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शनिवार, 7 अप्रैल 2012

यथार्थ का शतक !

कहीं पढ़ा था इसको और इसके यथार्थ पक्ष को देखा भी है और समझा भी हैकुछ सन्देश देती है ये कथा सो इसको यथार्थ की सौवीं रचना के रूप में आपके नजर कर रही हूँ

एक क्रोधी व्यक्ति एक संत की शरण में आया और कहने लगा कि मुझे बहुत क्रोध आता है और पता नहीं मैं किसको क्या क्या कह जाता हूँ?मुझको इससे निजात चाहिए
साधू ने कहा कि क्रोध पर नियंत्रण इंसान खुद ही कर सकता है ऐसा कोई मंत्र नहीं है कि जिससे आप इससे मुक्त हो जाएँ फिर भी आप को एक बात बताता हूँ जिससे अगर आप प्रयास करें तो शायद कुछ अच्छा प्रतिफल मिल सके
"आप बतलाइये मैं वो करूंगा जो आप बताएँगे।" क्रोधी व्यक्ति ने आतुर हो पूछा
"तुम्हें जब क्रोध आये तो तुम दीवार पर एक कील गाड़ दिया करना , जितनी बार भी क्रोध आये उतनी ही कीलें।" साधू ने उसको रास्ता बताया
"जैसी आपकी आज्ञा " कह कर क्रोधी व्यक्ति अपने घर लौट आया
जैसा साधू ने कहा था उसने वैसे ही वैसे करना आरम्भ कर दियापहले दिन उसको दिन में १५ बार क्रोध आया और उसने कीलें गाड़ दींउसने दस दिन तक ये काम किया और धीरे धीरे कीलों की संख्या अपने आप ही काम होने लगीएक दिन वह भी आया जब कि उसको क्रोध बिल्कुल भी नहीं आयावह उस दिन साधू के पास गया और हाथ जोड़ कर बोला , 'स्वामी जी कल मुझे क्रोध बिल्कुल भी नहीं आया और मैंने दीवार पर एक भी कील नहीं गाड़ी।"
संत ने उससे कहा कि अब तुम ऐसा करो कि अब जिस दिन तुमको बिल्कुल भी क्रोध आये तो उसमें से एक कील रोज उखाड़ते जानाजब सारी कीलें उखड जाएँ तो फिर मेरे पास आना
करीब एक महीने में उसने सारी कीलें उखड डाली और फिर आया तो बोला - "स्वामी जी अब मुझे बिल्कुल भी क्रोध नहीं आता है । "
"ये तो ठीक है लेकिन तुम्हारी दीवार पर जो कीलें गाडीं थी उसके निशान मिट गए या नहीं। "
"स्वामी जी निशान कैसे मिट सकते हें? कीलें निकल लीं लेकिन दीवार पर निशान तो रहेंगे ही।"
"हाँ अब सुनों तुम जो दीवार पर निशान देखते हो , उससे याद करो कि तुमने अपने क्रोध में एक कील गाड़ी और ख़त्म होने पर उखाड़ भी दी लेकिन क्या निशान ख़त्म हुआ ? नहीं, फिर सोचो तुमने क्रोध में कितने लोगों को अपशब्द कहे होंगे, किसी को मारा भी होगा और कितना अपना नुक्सान किया होगाक्रोध समाप्त होने पर सब भूल गए होगे लेकिन जब एक निर्जीव दीवार तुम्हारे क्रोध के कहर के अपने सीने में निशान की तरह संजोये हुए है फिर कोई इंसान जिसमें आत्मा होती है, कितना आहत किया होगा और फिर भूल गएउनके कष्ट का अनुमान तुम इसी से लगा सकते होवे सजीव प्राणी कभी इसको भूल सकते हें शायद नहींकितने शत्रु तुमने अपने पैदा कर लिए होंगे
इसी लिए कहा जाता है कि आदमी का क्रोध उसका सबसे बड़ा शत्रु होता हैअगर चाहते हो कि तुम्हारा कोई शत्रु हो तो सबसे पहले अपने क्रोध पर नियंत्रण पाना चाहिए