ये टास्क ऐसा है , जो हमारे आचार-विचारों की एक छवि तो प्रस्तुत कर ही रहा है। मैं अपने इस कार्य के लिए अपने पतिदेव , बेटियों और उनकी बहुत ही खास सहेलियों के अतिरिक्त किसी को भी पता नहीं है और आज अपनी सखियों के साथ उजागर कर रही हूँ।
मेरी बेटी के एक सहेली बहुत ही अंतरंग है और वे नवीं से लेकर अपने प्रोफेशनल कोर्स और फिर उसके बाद नौकरी तक साथ ही रहीं। एक ही कॉलेज , इंस्टिट्यूट और हॉस्टल का एक ही कमरा, फिर नौकरी करते हुए दिल्ली में एक ही घर में साथ रहीं। मेरी बेटी से कम न थी वह। मेरी उसकी माँ से बाद में मित्रता हुई और एक दिन अचानक वह हृदयाघात से संघर्ष करते हुए चली गयीं। जब उनके जाने से पहले मैं उनके पास गयी तो वह बोलीं - "आप ऋतु का ध्यान रखना।"
मैंने उन्हें आश्वासन दिया कि आप अब ठीक हो रहीं है और जल्दी ठीक भी हो जाएंगी लेकिन मेरे वहाँ से बाहर आने के आधा घंटे बाद फिर से अटैक आया और वह चली गयीं। कुल तेरह दिन बहू, बेटा और बेटियाँ रहीं। बड़ी बेटी शादीशुदा थी और बेटा भी। उनके पापा थोड़े से अक्खड़ टाइप के थे , एक तो अपने अफसर होने का दर्प और दूसरे उन्होंने कभी न ससुराल से और न ही भाइयों से (जो सौतेले थे। ) अधिक सम्बन्ध रखा और न ही पत्नी को रखने दिया। मेरी भी उनसे अधिक बातचीत कभी न हुई थी।
एक दिन मेरी बेटी का दिल्ली से फ़ोन आया - "मम्मी अंकल दो दिन से भूखे हैं, सिर्फ फल पर काम चला रहे हैं। "
उसने माजरा बताया कि कुछ दिन उनके सौतेले भाई के यहाँ से खाना आता रहा , एक दिन उनके भतीजे ने पैसे चुरा लिए और उन्होंने उसे पकड़ लिया। उसके बाद उन्होंने खाना भेजना बंद कर दिया था।
सुबह तो मुझे ऑफिस जाना होता था और मेरा रुट उनके घर के बिल्कुल ही विपरीत पड़ता था। पतिदेव के साथ सेटिंग की , मैं पांच बजे ऑफिस बस से चलती थी और एक स्टॉप पर उतरती और ये मुझे स्कूटर से लेकर उनके घर ले जाते। मैं बैग रख कर पहले चाय बना कर उनको देती और उसी समय में उनके जो बर्तन सिंक में पड़े होते उनको साफ करती और सब्जी भी काट लेती। चाय पीते पीते जो बातें होतीं फिर सब्जी बना कर उनको रोटियों बना कर खिला देती और सुबह के लिए कुछ बना कर रख देती। फिर किचन और बर्तन साफ करके घर की और निकलती। मेरा संयुक्त परिवार है - उसे समय घर में जेठ जेठानी सासूमाँ और हमारी दो बेटियाँ थी।
घर आकर पहले तो सबको चाय बना कर देती और फिर डिनर की तैयारी करने लगती। रोज सवाल होने लगता कि इतनी देर कैसे हो जाती है? चाय भी देर से मिलती है , मैं चुप रहती कोई उत्तर मेरे पास नहीं था। शनिवार और रविवार हमारी छुट्टी का दिन होता तो सुबह का खाना इनसे बना कर भेज देती और शाम को वो इनके साथ आ जाते और खाना खाकर चले जाते। घर में किसी को बनाना नहीं पड़ता तो ये सवाल नहीं उठता कि कौन बनाएगा और खिलायेगा ?
पूरे तीन महीने मैंने उनके लिए खाने की व्यवस्था की और उसके बाद उनके लिए एक मैड ऐसी खोज कर रखी जो उनका सफाई से लेकर खाने तक पूरी व्यवस्था करती और मैं अपने नैतिक दायित्व के नाते हफ़्ते में एक बार जाकर उनका हाल चाल लेती रही या फिर जब तक वे रहे कोई तकलीफ होती या तबियत ख़राब होती तो ये उनको घर ले आते और फिर यहीं रखती उनको। जब उनका निधन हुआ तो एक दिन पहले उनका फोन आया कि भैया मेरी तबियत ठीक नहीं है टेस्ट करवाए है और कल आता हूँ और फिर वो कल आया ही नहीं। ऋतु का यूएस से फ़ोन आया - "माते पापा चले गए।" बस इतना सा काम किया जिंदगी में।

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