मंगलवार, 11 मई 2010

आंखन देखी कानन सुनी !

                           

    ये किस्से सिर्फ लोगों से सुनती आ रही थी कि हमारी पुलिस कितनी भ्रष्ट है? पर कल तो ये कहावत सच हो गयी 'आंखन देखी कानन सुनी' मैं ही उसकी साक्ष्य बन गयी. मुझे शर्म भी आ रही थी और क्रोध भी .


                               कल जब मैं ऑफिस कि बस से उतरी तो मेरे पैर में बहुत दर्द था और मैं चौराहा भी पार नहीं कर सकती थी. मैंने पतिदेव को बोल दिया कि मैं जहाँ बस उतारती है वही पर बैठ जाउंगी. उस चौराहे पार पुलिस वाले खड़े होते हैं ट्रेफिक कण्ट्रोल के लिए. 
वही थोड़ी सी ऊंचाई पर कुर्सी पड़ी रहती हैं उनके बैठने के लिए. मैंने खाली कुर्सी देखी और उनसे पूछा - " क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ. मेरी ऐसी समस्या है और मुझे इन्तजार करना है." 
उन्होंने  मुझे बैठने कि अनुमति दे दी.
                                 उनमें तीन लोग थे, एक बाइक पार बैठा था और दो सड़क के किनारे बात कर रहे थे. देखो नई गाड़ी देख कर रोको. पैसे वाले होते हैं और देखना जिनमें ड्राइवर हो और हट्टा-कट्टा न हो.  मैंने सुन रही थी, एक गाड़ी आई उन लोगों ने रोक ली. 
'चलो गाड़ी के कागज़ निकालो, और उधर saahab को जाकर चैक  कराओ. '
  उन लोगों ने गाड़ी पर बैठे हुए को साहब बना दिया. गाड़ी वाले ने गाड़ी के कागज़ दिखा दिए.
'गाड़ी का लाइसेंस लाओ, बीमा के कागज़ पूरे हैं कि नहीं सब लाओ.' बाइक पर बैठे हुए सिपाही ने पूछा
              उनके इस सवाल पर  गाड़ी में पीछे बैठे मालिक को इन लोगों ने नहीं देखा था. इतना सुनकर मालिक गाड़ी खोल कर उतर कर आ गया.
'क्यों भाई क्या बात है? जो भी देखना है एक बार में क्यों नहीं बताते हो?' उसकी दबंग आवाज सुनकर वे सकपका गए.
'जी, चैक तो करना ही पड़ता है, आप के सारे कागज़ पूरे हैं जाइए."
     खैर एक तो निकल गयी, फिर वे दुबले पतले ड्राइवर के इन्तजार में खड़े हो गए.
फिर एक गाड़ी को हाथ देकर रोक लिया और वही सवाल फिर.
        उस गाड़ी वाले ने भी सब दिखाया कुछ कमी रही होगी तो लड़के ने फ़ोन पार बात करके फ़ोन पुलिस वाले को पकड़ा दिया.
"जी सर, कोई बात नहीं, रूटीन चेकिंग चल रही है. सब ठीक है.'
         उससे अगली गाड़ी भी चली गयी. इस बीच बहुत सी गाड़ियाँ निकल गयीं . वे चुपचाप खड़े रहे फिर उन्हें कोई नई गाड़ी नजर आ गयी और उन्होंने हाथ दिया. उस गाड़ी को ड्राइवर चला रहा था और पीछे कोई महिला बैठी थी. उनको लगा कि ये सही है. मरियल सा ड्राइवर और पीछे महिला जरूर कुछ मिल जाएगा. 
               अगली गाड़ी रुक गयी. पुलिस वालों ने कागज़ मांगे, ड्राइवर ने महिला से कहा और महिला ने सारे कागज़ उनको थमा दिए. 
वे इधर उधर करते रहे और कागज़ रख कर बैठ गए. 
महिला ने पूछा कि क्या बात है? 
'जी इसमें जो मुहर लगी है वो साफ नहीं है, इसलिए हमें कुछ सही नहीं लग रहा है. '
'कौन से मुहर ठीक नहीं है" महिला ने पूछा.
'ये वाली , दिखलाई नहीं देता है ऐसे कागज़ लेकर गाड़ी लेकर चल देती हैं.' उसने प्रभाव ने लेना चाहा.
             महिला ने अपने कागज़ उसके हाथ से छीनते हुए कहा, ' अब जाकर चालन कर दो और मैं आकर कोर्ट में निपट लूंगी.'
       उसने ड्राइवर को चलने का आदेश दिया और गाड़ी चली गयी.
'अरे  ये तो बड़ी तेज निकली, यार आज का दिन ही ख़राब है. चाय के पैसे भी नहीं निकले अभी तक.' वे आपस में बात कर रहे थे.
तब तक मेरे पतिदेव आ गए थे और मैं भी चल दी. लेकिन मैं ये सोच रही थी कि बेचारों  का कितना ख़राब दिन निकाला एक भी तो पैसा नहीं मिल पाया और एक औरत बेइज्जत करके और चली गयी. ये तो डूब मरने वाली बात हुई न.

8 टिप्‍पणियां:

rashmi ravija ने कहा…

हा हा अच्छी पोल खोली पुलिसवालों की..पैसे भी नहीं मिले..एक महिला ने बेइज्जती कर दी...और दूसरी ने सब देख लिया..बेचारे. :)
यहाँ, मुंबई में तो अक्सर बाइक वाले लड़कों को झूठ मूठ का रोक देते हैं...'आपने स्पीड लिमिट पार कर दी है'..और लोग जान छुडाने को १००,५० पकड़ा देते हैं..

सतीश पंचम ने कहा…

मुंबई के अंधेरी इलाके में स्थित हमारा पुराना ऑफिस कांच का बना है और उसी में हमारा पुराना आफिस था। काले शीशे वाले आफिस में अंदर बैठे बैठे बाहर की तरफ कई बार ट्रैफिक वालो के इस तरह के कारनामें देखते रहे हैं हम लोग।

shikha varshney ने कहा…

हा हा हा ..वाह क्या तस्वीर खींची है ..मजा आ गया पढ़कर ..और बेचारे पुलिस वाले .....पर काश उस महिला जैसी ही सब हो जाएँ पूरा नहीं तो ..कुछ सिस्टम तो बदल ही सकता है.

ashish ने कहा…

मेरे साथ ऐसा अक्सर होता है कि traffic पोलिस रोकती है पेपर्स चेक करने के लिए , तो मै उनसे वही वाला बात repeat करता हूँ,कि भाई कोई गलती मिले तो चालान कर दे, कोर्ट में वकील घर का है . लेकिन एक बार मुझे एक अपने दोस्त कि हेल्प लेनी पड़ी जो उनदिनों पुलिस विभाग में कप्तान था , और कानपूर में पोस्टेड भी था. वैसे शुक्र है उन्होंने आपसे उनकी chair पर बैठने का किराया नहीं माँगा , हा हाहा

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

आशीष ,

ये कानपुर का हाल है, इतने इनको निर्देश दिए जाते हैं और कभी कभी तो लेने हाजिर तक हो जाते हैं लेकिन वही हम नहीं सुधरेंगे. बैठेने को कुर्सी दे दी थे तभी तो मैं चुप रही नहीं तो कुछ न कुछ जरूर कहती उनसे.

R.Venukumar ने कहा…

गाड़ी रुक गयी. पुलिस वालों ने कागज़ मांगे, ड्राइवर ने महिला से कहा और महिला ने सारे कागज़ उनको थमा दिए.
वे इधर उधर करते रहे और कागज़ रख कर बैठ गए.
महिला ने पूछा कि क्या बात है?
'जी इसमें जो मुहर लगी है वो साफ नहीं है, इसलिए हमें कुछ सही नहीं लग रहा है. '
'कौन से मुहर ठीक नहीं है" महिला ने पूछा.
'ये वाली , दिखलाई नहीं देता है ऐसे कागज़ लेकर गाड़ी लेकर चल देती हैं.' उसने प्रभाव ने लेना चाहा.
महिला ने अपने कागज़ उसके हाथ से छीनते हुए कहा, ' अब जाकर चालन कर दो और मैं आकर कोर्ट में निपट लूंगी.'
उसने ड्राइवर को चलने का आदेश दिया और गाड़ी चली गयी.



क्या सही बात हुई ..अब कानपुर, नैनपुर ,नाक(ग)पुर , हाथरस, पैरपुर सब में यह कहावत मशहूर हो जाएगी...हिम्मते महिला मददे भइला

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

वेणु कुमार जी,

इसमें व्यंग्य जैसा तो कुछ भी नहीं है, ये हिम्मत की बात नहीं है बल्कि इन होने वाले कथित भ्रष्टाचार के प्रति विरोध है. हिम्मत तो खुद अपनी होती है और वही सहायक होती है. ये हमारी भ्रष्ट पुलिस के चेहरे पर पड़े एक नकाब का पर्दा हटाने वाली बात है.

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

कई बार होता है ऐसा ..ऐसा तो नहीं पर कुछ -कुछ ऐसा ही