गुरुवार, 18 मार्च 2010

जो गैरों की खातिर जिए मर मिटे ....................

  जो गैरों की खातिर जिए मर मिटे ....................
                                 कुछ  पंक्तियाँ कितनी सार्थक कथन बन जाती हैं, ये तो वही समझ सकता है जो  कि भुक्तभोगी हो. परोपकार मानव मूल्यों और नैतिक मूल्यों में सर्वश्रेष्ठ कर्म माना जाता है. अभी यह पृथ्वी वीरों से खाली नहीं हुई है और ऐसे कितने मिल जाते हैं कि इनसान अपने जीवन की प्राथमिकताओं को तिलांजलि देकर दूसरों के लिए समिधा बन जाता है. जब उस हवन कुण्ड की ओर देखता है तो सिर्फ उससे उठता हुआ धुआं दिखाई देता है  जिससे उसको यथार्थ भी धुंधला दिखने लगता है.
                             क्या कोई  उसके दर्द को समझ सकता है - शायद नहीं. वह जिनको अपना समझता रहा , वे तो अपने थे ही नहीं, उसे सीढ़ी समझ कर ऊपर चढ़े और आसमान छूने लगे तो पैर से वह सीढ़ी ठेल कर दूर कर दी., अब उन्हें उस सीढ़ी की जरूरत ही कहाँ रह गयी थी? 
                             ऐसे ही समर ने अपने भाई के परिवार की खातिर ( भाई एक दुर्घटना में विकलांग हो चुके थे) अपना पूरा जीवन ही लगा दिया. तन-मन-धन से समर्पित था अपने परिवार के लिए. उनके बच्चों के जन्म से लेकर हर कदम पर उनके साथ खड़ा रहा. चाहे बीमारी हो, पढ़ाई हो , कहीं नौकरी के लिए जाना हो, उनके लिए प्राइमरी से लेकर नौकरी में स्थापित होने तक वह अंगुली पकड़े रहा. जब पैरों पर खड़े हो गए तो  उस लक्ष्य तक अगले बच्चे को लेकर चलने लगा. इन बच्चों का भविष्य जैसे उसकी अपनी जिम्मेदारी थी.
                            और फिर एक दिन सब बच्चे सक्षम हो गए - उच्च शिक्षित , उच्च  पद प्रतिष्ठित तो एक दिन उनमें से बोला - "आप क्यों जाते हैं? आपको मना कर देना चाहिए था, मेरे मम्मी पापा खुद कुछ व्यवस्था करते."  जिनके लिए खुद शादी नहीं की. जिन्हें मेरी बेटियां और बेटे कहते जबान नहीं थकी. उसके इन शब्दों ने उसे उठाकर जमीन पर पटक  दिया  था. अब वे सब समर्थ थे और उन के लिए  इस इंसान की जरूरत ख़त्म हो चुकी थी. जिसने अंगुली पकड़ कर चलना सिखाया और शिखर तक ले जाने में अपना जीवन गवां दिया. उसकी पीड़ा का अहसास कौन करेगा? शायद कोई नहीं - वह किसी से कह भी तो नहीं सकता क्योंकि उसके दोस्त कहते थे - जिनके लिए तुमने अपनी ख़ुशी और जीवन न्योछावर कर दिया,  वह अपने होने का व्यामोह उन्हीं के द्वारा तोड़ा जाएगा. सिर्फ मतलब तक के सारे रिश्ते होते हैं. फिर दुनियाँ को क्या पड़ी कि वह तुम्हारे आंसूं पोंछने आएगी.  क्या उससे पूछ कर ये सब कर रहे थे .
                      एक समर ही क्यों? निहारिका भी तो ऐसी ही है - वो मेरी बचपन की सहेली है. पिता बैंक में अफसर थे और माँ मानसिक तौर पर विक्षिप्त . चार भाई बहनों में बड़ी सारी जिम्मेदारी और पढ़ाई एक साथ उठाये रही. पिता गैर जिम्मेदार थे सिर्फ खर्च लेने से मतलब रखते थे. उनकी दूसरी दुनियाँ भी थी. कभी कभी ही घर आते थे. अगर वह अपनी शादी के बारे में सोचती तो बाकी सब का क्या होता? पता नहीं कैसे लोग मिलें? कैसी ससुराल मिले?  सब भाई बहनों की शादी की लेकिन उसकी कौन करता? माँ बाप भी समय के साथ चल बसे. अब इस उम्र में शादी कौन करेगा? अब शादी करके क्या करोगी? हम सब लोग हैं न . 
                        ये दावे करने वाले अपने अपने घरों में व्यस्त हो गए. गर्मियों की छुट्टी में जिसके पास जाती सब उपहारों की राह देखते होते. दीदी आएगी तो छोटों के लिए कुछ तो लेकर आएगी ही. बुआ थी जिसकी उन्हें लगता बुआ कमाती है, कोई खर्च तो है नहीं. जिनकी मौसी थी वे भी यही सोचा करते . इन परिवारों में उसकी कम उसकी कमाई और उपहारों की कीमत अधिक होती थी. ऐसे ही एक बार वह अपनी बहन के घर बीमार पड़ी और बीमारी लम्बी खिंच गयी बहुत कमजोर हो गयी थी . उठने बैठने में भी तकलीफ होती. अब तो वह बोझ नजर आने लगी कि आगे बीमारी पर खर्च कौन करे?  दबी जबान से कहा गया की अगर वह चैक काट देती तो कुछ पैसा ले आते बीमारी में पैसा तो लगता ही  है. उसने चैक काट कर दे दी और फिर पैरों में ताकत आने तक वह रुकी , खड़े होने लायक होते है वह अपने घर वापस आ गयी. ये जब उसने मुझे बताया तो -- मैं साक्षी थी उसके त्याग, संघर्ष और समर्पण की. यदि वह खुद शादी कर लेती तो ये सब सड़क पर घूम रहे होते. कोई उनको देखने वाला नहीं था. 
                               बरबस ही ये पंक्तियाँ मन में उमड़ने लगीं.
जो गैरों की खातिर जिए मर मिटे पूछती हूँ -- उन्हें क्या मिला? क्या मिला? क्या मिला?


                 

8 टिप्‍पणियां:

rashmi ravija ने कहा…

ओह बहुत ही मर्मस्पर्शी गाथाओं का वर्णन कर डाला....मैंने भी कई ऐसे उदाहरण देखे हैं...कैसे सब भूल जाते हैं..उस व्यक्ति का त्याग जिसने अपना जीवन होम कर डाला उन सबके लिए..बहुत ही दुखद ...

dr.aalok dayaram ने कहा…

यह मानव मन की खासियत है कि वह दूसरों पर किये गये एहसान तो सिलसिले वार गिनाता है लेकिन अपने ऊपर किये गये दूसरों के एह्सान को याद रखने या गिनाने में स्वयं को अपमानित होने की स्थिति में मेहसूस करता है।इसीलिये कृतघ्नता कृतग्यता पर हावी रहती है। रेखाजी का आलेख बहुत अच्छा लगा। बधाई!

संगीता पुरी ने कहा…

वास्‍तविक जीवन में ऐसी कहानियां बहुत मिल जाएंगी .. दूसरों के लिए अपना जीवन न्‍यौछावर करनेवालों को अंतिम चरण में सिर्फ कष्‍ट ही मिल पाता है .. जिनके लिए किया जा रहा हो .. उनकी लालच की कोई सीमा ही नहीं होती !!

संजय भास्कर ने कहा…

वास्‍तविक जीवन में ऐसी कहानियां बहुत मिल जाएंगी .. दूसरों के लिए अपना जीवन न्‍यौछावर करनेवालों को अंतिम चरण में सिर्फ कष्‍ट ही मिल पाता है .. जिनके लिए किया जा रहा हो .. उनकी लालच की कोई सीमा ही नहीं होती !!

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

जी हां रेखा दी, दुनिया में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है. ये तो मध्यम वर्गीय परिवार थे, दुनिया का प्रतिष्ठित मंगेशकर परिवार, जहां लता जी ने कितनी तकलीफ़ें झेल के अपने भाई-बहनों को स्थापित किया, उन्हें क्या कुछ नहीं सुनना पडा, अपनों से ही?

Suman ने कहा…

nice

शहरोज़ ने कहा…

आप बहुत ही सूक्ष्मता के साथ हम सब के पोरों-अंतरों को संवेदित कर देती हैं.पता नहीं लोग इतने मतलब परस्त क्यों हो जाते हैं..

vishal ने कहा…

हृदयस्पर्शी वाकयों का जिक्र किया है आपने आंटी। अपनी जिम्मेदारी निभाकर निहारिका और समीर को खुशी मिली लेकिन बदले में उनके परिजन भी उनकी नेकी का सिला नेकी से देते नहीं भी दे सकते (दिल में कम से कम भावना तो रखते) तो उनकी आत्मा तक को चैन-सुकून मिलता। लेख के लिए साधुवाद। मेरी उम्र काफी कम है इसलिए आपको आंटी लिखा है। आप जैसी सहृदय महिला अन्यथा लेंगी ऐसा विचार भी मुझे नहीं आता।