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रविवार, 20 फ़रवरी 2022

संत ऐसे ऐसे !

 संत ऐसे ऐसे !

 

                             रविदास जयंती के दिन हमने उन महान संत  की महानता को याद कर रहे थे और वह ' वाला मन चंगा तो कठौती में गंगा' वाला प्रसंग आया था तो मुझे अपने गुरु का एक प्रसंग याद आ गया और वे कोई बड़े भगवाधारी या साधु संतों के वेश वाले इंसान न थे। वे मेरे फूफाजी थे और मेरा जन्म उनके  सामने हुआ था।मेरी बुआ भी मुझे बहुत प्यार करती हैं और फूफाजी भी करते थे। 

                             वे मेरे आध्यात्मिक गुरु हुए और उन्होंने मुझे सब कुछ सिखाया और बताया।  जो जीवन का सत्य है और अपने को उसमें लिप्त न होने देने का मार्ग। वे एक साधारण गृहस्थ और एक इंटर कॉलेज में प्रवक्ता थे। ज्ञान और आध्यात्मिक शक्तियों से  सम्पन्न थे। कोई भीड़ नहीं सिर्फ अपने घर वालों या फिर बहुत घनिष्ठ लोगों तक उनकी दुनियां थी। 

                              अंशुमाला जी के कहने पर बस एक छोटी से घटना उद्धृत कर रही हूँ।  उनको मेरे अलावा मेरे भाई साहब से भी बड़ा स्नेह थे।  भाईसाहब के एक मित्र जो कानपुर में ही रहते हैं , बहुत परेशान रहते थे , भाईसाहब उन्हें फूफाजी के पास ले गये । वह आँखें बंद करके लेटे थे , जैसे ही दोनों पहुँचे वे बोले - "दोस्त अब तक कहाँ थे? बहुत दिनों से इंतजार था तुम्हारा।"

                बाद में आँखें खोली । फिर उनका एक सहारा बन गये फूफाजी घंटों उनके पास बैठते। एक दिन बहुत परेशान आये । बैठे बात करते रहे , जब चलने लगे तो फूफाजी ने कहा - "आदित्य मेरी डायरी उठाओ, उसको खोलो और जो रखा है उठा लो, एक बार और खोलो और उसमें रखा भी  ले लो और डायरी बंद करके रख दो । इतना काफी है न।" 

"जी।"

            बताती चलूँ इस घटना का काल  1995 से पहले का था ।

              

गुरुवार, 20 जनवरी 2022

कुलदीपक !

                भारतीय समाज की यह त्रासदी आज भी बनी हुई है कि एक बेटा हो बुढ़ापे का सहारा, बाप की नाम उजागर करने वाला। अब भी कुछ ऐसे वाकये अचानक आ कर खड़े हो जाते हैं कि सिर पीटने का मन करता है।

              मेरी सहायिका सुबह आठ बजे आती है तो मैं गेट का ताला उससे पहले खोल देती हूँ। आज किसी ने गेट खटखटाया तो मैंने कहा - "खुला है।"

           फिर खटखटाया तो मैं गेट की तरफ गई, एक इंसान खड़ा था , कुछ पहचानी शक्ल लगी , इससे पहले कि पहचान पाती वह बोला - "आँटी पहले मैं यहीं आपके पड़ोस में रहता था, मेरे पिताजी नहीं रहे, कुछ पैसों से मदद कर दीजिए।"  

              मैं जवान और स्वस्थ लोगों को भीख नहीं देती , सो मैंने उसे आगे जाने को कहा। मुझे उसकी शक्ल याद आ गई । उसका परिवार मेरे घर से दो तीन घर छोड़कर रहता था और वे लोग मुझसे पहले से रहते थे। तीन बहनों के बाद ये बेटा था और दादी का बेहद दुलारा। 

            बाबाजी फ्लैक्स कंपनी में काम करते थे। रिटायरमेंट के बाद यही छोटा सा मकान बनवा कर बहू बेटे परिवार सहित रहने लगे। अपने रहते दो पोतियों की शादी कर दी। बेटा चल बसा तो बहू ने एक स्कूल में आया की नौकरी कर ली।

              पोता बड़ा होने के साथ साथ बिगड़ता जा रहा था । दादा की आँखें बंद होने के बाद दादी से पैसे लेकर पान मसाला, सिगरेट बहुत कम उम्र में सेवन करने लगा । पहले अच्छी तरह फिर मार पीट कर छीन ले जाता। 

               कुछ लालची लोगों की नजर उसके घर पर लगी थी । उसे उधार देने लगे। सामान और पैसा सब कुछ,  बदले में उसके घर से सामान मँगवा लेते। उसने सारा सामान बेच दिया । भूखों मरने की नौबत आ गई। दबंगों ने उधार देना शुरू किया और मकान पर कब्जा कर लिया।

              फिर कहाँ गये ? मुझे पता नहीं लेकिन कुछ खबर मिलती रहती। दादी भी गुजर गई।

              इसके बाप को गुजरे हुए करीब बीस साल हो चके हैं और आज अपने नशे के लिए पिता के नाम पर भीख माँग रहा था। नाम ही तो चला रहा है ।

शनिवार, 8 जनवरी 2022

तुलना करें सोच समझ कर !

                                     हम जीवन में बेटों को दोष देते हैं कि वह  पत्नी और बच्चों पर अधिक ध्यान देते हैं।  ऐसा है भी कहीं बेटे अपने माता पिता के प्रति  गैर जिम्मेदार भी होते हैं लेकिन वहां पर माता पिता उनकी आलोचना करने में संकोच भी करते हैं लेकिन  जब बेटा पूरा पूरा ध्यान भी दे रहा हो और उन पर कटाक्ष भी किया जाय तो हमारी मानसिकता का दोष है।  ऐसे ही कल हमारे सामने और साथ ही वाकया आ गया तो लगा की हम अगर संतुष्ट नहीं हैं तो दोष खोज ही लेते हैं।

                                  मेरी पड़ोसन मुझसे उम्र में काफी बड़ी हैं , उनके एक बेटा , बहू और किशोर हो रहे पोता और पोती भी हैं.  बेटा अपना काम कर रहा है और उसका जीवन भाग दौड़ भरा होने पर भी माता पिता को अपनी पत्नी और बच्चों से अधिक परवाह करता है।  मैं खुद इस बात की साक्षी हूँ।  कल मैं वहीँ बैठी थी तो बेटी ने ऑनलाइन आर्डर करके कुछ सामान अपने पापा के लिए भेजी थी।  मैं उसको रिसीव  करने के लिए आई।  जब वापस गयी तो उन्हें बताया कि सोनू  ने पापा के लिए स्पोर्ट शूज़ भेजे हैं।  सुनते ही वह तुरंत बोली - 'ये लड़की हैं न इसलिए अगर इसकी जगह बेटा होता तो सोचता की इतने पैसे अपनी पत्नी और बच्चों पर खर्च करेगा।  माँ बाप पर इतने पैसे खर्च क्यों किये जाएँ ? '
                                उस समय उनके बेटा और बहू वहीँ बैठे थे।  मैंने उनके  इस कथन का दर्द  उनके बच्चों  के चेहरे पर साफ देखा।  फिर मुझे लगा कि उन्हें कैसे इससे उबर जाय ? मैंने उनकी माँ  से कहा - देखिये सोनू  खुद जॉब कर रही है और उसका हस्बैंड भी।  अभी उनके ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं है।  दोनों इस तरह का काम करने में कुछ सोचने की जरूरत नहीं समझते।  अगर बेटा अकेला कमाने वाला हो और पूरे घर की जिम्मेदारी उठा रहा हो तो उसको पहले अपनी जिम्मेदारियों का क्रम तय करना होता है क्योंकि सब  उसके लिए जरूरी होता है।  अगर बेटी भी जिम्मेदारियों में फँसी होती है तो पहले उसे अपने परिवार को देखना होगा। फिर एक कमाने वाला हो तो  सीमायें निश्चित होती हैं और दोनों के कमाने और फिर आमदनी के हिसाब से इंसान व्यय  करता है।
                            फिर मुझे लगा की कुछ लोग कभी खुश नहीं होते चाहे उनके लिए कोई कोई जान ही न्योछावर क्यों न दे ? अगर इंसान को संतुष्ट होने का गुण हो और वह अपने से नीचे झुक कर देखे तो ज्ञात होता है कि और भी लोग हैं जो उनसे अधिक दुखी है तो सदैव अपने में संतुष्टि प्राप्त करेगा.

शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2021

गिरगिट !

                                               कमला बड़बड़ाती  हुई घर में घुसी और तेजी से काम करने में जुट गयी लेकिन उसका बड़बड़ाना  बंद नहीं था। 

"अरे कमला क्या हुआ ? क्यों गुस्सा में हो?"

"कुछ नहीं दीदी, मैं तो छिपकली और गिरगिट से परेशान हूँ। "

"ये कहाँ से आ गए ?"

" ये तो मेरे घर में हमेशा से थे, मैं अपने कमरे में बात करूँ तो ननद हर वक्त कान लगाए रहती है और घर से वह कहीं चली जाए तो ससुर का रंग दूसरा होता है और उसके होने पर दूसरा।"

"सही है न, काम निकलना चाहिए। "

"आप भी न , उनकी ही बता सही बताएंगी। "

"देख ये छिपकली तेरे ही घर में नहीं है , हर घर में होती हैं।  बड़े घरों में बड़े घर जैसी और छोटे में छोटे जैसी। "

"और गिरगिट ?"

"वो भी तो होते हैं , वक्त पर गधे को भी बाप बनाने वाले ऐसे ही होते हैं।" निशा ने बात बढ़ाना उचित न समझा। 

लेकिन वह अपने ही अतीत में खो गयी  - 

                          उसकी जिठानी पढ़ी लिखी होने के बाद भी किसी का फ़ोन आये या कोई मायके से आ जाय तो दरवाजे के बाहर ओट में , या फिर कमरे के आस पास ही मंडराती रहती थी।  बच्चों के आने पर भी क्या बात हो रही है ? फ़ोन आने पर भी किससे क्या बात हो रही है,  उसकी बुराइयां तो नहीं की जा रही हैं।  कई लोगों ने बताया भी लेकिन उससे क्या फायदा ? कभी न टोका और न सवाल किया कि इस तरह से बातेन क्यों सुनती हो ?

                         और जेठ तो उनके भी दो कदम आगे , संयुक्त परिवार और पैतृक मकान के चलते रहना तो वहीँ था और तब घर भी ऐसे ही बने होते थे. एक महिला अगर घर से गयी तो दूसरी सबके लिए रसोई और  सारे काम करने के लिए होती ही थी।  वह भी इस घर में भी था।  निशा की जिठानी बाहर गयीं और फिर जेठ जी गिरगिट की तरह से रंग बदल लेते चाहे घर के बच्चों हों या फिर वह स्वयं।  जेठ जी की वाणी में चाशनी टपकने लगती।  बड़े मधुर शब्दों में बोलने लगते।  'आप' के नीचे बात न होती और जेठानी के आते ही वह एक शुष्क  इंसान की तरह व्यवहार करते और व्यंग्यबाण चलने लगते।  उनकी इच्छा होती कि उनकी पत्नी किसी  के पास न बैठे और बात न करे।  खुद भी नहीं करता था। 

                                      ये रोग तो बड़े घरों में या इन काम वालों सब जगह पाया जाता है।

"

"

शनिवार, 31 जुलाई 2021

अपनी अपनी किस्मत !

    मेरी यह बहुत ही बुरी आदत है कि मैं अपने उम्र वालों के साथ ही नहीं बल्कि अपने से बड़ों और छोटों के साथ भी उतनी ही घुली मिली रहती हूँ कि वे अपनी समस्याएं और तकलीफें बयां कर देते है।
                              ऐसी ही घटना  दिनों सामने आई की इंसान के जीवन में कभी कभी इंसान से जानवर अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। वैसे तो ये आम बात है कि  बड़े घरों में कुत्ते नौकरों से बेहतर जीवन जीते हैं।   वह बड़े घरों की बाते हैं लेकिन ये बात अब हमें अपने  मध्यम वर्गीय परिवारों में  भी देखने को मिलने लगी है। माताजी के घर में उनका बेटा और बहू  और एक कुत्ता है। उनके दोनों बच्चे बाहर  रहते हैं सो वह कुत्ता ही उनके लिए बेटा बन चुका  है। पत्नी के मायके में शादी थी सो वह पति पत्नी ससुराल चले गए . घर में माँ  और कुत्ता बचा . बहू रानी सास के लिए तीन दिन के लिए रोटियां कैसरोल में सेंक कर रख गयीं क्योंकि उनको कुछ कम दिखलाई देता है और सब्जी भी बना कर फ्रिज  में  रख गयी लेकिन कुत्ते के लिए काम करने वाली से कह कर गयी कि  ये गरम रोटी ही खाता है सो जब वह काम करने आये तो इसको गरम रोटी बना कर खिला दे और सास से कह दिया कि  जब इसका दूध का बरतन खाली  हो जाए तो उसमें दूध भर दिया करें .  इस घर में सास को एक कप दूध नसीब नहीं है और कुत्ते के लिए 1 किलो   दूध आता है . पति प्राइवेट नौकरी में थे फंड मिला  था बच्चे के लिए घर बनवा दिया और पत्नी के लिए जो कुछ छोड़ा था वह बेटे ने समय समय पर निकाल  लिया ।
                एकांत पाकर माताजी ने दिल और मुंह दोनों खोल कर हलके होना चाहा क्योंकि उनकी उम्र के लोग अब कम ही बचे हैं सो वह किसके पास जाएँ और कहाँ जाकर बैठें सो अपने कमरे में चुपचाप लेटी  रहती हैं। आँखें कमजोर हैं तो टीवी भी नहीं देख पाती। कई कई दिन हो जाते हैं - बगैर किसी से बात किये। बहू बेटा अपने कमरे में उस कुत्ते के साथ बातें करते रहते हैं . जितना समय वह कुत्ते के साथ गुजरते हैं उसका अगर एक  प्रतिशत भी उनके  पास बैठ कर गुजारें  तो उनको भी लगे कि  वह इसी घर का सदस्य हैं।

सवा महीना !

 सवा महीना !


        इस त्रासदी के कठिन काल ने सबकी सोच बदल दी लेकिन वे नहीं बदले जो खुद इसे झेल चुके हों । रीना का बेटा कोरोना में चल बसा । उस कठिन  काल में भी उर्मिला बराबर आकर काम करती रही । जबकि और काम वालियों ने उसे जाने से मना भी किया था ।

  "दीदी मैं नहीं मानती , ये भाग्य का खेल है। कोई मनहूस नहीं हो जाता। इसमें बहू का क्या दोष ।"

       भाग्य ने उसके साथ भी खेल कर दिया , उसका पति कोरोना में  चल बसा । तीन लड़कियाँ है , कमाने वाला तो गया । सवाल रोजी पर भी आ गया । किसी तरह सवा महीना गुजारा । ये अंधविश्वास हमारे समाज में सदियों से पलता चला आ रहा है कि  हाल में हुई विधवा का मुँह देखना अशुभ माना जाता है ।

         पेट नहीं मानता , जमा पूँजी इलाज में लगा दी । काम अब कैसे करने जाय ? कोई बुलाए तब न । 

         उसने फोन किया - "दीदी बहू की जचगी हो गई होगी, अब खाना बनाने आने लगूँ ।"

    "न न अभी न आ , अभी तो सवा महीना भी न हुआ होगा ।"

   " हो गया दीदी , घर में बैठकर खाऊँगी क्या ?

     " अभी न आओ, दीपा भी अपना बच्चा लेकर आ रही है ....।"

           "बहूरानी से न कोई परहेज है , हमसे परहेज कर रही हैं ।"

"उसे मैंने जब तक दीपा रहेगी मायके भेज दिया है ।" 

"क्या ?"  उर्मिला मुँह खुला रह गया।

सोमवार, 19 जुलाई 2021

एक अनमोल भाव!

 घर में कैद करके रख.दिया इस कोरोना न । यही एक भाई ऐसा था जो चक्कर लगा ही जाता । 

        उस दिन रति ने उसे बहुत डाँटा - "क्यों निकलते हो बाहर धूप में , घर में नहीं रहा जाता ।"

    "क्या करूँ सबकी खोज खबर रखनी पड़ती है ।" कहते हुए बेफिक्री से हँस दिया ।

" इस समय जैसे तुमने ही सारा ठेका ले रखा है । इतनी तेज धूप पड़ रही है , ऊपर से बाइक से चलना ।"

"चिंता मत करो बड़ी कड़ी जान हूँ , मुझे कुछ नहीं होनेवाला ।"

           बस उससे रति की वही आखिरी मुलाकात थी । उसी दिन घर पहुँचकर  उसे बुखार हुआ । फिर टेस्टिंग में पॉजिटिव निकला और कोरोना की जद्दोजेहद शुरू ।

      बस चार दिन-  अस्पताल में एडमिट होना , ऑक्सीजन की कमी, आईसीयू और फिर वेंटीलेटर पर जाना और रात भतीजे का फोन आना - "बुआ पापा नहीं रहे।"

           आधी रात वह बैठी रोती रही , उसके बाद मिलना ही न हो सका । शाम तक सब खत्म ।

            भाभी से मुलाकात भी चार महीने पहले भतीजे की शादी में हुई थी , उसका वही खिलखिलाता चेहरा सामने घूमता है। अब फोन करके वह क्या समझाये? खुद धैर्य नहीं रख पा रही थी तो जिसकी दुनिया ही उजड़ गई हो ?

              अचानक आज कॉल आई, नाम भाई का ही आया , एकदम धक से रह गई । दूसरी तरफ भाभी थी । रति तो हैलो कहते ही रो पड़ी । दूसरी तरफ से आवाज आने लगी - "दीदी रोओ मत , आपका भाई गया है न , भाभी अभी जिंदा है । उनके जितना तो नहीं कर पाऊँगी, लेकिन आपका मायका तो रहेगा सदा ।"

              रति भाभी के धैर्य और प्यार से कही बात को सुनकर फफक फफक कर रो पड़ी।