सोमवार, 18 अगस्त 2014

कहाँ है हम ?

                                    हम बहुत आगे जा रहे हैं और इसमें कोई शक भी नहीं है लेकिन क्या हम अपनी मानसिकता से भी उतने ही आगे बढ़  पा रहे हैं या नहीं। कभी कभी ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं कि सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि  आज भी हम वहीँ खड़े हैं क्या ? 

                                     एक दंपत्ति मेरे पास आये थे।  उनको बच्चे नहीं थे और उम्र के चलते डॉक्टर ने उम्मीद भी काम ही बताई थी और सलाह दी थी कि कोई बच्चा गोद ले लीजिए।  पतिदेव  गाँव से सम्बंधित थे सो  परिवार में सभी प्रकार के लोग थे।  पत्नी शहर से थी लेकिन  सबका सम्मान बराबर करती थी।  जब गोद लेने की बात आई तो पतिदेव के बचपन का सहपाठी जिसकी दो बेटियां थी अपने तीसरी बेटी को देने के लिए तैयार था लेकिन वो उनके पास के गाँव का था और साथ ही वह अनुसूचित जाति का भी था। 
                                    घर वालों ने मना कर दिया कि  'एक तो लड़की लो वह भी नीच जाति की , लड़का होता तो भी सोच लेते।  गाँव भर थू थू हो जायेगी। '
                          पति को भी कोई परेशानी न थी और पत्नी को भी नहीं लेकिन घर वाले।  उनका कहना था कि'  ' अभी छोटे भाई की पत्नी कोबच्चा होने वाला है अगर लड़का हो जाएगा तो अगला बच्चा तुम्हें दे दिया जाएगा।  बाहर का पता नहीं कैसा खून हो ? '

                                     इस परिवार  में सभी भाई सरकारी नौकरी करने वाले हैं और सोच उनकी कितनी छोटी है।  

2 टिप्‍पणियां:

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

हां दीदी... हमारी सोच अभी भी सदियों पीछे है. और शायद इसीलिये हम अब तक पिछड़े कहलाते हैं.

आशीष भाई ने कहा…

बढ़िया लेखन आ.धन्यवाद !
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