बुधवार, 20 अप्रैल 2011

अर्थ में छुपा दर्द !

बहुत कुछ ऐसा घट जाता है कि उसे कहा भी नहीं जाता और सहा भी नहीं जाता। आज वटवृक्ष पर रश्मि प्रभाजी नेमेरी एक कविता मेरे ब्लॉग से खोजकर ली। यह तब लिखी गयी थी जब मेरा ब्लॉग था और मैं ब्लॉग के बारेमें जानती थी। किसी ने कहा अर्थ पर तो अपने यमक अलंकर का उदाहरण बना दिया है। क्या वाकई ये अर्थरिश्ते , संवेदनाओं और भावनाओं को हर नहीं लेता है? जिस घटना ने इस कविता को लिखने के लिए विवश कियावह मेरे बहुत करीब घटी थी। वह घटी इतने करीब थी कि उसमें लहूलुहान मेरी आत्मा भी हुई थी।
कई साल पहले कि घटना है - वह मेरी आत्मीय थी, पता चला कि उनके गिरने से उनको चोट आई है। वे चल नहींपा रही हैं। जब मुझे पता चला तो मैंने फ़ोन करके कहा कि उनका एक्स रे करवा लें ताकि पता चले कि चोट कहाँलगी है?
वहाँ से कहा गया अभी तो सिकाई करवा रहे है, बस खड़ी नहीं हो पा रही हैं वैसे तो कोई तकलीफ नहीं है। 'मुझे पताथा कि ऐसा ही कुछ होगा जिसको पता नहीं चल पा रहा है और एक्स रे
, से जरूर पता चल जायेगा एक्स रेकरवाया तो पता चला कि कुल्हे की हड्डी टूट गयी छोटी जगह है और उतनी सुविधाएँ भी नहीं इसलिए मैंनेउनको कानपुर लाने की बात कही की यहाँ पर हमारे अपने संबंध है और ठीक से केयर भी हो जाएगी। उनकोकानपुर लाये और ऑपरेशन के दूसरे ही दिन वह चले गए इस समय सीजन चल रहा है तो मेरा घर पर होना जरूरीहै। मैंने भी इसको इतर नहीं लिया क्योंकि वे हमारी भी आत्मीय हैं। अस्पताल हमारे घर जैसा था और उनकीकेयर भी सबने अपने जैसे ही की। १० दिन बाद हम उनको घर लाये। इस बीच कोई समाचार लेने वाला नहीं था।एक महीने बाद जब वे चलने के काबिल हो गयी हम एम्बुलेंस से उनको छोड़ने गए।
सबसे पहले पूछा कि जो भी खर्च हुआ है उसकी रसीद बनवाई है या नहीं। वास्तव में हमने ऐसा कुछ सोचा ही नहींथा क्योंकि हमारे जीवन में ऐसा कभी हुआ ही नहीं था। अपने घर में भी कभी ऐसा देखा नहीं था और किया भी नहींथा। फिर अस्पताल से लेकर डॉक्टर और दवाएं तक हमने अपने तरीके से हैंडिल की थीं। जिसको जो देना था दियाफिर नर्सिंग होम के भी चार्जेज हमने अपने मुताबिक दिए रसीद हम किससे और क्यों लेते?
मेरे मना करने पर बड़ा बवाल मच गया कि अगर रसीद होती तो हमें इनकम टैक्स में रिबेट मिल जाता। ऐसे तोकुछ भी नहीं मिलेगा। बात उनकी भी सही थी लेकिन रिबेट तो तब लेते जब पैसे उन्होंने खर्च किये होते। शायदरसीद होती तो वे भुगतान करने की सोचते।
मैं दूसरे दिन चली आई लेकिन इस वाकये से इतना दुःख हुआ की पैसे से तौलने वाले रिश्ते क्या इंसान होने काद्योतक होता है शायद नहीं। हम उनकी देखभाल नहीं कर सकते , उनकी सेवा नहीं कर सकते फिक्र हमें इनकमटैक्स की है। वाह रे इंसान - अब कुछ कहने के लिए नहीं बचा है।

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

कैसे कैसे मन?

कल एक लघु कथा पढ़ी अखबार में - पिता के घनिष्ठ मित्र की मृत्यु पर बेटा टीवी बंद नहीं कर रहा हैक्योंकि मैच रहा हैपिता ने सोचा की शायद कल ये होगा कि मेरी मृत्यु पर भी टीवी बंद नहीं होगा अगर ऐसेही कोई कार्यक्रम आता हुआ
ये तो नई पीढ़ी को हम दोष दे रहे हैं लेकिन अगर हम ही या हम से भी कुछ साल पहले वाली पीढ़ी कुछऐसा ही करे तो क्या हम विश्वास करेंगे ? शायद नहीं क्यों हम समझते हैं कि हम और हमारी पीढ़ी अधिकसंवेदनशील और सामाजिक रही है , रही नहीं है आज भी है लेकिन इसके भी कुछ अपवाद जब देखने को मिलजाते हैं तो शर्म तो ही जाती है.
हमारे एक बहुत ही करीब के पारिवारिक सदस्य के साढू भाई बीमार थे और हम लोग उनके घर नहींपहुँच पा रहे थेअभी जवान थे उनके साढू दो छोटे छोटे बच्चे हैंहम दोनों लोग बैठे ही थे कि फ़ोन आया - उनकीमृत्यु हो गयीउनकी पत्नी रोने लगी और पतिदेव एकदम से बेहाल नजर आने लगे कि दिल बैठा जा रहा है, मेरेपति ने कहा कि मैं अभी दवा लेकर देता हूँ आप ले लीजिये आराम जायेगावे जल्दी से गए और दवा लेकरआये उनको खिलाईफिर वह सज्जन बोले कि मैं तो जा नहीं सकता हूँ, ऐसा करो कि रेखा को यही रहने दो औरतुम अपनी भाभी को अस्पताल छोड़ आओमेरे पति उनकी पत्नी को लेकर चले गएमैं वही रही पत्नी के जाते हीवह उठे और किचेन में गए वहाँ से उन्होंने कुछ खाने को लिया और खायामेरी तो ये समझ नहीं रहा था कि येइंसान थोड़ी देर पहले लग रहा था कि साढू के सदमे से कहीं कुछ हो जाएखा पी कर बोले - थोड़ी चाय बना दोमैंने चाय बना कर दीचाय पीकर वह हमसे बोले - "टीवी तो देखा जा सकता है।"
मुझे लगा कि ये कुछ और कह रहे हैं और मुझे सुनाई कुछ और दे रहा है , लेकिन बोल तो वह वहीरहे थेमैं क्या कहती? मैंने कह दिया - क्यों नहीं अगर आप देखना चाहें तो खोल लीजियेवह वही पड़े दीवान परलेट गए और टीवी देखने लगेअब मैं यह नहीं समझ पा रही थी कि ये जो थोड़ी देर पहले तबियत घबराने कानाटक कर रहे थे या फिर वाकई ऐसा कुछ थाया फिर अपनी पत्नी को दिखाने के लिए ऐसा कुछ कर रहे थेजबपतिदेव वापस आये तो चलने के लिए कहाबोले हो तो तुम लोग आज यही रुक जाओ वह तो अब वापस क्या पाएंगी? मैं अकेला रात बिरात कोई समस्या हो गयी तो कोई देखने वाला नहीं
मुझे इतना तेज गुस्सा रहा था की मैं बता नहीं सकतीमैंने अकेले में इनसे कहा कि घर चलतेहैं अगर कोई प्रॉब्लम होती भी है तो भाई साहब फ़ोन कर देंगे हम लोग जायेंगेफिर सुबह तो हम लोग भीउनके घर जायेंगे ही तो यहाँ से कैसे जाना होगा?
घर आकर मैंने इनको सारी बात कही. तो इन्होने बताया कि हाँ वे ऐसे ही हैं . इनको अपने और सिर्फअपने आराम और सुख से मतलब है बाकी किसी से नहीं. फिर मुझे यही लगता रहा कि क्या इंसान इतनाबेमुरव्वत हो सकता है

रविवार, 10 अप्रैल 2011

सुखद निर्णय !

जीवन संध्या अकेले गुजरना कितना भयावह हो जाती है? इसके विषय में सिर्फ वही बता सकता है जो इसको गुजर रहा होता है लेकिन उनके इस दर्द को अगर बच्चों ने समझ कर कुछ अच्छे निर्णय लिए तो वे सराहनीय होते हैं।
डॉ तिवारी की पत्नी की मृत्यु जब उनके दोनों बच्चे बहुत छोटे थे तभी हो गयी। उन बच्चों को उनकी दादी ने आकर संभाला । लेकिन जब तक दादी रही वे बच्चों के लिए माँ बनी रहीं और बेटे के लिए तो माँ थीं ही। जब उनका निधन हुआ तो बच्चे बड़े हो चुके थे। उनकी अपनी अपनी पढ़ाई और जॉब के लिए घर से बाहर निकल गए । अब डॉ तिवारी के लिए बच्चों के घर बसने के लिए चिंता तैयार हो चुकी थी। माँ के होते हुए निर्णय लेना अधिक आसान होता है लेकिन बगैर माँ के बच्चों के विषय में अकेले निर्णय लेना कुछ दुष्कर लगता था। लेकिन बगैर माँ के जीते हुए बच्चे भी पिता के कंधे से कन्धा मिला कर चलने को तैयार हो चुके थे।
डॉ तिवारी ने दोनों बच्चों की शादी कर दी। अब वे अकेले रह गए। अकेले तो वे वर्षों से ही थे लेकिन अब उम्र के उस पड़ाव पर आ गए थे की पचास से ऊपर आने के बाद ही लगता है की अब कोई जीवन में होना चाहिए था। अब इस बारे में सोचने की उनके बच्चों की बारी थी। दोनों बच्चों ने अपने अपने जीवनसाथी के साथ मशविरा करके पापा के लिए एक संगिनी खोनाने की बात सोची और उन्हें मिल भी गयी। वह उन बच्चों के कॉलेज में ही एक टीचर थी। संयोग वश उनका विवाह न हो पाया था। बच्चों ने पापा से बात की तो पापा ने उनको डांट दिया क्या तुम लोग तमाशा फैला कर खड़े हुए हो ? मेरी अब शादी की उम्र है।
"नहीं पापा, आपकी शादी की उम्र नहीं है , लेकिन अब आपकी उम्र है की कोई घर में हो जो आपको खाना बना कर दे और आपके सुख और दुःख को बाँट सके। "
"हाँ पापा अब हम सब अपने अपने घर बसा कर उसमें व्यस्त हो गए हैं और जितनी आपने हम लोगों के लिए त्याग किया है अगर हम उसके मुकाबले आपके लिए कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए सोचा है की हमारी मैम भी अकेली हैं वे आपके साथ के लिए बिल्कुल ठीक रहेंगी । "
"अगर आप राजी हों तो हम उनसे बात कर सकते हैं।"
"बेटा लोग क्या कहेंगे?"
"पापा लोग तब भी कुछ कहते जब आप हमारे बचपन में ही दूसरी शादी कर लेते। अब भी कहेंगे लेकिन लोग आपके बीमार होने पर आपको आक़र खाना नहीं खिला जायेंगे। दवा नहीं दे जायेंगे। "
बच्चों के इतना कहने पर डॉ तिवारी ने भी कुछ सोचा और फिर अपनी मंजूरी दे दी। बच्चों ने मंदिर में पापा की शादी रचाई और फिर एक छोटी सी पार्टी भी दी।
आज शादी के ५ साल बाद डॉ तिवारी रिटायर हो रहे हैं और इस इंसान और उस पांच साल पहले वाले इंसान में जमीन आसमान का फर्क है। तब वे अधिक बूढ़े नजर आते थे और आज तो वे लग ही नहीं रहे हैं कि वे सेवानिवृत्त हो रहे हैं।
मुझे ये सुखद निर्णय बहुत अच्छा लगा कि बच्चे अगर खुद कुछ न कर पाए तो उन लोगों ने पापा के लिए बहुत अच्छा निर्णय लिया। उन्हें पापा की संपत्ति से नहीं बल्कि अपने पापा के एक सुखद भविष्य से वास्ता था जो उन्होंने अपने बच्चों के लिए अपनी पूरी जिन्दगी न्योछावर कर दी थी। उसका बहुत अच्छा सिला दिया उनके बच्चों ने। समाज में ऐसे निर्णय वह भी बच्चों के द्वारा लिए हुए कम ही नजर आते हैं लेकिन ये सोच सराहनीय है।