया हो ऐसा नहीं है लेकिन हम ही उसको भूल जाते हैं . वे एक ऐसे महापुरुष थे , जो खामोश रहते हुए बहुत कुछ कर गए. महापुरुष कहलाने के लिए अनुयायिओं की एक सेना लेकर चलने कि जरूरत नहीं होती बल्कि एक व्यक्तित्व होता है और ओजस्वी वाणी. बहुत थोड़े समय के लिए वे प्रधानमंत्री बने लेकिन वे देश के अब तक के सबसे गरीब प्रधानमंत्री हुए. जब देश की बागडोर उन्होंने संभाली तो देश एक साथ कई विभीषिकाओं से जूझ रहा था , जिनमें खाद्य समस्या और सीमा पर पाकिस्तानी गतिविधियाँ प्रमुख थी. उन्होंने देश को जिस ढंग से एक सूत्र में बाँध  कर सिर्फ युद्ध ही नहीं जीता बल्कि खाद्य समस्या से लड़ने के लिए देशवासियों को इस तरह से तैयार किया कि हम जीत गए. 
                          मैं अपने बचपन की उनके इस प्रयास से जुड़ी एक घटना प्रस्तुत कर रही हूँ. बात १९६५ की है, मैं बहुत छोटी थी किन्तु स्मृति में अभी भी शेष है. शास्त्री जी का आगमन हमारे गृह नगर जालौन में हुआ था और मैं अपने माँ और पापा के साथ उरई से जालौन उनका भाषण सुनने के लिए गयी थी. वह कोई चुनावी भाषण नहीं था, वादों की श्रंखला लिए कोई बहलाने वाली सभा भी नहीं थी. वह तो था उस समय देश में विकराल रूप लिए हुए खड़ी "खाद्य समस्या" से लड़ने का आह्वान . शास्त्री जी ने उस विशाल जनसमूह के सामने आग्रह किया कि अगर आप सभी लोग सप्ताह में एक दिन व्रत रखने का संकल्प करें तो इससे बचने वाले अन्न से हम अपनी समस्या को कुछ कम कर सकते हैं. उन्होंने उन लोगों से हाथ उठाने को कहा जो इस कार्य के लिए संकल्प ले रहे थे. मैंने भी हाथ उठाया था. मैंने सोमवार को व्रत रखने की सोची . माँ पापा ने समझाया कि उन्होंने तो बड़ों से कहा था तुम तो बहुत छोटी हो लेकिन मैंने हाथ उठाया था तो मैंने कहा कि मैंने भी हाथ उठाया था तो मैं भी व्रत करूंगी. उसके बाद मैंने कई वर्षों तक व्रत रखा. वह घटना मुझे आज भी याद है और उस तेजस्वी व्यक्तित्व की छवि आज भी मन में उसी तरह से अंकित है. 
                          अपने प्रधान मंत्रित्व काल में जब पाकिस्तान ने युद्ध छेड़ा तो कमान उनके हाथ में थी और उस समय देश की सीमा पर अपने दायित्व निभाने वाले जवानों और देश के लिए अन्न उपजाने वाले किसानों दोनों को ही उनके  दायित्व से जुड़े कर्तव्यों को सम्मान देते हुए "जय जवान जय किसान " का नारा दिया था.  शत्रु को परास्त करने के बाद विजय पताका भारत ने फहराई थी और इसके बाद भी रूस के मध्यस्थता में भारत और पाकिस्तान के मध्य युद्ध संधि हुई और जीते हुए क्षेत्र को उन्होंने लौटा दिया. रात संधिपत्र पर हस्ताक्षर हुए और फिर वे सदा के लिए १० जनवरी १९६६ की रात सो गए. वह कोई षड़यंत्र था या हमारा दुर्भाग्य कि हम देश के उस होनहार लाल को खो बैठे. 
                         उनके निधन के बाद उनकी पत्नी ललिता शास्त्री ने "मेरे पति मेरे देवता " नाम से  उनके सम्पूर्ण जीवन का वृतांत लिखा जो "साप्ताहिक हिंदुस्तान " में धारावाहिक के रूप में प्रकाशित हुआ. उससे उनके सम्पूर्ण जीवन वृतांत पढ़कर और मन श्रद्धा से भर उठा. वे ही एक ऐसे प्रधानमंत्री थे जो कर्जदार ही चले गए. बहुत वर्षों बाद ये मामला संज्ञान में आया कि शास्त्री जी ने शायद अपनी बेटी के शादी के अवसर पर स्टेट बैंक से कर्ज लिया था जो वे नहीं चुका पाए और उनका निधन हो गया. जब पता चला तो देने वाला जा चुका था. और बैंक ने वह कर्जा माफ कर दिया.
                        आज मैं उनके जन्म दिन पर शत शत नमन करती हूँ और सोचती हूँ कि काश उसके बाद और एक शास्त्री भारत को मिला होता तो आज इसकी तस्वीर शायद कुछ और होती.