बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

होली में भंग की तरंग !






होली शब्द सुनकर ही कुछ रंग-गुलाल, मौज - मस्ती और हंसी मजाक का मूड बन जाता है. इस में भंग की तरंग हो फिर क्या कहने? कुछ वाकये होली के रंग में ऐसे गुजर जाते हैं कि फिर जीवन भर के लिए यादगार बन जाते हैं.

                 ऐसे ही एक होली का किस्सा आप सब को सुन कर कुछ हंसी आपके चेहरे पर भी बिखर जाए.

     करीब दस साल पहले की बात होगी, तब होली मनाने और खेलने में जो मजा था - अब ख़त्म हो चला है. अब होली में औपचारिकता मात्र देखने के लिए रह गयी है. ये मेरा अपना अनुभव है. तब हम अपने- अपने घरों से निकलते थे और सब जो नहीं निकले उन सबको निकाल कर टोली बना कर पूरे मोहल्ले में घूमा करते थे. महिलाओं की टोली मौज मस्ती करके दिन में 2 बजे तक घर लौटती थी.

                          मैं महिलाओं की टोली में और पतिदेव अपनी टोली में निकल जाते थे.  उस बार पतिदेव टोली में निकले और कहीं से भंग पीकर आ गए.  मैं लौटी नहीं थी और उनको पता नहीं क्या सूझा और पड़ोस में रहने वाले बुजुर्ग के घर जा पहुंचे, एकदम से रोनी सूरत बनाये. उनहोने गुझिया खाने  को दी तो मना कर दिया. वैसे ये रोनी सूरत में कभी नजर नहीं आते. बड़ों के साथ बड़े और बच्चों के साथ बच्चे बन जाते हैं.
"क्या चाचा मेरी तो अब क्या होली और क्या दीवाली?"
"क्यों सब ठीक तो है न?"
"कहाँ? अब रेखा तो घर में मेरे साथ रहना नहीं चाहती है, कल से तलाक की बात कर रही है."
"अरे ! ऐसा नहीं हो सकता ."
"अरे चाचा हो रहा  है, बतलाइए मैं दो बेटियों के लेकर कैसे क्या करूंगा?"
"तुम परेशान मत हो - मैं आकर उससे बात करता हूँ."
"ठीक है चाचा , अब आप बुजुर्गों का ही सहारा है. शायद कुछ समझ आ जाए. नहीं तो मैं तो कहीं का भी नहीं रहूँगा."
                            घर आकर सबने नहा धोकर खाना khaya और फिर हम सब सोने चले जाते हैं. बच्चे अपने ढंग से मस्ती करते हैं. 
                          अचानक ५ बजे बेटी ने आकर जगाया - "मम्मी, अंकल आये हैं और कई लोग हैं. आपको बुला रहे हैं."
        शाम को आना जाना फिर शुरू हो जाता है. मैं उठी और मुंह धोकर उनके पास चली गयी. वे दो और बुजुर्गों के साथ थे. 
"बैठो बेटा, तुमसे कुछ बात करनी है."
    मैं बैठ गयी और सोचने लगी की इस समय ऐसी क्या बात हो सकती है.
"देखो बेटा  तुम्हारी बेटियां अब सयानी हो रही हैं."
"जी"
"तो इनको सही तरह से तुम्हीं गाइड कर सकती हो."
"हाँ, ये तो है."
"देखो, जहाँ चार बर्तन होते हैं तो खटकते तो हैं ही, लेकिन कोई ऐसे नहीं करता."
"बेटा , तुम पढ़ी -लिखी समझदार हो. ये तो है  कि तुम  नौकरी करती हो तो किसी के पैसों से मुंहताज नहीं हो , फिर भी घर तो दोनों लोगों से ही चलता है." दूसरे बुजुर्ग ने बात को और आगे बढाया.
       अब मेरा माथा ठनका की ये माजरा क्या है  ? क्यों इस तरह की बात हो रही है? वह भी होली के दिन सब अच्छे मूड में ही होते हैं.
       फिर वे बेटी से बोले, "बिटिया पापा कहाँ है?"
"अन्दर सो रहे हैं."
"जरा उन्हें भी बुलाकर लाओ."
                थोड़ी देर में ये भी आ गए. इतने लोगों के साथ मुझे देखकर वहीँ बैठ गए.
"अब बताओ आदित्य - क्या कह रही हैं ये?"
"अरे चाचा मैं तो भंग की तरंग में था , पता नहीं क्या क्या कह गया ?"
                 चाचा का तो चेहरा लाल, मैं बताता हूँ तुम्हें और तुम्हारी भंग भी उतरता हूँ.
"अरे बेटा , ये रोनी सूरत बना कर दोपहर में गया और कह रहा था की चाचा रेखा घर छोड़कर जा रही है , तलाक लेने की बात कर रही है. मैं लड़कियों को लेकर कहाँ जाऊँगा?"
                           ये सुनकर तो मेरी हंसी छूट गयी  क्योंकि मुझे इस विषय में कुछ भी नहीं पता था. यहाँ तक की चर्चा भी नहीं की कि  वे चाचा के पास गए थे. 
                            तब से ये मोहल्ले में प्रसिद्ध हो गया और होली में इनसे चुटकी ली जाती है.
                              "चलो तुम्हारा मामला तो नहीं सुलझाना हैं?"

7 टिप्‍पणियां:

rashmi ravija ने कहा…

हा हा हा हा...बहुत ही मजेदार वाकया सुनाया आपने,रेखा दी .....फिर तो आदित्य जीजाजी ने ज़िन्दगी में कभी भांग को हाथ नहीं लगाया होगा...मैंने भी कई किस्से सुने हैं...मेरी बहन के पतिदेव चिल्लाने लगे थे कि उनका दूसरा पैर कहाँ है?..बहन कहती..ये रहा दूसरा पैर तो कहते..ये नहीं दूसरा....ऐसे ही एक सहेली के पति ने अपनी जीभ पकड़ रखी थी उन्हें लगता कि वे अपनी जीभ ही ना कहीं निगल जाएँ..हाहा...इतनी हंसी भरी यादोकी याद दिलाने का शुक्रिया..dogy

shikha varshney ने कहा…

हा हा हा ..रेखा जी ये भी बहुत खूब रही...मजा आ गया..बेचारे आदित्य जी के दिल की तमन्ना भंग ने कह दी ..ही ही ही ...मजाक के अलावा ...बहुत अच्छा लिखा है आपने एकदम होली की मस्ती के अनुरूप.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

ऐसे कुछ किस्से अपुन के पास भी हैं। पर मुझे यह भांग की तरंग कम औऱ होली का मजाक अधिक लग रहा है।

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

@dinesh ji,

apane saath to gujara hai so ye to karane vala adhik achchhi tarah se bata sakata hai ki bhang ki tarang thi ya holi ki thitoli.

अजय कुमार ने कहा…

मजेदार वाकया ।

निर्मला कपिला ने कहा…

धा हा हा हा ये हुयी न होली! बहुत रोचक प्रसंग है शुभकामनायें

Ashish (Ashu) ने कहा…

मजा आ गया मॆ तो ये मजाक जरूर करूगा..