रविवार, 24 जुलाई 2011

दूसरों की रोटी !

बहुत दिनों से सोच रही थी कि कभी किसी वृद्धाश्रम में जाऊं और वहाँ रहने वाले बुजुर्गों से मिलूँ - कुछपल उनके साथ बैठ कर शायद कुछ पा सकूं और कुछ दे सकूंपता चला कि घर से कुछ ही किलोमीटर की दूर पर एकवृद्धाश्रम हैउस दिन निकल ही लीवृद्धाश्रम के परिसर में गुट बनाकर बैठे बुजुर्ग हँस रहे थे , बातें कर रहे थे पुरुष औरमहिलायें दोनों ही थेलग रहा था कि जैसे एक परिवार जैसा हो
वही देखा दूर बेंच पर एक माई खामोश और अकेली बैठी थींगयी तो ये सोच कर थी कि हो सका तोसबसे परिचय करके और कभी कभी उनके बीच बैठ कर , कभी किसी कि पसंद जान कर उनके लिए कुछ बना कर लेजाऊँगीउनको अच्छा लगेगा तो मुझे भी अच्छा लगेगालेकिन अकेली बैठी माई ने मुझे अपनी ओर खींच लियामैंउनके पास पहुंची तो देख कर उन्होंने मुझे अपने पास बेंच पर बैठने के लिए इशारा किया और मैं उनके पास ही बैठगयीअभी मैं सोच ही रही थी कि उनसे बात कहाँ से शुरू करूँ? उन्होंने पहले ही बोलना शुरू कर मेरी मुश्किल आसानकर दी
"तुम भी यहाँ रहने आई हो?"
"नहीं, मैं तो आप सबसे मिलने आई हूँ।"
"कहीं नौकरी करती हो?
"हाँ ।"
"कितने बच्चे हैं?"
"दो बेटियाँ "
"शादी कर दी।"
"अभी नहीं, बड़ी की जल्दी ही होने वाली है। "
"फिर मेरी एक बात मानो - अपना पैसा अपने पास ही रखना, ताकि किसी पर कभी भी आश्रित होना पड़ेबहुतमुश्किल है
दूसरों की रोटियों पर जीना।"
बिना परिचय इतनी बड़ी नसीहत देने वाली वह माई क्या क्या सहकर यहाँ आई मैं नहीं जानती लेकिनअर्थमय जीवन में हो रहे अर्थहीन रिश्तों की कहानी तो बयान कर ही दी
फिर उस दिन और कुछ जानने की या किसी और से मिलने कि इच्छा हुई ही नहींमैं घर वापस गयीऔर सोचती रही उस मर्म को - क्या वाकई ऐसा ही है?

9 टिप्‍पणियां:

दीप्ति शर्मा ने कहा…

jivan ki ek sachayi bayan ki aapne

नीरज जाट ने कहा…

बहुत भयानक सच्चाई है यह।

Udan Tashtari ने कहा…

वाकई ऐसा ही है-sach kah rahi hain vo!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत अच्छा प्रेरक आलेख!

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत बड़ी नसीहत।

SAJAN.AAWARA ने कहा…

Bechari ko sayad uski santan ne dukh pahunchaya hai....
Jsai hind jai bharat

anu ने कहा…

मैंने भी बहुत बार वृद्धआश्रम के बारे में सुना है ...क्या सच में आज के बच्चे ...अपने माँ बाबा को अपने पास नहीं रखना चाहते ....क्यों ये दुनिया ....हमारे संस्कार इतने बदल गए है इस भौतिकवाद के दुनिया में ...
आपका लेख बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है दीदी

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

हाँ अनु, ये प्रतिशत अब बढ़ाता चला जा रहा है. अब जगह जगह ये आश्रम खुलते जा रहे हैं - अपने माता पिता को इस तरह छोड़ने वाले अपनी जगह भी तो इन आश्रमों में सुरक्षित करवा लें. इस अर्थपूर्ण जीवन में रिश्ते अबअर्थहीन हो रहे हैं.

shikha varshney ने कहा…

बिलकुल ऐसा ही है रेखा जी !मैं उन माई जितनी अनुभवी नहीं फिर भी जितना देखा है.नसीहत मेरी भी यही होगी.