मंगलवार, 18 मई 2010

दर्द जो आखिर बह निकला!

आज सुबह जब ऑफिस आई तो एक मेल थी मेरे एकाउंट में और उसमें थी एक कविता - पढ़ा सोचा और आँखें भर आयीं फिर डूबने लगी अतीत में और उतराने लगी वर्तमान में ---

                       वह एक समय था जब वह फर्स्ट इयर में पढ़ रही थी, बहुत मेधावी छात्रा थी अब भी वैसे ही है क्योंकि मेधा तो कहीं जाती नहीं है. हाई स्कूल में ७७% UP बोर्ड से हासिल किये थे.  सभी विषयों में ऑनर्स थी.  अचानक एक दिन स्कूल में ही बेहोश हो गयी , स्कूल से फ़ोन मिला तो घर ले आये फिर कई दिन तक बुखार और तेज दर्द. पूरे बदन में दर्द की शिकायत होने लगी. दवा देते, उसको मालिश करते और कभी कभी तो उसको कंधे से पकड़ कर ऐसे ही दबाये बैठे रहते. कभी कभी तो सारी रात ऐसे ही बैठी रहती कि  वो सो जाए. कभी आराम हो गया तो सो जाती और मैं भी वही लुढ़क जाती. कब इस दर्द की तेजी बढ़ जाए नहीं कह सकती  . हम सभी चिंता और रोग से टूट रहे थे. कोई डॉक्टर, मंदिर , मस्जिद , गुरुद्वारा नहीं बचा  , लेकिन परिणाम सिफर कोई कारण नहीं जान पाया. इलाज की कोई भी विधा नहीं छोड़ी - एलोपैथी, होम्योपैथी, आयुर्वेद, बायोकैमिक, एक्यूप्रेशर, मेग्नेट थेरेपी कुछ भी नहीं छोड़ा था. जिन्दगी अपनी गति से भागी जा रही थी हम उसके साथ साथ ही चल रहे थे लेकिन थके थके से . उसका १२ क्लास था और हम वही. जितनी देर ठीक रहती पढ़ाई करती या फिर दर्द से बैचेन रहती. हिम्मत इतनी कहती मम्मी ऑफिस जाओ कोई परेशानी होती तो किसी को बुला लूंगी. परीक्षाओं का समय नजदीक आ रहा था और उसे अपनी प्रतिष्ठा की भी चिंता होने लगी , वह स्कूल में अध्यक्ष भी थी. कभी कहती - 'मम्मी मैं कभी ठीक नहीं हो सकती? मैं अपनी जिन्दगी में कुछ भी नहीं कर पाउंगी. '
                   उसके शब्द मुझे अन्दर तक बेध जाते थे लेकिन आंसूं छुपाकर उसको समझाती नहीं ऐसे थोड़े रहेगा सब ठीक होगा.  परीक्षाओं में रात को उसको कंधे से कस के दबा कर बैठ जाती और वह पढ़ती. बीच में सुला भी देती और किसी तरह से उसको परीक्षा दिलवाई थी तब भी चिंता रहती की वहाँ न कोई परशानी हो.  वह भी उसने ऑनर्स से निकाल ली. हम दर्द की गलियों में यूं  भटक रहे थे.  
               इंटर के बाद उसने निर्णय लिया कि मेडिकल की तैयारी ही करूंगी . उसकी तैयारी के बीच ही उसको संजय गाँधी लखनऊ   दिखाया तो वहाँ पता चला कि इस रोग को "फाइब्रोमाइलीजिया " कहते हैं और इसका  दवा से इलाज नहीं हो सकता और इसमें कोई भी पेनकिलर भी काम नहीं करती. इसको physiotherapy  और तनाव से मुक्त रहने से कम किया जा सकता है . 
                       फिर सारी दवा बंद और उसने आपको तैयार किया ऐसी ही पढ़ाई के लिए, उसका चुनाव Occupational Therapy के  लिए हो गया और वह भी Delhi में जाकर पढ़ने लगी.  अब भी जब बहुत दर्द होता है तो फ़ोन करती है और कहती है कि मम्मी बहुत दर्द हो रहा है लेकिन उसके इंस्टिट्यूट में इसके लिए therapy है और वही उसकी exercise भी होती है. कुछ मशीन से treatment दिया जाता है. अब इसको अपनी जिन्दगी का एक हिस्सा मान लिया उसने और सारी चुनौतियों को स्वीकार करते हुए फाइनल  इयर तक आ गयी शेष ६ महीने की internship के बाद वह खुद अपने नए सफर पर  चल पड़ेगी. 
                                      आज सुबह उसी की मेल थी और उसे उसी तरह से लिख रही हूँऔर  इसको लिखने वाली है मेरी छोटी बेटी सोनू ( प्रियंका).

 क्या लिखा है? क्यों लिखा है? पता नहीं बस लिखा डाला , पढ़ लो और किसी को पढ़ाया भी नहीं है.

जीवन बन गयी एक उलझन, 
अब तो कहीं लगता नहीं मन.
क्या करूँ, कुछ समझ नहीं आता,
क्यों कोई मुझे नहीं समझ पाता,
सबको ही है आगे बढ़ने की होड़,
सब निकल रहे है मुझे पीछे छोड़. 
किसे बुलाऊं और कौन आएगा?
आखिर कोई कब तक मेरे साथ निभाएगा.
तय करना है मुझे अकेले ही ये सफर,
फूलों की हो या फिर काँटों की डगर.
साथ रहेगा तुम्हारे प्यार का अहसास,
टूटने नहीं दूँगी कभी तुम्हारा विश्वास. 
लडूंगी मैं जीवन की ये जंग,
अकेले रहूँ या कोई हो मेरे संग. 
न कोई साथी न कोई मीत
बस मुझे चाहिए अपने सपनों की जीत.

20 टिप्‍पणियां:

आलोक सिंह "साहिल" ने कहा…

माफी चाहूंगा...सोनू की कविता न पढ़ सका...वहां तक आते-आते...माथा काम करना बंद कर दिया...

आलोक साहिल

kunwarji's ने कहा…

maarmik...

kunwar ji,

दिलीप ने कहा…

behad maarmik sonu ki kavita uske dil ka dard khol ke rakh deti hai...

rashmi ravija ने कहा…

आँखें हमारी भी भर आयीं...पर सोनू की दृढ इच्छा शक्ति को सलाम और उसे सहारा देने वाले दोनों हाथों को नमन....

"अकेले रहूँ या कोई हो मेरे संग.
न कोई साथी न कोई मीत
बस मुझे चाहिए अपने सपनों की जीत. "
उसका यह प्रण काबिल-ए-तारीफ़ है..पर हमारा आशीर्वाद और शुभकामनाएं हैं....उसकी इस जंग में एक जोड़ी हाथ और , उसका सहारा बनेंगे

ashish ने कहा…

मै सोनू के लिए आंसू नहीं बहाऊंगा , (वैसे निकल ही आये) , उसकी लगन, धैर्य और अटूट विश्वास को मेरा सलाम . किसी ला इलाज बीमारी पर केवल इच्छा शक्ति के बल पर ही विजय पाई जा सकती है.ये उसने सिद्ध कर दिया. प्रभु सोनू को शक्ति दे जीवन में सफल होने कि .

रंजना ने कहा…

अनुभूत उदगार को अभिव्यक्त कर पाने में अक्षम हूँ मैं.....

बस ह्रदय से ढेरों आशीर्वाद और शुभकामनाएं देती हूँ प्यारी बिटिया को,की उसका धैर्य कभी न टूटे और चलते हुए वह जीवन के उस मुकाम पर पहुंचे जहाँ वह तो विजेता बने ही,असंख्य जनों की प्रेरणाश्रोत भी बने...ईश्वर आपको भी धैर्य दें,क्योंकि संतान का दुःख माता की क्या दशा करता है,इससे अनभिज्ञ नहीं मैं...

sangeeta swarup ने कहा…

बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति.....

बस बेटी का हसला बुलंद रहे

न कोई साथी न कोई मीत
बस मुझे चाहिए अपने सपनों की जीत

और सारे सपने साकार हों

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

bahut marmik abhivyakti.......

aapki iss kahani ko padh kar mujhe bhi apni ek student yaad aa gayee...Maths me board me usse 99% marks the.......aur padhai me wo aisee thi, ki main teacher hote hui bhi sayad uske yahan daily chai peene hi jata tha.......lekin kuchh dino baad hi usko pata nahi kaun si bimari ho gaye.....pure sharir ke joints me usko pain rahta hai......aur wo har samay karahti rahti hai..........fir bhi usne pichhle dino apne bal-bute pe sarkari sahayak ki naukri hasil ki hai..........god bless Sangita!!

Mithilesh dubey ने कहा…

ओह , बहुत ही मार्मिक , दिल भर आया पढ़ते-पढ़ते ।

Nitish Raj ने कहा…

दिल को छू गई ना कोई साथी ना कोई मीत...
मार्मिक....

गिरीश बिल्लोरे ने कहा…

अन्तस को झखझोर गई पोस्ट

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बस मुझे चाहिए अपने सपनों की जीत
आमीन. ईश्वर करे, बिटिया की हर ख्वाहिश पूरी हो.

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

बहुत बहुत धन्यवाद आप सबको, बेटी को दिए आशीर्वाद के लिए , इतने प्यार और आशीर्वाद के बल पर ही वो इस जंग में सफल रही है, फिर ये आशीष और प्यार तो जीवन भरचाहिए.

shikha varshney ने कहा…

भरी आँखों से कविता पढ़ गई ....नतमस्तक हूँ ऐसे व्यक्तित्व के आगे ...और सलाम उसके जज्बे को....कुछ नहीं कह पाऊँगी और ..करोड़ों शुभकामनाये सोनू को ये हाथ भी उसके लिए दुआ के वास्ते उठेंगे अब.

शोभना चौरे ने कहा…

रेखाजी
आँखे नम हो गई अंतर्मन तक पैठ गई बिटिया सोनू शारीरिक व्यथा |किन्तु उसका आत्मिक बल और जीवन से लड़ने की अपार क्षमता और उसका मेधावी होना उसे जरुर जीत दिलवा कर ही रहेगा |आपका आभार जो ये संस्मरण बाँट कर आप हमारी प्रेरणा बनी |ईश्वर सोनू को उसकी तय की मंजिल तक जरुर पहुचायेगे इन्ही शुभकामनाओ के साथ अनेक आशीर्वाद सोनू बेटी को |

आशीष/ ASHISH ने कहा…

Kaee dino ke baad aaj roya hoon...

DAISY D GR8 ने कहा…

itna dard kash sab dard hum pee saktey
magar kalam nein wo kar dikhaya

rekha ji aapka jawab nahi

Akanksha~आकांक्षा ने कहा…

बेहद मर्मस्पर्शी....!!

____________________________
'शब्द-शिखर' पर- ब्लागिंग का 'जलजला'..जरा सोचिये !!

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

उसने जो सहा वह हम बाँट तो नहीं पाए लेकिन उसके साथ उसको जिया हमने भी था. हमने अपने जीवन का दर्द पहली बार साझा किया है और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो आस पास होकर भी हमारे दर्द को बांटना तो दूर - 'बहाने' के नाम से नवाजते रहे. चलो वह वक़्त भी नहीं रहा. इसको लिखते वक़्त मैं भी बहुत रोई. दर्द को सह कर फिर उसको लफ्जों में ढालना कम कष्ट दायक नहीं होता है. एक बुरे स्वप्न कि तरह से गुजर गया.

vishal ने कहा…

आंटी आप भी धैर्य रखिए। छोटी (सोनू बहन) ने कितनी अच्छी कविता लिखी है। ऐसे लोगों को ईश्वर निश्चित रूप से अलग से शक्ति देता है। आज नहीं तो कल निश्चित रूप से इसका इलाज होगा। मैं भी सांईबाबा से प्रे करूँगा उनके लिए। निश्चित रूप से आराम मिलेगा और वह ठीक भी हो जाएँगी। हम सब दिल से उसकी ताकत बनेंगे इतने लोगों की दु्आओं के आगे दर्द बेअसर हो जाएगा। बट अब थोड़ी पोजीटिव कविता भी हो जाएँ।