चिट्ठाजगत www.hamarivani.com

शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

दुश्मन को रख देंगे चीर : हम हैं अग्निवीर !

 


दुश्मन को रख देंगे चीर : हम हैं अग्निवीर !


                                ये नारा है अग्निवीरों का।  हाँ वही अग्निवीर  - जिनके लिए जब यह योजना लाई गयी थी तब पता नहीं किसने युवाओं को इसके विरुद्ध भड़काया था कि ये उनको सुनहरे ख़्वाब दिखाए जा रहे हैं और चार साल के बाद ये युवा दर दर के भिखारी बन भटकेंगे। जब अग्नि वीरों की भर्ती हो रही थी तो सरकार की इस योजना की पुरजोर आलोचना की गई थी और इसको विफल करने के लिए उस समय रेल जलाना , बसें जलाने के काम भी किए गए थे। वह कौन थे? जो युवाओं को अग्निवीर में भर्ती के लिए भड़का रहे थे, ये हम खुल कर नहीं कह सकते हैं।  

                                    पिछले दिनों अपनी नासिक से कानपुर की यात्रा के दौरान मुझको अपने ही कंपार्टमेंट में कुछ अग्निवीरों से मुलाकात करने का मौका मिला। बोगी में हम दूर थे लेकिन कानपुर में उतरते समय हम सब एक ही गेट पर खड़े थे तो मैंने सोचा कि उनके कुछ अनुभव और उनके अपनी नौकरी के प्रति विचारों को साझा किया जाए. वह जो अग्निवीर बने वे बहुत ही संतुष्ट है और सरकार की भविष्य की नीतियों के प्रति भी उनके अंदर एक आश्वासन है, जो उन्हें एक सुरक्षित भविष्य देगा।

           . मेरी 8 -10 अग्नि वीरों से मुलाकात हुई जिनकी उम्र 18 से 23 वर्ष के बीच थी। वे अपनी पहली ट्रेनिंग पीरियड पूरा करके 15 दिन की छुट्टी पर अपने घर आ रहे थे और स्टेशन पर उनको रिसीव करने के लिए उनके घर वाले, उनके मित्र सभी एकत्र थे। जितना उत्साह अग्नि वीरों में था, उतना ही उत्साह उनके घर वालों में भी था। उनमें से कुछ अपनी यूनिफॉर्म में थे। जब उनसे पूछा कि आप यूनिफॉर्म में क्यों जा रहे हैं ? वे बोले हमारा मन तो नहीं था लेकिन घर वालों ने कहा कि हम अपने बच्चों को यूनिफॉर्म में देखना चाहते हैं इसीलिए हम यूनिफॉर्म में जा रहे हैं।गाँव से घर वाले स्टेशन पर आ रहे हैं मैंने तो मना किया था लेकिन वो माने ही नहीं है। 
 
                             हमारे साथ पढ़ने वालों में भी बहुत उत्साह है कि हमें इस तरह देख कर वे अपने को खुशनसीब समझेंगे कि हमारा यार देश की सेवा में है।हमारे घर वाले इतने सम्पन्न नहीं हैं कि हमको एन डी ए  के लिए कोचिंग करवा पाते और सरकार के इस कदम ने हमें एक अच्छा मौका दिया है। हम और घर वाले सब खुश हैं।
        
 
         मैंने उनकी अपनी कार्य स्थल और कार्य प्रशिक्षण के प्रति संतुष्टि के बारे में पूछा और पूछा - 
 
1.   आप अपने भविष्य के प्रति आशंकित तो नहीं है?
 
                   तब उन्होंने बताया - " नहीं इससे अच्छा भविष्य हमको नहीं मिलता, हमको 40 हजार रुपए वेतन मिलता है और हमारे सारे खर्च सरकार उठाती है। 4 साल के बाद हमको 14 लाख रुपए मिलेंगे और सिविल एरिया में हमें नौकरी मिलेगी। जिसमें हर क्षेत्र में हमें 25 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा। हममें से जो भी सेना की नौकरी को जारी रखना चाहेगा तो उसकी नौकरी जारी रहेगी। इससे अच्छा विकल्प और हमारे लिए क्या हो सकता है ? 
हम अभी उच्च शिक्षित नहीं है लेकिन अपने परिवार के लिए और अपने लिए एक सुरक्षित भविष्य के प्रति निश्चिंत हैं।
 
2. आपकी ट्रेनिंग किस तरह की होती है ? :--
 
                       हमारी ट्रेनिंग बहुत कठिन होती है, जिसके लिए ही हमारी इसमें चयन के समय ही कठिन परीक्षा ली गयी थी और उसमें सफल होने के बाद ही लिया गया। अपने नासिक के प्रशिक्षण काल में  हमको काफी बोझ पीठ , हाथों में लेकर मीलों तक पैदल चलना होता है और यह हमारे दैनिक की क्रिया होती है।हमें कड़े अनुशासन का पालन करना होता है और हमारा "आर्टिलरी प्रशिक्षण केंद्र " है।   हम लोग  आर्टिलरी शाखा में है,  जिसमें हमको सभी अस्त्र-शस्त्र चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है।  गोला आदि का चलाना सिखाया गया है। एक गोले का भार करीब 95 किलो होता है, जिसे हम चार लोग उठाकर डालते हैं और एक बार उसका वार करने पर 40 किलोमीटर तक सब कुछ तबाह हो जाता है। इसलिए हमें निर्णय भी बहुत सोच समझ कर लेने का निर्देश दिया जाता है।हम जहाँ भी जरूरत होती है वहाँ सेना को इन सब चीजों को पहुंचाते भी हैं।  हमें  भारतीय सेना में तोपची , तकनीकी सहायक, रेडिओ ऑपरेटर और चालक के रूप में सेवा करने  का अवसर प्रदान किया जाएगा।
 
3.  आपको  एक साल में कितने दिनों की छुट्टी मिलती है ?  
     
                     हमको साल में 2 महीने की छुट्टी मिलती है , जिसमें १ महीने की कैजुअल और एक महीने की अर्न होती है। और मेडिकल सुविधा हमको सेना की तरफ से प्राप्त होती है। उसे छुट्टी का कोई गणना नहीं की जाती है। बाकी कैंटीन की सुविधा भी मिलती है , जिसे घर वालों के लिए प्रयोग किया जा सकता है क्योंकि हमें तो सब कुछ वहीँ से मिलती है। 
 
4. आप को अपने काम से संतुष्टि है कोई असुरक्षा का भाव तो नहीं है ?
 
                   बिलकुल भी नहीं , हमारी उम्र में कौन इतना कमा सकता है ? हम अभी आगे की पढाई के लिए जा रहे होते तो अभी पढ़ ही रहे होते।  हम अपने घर का एक मजबूत कन्धा बन चुके हैं और घर वाले भी खुश हैं और हम भी। 
 
                      इनमें से कुछ बच्चे तो कानपूर के आस पास के थे , कुछ लखनऊ , गोण्डा , बलिया, बस्ती  और गोरखपुर के थे। 

नोट :-- ये सारी जानकारी मुझे उन अग्निवीरों से ही प्राप्त हुई है और इससे पहले मैं भी अग्निवीरों के भविष्य के प्रति फैलाई वही भान्तियों का शिकार थी। 
 

रहती थी।  मैंने देखा है घर में दादी से पूछ कर सारे काम होते थे। खेती से मिली नकद राशि  उनके पास ही रहती थी।  लेकिन  उनके सम्मान से पैसे के होने न होने का  कोई सम्बन्ध नहीं था। 

  1 .   वृद्ध माँ  आँखों से भी कम दिखलाई  देता है , अपने पेट में एक बड़े फोड़े होने के कारण एक नीम हकीम डॉक्टर के पास जाकर उसको  ऑपरेट  करवाती है। उस समय  पास कोई अपना नहीं होता बल्कि पड़ोस में रहने वाली  होती है।  वह ही उसको अपने घर दो घंटे लिटा कर रखती है और फिर अपने बेटे के साथ हाथ  कर घर तक छोड़ देती है।

 
2 .   74 वर्षीय माँ घर में झाडू पौंछा करती है क्योंकि बहू के पैरों में दर्द रहता है तो वो नहीं कर सकती है।  उस घर में उनका बेटा , पोता  और पोती 3 सदस्य कमाने वाले हैं   किसी को भी उस महिला के काम करने पर कोई ऐतराज नहीं है।  एक मेट आराम से रखी जा सकती है लेकिन  ?????????? 
 
3.    बूढ़े माँ - बाप को एकलौता बेटा अकेला छोड़ कर दूसरी जगह मकान लेकर रहने लगा क्योंकि पत्नी को उसके माता - पिता पसंद नहीं थे और फिर जायदाद वह सिर पर रख कर तो नहीं ले जायेंगे . मरने पर मिलेगा तो हमीं को फिर क्यों जीते जी अपना जीवन नर्क बनायें। 
 
4 .  पिता अपने बनाये हुए  घर में अकेले रहते हैं क्योंकि माँ का निधन हो चुका है।  तीन बेटे उच्च पदाधिकारी , बेटी डॉक्टर।  एक बेटा उसी शहर में रहता है लेकिन अलग क्योंकि पत्नी को बाबूजी का तानाशाही स्वभाव पसंद नहीं है।  आखिर वह एक राजपत्रित अधिकारी की पत्नी है।

                            आज हम पश्चिमी संस्कृति के  जिस रूप के पीछे  भाग रहे हैं उसमें हम वह नहीं अपना रहे हैं जो हमें अपनाना चाहिए।  अपनी सुख और सुविधा के लिए अपने अनुरूप  बातों को अपना रहे हैं।  आज मैंने  में पढ़ा कि 24 शहरों  में वृद्ध दुर्व्यवहार के लिए मदुरै  सबसे ऊपर है और कानपुर दूसरे नंबर पर है।  कानपुर में हर दूसरा बुजुर्ग अपने ही घर में अत्याचार का  शिकार हैं।  एक गैर सरकारी संगठन  कराये गए सर्वे के अनुसार ये  परिणाम   हैं। 
 
                 हर घर में बुजुर्ग हैं और कुछ लोग तो समाज के डर  से उन्हें घर से बेघर नहीं कर  हैं, लेकिन कुछ  लोग ये भी  कर देते हैं। एक से अधिक संतान वाले बुजुर्गों के लिए अपना कोई घर नहीं होता है बल्कि कुछ दिन इधर  और कुछ दिन  उधर में जीवन गुजरता रहता है।  उस पर भी अगर उनके पास अपनी पेंशन या  संपत्ति है तो बच्चे ये आकलन  करते रहते हैं कि  कहीं दूसरे को तो  ज्यादा नहीं दिया है और अगर ऐसा है तो  उनका जीना दूभर कर देते हैं।  उनके प्रति अपशब्द , गालियाँ या कटाक्ष आम बात मानी जा सकती है। कहीं कहीं तो उनको मार पीट का शिकार भी होना पड़ता है। 
                      इसके कारणों को देखने की कोशिश की तो पाया कि  आर्थिक तौर पर बच्चों पर  निर्भर माता - पिता अधिक उत्पीड़ित होते हैं।  इसका सीधा सा कारण है कि उस समय के अनुसार आय बहुत अधिक नहीं होती थी और बच्चे 2 - 3 या फिर 3 से भी अधिक होते थे। अपनी  आय में अपने माता - पिता के साथ अपने बच्चों के भरण पोषण  में सब कुछ खर्च  देते थे।  खुद के लिए कुछ भी नहीं रखते थे।  घर में सुविधाओं की ओर भी ध्यान  देने का समय उनके पास नहीं होता था।  बच्चों की स्कूल यूनिफार्म के अतिरिक्त दो चार जोड़ कपडे ही हुआ करते थे।  किसी तरह से खर्च पूरा करते थे ,  पत्नी के लिए जेवर  और कपड़े बाद की बात होती थी।  घर में कोई नौकर या मेट नहीं हुआ करते थे, सारे  काम गृहिणी ही देखती थी। सरकारी नौकरी भी थी तो  बहुत कम पेंशन  मिल रही है और वह भी बच्चों को सौंपनी पड़ती है।  कुछ बुजुर्ग रिटायर्ड होने के बाद पैसे मकान  बनवाने में लगा देते हैं। बेटों में बराबर बराबर बाँट दिया।  फिर खुद एक एक पैसे के लिए मुहताज होते हैं और जरूरत पर माँगने पर बेइज्जत किये जाते हैं। 
                      आज जब कि  बच्चों की आय कई कई गुना बढ़ गयी है ( भले ही इस जगह तक पहुँचाने के लिए पिता ने अपना कुछ भी अर्पित  किया हो ) और ये उनकी पत्नी की मेहरबानी मानी जाती है।
-- आप के पास था क्या ? सब कुछ  हमने जुटाया है। 
-- अपने जिन्दगी भर सिर्फ  खाने और खिलाने में उडा  दिया।  
-- इतने बच्चे पैदा करने की जरूरत  क्या थी ? 
-- हम अपने बच्चों की जरूरतें पूरी  करें या फिर आपको देखें।
-- इनको तो सिर्फ दिन भर खाने को चाहिए , कहाँ से आएगा इतना ?
-- कुछ तो अपने बुढ़ापे के लिए सोचा होता , खाने , कपड़े से लेकर दवा दारू तक का खर्च हम कहाँ से पूरा करें ? 
-- बेटियां आ जायेंगी तो बीमार नहीं होती नहीं तो बीमार ही बनी रहती हैं।
-- पता नहीं कब तक हमारा खून पियेंगे  ये , शायद  हमें खा कर ही मरेंगे।  
                          
              अधिकतर घरों में अगर बेटियां हैं तो बहुओं को उनका आना जाना फूटी आँखों नहीं  सुहाता है। अपनी माँ - बाप  से मिलने आने के लिए भी उनको सोचना पड़ता है। 
                   बुजुर्गों का शिथिल  होता हुआ शरीर भी उनके लिए एक समस्या बन जाता है।  अगर वे उनके चार काम करने में सहायक हों तो बहुत  अच्छा,  नहीं तो पड़े रोटियां  तोड़ना उनके लिए राम नाम की तरह होता है।  जिसे बहू और बेटा  दुहराते रहते हैं।  अब जीवन स्तर बढ़ने के साथ साथ जरूरतें इतनी बढ़ चुकी हैं कि उनके बेटे पूरा नहीं कर पा  रहे हैं।  घर से बाहर  की सारी  खीज घर में अगर पत्नी पर तो उतर नहीं सकती है तो माँ -बाप मिलते हैं तो किसी न किसी  रूप में वह कुंठा उन पर ही उतर जाती है। 
 
                     वे फिर भी चुपचाप सब कुछ सहते रहते हैं , अपने ऊपर हो रहे दुर्व्यवहार की बात किसी से कम ही  उजागर करते हैं क्योंकि कहते हैं - "चाहे जो पैर उघाड़ो इज्जत तो अपनी ही जायेगी न।" फिर कहने से क्या  फायदा ? बल्कि कहने से अगर ये बात उनके पास तक पहुँच गयी तो स्थिति और बदतर हो जायेगी . हम चुपचाप सब सह लेते हैं कि घर में शांति बनी रहे।  ज्यादातर घरों में बहुओं की कहर अधिक होता है और फिर शाम को बेटे के घर आने पर कान भरने की दिनचर्या से माँ बाप के लिए और भी जीना दूभर कर देता है।  पता  नहीं क्यों बेटों की अपने दिमाग का इस्तेमाल करने की आदत क्यों ख़त्म हो चुकी है ? 
 
                       माता-पिता को बीमार होने  पर दिखाने  के लिए उनके पास छुट्टी नहीं होती है और वहीं पत्नी के लिए छुट्टी भी ली जाती है और फिर खाना भी बाहर से ही खा कर  आते हैं।  अगर घर में  रहने वाले को बनाना आता है तो बना कर खा ले नहीं तो भूखा पड़ा रहे  वह तो बीमार होती है।
 
                     हमारी संवेदनाएं कहाँ  गयीं हैं या फिर बिलकुल मर चुकी हैं।  कह नहीं सकती हूँ , लेकिन इतना तो है कि हमारी संस्कृति पूरी तरह से पश्चिमी संस्कृति हॉवी हो चुकी है। रिश्ते ढोए जा रहे हैं।  वे भी रहना नहीं चाहते हैं लेकिन उनकी मजबूरी है कि  उनके लिए कोई ठिकाना नहीं है। 
 
                    आज वृद्धाश्रम इसका विकल्प बनते जा रहे हैं लेकिन क्या हर वृद्ध वहाँ  इसलिए है क्योंकि वे अपने बच्चों के बोझ बन चुके हैं। हमें उनके ह्रदय में अपने बड़ों के लिए संवेदनशीलता रखें और अब तो बुज़ुर्गों के प्रति दुर्व्यवहार करने वालों के लिए दण्ड का प्राविधान हो चूका है लेकिन वयोवृद्ध बहुत मजबूर होकर ही क़ानून की शरण लेते हैं।                     
 
                      * सारे  मामले मेरे अपने देखे हुए हैं।

 वर्क फ्रॉम होम : सुखद या दुखद !


                                   आईटी  कंपनी के लिए वर्क फ्रॉम होम एक अच्छा विकल्प था कि कर्मचारी को कभी आपात काल में घर में बैठ कर काम करने की सुविधा प्राप्त थी और वह इससे कुछ आराम भी महसूस कर सकता था। ये व्यवस्था हर कंपनी में थी  और  करीब करीब  सबको दी जा रही थी और कर्मचारी ले  रहे थे।  लेकिन हद से ज्यादा कोई  सुविधा भी अवसर की जगह गले की फांस बन जाती है। 

              कोरोना की दृष्टि से वर्क फ्रॉम होम एक सुरक्षित और सहज तरीका है , जिससे कार्य भी होता रहे और उनके कर्मचारी सुरक्षित भी रहें।  अब वर्क फ्रॉम होम करते करते लोगों के लिए एक वर्ष पूर्ण होने जा रहा है और कंपनी के काम तो सुचारु रूप से चल रहा है लेकिन उसके कर्मचारियों के लिए एक गले की फाँस बन चुका है। ऑफिस के कार्य करने के वातावरण में और घर के वातावरण में अंतर होता है। अब जब कि बच्चे भी घर में ही अपनी पढाई  कर रहे हैं और  पत्नी भी कामकाजी है तो वह भी अपने काम को किसी न किसी तरीके से सामंजस्य स्थापित करके जारी रख रही है।  

                   बच्चों के लिए स्कूल का वातावरण और घर में रहकर पढाई करने से सबके समय का तारतम्य बैठ नहीं  पाता है।  बच्चे अगर छोटे हैं तो माँ उन्हें साथ लेकर उनकी पढाई करवानी होती है।  ऐसे समय में जब कि न सहायिकाएं बुलाई जा रही हैं और न कोई और साथ दे सकता है तब ये वर्क फ्रॉम होम भी गले की फाँस ही  बना है।  एक गृहणी घर , काम और बच्चे सब का  सामान्य दिनों में प्रबंधन कर लेती हे लेकिन जब सारी जिम्मेदारियां  एक साथ आ खड़ी हों तो पति , अपना और बच्चे की पढाई सामान्यतया  संभव नहीं है।  परिणाम ये होता है कि पति का काम समय से पूरा न हो तो वह भी इसकी जिम्मेदारी परिवार पर ही डालता है , पत्नी भी यही सोचती है लेकिन वह  ही  क्यों खट रही है , क्योंकि हर हाल में सब को सही वातावरण देकर स्वयं को अधिक काम के बोझ तले दबा हुआ देख कर वह अपनी झुंझलाहट किस पर उतार सकती है , बच्चों पर , पति पर न।  इसके बाद घर का वातावरण तनाव पूर्ण ही बन जाता है।  फिर सब एक दूसरे के ऊपर आरोप प्रत्यारोप लगाने लगते हैं। 

                     स्थितियाँ इसके विपरीत भी बन रही हैं , अगर पति किसी व्यवसाय में है और पत्नी अन्य तरीके से कार्यरत है तो इसमें पति अवसाद का शिकार हो रहा है क्योंकि व्यवसाय लगभग बंद रहे हैं या फिर निश्चित समय  के लिए ही खुल पा रहे हैं।  अगर वह समझदार है तो वह पत्नी के  कार्यों में सहभागिता करके परिवार को एक अलग ही वातावरण दे रहा है और समझदारी भी यही है। लेकिन जरूरी नहीं है कि वह जो चाहता है वह कर सके क्योंकि हर जगह की  अलग कार्य शैली होती है। स्कूल में कार्य करने का समय अलग होता है , सरकारी कार्यालयों में अलग और आईटी कंपनियों में अलग होता है।  

                       इसमें सबसे अधिक होता है कंपनियों की कार्य  शैली में अंतर।  मीटिंग्स और कार्य का कोई समय नहीं होता है क्योंकि आपका मैनेजर या फिर बॉस कभी भी मीटिंग रख लेता है और वर्क फ्रॉम होम में कभी भी  करके आया काम सौप सकता है।  अपने सम्पर्क में आये  कई परिवारों के बच्चों के बारे में सुना है कि अब तो न कोई खाने का समय और न ही सोने का  , हर समय लैपटॉप पर बैठे काम  ही किया करते हैं।  कभी कभी तो  ३ बने तक भी काम होता रहता है।  इससे कर्मचारी के ऊपर कितना दबाव बढ़ जाता है।  ऐसे  कठिन समय ें में जब कि कंपनियों में भी काम करने वालों को निकला जा रहा है, अपनी नौकरी बचने के लिए कर्मचारी हर शर्त और हर हाल में काम करने के लिए मजबूर है। कितने घंटे काम के होते हैं इसकी कोई भी सीमा नहीं होती है। 

                      इससे पहले  कर्मचारी का एक निश्चित कार्यक्रम होता था कि उसको इतने बजे ऑफिस में रिपोर्ट करना है और  इतने बजे निकलना है।  इसके बाद वह अपने परिवार के लिए समर्पित होता था। अब स्थितियां उसके लिए अपने अनुसार नहीं चल रही हैं। कंपनी का पूरा काम हो रहा है, कर्मचारियों को दी जाने वाली यातायात सुविधा की   है लिहाजा उसके चालक या तो बेकार हो चुके हैं या फिर उसके मालिक को नुक्सान हो रहा है।  ऑफिस के रख रखाव का पूरा पूरा व्यय अब उनके लिए बचत ही हो चुकी है।  लेकिन वहीँ कर्मचारी के लिए सारे दिन वाई फाई का लोड और कई सारे व्यय बढ़ चुके हैं। 

                     कंपनी का नजरिया भी कई तरह से ठीक है वह अपने कर्मचारियों की सुरक्षा को देखते हुए ये सुविधा प्रदान कर रही है  और जो बच्चे माँ-बाप से दूर शहरों में काम कर रहे हैं , उन्हें घर आकर एक मुद्दत बाद  उनके साथ रहने का मौका मिल रहा है।  घर में बंद  बच्चों को अपनों का साथ मिल रहा है और माँ-बाप को आंतरिक ख़ुशी भी मिल रही है।   हर सुविधा के दो पहलू होते हैं सुखद और दुखद - ये हमारे ऊपर निर्भर करता है कि उसको हम अवसर के अनुकूल किस  दृष्टि से देख रहे हैं।



                   


                                  

कोई टिप्पणी नहीं: