रविवार, 27 मई 2012

श्रवण कुमार आज भी हैं !

          मैं   जीवन को इतने  करीब अकेले ही तो नहीं जीती हूँ  हर इंसान के आस-पास ऐसा  गुजरता  है।  कुछ पढ़ने वालों को  लगा कि मैं  सिर्फ नकारात्मक छवि ही प्रस्तुत  करती हूँ। ऐसा नहीं है मैं खुद जिस परिवार हूँ वहां मैंने जो  देखा  है तो ऐसी घटनाएँ कहीं हिला देती हैं। 
                 मैंने  अपने जीवन में ऐसा देखा है तो श्रवण कुमार  देखने केलिए कहीं और नहीं जाना  पड़ता है। एक ऐसा इंसान भी मैंने देखा है जिसने अपने जीवन के 39  तक सिर्फ अपनी माँ  की सेवा में गुजारा हैं। न अपना करियर देखा और न भविष्य . फिर भी कभी कोई कमी नहीं हुई .  यह बात और हैं कि  अगर उन्होंने अपनी माता पिता को नजरअंदाज किया होता तो शायद नहीं बल्कि निश्चित तौर पर आज बहुत समृद्ध और धनाढ्य होता। जब वह 18 वर्ष की आयु में बी एस सी कर रहा था तो 27 फरवरी 1972 को उनकी माँ  सड़क दुर्घटना का शिकार हुई . शरीर में 27 जगह से हड्डियाँ  टूटी हुई थी। उनके पिता बड़े अस्पताल में फार्मासिस्ट थे और वहीँ कैम्पस में रहते थे। उस समय सर्जरी इतनी उन्नत नहीं थी कि घायल को तुरंत आपरेशन करके खड़ा किया जा सकता . घर में एक 7 साल बड़े भाई भी थे लेकिन जिम्मेदारी बांटने के स्थान पर स्व को ही देखना उनका स्वभाव था और जो आज तक है। 3 साल तक उस इंसान ने घर , कालेज और अस्पताल में घूमते हुए अपनी एम एस सी को पूरा किया और उसमें अपनी डिवीजन  गवां बैठे और भविष्य में जो सोचा था गर्त में चला गया . तीन साल बाद जब माँ घर आयीं तब भी वह चल फिर नहीं सकती थी उनको बिस्तर  पर ही रहना पड़ा। 5 साल बाद वह छड़ी के सहारे चलने काबिल हुई।घर के हालातों को देखते हुए मेडिकल  रिप्रजेंटेटिव की नौकरी कर ली  इससे अस्पताल में काम भी कर सकते थे और घर में माँ को भी देखा जा सकता था।  मैं इन सालों की साक्षी नहीं थी। इस परिवार से जुड़ने के बाद ही पता चला।  
                          1980 में मैंने इस इंसान के साथ अपना जीवन आरम्भ किया और मुझसे यही कहा कि  इन दोनों को कोई तकलीफ मत होने देना . पिता को अल्सर था तो उन्हें कभी कभी अस्पताल में भर्ती  करना पड़  जाता था।  दवा ,  डॉक्टर और अस्पताल में माहौल में  जन्मे ,   पले बढे कुछ पिता का  संरक्षण  जीवन में सेवा को  अपना काम   मान लिया . माँ के लिए तो  बराबर ही उनको लगे रहना था। एक समय तो ऐसा भी आया था कि मैं बी एड कर रही थी और इनको दिल्ली मीटिंग में जाना था मेरी परीक्षा  पास में ही थी  तो मैं किताबें लेकर ससुर जी के पास अस्पताल में बैठी पढ़ती  रहती थी। माताजी इस  काबिल थी ही नहीं वे वहां बैठ सके। 
                     1990 में पिताजी को कैसंर बताया गया . टूरिंग जॉब और जहाँ हमने घर बनाया था नयी जगह थी वहां पर कोई आने जाने का साधन आसानी से उपलब्ध नहीं था। एक डेढ़ किमी जाकर ही रिक्शा लाना पड़ता था या फिर पैदल ही जाना पड़ता था। उनके पास स्कूटर था सो आना जाना आसन होता लेकिन वह तब जब कि  शहर में हों। कैंसर के दौरान कितने बार घर और अस्पताल में भागदौड़ करने वाले वही एक इंसान थे। तीन माह वह अंतिम अवस्था में बिस्तर पर रहे लेकिन उनकी सेवा में कभी कोई भी कमी नहीं आने दी। 1991  में पिता को खो दिया . माताजी तो अब भी उसी तरह से थी हाँ अब वह छड़ी के सहारे चल लेती थीं लेकिन उनकी तकलीफों में और इजाफा होता चला जा रहा था। उम्र के साथ साथ हड्डियों में दर्द बढ़ रहा था। चलने फिरने में तकलीफ होना स्वाभाविक था। इतना अवश्य था कि माँ के मुंह से निकला नहीं की उसकोन पूरा करना उनके लिए वेद वाक्य की तरह से था। 
                        फिर माँ को कैंसर बताया गया लेकिन पिता का हश्र  देखने के बाद उन्होंने माँ की बायोप्सी कराने   से  इनकार कर दिया कि  अगर जिन्दा रहना है तो इसके साथ भी उतने ही दिन जिन्दा रहना है  और नहीं तो बायोप्सी के बाद भी उतने ही दिन रहेंगी। अब और कष्ट   इन्हें नहीं दूंगा . हाँ इतना जरूर कि  जहाँ जिसने भी बताया कि  वहां अच्छा वैद्य   है , डॉक्टर है और कोई भी पैथी  ऐसी नहीं  बची जिसमें  न  कराया हो। डॉक्टर या वैद्य मीलों दूर  हो उसको अपने स्कूटर से लाना और  ले जाना वहां से दवा लाना . सारे  काम अकेले और खुद ही  करते थे। कैंसर की  डॉक्टर कह चुकी थी कि  इनकी जिन्दगी  से अधिक 6 महीने  है लेकिन  नहीं हारे और दवा कराते  रहे कि  बस उनकी तकलीफ में आराम हो . जाना तो सभी को है लेकिन आराम से जाएँ । उनकी त्वचा सड़ने  लगी थी और उसकी ड्रेसिंग करने काम मेरा था।  मैंने भी 6 महीने की छुट्टी ली क्योंकि दिन में कई बार तकलीफ बढ़ने पर उसकी ड्रेसिंग जरूरी  होती थी। जब उन्हें दर्द होता था तो गालियाँ  मैंने भी खूब खायीं। पता नहीं शायद भगवन भी उस तपस्या के आगे  हार गया और माँ  का कैंसर ठीक होने लगा और एक समय ऐसा भी आया की वह पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गयी। उसके बाद 14 साल रही लेकिन कैसर जैसी कोई तकलीफ उनके दुबारा नहीं हुई। दस साल बाद वह गिर गयीं और फिर वह अपना साहस खो बैठी दुबारा चलने का साहस न जुटा   सकीं और 4 साल बिलकुल बिस्तर पर ही रहीं। उनके उसी कमरे में सारे  काम करने होते थे . नहलाने से लेकर सभी काम .
उन्हें किसी भी काम में कोई गुरेज नहीं थे . माँ की नित्य क्रिया करवानी हो या कपडे धोने हों या फिर उनको नहलाना हो। मेरे मीटिंग में बाहर  जाने पर ये सब काम खुद ही करते थे। और 4 साल बिस्तर पर रहने के बाद भी कभी उनको कहीं भी कोई घाव  नहीं हुए। कभी कोई नर्स या  काम करने वाले को उनका काम नहीं करने दिया। उनके कारण ही अपनी नौकरी छोड़ दी क्योंकि कैंसर की हालत में उन्हें छोड़ कर नहीं जा सकते थे। अपने काम को नया  रूप दे दिया जिसमें समय का प्रतिबन्ध  न हो. आखिर   माँ ने 2 जनवरी 2011 को उन्होंने शरीर त्याग दिया।
                        इतने सालों में  मैं साथ रही कभी भी मैंने उनको माँ या पिता के साथ कितने भी थके हों कभी भी झुंझलाते हुए नहीं देखा। अगर तुरंत ही आये हों और उन लोगों ने कह दिया कि  हमें ये खाना है या ये दवा चाहिए तो तुरंत ही स्कूटर लेकर चल देना है ऐसे में मुझे कभी कभी कष्ट होता था कि  आकर पानी या चाय भी नहीं पी और फिर चल दिए लेकिन उन्होंने कभी भी कोई शिकायत  नहीं की। 
                          ये श्रवण  कुमार मेरे पतिदेव हैं। आज मुकेश सिन्हा ने मेरे पिछली प्रस्तुति पर कहा कि  ये अतिश्योक्ति लग रही है तो फिर ये तो उनको महा अतिश्योक्ति लगेगी लेकिन ये सच और और अक्षरशः सत्य है। वैसे मैं इसको लिखने के लिए तैयार नहीं थी लेकिन जब ऐसी बात हो रही है तो सकारात्मक सोच वाले बेटे का ये उदारहण देना मुझे प्रासंगिक लगा। भले ही कोई कहे  -- दूल्हे को कौन सराहे दूल्हे का बाप। "सिर्फ ये नहीं कि  सिर्फ अपने माता पिता के लिए ही ऐसा किया हो उन्होंने तो अपने मित्रों के माता पिता के लिए भी बहुत किया है। खुद मेरे माता पिता को जब भी उनकी जरूरत पड़ी कभी पीछे नहीं हटे . मुझे फख्र है कि  उनके इस काम में मेरा सहयोग ने ही मुझे इतनी गहरे से दर्द की परिभाषा को सिखाया है और औरों के लिए कुछ भी करने का  जज्बा दिया है।

शुक्रवार, 25 मई 2012

मिसाल बेटे की !

समय !और युग के साथ श्रवण कुमार की क्या परिभाषा बदल गयी है?  हर माँ बाप बेटे के जन्म के साथ उसके श्रवण कुमार सा होने का ही सपना देखता होगा (मेरे बेटा नहीं सो कभी सोचा ही नहीं बेटियां कभी इतिहास में मिसाल बन कर सामने लायी ही नहीं गयी।लेकिन आज मिसाल कायम कर रही हैं।  )
                     कल ही एक आत्मीय का निधन हुआ और  आज उनकी अंत्येष्टि . उनके यो बेटे और दो बेटियां हैं। बड़ा बेटा बहुत बड़ा अफसर है , छोटा कम पढ़ा लिखा है सो किसी तरह अपना परिवार पाल रहा है। एक बेटी भी नौकरी कर रही है और छोटी बेटी एक धनाढ्य परिवार की बहू है।
                    हमारा बीच बीच में जाना  होता रहता है और उनके पारिवारिक  से हम अच्छी तरह से परिचित  भी हैं। उनके  बड़े दामाद ने बेटे के हर  को  निभाया .   वह ह्रदय रोगी थे तो कई बार बीमार हुए और उनको अस्पताल में  भर्ती करना पड़ा और दामाद ने पूरी निष्ठां से उनकी सेवा की। जब भी वे बीमार हुए अपने फर्ज के अनुरूप दोनों सालों को सूचना  रहे। बेटी का भी संयुक्त परिवार है फिर भी वह और उसके पति ने कभी भी उनका साथ नहीं छोडा . पैत्रिक मकान दूर था इसलिए अपने घर के पास ही एक कमरा  पर दिला दी। खाना बेटी घर से बना कर भेज देती और अपने ऑफिस जाने के पहले और बाद एक बार दोनों लोग उनको देख आते .
                   उनकी बीमारी का समाचार सुनकर बड़े बेटे को लखनऊ से आना  पड़ता था। एक दो बार तो आया लेकिन पिछले बार जब आया तो वह आकर झल्लाया - " क्यों मुझे बार बार परेशां करते हो, इनकी तो रोज ही तबियत ख़राब होती है, मरते तो ये हैं नहीं कि काम  ख़त्म हो । आइन्दा  मरने पर ही   मुझे खबर करना . "
                 इन शब्दों को सुनकर बेटियों को बहुत ही बुरा लगा . वह अपने छोटे भाई से कोई सम्बन्ध नहीं रखता था। उसके बाद  बहन गलत बात सहन नहीं करती थी , वह सच कह  देती थी तो उससे भी कम ही संपर्क रखता . हाँ छोटी बहन धनाढ्य परिवार की बहू थी सो उससे संपर्क रखे हुए था। कल रात जब निधन हुआ तो बेटी और दामाद ने सूचना देने से साफ इनकार कर दिया। छोटे भाई का तो सवाल ही नहीं था। आखिर छोटी बहन से कहा गया की वह सूचित करे . वह भी बहुत दुखी थी फिर भी उसने फ़ोन किया और  कहा - "दादा अब आपकी इच्छा पूरी हो गयी है, जैसा कि  आप चाहते थे कि  पापा के न रहने पर खबर दी जाय. अब पापा  गए हैं अब आप आ  सकते हैं । "
                     रात  को खबर देने के बाद वह दूसरे दिन 12 बजे पहुंचा . सारी  तयारी हो ही चुकी थी। मोहल्ले वालों ने देखा तो पूछा कि  ये कौन है?  बड़े तैश में आकर बोला - 'आपको नहीं मालूम मैं इनका बड़ा बेटा हूँ '
'बड़ा बेटा , अरे बड़ा बेटा तो ये है जिसने वर्षों से सेवा की है . अब तक कहाँ थे तुम?'
                उनके अंतिम संस्कार में वे इच्छुक भी नहीं थे लेकिन वह किसी भी सोच से आगे बढे तो छोटी बहन ने आगे आकर कहा = "नहीं दादा, ये काम छोटे दादा को करने दें , गरीब ही सही 13 दिन तक  यहाँ बैठ कर दीपक तो जलाएंगे , आपको वापस भी जाना होगा।"
                    वहां पर  सभी लोगों ने इसका समर्थन किया .  सही ही किया जो मरने की खबर का इन्तजार कर रहा था उसको बाद में उस  के संस्कार से क्या लेना देना।

बुधवार, 23 मई 2012

ये कैसा पुण्य ?

      ये घटना पिछली  नवरात्रि की है।  उस दिन मुझे अपने पतिदेव के साथ कहीं जाना पड़ा  और उनको कुछ और काम  आ पड़ा  उन्होंने मुझे अपने एक मित्र के यहाँ रुक जाने को कहा। मुझे  3-4 घंटे इन्तजार  करना था। उन मित्र की पत्नी  गृहणी हैं और पति डॉक्टर . घर में उनके पति , पत्नी और उनकी सास जी   हैं जो कमर से नीचे के हिस्से में पक्षाघात का  शिकार हैं। 
                हमारी बातचीत के   दौरान उनकी  की आवाज  - "  मीना पानी   दे जा  गिलास नीचे गिर गया है।"
"मीना नहीं है ,वह अब शाम को  आएगी. "
                  फिर वह मेरी ओर मुखातिब होकर  - ' देखिए  ठीक से गिलास उठाती नहीं हैं , गिलास गिरा दिया   होगा . मैं तो नौ दिन का व्रत रखती हूँ , अगर  उनके पास  जाऊं तो फिर से नहाना पड़ेगा और बार बार  नहाने से मेरे जोइंटस में   दर्द बढ़ जाता है।"
               वह मुझे  बता  रहीं  थी . और मैं  खुद भी व्रत थी। मुझे यह बात अच्छी तरह से समझ आ चुकी थी कि  वे व्रत का बहाना करके उनके पास नहीं जाना चाहती थीं और  वास्तव  में वह जाना भी नहीं चाहती  थी। मुझसे रहा नहीं गया और मैं  पूछ  ही  बैठी   " फिर आप ऐसे में क्या करती   हैं ?"
"इसी  लिए तो मीना को रखा है वह सुबह आती है , आकर उनके सारे काम  नहलाना  धुलाना , खाना खिलाना  सब काम करके चली जाती है और शाम को फिर आती है। " 
"अगर वह न आये तो?"
"तो फिर मीना वाले सारे काम ये करते हैं। मुझे तो व्रत के  सफाई और पाक का ध्यान रखना पड़ता है . व्रत में  छूत होकर  रहने का पाप कौन मोल ले . मैं तो बड़े ही नियम धर्म से व्रत रखती हूँ।" 
" अच्छा " कह कर चुप रह जाने के अलावा कोई चारा भी तो नहीं था। 
                   उनकी सास बार बार आवाज दिए  जा रही थीं क्योंकि उनको उम्र और बीमारी के  कारण सुनाई भी कम देता था। मुझसे रहा नहीं गया और  खुद  जा कर उनके गिलास में पानी उनको ले  जा कर दे दिया . हम ऐसे छूत और पाक  में विश्वास नहीं करते हैं। अगर हम  किसी  प्यासे को पानी नहीं  पिला  सकते तो  कोई धर्म या  पंथ नहीं है जो ऐसे पाक और छूत  को अहमियत  दे।
" अरे अरे आप  वहां क्यों  चली गयीं आप ने  तो अभी  चाय भी  पी नहीं  थी।"
"मैं व्रत में चाय नहीं  पीती ." कह कर मैंने टाल दिया .
                              लेकिन ये सोचने के लिए मजबूर जरूर हुई कि हम किसको धोखा देते हें अपने आपको या फिर अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए बहाने खोज लेते हें . पाप और पुण्य तो हमारे बनाये हुए चोचले हें. किसी भी व्रत और पूजा से बढ़कर किसी इंसान के प्रति दया और ममता का भाव है और वह भी तब जब कि वह मजबूर हो और हमारे ऊपर आश्रित हो . 

गुरुवार, 17 मई 2012

वसीयत !

                             उस दिन वृद्धाश्रम के अन्दर सन्नाटा छाया था , अचानक तिवारी जी का निधन हो गया और वहां के कर्ता धर्ता ने उनके बेटे को सूचना देने के लिए फ़ोन उठाया ही था की शर्मा जी ने उन्हें एक कागज़ पकड़ा दिया-' पहले इसको पढ़ लीजिये। '
'ये क्या है ?' 
'ये तिवारी जी की वसीयत है।"
                   उसको निकल कर पढ़ा गया तो सब स्तब्ध रह गए। उसमें लिखा था 'मेरे मरने पर मेरे बेटे को खबर न दी जाय। मेरे इस शरीर को मेडिकल कॉलेज में दान कर दिया जाय। मुझे यहाँ से ही मेरे साथियों के द्वारा विदा किया जाय। जिस घर में मेरे लिए कोई जगह न हो , उसके दरवाजे पर मेरे शरीर को ले जाकर अपमानित न किया जाय।' 
                       उसके नीचे तिवारी जी के हस्ताक्षर थे।