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बुधवार, 29 अप्रैल 2026

हार्ट अटैक - एक साइलेंट किलर !

                                      हार्ट अटैक - एक साइलेंट किलर !

                आजकल रोज ही सुनने को मिल रहा है कि हार्ट अटैक से अचानक मौत! इसके लिए कोई उम्र अब रह नहीं गयी है। वरिष्ठ नागरिक ही नहीं बल्कि युवा और बच्चे भी इसका शिकार हो रहे हैं। कोई कारण समझ नहीं आ रहा है तो फिर हम उठाकर ठीकरा फोड़ ही देते हैं कि ये कोरोना वैक्सीन का दुष्परिणाम है। हर तरफ एक ही आरोप सुनाई देता है लेकिन उन बच्चों का क्या जो  8-12 साल की उम्र में अचानक स्कूल या घर में बेहोश होते हैं और उसके बाद सब ख़त्म - बाद में पता चलता है कि हार्ट फ़ेल या फिर हार्ट अटैक।  इन बच्चों को तो वह वैक्सीन भी नहीं लगाई गयी थी फिर? इस ओर न कोई सोचने का प्रयास करता है और न इसके विषय में कोई भी शोध करना चाहता है। सबसे आसान काम दूसरे के ऊपर दोषारोपण। 

                   ऐसा नहीं कि ये वैक्सीन का दुष्परिणाम नहीं हो सकता है लेकिन उस समय हम इसलिए वैक्सीन के पीछे पागल थे क्योंकि उस समय कोरोना की विभीषिका से बचने के यही एक विकल्प सामने था, यद्यपि इसके बाद भी लोग कोरोना के शिकार हुए और काल कवलित भी हुए लेकिन बचाव का जो साधन सामने था वही हम सबने पकड़ा था। अब ये बात भी कही जाने लगी है कि बूस्टर डोज की विपरीत प्रतिक्रिया के विषय में शायद आगाह भी किया गया था फिर भी उस समय स्वयं को सुरक्षित करने का बेहतर विकल्प खोजा गया था और सबने उसको चुना। ऐसा नहीं कि लोगों को घर से पकड़ पकड़ कर वैक्सीन दिया गया हो लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से जो उसे समय संभव था वह किया गया था। 

        खानपान की विसंगति :--   

                 ये हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि  हम सबसे पहले दोष दूसरे पर मढ़ने की कोशिश करते हैं। स्वयं को कभी भी दोषी नहीं मानते हैं और होना भी चाहिए, ये तो मानव मन की प्रवृत्ति है। हम अगर अपने खान-पान की  आदतों पर नजर डालें तो हमारे सामने यह बचाव होता है कि ये तो चलता ही है लेकिन उसकी गहराई तक जाने का समय किसके पास है? बच्चों को फ़ास्ट फ़ूड चाहिए ही होता है और कामकाजी माँ-बाप भी बच्चों को खुश करने के लिए इससे ऐतराज भी नहीं करते हैं। समय-समय पर इसमें  मिलावट के बारे में समाचार आते रहते हैं लेकिन जरूरी नहीं कि वह सबकी नज़रों से गुजरे ही। मानकों को ध्यान में रखते हुए बड़ी नामी कंपनी गुणवत्ता का भले ही ध्यान रखती हो, लेकिन उनकी आड़ में कितनी छद्म नाम से कंपनी मिलावटी और प्रतिबंधित सामग्री उपयोग करके स्नैक्स तैयार करके बाज़ार में बेच रही हैं। निम्नवर्गीय परिवार के बच्चे भी इन चीजों को खाने के लालायित होते हैं और उनके माँ-बाप भी अपनी पहुँच में पाकर खरीद देते हैं। 

                 ये तो छोटे स्तर पर चल रहा है, दैनिक जीवन के हर चीज अगर कहीं पर शुद्ध मिल रही है तो उससे अधिक मिलावटी चीजें तैयार हो रही हैं। आटा, दाल, चावल, मसाले, तेल, घी, दूध-दही, सब्जी और फल तक मिलावटी आ रही हैं। केमिकल और अखाद्य पदार्थों को मिलाकर निर्माण और सेवन से कोई भी सुरक्षित नहीं है। इस धीमे जहर का प्रभाव शरीर पर धीरे-धीरे असर करता है और शरीर के अंग अपने सामान्य रूप से काम करना बंद कर देते हैं। तभी तो 8-9 साल की उम्र के बच्चों को हार्ट फेल की घटनायें सामने आ रहीं हैं। युवा लोगों को भी हार्ट फेल या हार्ट अटैक में जीवन खोना पड़ रहा है। 

               फिर जिम्मेदार कौन? 

                                  ऐसी घटनाओं के लिए हम किसको जिम्मेदार ठहरा सकते हैं। डॉक्टर तक इसके लिए किसी को जिम्मेदार नहीं ठहरा पा रहे है। मुझे कोई भी संकोच नहीं कि जो मैं पढ़ती और सुनती आ रही हूँ कि जबसे कोरोना की वैक्सीन लगी है युवा लोगों को हार्ट अटैक आने लगा है। पचास से साठ की उम्र वाले शायद इससे सुरक्षित हैं क्यों? कभी सोचा है इस बारे में शायद नहीं। आज की जीवनशैली, खानपान और कार्य के घंटे और लगातार लैपटॉप, मोबाइल या अन्य गजैट्स के संपर्क में रहना भी शरीर और मष्तिष्क को प्रभावित करता है।  शरीर भी एक मशीन की तरह काम करता है और उसको आराम, विराम और शांति की जरूरत होती है लेकिन नहीं मल्टीनेशनल कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को मशीनों से ज्यादा मशीन बना रखा है, उनके पास न खाने का समय, न  सोने का समय और न ही रिलेक्स होने का समय। इन सबका प्रभाव कहाँ जाता है?  युवाओं के जीवन को लील रहा है। 

               बच्चों के लिए जिम्मेदार !

              कम उम्र में ही बच्चों को थाइराइड, शुगर, पाचन प्रणाली की समस्याएं आजकल रोज की बात हो चुकी है। बच्चों को टाइप टू डाइबिटीज के पीछे क्या है ? यही मिलावटी खानपान, गर्भवती महिलायें जो खाती हैं, वह तो गर्भस्थ शिशु ग्रहण करता है। तभी उसको जन्म से ही कुछ समस्याएं होने लगती हैं। छोटे छोटे बच्चों को भी डॉक्टर स्ट्रॉयड देने में संकोच नहीं करते। इसके दुष्प्रभाव को वह भी जानते हैं और फिर भी  वे प्रयोग पर प्रयोग करते रहते हैं। बच्चों पर ही क्यों बड़ों पर भी किया करते हैं। हाँ हम आराम मिलने पर हम भी डॉक्टर के गुण गाने लगते हैं कि इतने दिनों से परेशान थे इस दवा से ठीक हो गया। हम उसे दवा के बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं।  

           स्वास्थ्य के प्रति सजगता !  

            पचास साल पहले ये आम बात थी कि लोग बीमार ही नहीं होते थे या कहें तब जल, वायु, और आहार में शुद्धता थी। शारीरिक श्रम से एक स्वस्थ और शांतिपूर्ण जीवन था।  जब गाँव उठकर शहर की और प्रस्थान कर गया और गाँवों में विकास के नाम पर खेत बेच दिए गए या फिर सरकार द्वारा उनको हाइवे के लिए अग्रहारित कर ली गयी तो वह सब कुछ समाप्त हो गया। शहर की हवा गाँवों में पहुँची और वहाँ की भी हवा जहरीली हो गयी। आज की पीढ़ी उसी में पैदा हुई और उसी में पल रही है तो उसकी शुद्धता भी संदिग्ध हो गयी। प्रदूषण और मिलावट की गम्भीरता को देखते हुए शारीरिक व्याधियाँ जल्दी सिर उठाने लगती हैं तो इस दृष्टि से 35 वर्ष की आयु के बाद रुटीन चेकअप करवाते रहना चाहिए ताकि अगर कुछ शारीरिक कमियाँ आरंभ हो रही हों तो उनका समय से उपचार हो सके या फिर उनके अनुसार खानपान में सावधानी बरती जा सके।   

            सच कहें तो साइलेंट किलर के पीछे कई और भी कारक होते हैं , जिनके असंतुलन से भी कुछ व्याधियाँ प्रकट होने लगती हैं।  

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