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गुरुवार, 28 जून 2012

क्या चाहता है समाज ?

                    इस समाज का यह स्वरूप आज नहीं बना है बल्कि सदियों से बना हुआ है , उसे नारी सदैव बेचारी के रूप में ही देख कर खुश होने की आदत पड़  चुकी है। उसका मन कैसे रोता है?  कुर्बान होने पर ये दर्द किसी को नहीं दिखाई देता है? वह उसके उस रूप को देख कर वाह वाह करने में उन्हें मजा आता है। 
                    पिछले दिनों में विश्वविद्यालय गयी ( बताती चलूँ कि मेरी शादी के समय हमारा परिवार विश्वविद्यालय परिसर में ही रहता था।)   मेरी मुलाकात मिसेज यादव से हो गयी . पके हुए बाल हलके रंग की साड़ी  में वे घर से ऑफिस आ रही थी। मैं ठिठक गई क्योंकि वे मुझे शायद न पहचान पाती क्योंकि हम दोनों की शादी सिर्फ कुछ ही महीने के अंतर से हुई थी। मेरे घर के सामने वाले ब्लाक में यादव जी रहते थे जिनकी पत्नी का निधन कुछ साल पहले हो चुका  था और उनके एक बेटा था। अपनी शादी के कुछ दिनों बाद सुना कि  यादव जी की शादी हो रही है और वह मंदिर में शादी करके आये घर में उन्होंने सत्यनारायण की कथा रखी . मैं नयी बहू थी सो जाने का कोई सवाल ही नहीं था। उनसे परिचय का एक अवसर था वह भी चला गया। नयी बहू का अपने जैसी बहू से परिचय का शौक जो होता है। 
                 सिर्फ 6 महीने बाद  यादव जी का  निधन हो गया। पूरे परिसर में कितनी तेजी से अफवाहें और चर्चाएँ  फैलने लगीं --
--कैसी अभागन आई है आते ही पति को खा गयी। 
--अब ये यहाँ टिकने वाली नहीं , सब लेकर चलती बनेगी ।
--यादव जी के बेटे का क्या होगा ? 
--इसका बाप बहुत चालू है ,  कुछ न कुछ तो चाल  चलेगा ही। 
--अरे विश्वविद्यालय की नौकरी नहीं छोड़ने वाला , खुद ले लेगा। 
--पढ़ी लिखी है क्या पता यही  नौकरी करने लगे? 
                   कुछ दिनों के बाद विश्वविद्यालय में उसको नौकरी दे दी गयी। वह अपने सौतेले बेटे के साथ वही रहने लगी और साथ में उनके पिता भी क्योंकि यादव जी के बेटे को टी बी की बीमारी थी और उसको देखभाल की जरूरत थी। उसने उस बेटे की देखभाल अपने बच्चे की तरह की क्योंकि उसके आगे इस बेटे के सिवा कोई और विकल्प था ही  नहीं।  उसके बाद मैं तीन साल तक उस परिसर में रही और वो भी उसी मकान  में रही . मेरी उनसे मिलने की इच्छा थी लेकिन पता नहीं क्यों? कौन सा पूर्वाग्रह था कि वहां की औरतों ने मुझे उससे मिलने नहीं दिया . उनका कहना था कि  किसी नवविवाहिता को ऐसी विधवा स्त्री से नहीं मिलाना चाहिए . मैं खिड़की से उसको ऑफिस जाते  हुए देखा करती थी और मुझे उनके साथ बहुत ही सहानुभूति थी।
               इतने साल बाद उन्हें उसी विधवा के वेश में देखा तो लगा कि  ये समाज कितना निष्ठुर है? उस बेचारी ने देखा क्या था?  किस पाप का दंड उसने भोगा ? न वैवाहिक जीवन का सुख , न परिवार का सुख और न दुनियादारी। इतने साल बाद परिसर के लोगों में से अधिकतर रिटायर्ड होकर जा चुके हैं लेकिन जब मिल जाते हैं तो जिक्र होने पर उनकी प्रशंसा करते हैं। 
            ये प्रशंसा किस बात की - इस बात की कि  उसने अपना पूरा जीवन एक विधवा का जीवन जीते हुए गुजार  दिया. हंसने  और बोलने तक पर पहरे लगे रहे क्योंकि ऑफिस का जीवन भी ऐसी औरतों के लिए आसान  नहीं होता है। फिर वह उस समय विश्वविद्यालय का माहौल जहाँ सिर्फ औरतें ही नहीं बल्कि पुरुष भी प्रपंच किया करते थे। करते तो आज भी हैं लेकिन उस समय के लोगों की सोच कुछ और ही होती थी। मिसेज यादव का जीवन इस समाज और सोच की बलि चढ़ ही गया । 


शनिवार, 9 जून 2012

परदेश की कमाई !

                       परदेश में कमा  रहे हैं - हमारे पास में एक ब्राह्मण  परिवार रहता है . उस परिवार का मुखिया जब नहीं रहा तो उसके चार बच्चे थे छोटे छोटे - माँ अनपढ़ आमदनी का कोई सहारा नहीं क्योंकि गाँव में खेती के बल पर बिगड़े नवाब थे . हर दिल दुखी था  कि  इस कच्ची उम्र की महिला का क्या होगा ? वह क्या करेगी ? धीरे धीरे जैसे ही बच्चे बड़े हुए किसी को हलवाई की दुकान में लगा दिया और किसी को टेम्पो में लगा दिया और रोटी चलने लगी। फिर एक एक करके वे शहर से बाहर निकल गए। सब बाहर  कमाने चले गए। जब 4-6 महीने में आते पैसा भी लाते  और माँ - बहन के लिए कपडे और सामान लेकर आते। कुल मिलकर माँ खुश सब बेटे कमाने लगे और वह भी छोटी उम्र में। आजकल पड़े लिखों को तो नौकरी मिलती नहीं है और मेरे बेटे तो इतना कमाते हैं कि अपना खर्च चला लेते हैं और घर भेजते रहते हैं।   खुद कुछ भी खाकर गुजरा कर लेते हैं और घर के लिए कमी नहीं होने देते हैं।
                             पिछले दिनों दिल्ली जाना हुआ वैसे तो अगर ऑफिस के काम से जाती  तो कोई बात नहीं पहले से  वाहन  मिल जाता है लेकिन  ये मेरी व्यक्तिगत यात्रा थी और स्टेशन से पास ही विष्णु दिगंबर मार्ग तक बेटी के हॉस्टल जाना था। मैने सोचा कि  सुबह का सुहाना मौसम है तो रिक्शा से चला जाय , दिल्ली के दर्शन ऑटो में तो हो नहीं पते हैं। सर्र  से निकल गए। रिक्शा चला जा रहा था और सड़क के किनारे कहीं पार्क के बाहर  अपने रिक्शे को ही बेड बनायें , पीछे हुड का तकिया, सीट का गद्दा और  चालक सीट पर पैर फैलाये गहरी नीद में सो रहे थे . कुछ रात  भर सवारी ढोने  के बाद  तड़के 3 या 4 बजे आ कर सोये हैं। एक पार्क के किनारे से गुजरते हुए मेरे रिक्शा वाले ने आवाज दी - 'ओए गोपाल उठ अभी सफाई वाला आएगा तो डंडा चलाएगा।'
वह गोपाल आँखे मलते हुए उठा तो मेरी नजर उस पर पड़  गयी ये तो मेरे मोहल्ले वाला गोपाल है तिवारिन  का बेटा ।   मुझे देखते ही वह उठ कर दूसरी और मुड़  गया। जैसे मैं उसको बचपन से देख रही थी वैसे ही वह भी देख रहा था। रिक्शा वाला रिक्शा खड़ा  करके  पानी पीने  चला गया तो गोपाल मेरे पास आया - 'आंटी वहां किसी को मत बतलाइयेगा  कि  मैं यहाँ पर रिक्शा चलाता  हूँ , अभी बहन की शादी करनी है न उसी के लिए हम सब पैसा इकठ्ठा कर रहे हैं। अगर वहां पता चल गया कि  हम रिक्शा चलाते  हैं तो कोई अच्छा लड़का नहीं मिलेगा। उसको हम इसी लिए पढ़ा रहे हैं कि वह खुश रहे और अच्छे घर में चली जाय। '
                     एक कम पढ़े लिखे बच्चे से ऐसे सुनकर मन खुश हो गया क्योंकि आज के पढ़े लिखे बच्चे अपने घर और परिवार की कितनी जिम्मेदारी को समझते हैं और कितना औरों के लिए सोचते हैं ? उस की बात ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि  यही बाहर   रहकर इतनी मेहनत  करके औरों की तरह से अपनी कमाई  शराब और जुए में नहीं उड़ा  रहा है। बाकी  भाई भी उसके कहीं न कहीं कमा  ही रहे हैं . यही तो कमाई  सच्ची  कमाई और  सार्थक कमाई  है। उससे भी सच्ची और सार्थक है उसकी सोच की हम कुछ न कर सके लेकिन बहन का भविष्य तो हम बना ही सकते हैं। 

रविवार, 27 मई 2012

श्रवण कुमार आज भी हैं !

          मैं   जीवन को इतने  करीब अकेले ही तो नहीं जीती हूँ  हर इंसान के आस-पास ऐसा  गुजरता  है।  कुछ पढ़ने वालों को  लगा कि मैं  सिर्फ नकारात्मक छवि ही प्रस्तुत  करती हूँ। ऐसा नहीं है मैं खुद जिस परिवार हूँ वहां मैंने जो  देखा  है तो ऐसी घटनाएँ कहीं हिला देती हैं। 
                 मैंने  अपने जीवन में ऐसा देखा है तो श्रवण कुमार  देखने के लिए कहीं और नहीं जाना पड़ता है। एक ऐसा इंसान भी मैंने देखा है जिसने अपने जीवन के 39 वर्ष  तक सिर्फ अपनी माँ  की सेवा में गुजारे हैं। न अपना करियर देखा और न भविष्य . फिर भी कभी कोई कमी नहीं हुई। यह बात और हैं कि अगर उन्होंने अपनी माता-पिता को नजरअंदाज किया होता तो शायद नहीं बल्कि निश्चित तौर पर आज बहुत समृद्ध और धनाढ्य होेते । जब वह 18 वर्ष की आयु में बीएससी कर रहा थे तभी 27 फरवरी 1972 को उनकी माँ  सड़क दुर्घटना का शिकार हुई . शरीर में 27 जगह से हड्डियाँ  टूटी हुई थी।                
           उनके पिता बड़े अस्पताल में फार्मासिस्ट थे और वहीँ कैम्पस में रहते थे। उस समय सर्जरी इतनी उन्नत नहीं थी कि घायल को तुरंत आपरेशन करके खड़ा किया जा सकता।घर में एक 7 साल बड़े भाई भी थे लेकिन जिम्मेदारी बाँटने के नाम पर सिर्फ अपने स्वार्थ को साधा।  3 साल तक उस इंसान ने घर, कालेज और अस्पताल में घूमते हुए अपनी एम एस सी को पूरा किया और उसमें अपनी डिवीजन  गवां बैठे और भविष्य में जो सोचा था गर्त में चला गया। तीन साल बाद जब माँ घर आयीं तब भी वह चल फिर नहीं सकती थी।  उनको बिस्तर पर ही रहना पड़ा। 5 साल बाद वह छड़ी के सहारे चलने काबिल हुई।         घर के हालातों को देखते हुए मेडिकल रिप्रजेंटेटिव की नौकरी कर ली। इससे अस्पताल में काम भी कर सकते थे और घर में माँ को भी देखा जा सकता था।  मैं इन सालों की साक्षी नहीं थी। इस परिवार से जुड़ने के बाद ही पता चला।  
                          1980 में मैंने इस इंसान के साथ अपना जीवन आरम्भ किया और मुझसे यही कहा कि इन दोनों को कोई तकलीफ मत होने देना। पिता को अल्सर था तो उन्हें कभी कभी अस्पताल में भर्ती  करना पड़  जाता था।  दवा,  डॉक्टर और अस्पताल में माहौल में जन्मे , पले-बढ़े, कुछ पिता का  संरक्षण।  जीवन में सेवा को  अपना काम मान लिया। माँ के लिए तो बराबर ही उनको लगे रहना था। 
             एक समय तो ऐसा भी आया था कि मैं बीएड कर रही थी और इनको दिल्ली मीटिंग में जाना था। मेरी परीक्षा होने वाली ही थी तो मैं किताबें लेकर ससुर जी के पास अस्पताल में बैठी पढ़ती  रहती थी। माताजी इस  काबिल थी ही नहीं वे वहां बैठ सके।
                     1990 में पिताजी को कैसंर बताया गया।  टूरिंग जॉब और जहाँ हमने घर बनाया था नयी जगह थी। वहाँ पर आवागमन के  साधन आसानी से उपलब्ध नहीं थे।  उनके पास स्कूटर था सो आना जाना आसन होता लेकिन वह तब जबकि शहर में हों। कैंसर के दौरान कितने बार घर और अस्पताल में भागदौड़ करने वाले वही एक इंसान थे। तीन माह वह अंतिम अवस्था में बिस्तर पर रहे लेकिन उनकी सेवा में कभी कोई भी कमी नहीं आने दी। 1991  में पिता को खो दिया। 
               माताजी तो अब भी उसी तरह से थी हाँ अब वह छड़ी के सहारे चल लेती थीं लेकिन उनकी तकलीफों में और इजाफा होता चला जा रहा था। उम्र के साथ साथ हड्डियों में दर्द बढ़ रहा था। चलने फिरने में तकलीफ होना स्वाभाविक था। इतना अवश्य था कि माँ के मुंह से निकला नहीं कि  उसको पूरा करना उनके लिए वेद वाक्य की तरह से था। 
                        फिर माँ को कैंसर बताया गया लेकिन पिता का हश्र  देखने के बाद उन्होंने माँ की बायोप्सी कराने से  इनकार कर दिया कि अगर जिन्दा रहना है तो इसके साथ भी उतने ही दिन जिन्दा रहना है और नहीं तो बायोप्सी के बाद भी उतने ही दिन रहेंगी। अब और कष्ट   इन्हें नहीं दूँगा। हाँ इतना जरूर कि जहाँ जिसने भी बताया कि  वहाँ अच्छा वैद्य   है , डॉक्टर है और कोई भी पैथी  ऐसी नहीं  बची जिसमें  न  कराया हो। डॉक्टर या वैद्य मीलों दूर  हो उसको अपने स्कूटर से लाना और  ले जाना वहाँ से दवा लाना। सारे  काम अकेले और खुद ही  करते थे। कैंसर की  डॉक्टर कह चुकी थी कि  इनकी जिन्दगी  से अधिक 6 महीने  है लेकिन  नहीं हारे और दवा कराते  रहे कि  बस उनकी तकलीफ में आराम हो। जाना तो सभी को है लेकिन आराम से जाएँ । उनकी त्वचा सड़ने  लगी थी और उसकी ड्रेसिंग करने काम मेरा था।  मैंने भी 6 महीने की छुट्टी ली क्योंकि दिन में कई बार तकलीफ बढ़ने पर उसकी ड्रेसिंग जरूरी  होती थी। जब उन्हें दर्द होता था तो गालियाँ  मैंने भी खूब खायीं। पता नहीं शायद भगवन भी उस तपस्या के आगे  हार गया और माँ  का कैंसर ठीक होने लगा और एक समय ऐसा भी आया की वह पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गयी। उसके बाद 14 साल रही लेकिन कैसर जैसी कोई तकलीफ उनके दुबारा नहीं हुई।                       दस साल बाद वह गिर गयीं और फिर वह अपना साहस खो बैठी दुबारा चलने का साहस न जुटा   सकीं और 4 साल बिलकुल बिस्तर पर ही रहीं। उनके उसी कमरे में सारे  काम करने होते थे . नहलाने से लेकर सभी काम .
उन्हें किसी भी काम में कोई गुरेज नहीं थे।  माँ की नित्य क्रिया करवानी हो या कपडे धोने हों या फिर उनको नहलाना हो। मेरे मीटिंग में बाहर  जाने पर ये सब काम खुद ही करते थे। और 4 साल बिस्तर पर रहने के बाद भी कभी उनको कहीं भी कोई घाव  नहीं हुए। कभी कोई नर्स या  काम करने वाले को उनका काम नहीं करने दिया। उनके कारण ही अपनी नौकरी छोड़ दी क्योंकि कैंसर की हालत में उन्हें छोड़ कर नहीं जा सकते थे। अपने काम को नया  रूप दे दिया जिसमें समय का प्रतिबन्ध  न हो. आखिर   माँ ने 2 जनवरी 2011 को उन्होंने शरीर त्याग दिया।
                        इतने सालों में  मैं साथ रही कभी भी मैंने उनको माँ या पिता के साथ कितने भी थके हों कभी भी झुंझलाते हुए नहीं देखा। अगर तुरंत ही आये हों और उन लोगों ने कह दिया कि  हमें ये खाना है या ये दवा चाहिए तो तुरंत ही स्कूटर लेकर चल देना है ऐसे में मुझे कभी कभी कष्ट होता था कि  आकर पानी या चाय भी नहीं पी और फिर चल दिए लेकिन उन्होंने कभी भी कोई शिकायत  नहीं की। 
                          ये श्रवण  कुमार मेरे पतिदेव हैं।  ये अतिश्योक्ति लग रही है तो यह अक्षरशः सत्य है। वैसे मैं इसको लिखने के लिए तैयार नहीं थी लेकिन जब ऐसी बात हो रही है तो सकारात्मक सोच वाले बेटे का ये उदारहण देना मुझे प्रासंगिक लगा। भले ही कोई कहे  -- दूल्हे को कौन सराहे दूल्हे का बाप। "सिर्फ ये नहीं कि  सिर्फ अपने माता पिता के लिए ही ऐसा किया हो उन्होंने तो अपने मित्रों के माता पिता के लिए भी बहुत किया है। खुद मेरे माता पिता को जब भी उनकी जरूरत पड़ी कभी पीछे नहीं हटे . मुझे फख्र है कि  उनके इस काम में मेरा सहयोग ने ही मुझे इतनी गहरे से दर्द की परिभाषा को सिखाया है और औरों के लिए कुछ भी करने का  जज्बा दिया है।

शुक्रवार, 25 मई 2012

मिसाल बेटे की !

समय !और युग के साथ श्रवण कुमार की क्या परिभाषा बदल गयी है?  हर माँ बाप बेटे के जन्म के साथ उसके श्रवण कुमार सा होने का ही सपना देखता होगा (मेरे बेटा नहीं सो कभी सोचा ही नहीं बेटियां कभी इतिहास में मिसाल बन कर सामने लायी ही नहीं गयी।लेकिन आज मिसाल कायम कर रही हैं।  )
                     कल ही एक आत्मीय का निधन हुआ और  आज उनकी अंत्येष्टि . उनके दो   बेटे और दो बेटियाँ हैं। बड़ा बेटा बहुत बड़ा अफसर है, छोटा कम पढ़ा लिखा है सो किसी तरह अपना परिवार पाल रहा है। एक बेटी भी नौकरी कर रही है और छोटी बेटी एक धनाढ्य परिवार की बहू है।
                    हमारा बीच बीच में जाना  होता रहता है और उनके पारिवारिक  पृष्ठभूमि से हम अच्छी तरह से परिचित भी हैं। उनके  बड़े दामाद ने बेटे के हर दायित्व को पूरी तर निभाया। वह ह्रदय रोगी थे तो कई बार बीमार हुए और उनको अस्पताल में  भर्ती करना पड़ा और दामाद ने पूरी निष्ठां से उनकी सेवा की। जब भी वे बीमार हुए अपने फर्ज के अनुरूप दोनों सालों को सूचना देते रहे। बेटी का भी संयुक्त परिवार है, फिर भी वह और उसके पति ने कभी भी उनका साथ नहीं छोड़ा, पैत्रिक मकान दूर था इसलिए अपने घर के पास ही एक कमरा किराये पर दिला दी।                        खाना बेटी घर से बना कर भेज देती और अपने ऑफिस जाने के पहले और बाद एक बार दोनों लोग उनको देख आते .
                   उनकी बीमारी का समाचार सुनकर बड़े बेटे को लखनऊ से आना  पड़ता था। एक दो बार तो आया लेकिन पिछले बार जब आया तो वह आकर झल्लाया - " क्यों मुझे बार बार परेशान करते हो, इनकी तो रोज ही तबियत ख़राब होती है, मरते तो ये हैं नहीं कि काम  ख़त्म हो । आइन्दा  मरने पर ही मुझे खबर करन"
                 इन शब्दों को सुनकर बेटियों को बहुत ही बुरा लगा। वह अपने छोटे भाई से कोई सम्बन्ध नहीं रखता था। उसके बाद  बहन गलत बात सहन नहीं करती थी , वह सच कह  देती थी तो उससे भी कम ही संपर्क रखता . हाँ छोटी बहन धनाढ्य परिवार की बहू थी सो उससे संपर्क रखे हुए था। कल रात जब निधन हुआ तो बेटी और दामाद ने सूचना देने से साफ इनकार कर दिया। छोटे भाई का तो सवाल ही नहीं था। आखिर छोटी बहन से कहा गया कि वह सूचित करे।  वह भी बहुत दुखी थी फिर भी उसने फ़ोन किया और  कहा - "दादा अब आपकी इच्छा पूरी हो गयी है, जैसा कि आप चाहते थे कि पापा के न रहने पर खबर दी जाय. अब पापा  गए हैं अब आप आ  सकते हैं । "
                     रात  को खबर देने के बाद वह दूसरे दिन 12 बजे पहुंचा। सारी  तैयारी हो ही चुकी थी। मोहल्ले वालों ने देखा तो पूछा कि  ये कौन है?  बड़े तैश में आकर बोला - 'आपको नहीं मालूम मैं इनका बड़ा बेटा हूँ '
'बड़ा बेटा , अरे बड़ा बेटा तो ये है जिसने वर्षों से सेवा की है . अब तक कहाँ थे तुम?'
                उनके अंतिम संस्कार में वे इच्छुक भी नहीं थे लेकिन वह किसी भी सोच से आगे बढे तो छोटी बहन ने आगे आकर कहा - "नहीं दादा, ये काम छोटे दादा को करने दे, गरीब ही सही 13 दिन तक  यहाँ बैठ कर दीपक तो जलाएंगे, आपको वापस भी जाना होगा।"
                    वहांँ पर सभी लोगों ने इसका समर्थन किया। सही ही किया जो मरने की खबर का इन्तजार कर रहा था उसको बाद में उस  के संस्कार से क्या लेना देना।

बुधवार, 23 मई 2012

ये कैसा पुण्य ?

      ये घटना पिछली  नवरात्रि की है।  उस दिन मुझे अपने पतिदेव के साथ कहीं जाना पड़ा  और उनको कुछ और काम  आ पड़ा  उन्होंने मुझे अपने एक मित्र के यहाँ रुक जाने को कहा। मुझे  3-4 घंटे इन्तजार  करना था। उन मित्र की पत्नी  गृहणी हैं और पति डॉक्टर . घर में उनके पति , पत्नी और उनकी सास जी   हैं जो कमर से नीचे के हिस्से में पक्षाघात का  शिकार हैं। 
                हमारी बातचीत के   दौरान उनकी  की आवाज  - "  मीना पानी   दे जा  गिलास नीचे गिर गया है।"
"मीना नहीं है ,वह अब शाम को  आएगी. "
                  फिर वह मेरी ओर मुखातिब होकर  - ' देखिए  ठीक से गिलास उठाती नहीं हैं , गिलास गिरा दिया   होगा . मैं तो नौ दिन का व्रत रखती हूँ , अगर  उनके पास  जाऊं तो फिर से नहाना पड़ेगा और बार बार  नहाने से मेरे जोइंटस में   दर्द बढ़ जाता है।"
               वह मुझे  बता  रहीं  थी . और मैं  खुद भी व्रत थी। मुझे यह बात अच्छी तरह से समझ आ चुकी थी कि  वे व्रत का बहाना करके उनके पास नहीं जाना चाहती थीं और  वास्तव  में वह जाना भी नहीं चाहती  थी। मुझसे रहा नहीं गया और मैं  पूछ  ही  बैठी   " फिर आप ऐसे में क्या करती   हैं ?"
"इसी  लिए तो मीना को रखा है वह सुबह आती है , आकर उनके सारे काम  नहलाना  धुलाना , खाना खिलाना  सब काम करके चली जाती है और शाम को फिर आती है। " 
"अगर वह न आये तो?"
"तो फिर मीना वाले सारे काम ये करते हैं। मुझे तो व्रत के  सफाई और पाक का ध्यान रखना पड़ता है . व्रत में  छूत होकर  रहने का पाप कौन मोल ले . मैं तो बड़े ही नियम धर्म से व्रत रखती हूँ।" 
" अच्छा " कह कर चुप रह जाने के अलावा कोई चारा भी तो नहीं था। 
                   उनकी सास बार बार आवाज दिए  जा रही थीं क्योंकि उनको उम्र और बीमारी के  कारण सुनाई भी कम देता था। मुझसे रहा नहीं गया और  खुद  जा कर उनके गिलास में पानी उनको ले  जा कर दे दिया . हम ऐसे छूत और पाक  में विश्वास नहीं करते हैं। अगर हम  किसी  प्यासे को पानी नहीं  पिला  सकते तो  कोई धर्म या  पंथ नहीं है जो ऐसे पाक और छूत  को अहमियत  दे।
" अरे अरे आप  वहां क्यों  चली गयीं आप ने  तो अभी  चाय भी  पी नहीं  थी।"
"मैं व्रत में चाय नहीं  पीती ." कह कर मैंने टाल दिया .
                              लेकिन ये सोचने के लिए मजबूर जरूर हुई कि हम किसको धोखा देते हें अपने आपको या फिर अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए बहाने खोज लेते हें . पाप और पुण्य तो हमारे बनाये हुए चोचले हें. किसी भी व्रत और पूजा से बढ़कर किसी इंसान के प्रति दया और ममता का भाव है और वह भी तब जब कि वह मजबूर हो और हमारे ऊपर आश्रित हो . 

सोमवार, 23 अप्रैल 2012

vah bhalai samane aayi!

                    बचपन से यही सुनती चली आ रही थी की जीवन में किये गए भले कामों का फल जरूर मिलता है और कल कुछ तो ऐसा देखने को मिला तो लगा की  ऐसे गुण और संस्कार हमें सिर्फ अपने से मिलते हैं और वे भी सिखाये नहीं जाते बल्कि हम खुद सीखते हैं .
                   कल मैं अपनी बहन के यहाँ से शादी के बाद अपने शेष भाई बहनों के साथ वापस आ रही थी. झाँसी के बाद उरई और कानपूर आने के लिए हमारे पास कोई रिजर्वेशन नहीं था. क्योंकि जहाँ से हम आ रहे थे वहां से झाँसी तक ही सीधी ट्रेन थी  और वह झाँसी पहुँचने  में एक घंटे लेट हो गयी और हमारी लिंक ट्रेन जा चुकी थी. अब हमारे सामने और कोई चारा न था की हम किसी दूसरी ट्रेन में टिकट लेकर बैठ जाएँ.  हम सभी जल्दी से जल्दी घर पहुंचना चाहते थे. झाँसी हम सुबह सात बजे पहुंचे और फिर पता किया तो हमें ९ बजे ट्रेन मिलनी थी जो की मुंबई से आ रही थी. हमने  टिकट  लिया  और ट्रेन आने पर  एक   बोगी में घुस  गए. उस  बोगी  में तिल  धरने  की  जगह नहीं थी लेकिन  क्या  करते  पहुँचाना जरूरी  था. उसी  में घुस गए की खड़े  खड़े ही सही  पहुँच  तो जायेंगे  ही. वहां पहले  से बैठे  लोग  किसी  भी तरह  से सहयोग  करने  को तैयार  नहीं थे. अपनी अपनी  सीट  पर पालथी  मार  कर बैठे हुए  थे . अगर  उनसे  अनुरोध  भी किया गया  तो उन  लोगों  ने बड़े  ही बेरुखे  ढंग  से उत्तर  दिया  की हम सीट रिजर्व आपके  लिए नहीं करवा कर  आ रहे हैं. बात  भी ठीक  थी.
                       वाही पर मैं , मेरे पति , मेरे बड़े भाई साहब  और bhabhi  जी  हमारे साथ थे. हम सभी किसी तरह खड़े होने  का प्रयास  कर वहां टिके  हुए थे. अचानक  सामने  की सीट पर बैठे हुए एक युवा  ने  मेरे  भाई साहब को देखा  कर पूछा  - 'आप  डी ए वी  कॉलेज  में पढ़ाते  हैं न ? '
'हाँ  वही पढाता  था, अब  रिटायर्मेंट  ले  लिया है.'
'सर  आप मुझे  नहीं पहचान  पाए  होंगे , लेकिन मैं आपको  पहचानता   हूँ . ' वह  यह  कहते  हुए अपनी बर्थ  छोड़ कर उठ खड़ा हुआ और बोला  'सर आप बैठ  जाइए  मैं खड़ा हो जाता  हूँ. भाई साहब ने उसको  बहुत  मना किया लेकिन वह अपनी जगह छोड़ कर उठ कर खड़ा हो गया.
                    फिर उसने अपनी सीट पर बैठे अन्य लोगों से थोडा थोडा खिसकने की बात कह कर हम सभी को बिठा लिया. 
                     फिर वह बातें करने लगा और अपने बारे में बताने लगा की वह अब क्या कर रहा है? भाई साहब से फिर बताने लगा की आप तो हमें जीवन भर याद  रहेंगे   क्योंकि जब  वह हाई स्कूल  में था तो उसके गाँव  में प्रेक्टिकल   लेने  गए थे और उसी दिन   मेरे पिताजी  का निधन  हो गया था मेरा प्रेक्टिकल  छूट   गया था. मैं तीन  दिन बाद आपके  पास पहुंचा था तो अपने घर पर ही मेरी  प्रेक्टिकल  की कॉपी  लिखवा  कर मेरा प्रेक्टिकल  ले लिया था. अगर आप ऐसा न करते तो फिर मैं अपने घर को संभालने   के लिए एक साल बाद तैयार हो पाता.
                       उसके  इतना कहने  पर मुझे वह घटना  याद  आ गयी. मैं उस समय  उरई में ही थी. एक लड़का  ऊपर  चढ़  कर आया  और पूछा मास्साब  घर में हैं क्योंकि प्रेक्टिकल  लेने  के बाद  भाई साहब घर पर ही थे . घर आकर  उसने बताया  था की उसके  पिताजी  का निधन  हो गया था और वह इसा  कारण   वह प्रेक्टिकल देने नहीं आ सका. साब आप अगर मेरा प्रेक्टिकल ले लें तो मेरा साल बच जाएगा.
                       भाई साहब ने उससे  घर पर ही कॉपी  लिखवा  ली  और प्रेक्टिकल की सारी  औपचारिकता  नियमपूर्वक  पूरी  करवाई  और उससे उसकी  उपस्थिति  दर्ज  कर ली. जब वह जाने  लगा तो मेरा भतीजा दो  साल का था वह वही खेल  रहा था. उसने दो रुपये  का नोट  निकल  कर उसको देने का प्रयास किया तो भाई साहब ने कहा की इसकी  कोई जरूरत  नहीं है. वह रुआंसा   हो गया - साब हम बहुत गरीब  हैं , हमारे पास आपको देने के लिए कुछ भी नहीं है. ये  बच्चे  को दे  रहा हूँ. इससे  ज्यादा  मेरे पास नहीं हैं मैं गाँव से यहाँ तक पैदल आया हूँ.
                       भाई साहब ने उससे कहा - 'बेटा  इसकी कोई जरूरत नहीं है, मैं ये सब  नहीं लेता , मैंने  तुम्हारी  परेशानी  देख  कर जो कर सकता  था वह किया. तुम  परेशान मत  हो. '
                  फिर उस लडके  से कभी मिलने  का कोई सवाल  ही नहीं था और आज  वही फिर सामने  आ गया तो लगा की आज  भी लोग किये गए किसी भी भलाई  को सम्मान  देते  हैं.

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

यथार्थ का शतक !

कहीं पढ़ा था इसको और इसके यथार्थ पक्ष को देखा भी है और समझा भी हैकुछ सन्देश देती है ये कथा सो इसको यथार्थ की सौवीं रचना के रूप में आपके नजर कर रही हूँ

एक क्रोधी व्यक्ति एक संत की शरण में आया और कहने लगा कि मुझे बहुत क्रोध आता है और पता नहीं मैं किसको क्या क्या कह जाता हूँ?मुझको इससे निजात चाहिए
साधू ने कहा कि क्रोध पर नियंत्रण इंसान खुद ही कर सकता है ऐसा कोई मंत्र नहीं है कि जिससे आप इससे मुक्त हो जाएँ फिर भी आप को एक बात बताता हूँ जिससे अगर आप प्रयास करें तो शायद कुछ अच्छा प्रतिफल मिल सके
"आप बतलाइये मैं वो करूंगा जो आप बताएँगे।" क्रोधी व्यक्ति ने आतुर हो पूछा
"तुम्हें जब क्रोध आये तो तुम दीवार पर एक कील गाड़ दिया करना , जितनी बार भी क्रोध आये उतनी ही कीलें।" साधू ने उसको रास्ता बताया
"जैसी आपकी आज्ञा " कह कर क्रोधी व्यक्ति अपने घर लौट आया
जैसा साधू ने कहा था उसने वैसे ही वैसे करना आरम्भ कर दियापहले दिन उसको दिन में १५ बार क्रोध आया और उसने कीलें गाड़ दींउसने दस दिन तक ये काम किया और धीरे धीरे कीलों की संख्या अपने आप ही काम होने लगीएक दिन वह भी आया जब कि उसको क्रोध बिल्कुल भी नहीं आयावह उस दिन साधू के पास गया और हाथ जोड़ कर बोला , 'स्वामी जी कल मुझे क्रोध बिल्कुल भी नहीं आया और मैंने दीवार पर एक भी कील नहीं गाड़ी।"
संत ने उससे कहा कि अब तुम ऐसा करो कि अब जिस दिन तुमको बिल्कुल भी क्रोध आये तो उसमें से एक कील रोज उखाड़ते जानाजब सारी कीलें उखड जाएँ तो फिर मेरे पास आना
करीब एक महीने में उसने सारी कीलें उखड डाली और फिर आया तो बोला - "स्वामी जी अब मुझे बिल्कुल भी क्रोध नहीं आता है । "
"ये तो ठीक है लेकिन तुम्हारी दीवार पर जो कीलें गाडीं थी उसके निशान मिट गए या नहीं। "
"स्वामी जी निशान कैसे मिट सकते हें? कीलें निकल लीं लेकिन दीवार पर निशान तो रहेंगे ही।"
"हाँ अब सुनों तुम जो दीवार पर निशान देखते हो , उससे याद करो कि तुमने अपने क्रोध में एक कील गाड़ी और ख़त्म होने पर उखाड़ भी दी लेकिन क्या निशान ख़त्म हुआ ? नहीं, फिर सोचो तुमने क्रोध में कितने लोगों को अपशब्द कहे होंगे, किसी को मारा भी होगा और कितना अपना नुक्सान किया होगाक्रोध समाप्त होने पर सब भूल गए होगे लेकिन जब एक निर्जीव दीवार तुम्हारे क्रोध के कहर के अपने सीने में निशान की तरह संजोये हुए है फिर कोई इंसान जिसमें आत्मा होती है, कितना आहत किया होगा और फिर भूल गएउनके कष्ट का अनुमान तुम इसी से लगा सकते होवे सजीव प्राणी कभी इसको भूल सकते हें शायद नहींकितने शत्रु तुमने अपने पैदा कर लिए होंगे
इसी लिए कहा जाता है कि आदमी का क्रोध उसका सबसे बड़ा शत्रु होता हैअगर चाहते हो कि तुम्हारा कोई शत्रु हो तो सबसे पहले अपने क्रोध पर नियंत्रण पाना चाहिए