शनिवार, 4 सितंबर 2010

गुरु तुम्हें नमन !

                     वैसे तो जीवन में मनुष्य के लिए पहली गुरु माँ होती है. सबसे पहले उसको ही नमन करती हूँ.
कोई गुरु इतना प्रभावशाली होता है कि जीवनभर याद रह जाता है. वो मेरी गुरु मेरे मानस पटल पर आज भी अंकित हैं और शायद आज मैं जो भी हूँ या कर पा रही हूँ यही उनका सपना था. उनका नाम था "प्रवेश प्रभाकर".
                    वह मेरी क्लास टीचर थी. जब  मैं नवें में थी. वे एक डॉक्टर की  बेटी थी और मेरे घर के ठीक बगल वाले घर में रहती थी. मैं मध्यम वर्गीय परिवार की  लड़की थी और वे हमारी टीचर और उच्च वर्ग से थी लेकिन उन्होंने मुझे हमेशा क्लास में सबसे अधिक पसंद किया और उनकी ये कोशिश रहती कि मैं हर काम में आगे रहूँ. वे मेरी होम साइंस की  टीचर भी थीं. मेरी प्रक्टिकल की  सारी तैयारी में उनका पूरा सहयोग था क्योंकि मैं उतनी तैयारी खुद नहीं कर पाती.. ये बात किसी को भी पता नहीं थी. स्कूल का कोई भी प्रोग्राम हो मेरे को आगे करतीं. मैं उस समय संकोची स्वभाव की थी इसलिए मुझे आगे बढ़ने में संकोच होता था.
                         जब मैं फर्स्ट इयर में आई तो वे फिर मेरी क्लास टीचर बनी. अब उनके पास मुझे प्रोमोट करने का पूरा पूरा मौका था. वे हर स्कूल फंक्शन में मुझे आगे रखने कि चेष्टा करती. मैं कुछ संकोची स्वभाव के कारण आगे कम ही बढती थी, अपने आप तो बिल्कुल ही नहीं. वे कुछ करें या न करें अगर डिबेट प्रतियोगिता होती तो मेरा नाम जरूर देती. मुझे वह घटना याद है जब कि उन्होंने मुझे साफ शब्दों में कह दिया कि वे मुझे बहुत आगे जाने के e सम्भावना देख रही हैं. हम लोग final इयर वालों को farewell दे रहे थे . सभी सीनियर के नाम के साथ टाइटल बोल कर उनको स्टेज पर बुलाना और कार्ड देने का काम होना था. मैं पीछे छिप  गयी थी कि मुझसे न कह दें. उन्होंने सबके पीछे देख कर आवाज डी - 'रेखा , चलो ये टाइटल तुम्हें पढ़ कर देने हैं. ' मुझे नहीं मालूम मेरी चेहरे से प्रतिक्रिया क्या थी? उन्होंने मुझे डांटा - 'क्या ३६ कोने का मुँह बनाती  हो? चलो और पढो.' मैं चुपचाप स्टेज पर पहुँच गयी. तो वह मुझसे बोली - मैं तुममें कुछ देख रही हूँ और चाहती हूँ कि तुम इसको बाहर लाओ. मैं यूँ तुमको नहीं डांटती रहती हूँ.'
                    वह मुझे जीवन भर याद रहा और मैं जहाँ भी पढ़ी मेरी पहचान अपने कॉलेज में इंस्टिट्यूट में अलग रही. अब वो पता नहीं कहाँ होंगी? लेकिन मेरी आदर्श और मुझे सबसे अधिक समझने वाली गुरु मेरी वही थीं और मेरे लिए आज भी श्रद्धा का पात्र  हैं. मैं आज उन्हें याद करके इस दिवस को अपने लिए सार्थक बना रही हूं.

10 टिप्‍पणियां:

राजभाषा हिंदी ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति
मूल ध्यान गुरु रूप है, मूल पूजा गुरु पाँव ।
मूल नाम गुरु वचन है, मूल सत्य सतभाव ॥

हिन्दी, भाषा के रूप में एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में सामाजिक प्रतीक और साहित्य के रूप में एक जातीय परंपरा है।

राजेश उत्‍साही ने कहा…

रेखा जी आपका संस्‍मरण पढ़कर मुझे भी कुछ ऐसा ही याद आ गया। कृपया अपनी पोस्‍ट का शीर्षक ठीक कर लें। शायद टायपिंग की गलती है।

वन्दना ने कहा…

ये कूवत सिर्फ़ शिक्षक मे होती है कि वो अपने शिष्य मे छुपी हर संभावना तलाश लेता है।

anitakumar ने कहा…

मुझे भी अपनी टीचर याद आ गयी आप का ये संस्मरण पढ़ के

rashmi ravija ने कहा…

बहुत ही बढ़िया संस्मरण...रेखा दी
आपकी क्लास टीचर सचमुच , शिक्षकों के लिए एक मिसाल हैं. इसी तरह... बच्चों की छुपी प्रतिभा को सामने लाने का प्रयास करना चाहिए और प्रोत्साहन देना चाहिए

Divya ने कहा…

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It's a beautiful post. Thanks for sharing your experience with us.

regards,
ZEAL
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Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

kash aisee teacher hame bhi milti...:)

achchha sansmaran!!

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

kash aisee teacher hame bhi milti...:)

achchha sansmaran!!

vishal ने कहा…

हमें भी स्कूल के दिन याद हो आए। काश! सारे शिक्षक अपने छात्रों को इसी नजरिए से देखें और उनमें ‍छुपी प्रतिभा को निखारें। साथ ही छात्र भी गुरु को इसी तरह सम्मान दें। ऐसे गुरु और उनकी शिष्या दोनों को प्रणाम।

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

sach kaha aapne.....guru aise hi hote hain..... unhen mera bhi naman