शनिवार, 15 जनवरी 2011

नाम ख़त्म !

                    लोग कहते हैं कि अगर हमारे बेटे हों तो हमारा नाम चलता रहेगा. और अगर बेटा ही कहे कि आज से इनका नाम ख़त्म हो गया तो सुनने वाले क्या कहेंगे?
                    हाल ही में मैं अपने बहुत ही करीब रिश्तेदार के यहाँ उनके पिता के  मरणोपरांत होने वाले एक संस्कार में शामिल होने गयी. अच्छा पढ़ा लिखा परिवार है. पिता  भी काफी वृद्ध थे. जिनके पोते और पोतियाँ सभी अच्छी जगहों पर काम कर रहे हैं.
                     मैंने अपने उन रिश्तेदार के मुँह से कई बार ये वाक्य  सुना - 'बस आज से इनका नाम ख़त्म.' जो भी आता औपचारिकता करता और वे यही बोलते. सुनने में ये वाक्य कोई खास मायने नहीं रखता है लेकिन अगर इसके गहन अर्थ की ओर जाएँ तो इसका मतलब क्या होगा? अरे अभी तो उनके दो बेटे और दो बेटियाँ जीवित हैं और उनसे उनकी कई पोते व् पोतियाँ तथा नाती और नातिन हैं. हमारी भारतीय परंपरा यही माना जाता है कि कोई नाम लेवा नहीं है यानि की उनके बाद उनका कोई अपना नहीं बचा.  जब उसकी औलाद ही कहे कि अब इनका नाम ख़त्म तो हम क्या कहें? अगर अभी वे स्वयं जीवित हैं तो कभी भी और कहीं भी कुछ भी काम करेंगे तो उनके साथ उनके पिता का नाम अवश्य ही लिखा जाएगा . उनके पिता के द्वारा किये गए सत्कर्मों से उनको याद करने वाले उनके घर में न सही बाहर  भी बहुत से लोग होंगे. क्या ऐसे मौके पर ये बुद्धिमत्तापूर्ण वक्तव्य है?  कितने अरमानों से और कितने बार अपने अरमानों का गला घोंट कर अपने बेटों को पाला होगा और वे ही इस तरह कहें तो फिर क्यों लोग बेटों को रोते हैं? मैं ये तो नहीं कह सकती कि सारे ही बेटे ऐसे होते हैं लेकिन बेटियाँ फिर भी अपने माता और पिता के लिए ऐसे शब्द नहीं बोल सकते हैं.
                 अपने जन्मदाता के ऋण से मुक्त होना इतना सहज नहीं है और लोग इस तरह से कहें तो फिर कहना होगा कि ऐसे बेटों से जो कि अपने रहते ही नाम ख़त्म कर दें बेटे न होना अधिक अच्छा है. ऐसे लोगों में अगर इंसानियत है तो उनको कई बेटे मिल जाते हैं और अगर बेटों के रहते हुए कोई बेटे की तरह होना चाहे तो ये बेटे इस बात को सहन नहीं कर सकते हैं. शायद उन्हें लगता है कि मेरे पिता इसको कुछ दे न दें. खुद भी नहीं करेंगे और दूसरे का करना भी उनको गंवारा नहीं होता. पिता की संपत्ति पर तो पूरा पूरा हक़ चाहिए इसके लिए वे अपनी बहनों को भी देने की नियत नहीं रखते (अमूमन बहनें सिर्फ माँ पिता के सुख और चैन से रहने के लिए कभी भाइयों से संपत्ति में हिस्सा नहीं मांगती. ) इसके बाद भी अगर वे इस बात को सुनती हैं तो बहुत तकलीफ होती है.
                  मुझे ऐसे लोगों कि मूर्खता पर हंसी भी आती है और सोच पर तरस आता है कि खुद सर्वसम्पन्न  और पिता की अकूत संपत्ति से क्या कोई स्मारक नहीं बनाया जा सकता है ताकि उनका नाम ख़त्म ही क्यों हो? वो दशकों तक नहीं जब तक वो संस्था रहेगी जीवित रहेगा. स्कूल, मंदिर , शरणस्थल कुछ भी बनवाया का सकता है.  लेकिन इसके लिए सदबुद्धि चाहिए, संकीर्ण मानसिकता नहीं और न ही सिर्फ अपने बारे में सोचने वाली मानसिकता.

17 टिप्‍पणियां:

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत सार्थक और सटीक प्रस्तुति..आज के समाज में बेटे के जन्म को जो इतना महत्व दिया जाता है वह हमारे लिए एक शर्म की बात है. वास्तव में आज के समय में बेटा होना एक उम्रभर के लिए मुसीबत लेने के बराबर है. आप उन पर निर्भर न भी हों तो भी वह आपको शांति से नहीं रहने दे सकते, क्यों कि उनका मुख्य उद्देश्य किसी तरह संपत्ति को हडपना है. बेटियाँ कितना प्यार और हमदर्दी देती हैं यह वही समझ सकता है जिन्होंने बेटी का प्यार देखा है.आज की ज्वलंत समस्या पर बहुत विचारणीय पोस्ट. आभार

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर लेख लिखा, लेकिन एक बात थोडी अखरी कि आप ने यहां नालयक ओलाद की जगहा बेटा बेटी पर ज्यादा जोर दिया, अगर सिर्फ़ एक बात लिखती ओर बेटा बेटी मे कोई फ़र्क ना लिखती तो आप का लेख बहुत अच्छा लगता.

एक हमारे मित्र( काफ़ी बुजुर्ग हे) जि यहां सन १९६० से जर्मनी मे हे, उन के पिता बचपन मे ही गुजर गये थे, मां ने लोगो के बरतन मंज कर ओर सिलाई कर के इन्हे पाला, बहिन अभी बहुत छोटी थी, ओर मां के संग यह सज्जन भी खूब काम करते, ओर पढाई भी करते, ओर इन्होने भारत मे इंजियर की पढाई पुरी की, ओर यहां इन्हे सीमेन्स मे नोकरी मिल गई, नोकरी के वाद यह यहां अलग काम भी करते, कन पुर मे इन्होने अपना बहुत बडा मकान बनवाया, मां को सारे सुख दिये, ओर आप यहां २०-- २० घंटे काम करते,दोनो बहिनो की शादी भी कर दी खुब सारा दहेज दे कर, एक बहिन ने तलाक ले लिया, लेकिन अब दोनो बहिने मां के पास ही रहती, एक दिन मां चल बसी, मां का सारा किरयाकर्म हमारे मित्र ने बहुत अच्छी तरह किया, ओर उस के बाद कई बार भारत गये, अब इन के बच्चे बडे हो गये, उन्होको पेसो की जरुरत पडी, भारत का मकन बेचना चाहा,..... तो बहिनो ने केस कर दिया, यह केस जीत गये, लेकिन बहिनो को बच्चो की तरह पाला था, उन्हे फ़िर भी हिस्सा दिया यानि खुब धन दिया, अब मकान पर कब्जा करना था लेकिन बहिनो ओर बहानोई ने गुंडो से इन्हे धम्की दिलवा दी कि अगली बार दिखाई भी दिये तो....
अब यह सज्जन यहां वापिस आ गये, फ़िर दोनो बहिने आपस मे लडने लगी, अब मकान विरान पडा हे, इस लिये लायक ओलाद ही मां बाप का नाम आगे बढाती हे, वो चाहे लडका हो या लडकी, नालयक तो नालायक ही रहता हे उस मे लडका या लडकी कोई भी हो सकता हे, धन्यवाद

ashish ने कहा…

मुझे तो वो कहावत याद आ रही है "पूत सपूत तो क्या धन संचय , पूत कपूत तो क्या धन संचय ". आंखे खोलती हुई पोस्ट .

shikha varshney ने कहा…

आशीष जी की टिप्पणी से सहमत.बहुत अच्छा आलेख लिखा है आपने .
वैसे काफी बदल रही है मानसिकता बाकी भी बदल जायेगी उम्मीद ही कर सकते हैं.

हरीश प्रकाश गुप्त ने कहा…

जिन परिवारों में लोग शिक्षित हो रहे हैं, परिवर्तन आ रहा है। लेकिन भारत जैसे रूढ़ियों और परम्पराओं वाले देश में यह परिवर्तन धीरे-धीरे ही सम्भव हो सकेगा। समाज में अच्छे, बुरे और आदर्श - हर तरह के उदाहरण मौजूद हैं। पाठकों की शिकायतें भी जायज हैं।

आभार

वन्दना ने कहा…

एक कडवे सच को उजागर किया है आपकी लेखनी हमेशा ही इसी तरह के प्रयास करती है जो एक बहुत ही सार्थक और सराहनीय कदम है।

वन्दना ने कहा…

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (17/1/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com

mark rai ने कहा…

बहुत ही प्रभावशाली रचना
उत्कृष्ट लेखन का नमूना
लेखन के आकाश में आपकी एक अनोखी पहचान है ..

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

नाम तो अपने कर्मों से होता है ....सार्थक लेख

Anupriya ने कहा…

bahut achchi prastuti...
vicharniya post.

रचना दीक्षित ने कहा…

सराहनीय, विचारणीय प्रस्तुति

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत ही प्रभावशाली रचना

निर्मला कपिला ने कहा…

सार्थक सोच। सच मे नाम तो अपने कर्मो से ही जीवित रहता है। हम बच्चों के लिये धन संचय करते रहते हैं अच्छा हो अपने जीवन मे ही कोई ऐसा अच्छा काम कर जायें जिस से बाद मे लोग याद रखएं। आभार।

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

rekha di...ummid rakhiye...sab kuchh badlega...wo bhi sarthak disha ki aur..:)

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

rekha di...ummid rakhiye...sab kuchh badlega...wo bhi sarthak disha ki aur..:)

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

Aad. Rekha ji,
Aaj kal har taraf aisa hi dekhne ko mil raha hai.lagata hai ham apne sanskaaron se katane ki bahut badi kimat chuka rahe hain.

aapne aise jwalant wishay par likha hai ki padhkar man bechain ho jaata hai.
Jiwan ke rishte bemani ho jaay to phir bachega kya.

राजीव थेपड़ा ने कहा…

sochne par vivash kar diyaa aapke aalekh ne.....!!!