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बुधवार, 29 अप्रैल 2026

हार्ट अटैक - एक साइलेंट किलर !

                                      हार्ट अटैक - एक साइलेंट किलर !

                आजकल रोज ही सुनने को मिल रहा है कि हार्ट अटैक से अचानक मौत! इसके लिए कोई उम्र अब रह नहीं गयी है। वरिष्ठ नागरिक ही नहीं बल्कि युवा और बच्चे भी इसका शिकार हो रहे हैं। कोई कारण समझ नहीं आ रहा है तो फिर हम उठाकर ठीकरा फोड़ ही देते हैं कि ये कोरोना वैक्सीन का दुष्परिणाम है। हर तरफ एक ही आरोप सुनाई देता है लेकिन उन बच्चों का क्या जो  8-12 साल की उम्र में अचानक स्कूल या घर में बेहोश होते हैं और उसके बाद सब ख़त्म - बाद में पता चलता है कि हार्ट फ़ेल या फिर हार्ट अटैक।  इन बच्चों को तो वह वैक्सीन भी नहीं लगाई गयी थी फिर? इस ओर न कोई सोचने का प्रयास करता है और न इसके विषय में कोई भी शोध करना चाहता है। सबसे आसान काम दूसरे के ऊपर दोषारोपण। 

                   ऐसा नहीं कि ये वैक्सीन का दुष्परिणाम नहीं हो सकता है लेकिन उस समय हम इसलिए वैक्सीन के पीछे पागल थे क्योंकि उस समय कोरोना की विभीषिका से बचने के यही एक विकल्प सामने था, यद्यपि इसके बाद भी लोग कोरोना के शिकार हुए और काल कवलित भी हुए लेकिन बचाव का जो साधन सामने था वही हम सबने पकड़ा था। अब ये बात भी कही जाने लगी है कि बूस्टर डोज की विपरीत प्रतिक्रिया के विषय में शायद आगाह भी किया गया था फिर भी उस समय स्वयं को सुरक्षित करने का बेहतर विकल्प खोजा गया था और सबने उसको चुना। ऐसा नहीं कि लोगों को घर से पकड़ पकड़ कर वैक्सीन दिया गया हो लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से जो उसे समय संभव था वह किया गया था। 

        खानपान की विसंगति :--   

                 ये हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि  हम सबसे पहले दोष दूसरे पर मढ़ने की कोशिश करते हैं। स्वयं को कभी भी दोषी नहीं मानते हैं और होना भी चाहिए, ये तो मानव मन की प्रवृत्ति है। हम अगर अपने खान-पान की  आदतों पर नजर डालें तो हमारे सामने यह बचाव होता है कि ये तो चलता ही है लेकिन उसकी गहराई तक जाने का समय किसके पास है? बच्चों को फ़ास्ट फ़ूड चाहिए ही होता है और कामकाजी माँ-बाप भी बच्चों को खुश करने के लिए इससे ऐतराज भी नहीं करते हैं। समय-समय पर इसमें  मिलावट के बारे में समाचार आते रहते हैं लेकिन जरूरी नहीं कि वह सबकी नज़रों से गुजरे ही। मानकों को ध्यान में रखते हुए बड़ी नामी कंपनी गुणवत्ता का भले ही ध्यान रखती हो, लेकिन उनकी आड़ में कितनी छद्म नाम से कंपनी मिलावटी और प्रतिबंधित सामग्री उपयोग करके स्नैक्स तैयार करके बाज़ार में बेच रही हैं। निम्नवर्गीय परिवार के बच्चे भी इन चीजों को खाने के लालायित होते हैं और उनके माँ-बाप भी अपनी पहुँच में पाकर खरीद देते हैं। 

                 ये तो छोटे स्तर पर चल रहा है, दैनिक जीवन के हर चीज अगर कहीं पर शुद्ध मिल रही है तो उससे अधिक मिलावटी चीजें तैयार हो रही हैं। आटा, दाल, चावल, मसाले, तेल, घी, दूध-दही, सब्जी और फल तक मिलावटी आ रही हैं। केमिकल और अखाद्य पदार्थों को मिलाकर निर्माण और सेवन से कोई भी सुरक्षित नहीं है। इस धीमे जहर का प्रभाव शरीर पर धीरे-धीरे असर करता है और शरीर के अंग अपने सामान्य रूप से काम करना बंद कर देते हैं। तभी तो 8-9 साल की उम्र के बच्चों को हार्ट फेल की घटनायें सामने आ रहीं हैं। युवा लोगों को भी हार्ट फेल या हार्ट अटैक में जीवन खोना पड़ रहा है। 

               फिर जिम्मेदार कौन? 

                                  ऐसी घटनाओं के लिए हम किसको जिम्मेदार ठहरा सकते हैं। डॉक्टर तक इसके लिए किसी को जिम्मेदार नहीं ठहरा पा रहे है। मुझे कोई भी संकोच नहीं कि जो मैं पढ़ती और सुनती आ रही हूँ कि जबसे कोरोना की वैक्सीन लगी है युवा लोगों को हार्ट अटैक आने लगा है। पचास से साठ की उम्र वाले शायद इससे सुरक्षित हैं क्यों? कभी सोचा है इस बारे में शायद नहीं। आज की जीवनशैली, खानपान और कार्य के घंटे और लगातार लैपटॉप, मोबाइल या अन्य गजैट्स के संपर्क में रहना भी शरीर और मष्तिष्क को प्रभावित करता है।  शरीर भी एक मशीन की तरह काम करता है और उसको आराम, विराम और शांति की जरूरत होती है लेकिन नहीं मल्टीनेशनल कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को मशीनों से ज्यादा मशीन बना रखा है, उनके पास न खाने का समय, न  सोने का समय और न ही रिलेक्स होने का समय। इन सबका प्रभाव कहाँ जाता है?  युवाओं के जीवन को लील रहा है। 

               बच्चों के लिए जिम्मेदार !

              कम उम्र में ही बच्चों को थाइराइड, शुगर, पाचन प्रणाली की समस्याएं आजकल रोज की बात हो चुकी है। बच्चों को टाइप टू डाइबिटीज के पीछे क्या है ? यही मिलावटी खानपान, गर्भवती महिलायें जो खाती हैं, वह तो गर्भस्थ शिशु ग्रहण करता है। तभी उसको जन्म से ही कुछ समस्याएं होने लगती हैं। छोटे छोटे बच्चों को भी डॉक्टर स्ट्रॉयड देने में संकोच नहीं करते। इसके दुष्प्रभाव को वह भी जानते हैं और फिर भी  वे प्रयोग पर प्रयोग करते रहते हैं। बच्चों पर ही क्यों बड़ों पर भी किया करते हैं। हाँ हम आराम मिलने पर हम भी डॉक्टर के गुण गाने लगते हैं कि इतने दिनों से परेशान थे इस दवा से ठीक हो गया। हम उसे दवा के बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं।  

           स्वास्थ्य के प्रति सजगता !  

            पचास साल पहले ये आम बात थी कि लोग बीमार ही नहीं होते थे या कहें तब जल, वायु, और आहार में शुद्धता थी। शारीरिक श्रम से एक स्वस्थ और शांतिपूर्ण जीवन था।  जब गाँव उठकर शहर की और प्रस्थान कर गया और गाँवों में विकास के नाम पर खेत बेच दिए गए या फिर सरकार द्वारा उनको हाइवे के लिए अग्रहारित कर ली गयी तो वह सब कुछ समाप्त हो गया। शहर की हवा गाँवों में पहुँची और वहाँ की भी हवा जहरीली हो गयी। आज की पीढ़ी उसी में पैदा हुई और उसी में पल रही है तो उसकी शुद्धता भी संदिग्ध हो गयी। प्रदूषण और मिलावट की गम्भीरता को देखते हुए शारीरिक व्याधियाँ जल्दी सिर उठाने लगती हैं तो इस दृष्टि से 35 वर्ष की आयु के बाद रुटीन चेकअप करवाते रहना चाहिए ताकि अगर कुछ शारीरिक कमियाँ आरंभ हो रही हों तो उनका समय से उपचार हो सके या फिर उनके अनुसार खानपान में सावधानी बरती जा सके।   

            सच कहें तो साइलेंट किलर के पीछे कई और भी कारक होते हैं , जिनके असंतुलन से भी कुछ व्याधियाँ प्रकट होने लगती हैं।  

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शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

संतुष्ट जीवन!

               गाँव की बात करें तो विश्वास कर भी लिया जाए , लेकिन दिल्ली जैसे शहर में कोई  पैदा हो, यहीं पर कार्य कर रहा हो और यह कहे कि वह आज तक ट्रेन में नहीं बैठा। ये कहना मेट्रो तो बहुत बड़ी चीज है। 

          यह एक ऐसे इंसान से मुलाकात हुई जो ऑटो चलाता है इसमें 18 साल की उम्र से ऑटो चलाना शुरु कर दिया था क्योंकि उसके पिता की मृत्यु हो गई थी और वह सिर्फ आठवीं तक पढ़ पाया था , उसके बाद घर के चलाने के लिए इधर उधर काम करके गुजारा किया क्योंकि तायाजी ने पूरा बिजनेस हड़प लिया था। वयस्क होते ही उसने ऑटो चलानी शुरू कर दी। ऑटो किराये का है, जिसका प्रतिदिन भाड़ा देता है और अपने परिवार को भी चलाता है सबसे दुखद बात तो यह बतलाई कि अपनी बहन की शादी के वक्त उसकी ससुराल वालों ने अचानक दहेज की मांग कर दी और उसके सिर छुपाने की जगह थी जो पिता करके गए थे उसको उसी वक्त में बेचनी पड़ी और बहन की शादी कर दी। फिर अपने छुपाने की जगह बनाने के लिए दोबारा नौबत नहीं आई और वह किराए के मकान में रह रहा है फिर भी उसका अपना यही नियम है कि वह प्रतिदिन भाड़े के अलावा ₹1000 जमा करता है और ₹500 अपने घर के लिए रखता है इसके बाद वह अपनी ऑटो खड़ा कर देता है।  अपनी बेटी को अच्छे स्कूल में पढ़ाना चाहता है,  उसका साथ देने के लिए उसकी पत्नी घर में सिलाई का काम करती है।  वह कहता है मुझे अपनी जरूरत और भविष्य की सुरक्षा के लिए जितनी जरूरत है मैं 1 दिन में उतना ही काम करता हूँ। 

             उसके गाड़ी में पेट्रोल ख़त्म होने वाला था, इसे पेट्रोल भरने के लिए पूछा क्योंकि वहां पर लम्बी लाइन लगी थी  तो मैंने कहा तब तो मेरे को बहुत देर हो जाएगी और अगर बीच में ही खत्म हो गया तो बोला कर बीच में खत्म हो गया तो मैं आपको देर नहीं करूंगा मैं आपको दूसरे ऑटो पर बिठा कर भेजूँगा और आपसे पैसे भी नहीं लूँगा। यह मेरा उसूल नहीं है कि मैं सवारी को बीच में छोड़ दूँ। मैं अपने काम के प्रति पूरी तरह ईमानदार और बिना लालच के करता हूँ।  आप बुजुर्ग हैं और  आपकी मजबूरी समझते हुए मैं आपको आपके घर तक छोड़ूँगा चाहे जो हो जाए,  हां समय लग सकता है लेकिन मैं घर तक छोड़कर ही आऊँगा।

                  ऐसे लोग कहाँ मिलते हैं ? वह भी नई उम्र के लड़के तो हवा में उड़ते हैं और ऊँची-ऊँची चाहतों में चाहे उसके पीछे कोई भी आधार न हो और कितने व्यसनों की शिकार होते हैं।  मैंने अपनी जिंदगी में यह पहला इंसान देखा है जो दिल्ली जैसे शहर में पैदा होकर और ट्रेन में ना बैठा हो।  न उसमें लालच है और न ही मैं लालच रखना चाहता है। 

जीवन के मौन रिश्ते !

  

                             ये टास्क ऐसा है , जो हमारे आचार-विचारों की एक छवि तो प्रस्तुत कर ही रहा है। मैं अपने इस कार्य के लिए अपने पतिदेव , बेटियों और उनकी बहुत ही खास सहेलियों के अतिरिक्त किसी को भी पता नहीं है और आज अपनी सखियों के साथ उजागर कर रही हूँ। 

                   मेरी बेटी के एक सहेली बहुत ही अंतरंग है और वे नवीं से लेकर अपने प्रोफेशनल कोर्स और फिर उसके बाद नौकरी तक साथ ही रहीं।  एक ही कॉलेज , इंस्टिट्यूट और हॉस्टल का एक ही कमरा, फिर नौकरी करते हुए दिल्ली में एक ही घर में साथ रहीं।  मेरी बेटी से कम न थी वह।  मेरी उसकी माँ से बाद में मित्रता हुई और एक दिन अचानक वह हृदयाघात से संघर्ष करते हुए चली गयीं। जब उनके जाने से पहले मैं उनके पास गयी तो वह बोलीं  - "आप ऋतु का ध्यान रखना।" 

                  मैंने उन्हें आश्वासन दिया कि आप अब ठीक हो रहीं है और जल्दी ठीक भी हो जायेंगी लेकिन मेरे वहाँ से बाहर आने के आधा घंटे बाद फिर से अटैक आया और वह चली गयीं। कुल तेरह दिन बहू, बेटा और बेटियाँ  रहीं। बड़ी बेटी शादीशुदा थी और बेटा भी। उनके पापा थोड़े से अक्खड़ टाइप के थे , एक तो अपने अफसर होने का दर्प और दूसरे उन्होंने कभी न ससुराल से और न ही भाइयों से (जो सौतेले थे। ) अधिक सम्बन्ध रखा और न ही पत्नी को रखने दिया। मेरी भी उनसे अधिक बातचीत कभी न हुई थी। 

                          एक दिन मेरी बेटी का दिल्ली से फ़ोन आया - "मम्मी अंकल दो दिन से भूखे हैं, सिर्फ फल पर काम चला रहे हैं। "

                         उसने माजरा बताया कि कुछ दिन उनके सौतेले भाई के यहाँ से खाना आता रहा , एक दिन उनके भतीजे ने पैसे चुरा लिए और उन्होंने उसे पकड़ लिया।  उसके बाद उन्होंने खाना भेजना बंद कर दिया था। 

                           सुबह तो मुझे ऑफिस जाना होता था और मेरा रूट उनके घर के बिल्कुल ही विपरीत पड़ता था। पतिदेव के साथ सेटिंग की , मैं पांच बजे ऑफिस बस से चलती थी और एक स्टॉप पर उतरती और ये मुझे स्कूटर से लेकर उनके घर ले जाते। मैं बैग रख कर पहले चाय बना कर उनको देती और उसी समय में उनके जो बर्तन सिंक में पड़े होते उनको साफ करती और सब्जी भी काट लेती।  चाय पीते पीते जो बातें होतीं फिर सब्जी बना कर उनको रोटियों बना कर खिला देती और सुबह के लिए कुछ बना कर रख देती।  फिर किचन और बर्तन साफ करके घर की ओर निकलती।  मेरा संयुक्त परिवार है - उस समय घर में जेठ जेठानी सासूमाँ और हमारी दो बेटियाँ थी।  

                         घर आकर पहले तो सबको चाय बना कर देती और फिर डिनर की तैयारी करने लगती।  रोज सवाल होने लगता कि इतनी देर कैसे हो जाती है? चाय भी देर से मिलती है , मैं चुप रहती कोई उत्तर मेरे पास नहीं था। शनिवार और रविवार हमारी छुट्टी का दिन होता तो सुबह का खाना इनसे बना कर भेज देती और शाम को वो इनके साथ आ जाते और खाना खाकर चले जाते। घर में किसी को बनाना नहीं पड़ता तो ये सवाल नहीं उठता कि कौन बनाएगा और खिलायेगा ?

                         पूरे तीन महीने मैंने उनके लिए खाने की व्यवस्था की और उसके बाद उनके लिए एक मैड ऐसी खोज कर रखी जो उनका सफाई से लेकर खाने तक पूरी व्यवस्था करती और मैं अपने नैतिक दायित्व के नाते हफ़्ते में एक बार जाकर उनका हाल चाल लेती रही या फिर जब तक वे रहे कोई तकलीफ होती या तबियत ख़राब होती तो ये उनको घर ले आते और फिर यहीं रखती उनको। जब उनका निधन हुआ तो एक दिन पहले उनका फोन आया कि  भैया मेरी तबियत ठीक नहीं है टेस्ट करवाए है और कल आता हूँ और फिर वो कल आया ही नहीं।  ऋतु का यूएस से फ़ोन आया  - "माते पापा चले गए।" बस इतना सा काम किया जिंदगी में।

दुश्मन को रख देंगे चीर : हम हैं अग्निवीर !

 


दुश्मन को रख देंगे चीर : हम हैं अग्निवीर !


                                ये नारा है अग्निवीरों का।  हाँ वही अग्निवीर  - जिनके लिए जब यह योजना लाई गयी थी तब पता नहीं किसने युवाओं को इसके विरुद्ध भड़काया था कि ये उनको सुनहरे ख़्वाब दिखाए जा रहे हैं और चार साल के बाद ये युवा दर दर के भिखारी बन भटकेंगे। जब अग्नि वीरों की भर्ती हो रही थी तो सरकार की इस योजना की पुरजोर आलोचना की गई थी और इसको विफल करने के लिए उस समय रेल जलाना , बसें जलाने के काम भी किए गए थे। वह कौन थे? जो युवाओं को अग्निवीर में भर्ती के लिए भड़का रहे थे, ये हम खुल कर नहीं कह सकते हैं।  

                                    पिछले दिनों अपनी नासिक से कानपुर की यात्रा के दौरान मुझको अपने ही कंपार्टमेंट में कुछ अग्निवीरों से मुलाकात करने का मौका मिला। बोगी में हम दूर थे लेकिन कानपुर में उतरते समय हम सब एक ही गेट पर खड़े थे तो मैंने सोचा कि उनके कुछ अनुभव और उनके अपनी नौकरी के प्रति विचारों को साझा किया जाए. वह जो अग्निवीर बने वे बहुत ही संतुष्ट है और सरकार की भविष्य की नीतियों के प्रति भी उनके अंदर एक आश्वासन है, जो उन्हें एक सुरक्षित भविष्य देगा।

           . मेरी 8 -10 अग्नि वीरों से मुलाकात हुई जिनकी उम्र 18 से 23 वर्ष के बीच थी। वे अपनी पहली ट्रेनिंग पीरियड पूरा करके 15 दिन की छुट्टी पर अपने घर आ रहे थे और स्टेशन पर उनको रिसीव करने के लिए उनके घर वाले, उनके मित्र सभी एकत्र थे। जितना उत्साह अग्नि वीरों में था, उतना ही उत्साह उनके घर वालों में भी था। उनमें से कुछ अपनी यूनिफॉर्म में थे। जब उनसे पूछा कि आप यूनिफॉर्म में क्यों जा रहे हैं ? वे बोले हमारा मन तो नहीं था लेकिन घर वालों ने कहा कि हम अपने बच्चों को यूनिफॉर्म में देखना चाहते हैं इसीलिए हम यूनिफॉर्म में जा रहे हैं।गाँव से घर वाले स्टेशन पर आ रहे हैं मैंने तो मना किया था लेकिन वो माने ही नहीं है। 
 
                             हमारे साथ पढ़ने वालों में भी बहुत उत्साह है कि हमें इस तरह देख कर वे अपने को खुशनसीब समझेंगे कि हमारा यार देश की सेवा में है।हमारे घर वाले इतने सम्पन्न नहीं हैं कि हमको एन डी ए  के लिए कोचिंग करवा पाते और सरकार के इस कदम ने हमें एक अच्छा मौका दिया है। हम और घर वाले सब खुश हैं।
        
 
         मैंने उनकी अपनी कार्य स्थल और कार्य प्रशिक्षण के प्रति संतुष्टि के बारे में पूछा और पूछा - 
 
1.   आप अपने भविष्य के प्रति आशंकित तो नहीं है?
 
                   तब उन्होंने बताया - " नहीं इससे अच्छा भविष्य हमको नहीं मिलता, हमको 40 हजार रुपए वेतन मिलता है और हमारे सारे खर्च सरकार उठाती है। 4 साल के बाद हमको 14 लाख रुपए मिलेंगे और सिविल एरिया में हमें नौकरी मिलेगी। जिसमें हर क्षेत्र में हमें 25 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा। हममें से जो भी सेना की नौकरी को जारी रखना चाहेगा तो उसकी नौकरी जारी रहेगी। इससे अच्छा विकल्प और हमारे लिए क्या हो सकता है ? 
हम अभी उच्च शिक्षित नहीं है लेकिन अपने परिवार के लिए और अपने लिए एक सुरक्षित भविष्य के प्रति निश्चिंत हैं।
 
2. आपकी ट्रेनिंग किस तरह की होती है ? :--
 
                       हमारी ट्रेनिंग बहुत कठिन होती है, जिसके लिए ही हमारी इसमें चयन के समय ही कठिन परीक्षा ली गयी थी और उसमें सफल होने के बाद ही लिया गया। अपने नासिक के प्रशिक्षण काल में  हमको काफी बोझ पीठ , हाथों में लेकर मीलों तक पैदल चलना होता है और यह हमारे दैनिक की क्रिया होती है।हमें कड़े अनुशासन का पालन करना होता है और हमारा "आर्टिलरी प्रशिक्षण केंद्र " है।   हम लोग  आर्टिलरी शाखा में है,  जिसमें हमको सभी अस्त्र-शस्त्र चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है।  गोला आदि का चलाना सिखाया गया है। एक गोले का भार करीब 95 किलो होता है, जिसे हम चार लोग उठाकर डालते हैं और एक बार उसका वार करने पर 40 किलोमीटर तक सब कुछ तबाह हो जाता है। इसलिए हमें निर्णय भी बहुत सोच समझ कर लेने का निर्देश दिया जाता है।हम जहाँ भी जरूरत होती है वहाँ सेना को इन सब चीजों को पहुंचाते भी हैं।  हमें  भारतीय सेना में तोपची , तकनीकी सहायक, रेडिओ ऑपरेटर और चालक के रूप में सेवा करने  का अवसर प्रदान किया जाएगा।
 
3.  आपको  एक साल में कितने दिनों की छुट्टी मिलती है ?  
     
                     हमको साल में 2 महीने की छुट्टी मिलती है , जिसमें १ महीने की कैजुअल और एक महीने की अर्न होती है। और मेडिकल सुविधा हमको सेना की तरफ से प्राप्त होती है। उसे छुट्टी का कोई गणना नहीं की जाती है। बाकी कैंटीन की सुविधा भी मिलती है , जिसे घर वालों के लिए प्रयोग किया जा सकता है क्योंकि हमें तो सब कुछ वहीँ से मिलती है। 
 
4. आप को अपने काम से संतुष्टि है कोई असुरक्षा का भाव तो नहीं है ?
 
                   बिलकुल भी नहीं , हमारी उम्र में कौन इतना कमा सकता है ? हम अभी आगे की पढाई के लिए जा रहे होते तो अभी पढ़ ही रहे होते।  हम अपने घर का एक मजबूत कन्धा बन चुके हैं और घर वाले भी खुश हैं और हम भी। 
 
                      इनमें से कुछ बच्चे तो कानपूर के आस पास के थे , कुछ लखनऊ , गोण्डा , बलिया, बस्ती  और गोरखपुर के थे। 

नोट :-- ये सारी जानकारी मुझे उन अग्निवीरों से ही प्राप्त हुई है और इससे पहले मैं भी अग्निवीरों के भविष्य के प्रति फैलाई वही भान्तियों का शिकार थी। 
 

रहती थी।  मैंने देखा है घर में दादी से पूछ कर सारे काम होते थे। खेती से मिली नकद राशि  उनके पास ही रहती थी।  लेकिन  उनके सम्मान से पैसे के होने न होने का  कोई सम्बन्ध नहीं था। 

  1 .   वृद्ध माँ  आँखों से भी कम दिखलाई  देता है , अपने पेट में एक बड़े फोड़े होने के कारण एक नीम हकीम डॉक्टर के पास जाकर उसको  ऑपरेट  करवाती है। उस समय  पास कोई अपना नहीं होता बल्कि पड़ोस में रहने वाली  होती है।  वह ही उसको अपने घर दो घंटे लिटा कर रखती है और फिर अपने बेटे के साथ हाथ  कर घर तक छोड़ देती है।

 
2 .   74 वर्षीय माँ घर में झाडू पौंछा करती है क्योंकि बहू के पैरों में दर्द रहता है तो वो नहीं कर सकती है।  उस घर में उनका बेटा , पोता  और पोती 3 सदस्य कमाने वाले हैं   किसी को भी उस महिला के काम करने पर कोई ऐतराज नहीं है।  एक मेट आराम से रखी जा सकती है लेकिन  ?????????? 
 
3.    बूढ़े माँ - बाप को एकलौता बेटा अकेला छोड़ कर दूसरी जगह मकान लेकर रहने लगा क्योंकि पत्नी को उसके माता - पिता पसंद नहीं थे और फिर जायदाद वह सिर पर रख कर तो नहीं ले जायेंगे . मरने पर मिलेगा तो हमीं को फिर क्यों जीते जी अपना जीवन नर्क बनायें। 
 
4 .  पिता अपने बनाये हुए  घर में अकेले रहते हैं क्योंकि माँ का निधन हो चुका है।  तीन बेटे उच्च पदाधिकारी , बेटी डॉक्टर।  एक बेटा उसी शहर में रहता है लेकिन अलग क्योंकि पत्नी को बाबूजी का तानाशाही स्वभाव पसंद नहीं है।  आखिर वह एक राजपत्रित अधिकारी की पत्नी है।

                            आज हम पश्चिमी संस्कृति के  जिस रूप के पीछे  भाग रहे हैं उसमें हम वह नहीं अपना रहे हैं जो हमें अपनाना चाहिए।  अपनी सुख और सुविधा के लिए अपने अनुरूप  बातों को अपना रहे हैं।  आज मैंने  में पढ़ा कि 24 शहरों  में वृद्ध दुर्व्यवहार के लिए मदुरै  सबसे ऊपर है और कानपुर दूसरे नंबर पर है।  कानपुर में हर दूसरा बुजुर्ग अपने ही घर में अत्याचार का  शिकार हैं।  एक गैर सरकारी संगठन  कराये गए सर्वे के अनुसार ये  परिणाम   हैं। 
 
                 हर घर में बुजुर्ग हैं और कुछ लोग तो समाज के डर  से उन्हें घर से बेघर नहीं कर  हैं, लेकिन कुछ  लोग ये भी  कर देते हैं। एक से अधिक संतान वाले बुजुर्गों के लिए अपना कोई घर नहीं होता है बल्कि कुछ दिन इधर  और कुछ दिन  उधर में जीवन गुजरता रहता है।  उस पर भी अगर उनके पास अपनी पेंशन या  संपत्ति है तो बच्चे ये आकलन  करते रहते हैं कि  कहीं दूसरे को तो  ज्यादा नहीं दिया है और अगर ऐसा है तो  उनका जीना दूभर कर देते हैं।  उनके प्रति अपशब्द , गालियाँ या कटाक्ष आम बात मानी जा सकती है। कहीं कहीं तो उनको मार पीट का शिकार भी होना पड़ता है। 
                      इसके कारणों को देखने की कोशिश की तो पाया कि  आर्थिक तौर पर बच्चों पर  निर्भर माता - पिता अधिक उत्पीड़ित होते हैं।  इसका सीधा सा कारण है कि उस समय के अनुसार आय बहुत अधिक नहीं होती थी और बच्चे 2 - 3 या फिर 3 से भी अधिक होते थे। अपनी  आय में अपने माता - पिता के साथ अपने बच्चों के भरण पोषण  में सब कुछ खर्च  देते थे।  खुद के लिए कुछ भी नहीं रखते थे।  घर में सुविधाओं की ओर भी ध्यान  देने का समय उनके पास नहीं होता था।  बच्चों की स्कूल यूनिफार्म के अतिरिक्त दो चार जोड़ कपडे ही हुआ करते थे।  किसी तरह से खर्च पूरा करते थे ,  पत्नी के लिए जेवर  और कपड़े बाद की बात होती थी।  घर में कोई नौकर या मेट नहीं हुआ करते थे, सारे  काम गृहिणी ही देखती थी। सरकारी नौकरी भी थी तो  बहुत कम पेंशन  मिल रही है और वह भी बच्चों को सौंपनी पड़ती है।  कुछ बुजुर्ग रिटायर्ड होने के बाद पैसे मकान  बनवाने में लगा देते हैं। बेटों में बराबर बराबर बाँट दिया।  फिर खुद एक एक पैसे के लिए मुहताज होते हैं और जरूरत पर माँगने पर बेइज्जत किये जाते हैं। 
                      आज जब कि  बच्चों की आय कई कई गुना बढ़ गयी है ( भले ही इस जगह तक पहुँचाने के लिए पिता ने अपना कुछ भी अर्पित  किया हो ) और ये उनकी पत्नी की मेहरबानी मानी जाती है।
-- आप के पास था क्या ? सब कुछ  हमने जुटाया है। 
-- अपने जिन्दगी भर सिर्फ  खाने और खिलाने में उडा  दिया।  
-- इतने बच्चे पैदा करने की जरूरत  क्या थी ? 
-- हम अपने बच्चों की जरूरतें पूरी  करें या फिर आपको देखें।
-- इनको तो सिर्फ दिन भर खाने को चाहिए , कहाँ से आएगा इतना ?
-- कुछ तो अपने बुढ़ापे के लिए सोचा होता , खाने , कपड़े से लेकर दवा दारू तक का खर्च हम कहाँ से पूरा करें ? 
-- बेटियां आ जायेंगी तो बीमार नहीं होती नहीं तो बीमार ही बनी रहती हैं।
-- पता नहीं कब तक हमारा खून पियेंगे  ये , शायद  हमें खा कर ही मरेंगे।  
                          
              अधिकतर घरों में अगर बेटियां हैं तो बहुओं को उनका आना जाना फूटी आँखों नहीं  सुहाता है। अपनी माँ - बाप  से मिलने आने के लिए भी उनको सोचना पड़ता है। 
                   बुजुर्गों का शिथिल  होता हुआ शरीर भी उनके लिए एक समस्या बन जाता है।  अगर वे उनके चार काम करने में सहायक हों तो बहुत  अच्छा,  नहीं तो पड़े रोटियां  तोड़ना उनके लिए राम नाम की तरह होता है।  जिसे बहू और बेटा  दुहराते रहते हैं।  अब जीवन स्तर बढ़ने के साथ साथ जरूरतें इतनी बढ़ चुकी हैं कि उनके बेटे पूरा नहीं कर पा  रहे हैं।  घर से बाहर  की सारी  खीज घर में अगर पत्नी पर तो उतर नहीं सकती है तो माँ -बाप मिलते हैं तो किसी न किसी  रूप में वह कुंठा उन पर ही उतर जाती है। 
 
                     वे फिर भी चुपचाप सब कुछ सहते रहते हैं , अपने ऊपर हो रहे दुर्व्यवहार की बात किसी से कम ही  उजागर करते हैं क्योंकि कहते हैं - "चाहे जो पैर उघाड़ो इज्जत तो अपनी ही जायेगी न।" फिर कहने से क्या  फायदा ? बल्कि कहने से अगर ये बात उनके पास तक पहुँच गयी तो स्थिति और बदतर हो जायेगी . हम चुपचाप सब सह लेते हैं कि घर में शांति बनी रहे।  ज्यादातर घरों में बहुओं की कहर अधिक होता है और फिर शाम को बेटे के घर आने पर कान भरने की दिनचर्या से माँ बाप के लिए और भी जीना दूभर कर देता है।  पता  नहीं क्यों बेटों की अपने दिमाग का इस्तेमाल करने की आदत क्यों ख़त्म हो चुकी है ? 
 
                       माता-पिता को बीमार होने  पर दिखाने  के लिए उनके पास छुट्टी नहीं होती है और वहीं पत्नी के लिए छुट्टी भी ली जाती है और फिर खाना भी बाहर से ही खा कर  आते हैं।  अगर घर में  रहने वाले को बनाना आता है तो बना कर खा ले नहीं तो भूखा पड़ा रहे  वह तो बीमार होती है।
 
                     हमारी संवेदनाएं कहाँ  गयीं हैं या फिर बिलकुल मर चुकी हैं।  कह नहीं सकती हूँ , लेकिन इतना तो है कि हमारी संस्कृति पूरी तरह से पश्चिमी संस्कृति हॉवी हो चुकी है। रिश्ते ढोए जा रहे हैं।  वे भी रहना नहीं चाहते हैं लेकिन उनकी मजबूरी है कि  उनके लिए कोई ठिकाना नहीं है। 
 
                    आज वृद्धाश्रम इसका विकल्प बनते जा रहे हैं लेकिन क्या हर वृद्ध वहाँ  इसलिए है क्योंकि वे अपने बच्चों के बोझ बन चुके हैं। हमें उनके ह्रदय में अपने बड़ों के लिए संवेदनशीलता रखें और अब तो बुज़ुर्गों के प्रति दुर्व्यवहार करने वालों के लिए दण्ड का प्राविधान हो चूका है लेकिन वयोवृद्ध बहुत मजबूर होकर ही क़ानून की शरण लेते हैं।                     
 
                      * सारे  मामले मेरे अपने देखे हुए हैं।

 वर्क फ्रॉम होम : सुखद या दुखद !


                                   आईटी  कंपनी के लिए वर्क फ्रॉम होम एक अच्छा विकल्प था कि कर्मचारी को कभी आपात काल में घर में बैठ कर काम करने की सुविधा प्राप्त थी और वह इससे कुछ आराम भी महसूस कर सकता था। ये व्यवस्था हर कंपनी में थी  और  करीब करीब  सबको दी जा रही थी और कर्मचारी ले  रहे थे।  लेकिन हद से ज्यादा कोई  सुविधा भी अवसर की जगह गले की फांस बन जाती है। 

              कोरोना की दृष्टि से वर्क फ्रॉम होम एक सुरक्षित और सहज तरीका है , जिससे कार्य भी होता रहे और उनके कर्मचारी सुरक्षित भी रहें।  अब वर्क फ्रॉम होम करते करते लोगों के लिए एक वर्ष पूर्ण होने जा रहा है और कंपनी के काम तो सुचारु रूप से चल रहा है लेकिन उसके कर्मचारियों के लिए एक गले की फाँस बन चुका है। ऑफिस के कार्य करने के वातावरण में और घर के वातावरण में अंतर होता है। अब जब कि बच्चे भी घर में ही अपनी पढाई  कर रहे हैं और  पत्नी भी कामकाजी है तो वह भी अपने काम को किसी न किसी तरीके से सामंजस्य स्थापित करके जारी रख रही है।  

                   बच्चों के लिए स्कूल का वातावरण और घर में रहकर पढाई करने से सबके समय का तारतम्य बैठ नहीं  पाता है।  बच्चे अगर छोटे हैं तो माँ उन्हें साथ लेकर उनकी पढाई करवानी होती है।  ऐसे समय में जब कि न सहायिकाएं बुलाई जा रही हैं और न कोई और साथ दे सकता है तब ये वर्क फ्रॉम होम भी गले की फाँस ही  बना है।  एक गृहणी घर , काम और बच्चे सब का  सामान्य दिनों में प्रबंधन कर लेती हे लेकिन जब सारी जिम्मेदारियां  एक साथ आ खड़ी हों तो पति , अपना और बच्चे की पढाई सामान्यतया  संभव नहीं है।  परिणाम ये होता है कि पति का काम समय से पूरा न हो तो वह भी इसकी जिम्मेदारी परिवार पर ही डालता है , पत्नी भी यही सोचती है लेकिन वह  ही  क्यों खट रही है , क्योंकि हर हाल में सब को सही वातावरण देकर स्वयं को अधिक काम के बोझ तले दबा हुआ देख कर वह अपनी झुंझलाहट किस पर उतार सकती है , बच्चों पर , पति पर न।  इसके बाद घर का वातावरण तनाव पूर्ण ही बन जाता है।  फिर सब एक दूसरे के ऊपर आरोप प्रत्यारोप लगाने लगते हैं। 

                     स्थितियाँ इसके विपरीत भी बन रही हैं , अगर पति किसी व्यवसाय में है और पत्नी अन्य तरीके से कार्यरत है तो इसमें पति अवसाद का शिकार हो रहा है क्योंकि व्यवसाय लगभग बंद रहे हैं या फिर निश्चित समय  के लिए ही खुल पा रहे हैं।  अगर वह समझदार है तो वह पत्नी के  कार्यों में सहभागिता करके परिवार को एक अलग ही वातावरण दे रहा है और समझदारी भी यही है। लेकिन जरूरी नहीं है कि वह जो चाहता है वह कर सके क्योंकि हर जगह की  अलग कार्य शैली होती है। स्कूल में कार्य करने का समय अलग होता है , सरकारी कार्यालयों में अलग और आईटी कंपनियों में अलग होता है।  

                       इसमें सबसे अधिक होता है कंपनियों की कार्य  शैली में अंतर।  मीटिंग्स और कार्य का कोई समय नहीं होता है क्योंकि आपका मैनेजर या फिर बॉस कभी भी मीटिंग रख लेता है और वर्क फ्रॉम होम में कभी भी  करके आया काम सौप सकता है।  अपने सम्पर्क में आये  कई परिवारों के बच्चों के बारे में सुना है कि अब तो न कोई खाने का समय और न ही सोने का  , हर समय लैपटॉप पर बैठे काम  ही किया करते हैं।  कभी कभी तो  ३ बने तक भी काम होता रहता है।  इससे कर्मचारी के ऊपर कितना दबाव बढ़ जाता है।  ऐसे  कठिन समय ें में जब कि कंपनियों में भी काम करने वालों को निकला जा रहा है, अपनी नौकरी बचने के लिए कर्मचारी हर शर्त और हर हाल में काम करने के लिए मजबूर है। कितने घंटे काम के होते हैं इसकी कोई भी सीमा नहीं होती है। 

                      इससे पहले  कर्मचारी का एक निश्चित कार्यक्रम होता था कि उसको इतने बजे ऑफिस में रिपोर्ट करना है और  इतने बजे निकलना है।  इसके बाद वह अपने परिवार के लिए समर्पित होता था। अब स्थितियां उसके लिए अपने अनुसार नहीं चल रही हैं। कंपनी का पूरा काम हो रहा है, कर्मचारियों को दी जाने वाली यातायात सुविधा की   है लिहाजा उसके चालक या तो बेकार हो चुके हैं या फिर उसके मालिक को नुक्सान हो रहा है।  ऑफिस के रख रखाव का पूरा पूरा व्यय अब उनके लिए बचत ही हो चुकी है।  लेकिन वहीँ कर्मचारी के लिए सारे दिन वाई फाई का लोड और कई सारे व्यय बढ़ चुके हैं। 

                     कंपनी का नजरिया भी कई तरह से ठीक है वह अपने कर्मचारियों की सुरक्षा को देखते हुए ये सुविधा प्रदान कर रही है  और जो बच्चे माँ-बाप से दूर शहरों में काम कर रहे हैं , उन्हें घर आकर एक मुद्दत बाद  उनके साथ रहने का मौका मिल रहा है।  घर में बंद  बच्चों को अपनों का साथ मिल रहा है और माँ-बाप को आंतरिक ख़ुशी भी मिल रही है।   हर सुविधा के दो पहलू होते हैं सुखद और दुखद - ये हमारे ऊपर निर्भर करता है कि उसको हम अवसर के अनुकूल किस  दृष्टि से देख रहे हैं।