एक हप्ते बाद जब वापस आई तो सोचा पहले सबको पढ़ लूंगी तब कुछ लिखूंगी लेकिन अभी खोल कर बैठी और कुछ पढ़ा ही था कि खबर मिली कि मेरी लेखन क्षमता को पहचानने वाली मेरी मित्र कम बहन अधिक प्रतिमा श्रीवास्तव हर मध्यम वर्गीय परिवार के संघर्ष से जूझती हुई अभी अभी स्थापित हुई है. नौकरी , घर , बच्चे और पति के बीच सामंजस्य बिठाते हुए सुकून कि सांस ले भी नहीं पाई थी कि वो कुछ इस लड़ाई में ऐसी घायल हुई कि अभी मेरे ऑपरेशन के बाद मुझे देखने आई और आज वही किसी व्याधि के कारण व्हील चेयर पर हॉस्पिटल लायी गयी.
अपने इस दर्द को शब्दों में ढाल दिया और अब चलती हूँ. अब उसके पैरों पर खड़े होने के लिए दुआ करती हूँ. और उसके ठीक होने तक तो वापस आना मुश्किल है. फिर मिलती हूँ. और सबसे कहती हूँ कि उसके लिए दुआ करें.
मंगलवार, 30 नवंबर 2010
गुरुवार, 18 नवंबर 2010
संस्कारों का ढोंग !
हमारी संस्कृति में मनुष्य के गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि तक सोलह संस्कार होते हैं. आज के जीवन में और बदलते मूल्यों के अनुसार पूरे सोलह संस्कार तो कोई भी नहीं कर पाता है लेकिन कुछ महत्वपूर्ण संस्कार जीवन में पूरे किये ही जाते हैं. इनमें से अब कुछ ही रह गए हैं जैसे - जन्म पर होने वाले, नामकरण , मुंडन, कर्णछेदन, विद्यारम्भ, विवाह और अंत्येष्टि एवं उसके बाद त्रयोदशी आदि.
ये सारे संस्कार हमारी अपनी मान्यताओं के अनुरुप होते हैं और इस बात पर भी कि हम इनको कितना महत्व देते हैं. अब कुछ नए संस्कार भी जुड़ गए हैं जैसे बर्थडे , एनिवर्सरी जैसे कार्यक्रम. बड़े धूमधाम से मनाते हैं. अपनी हैसियत के अनुसार लोगों को भी बुलाते हैं. लेकिन पुराने संस्कारों के प्रति हमारा दृष्टिकोण पुरातन पंथी कह कर बदलता जा रहा है. उसको भी हम सुविधानुसार ढाल कर पूरा करने लगे हैं.
कल मैं अपने पति के एक मित्र के पिता की तेहरवी में गयी थी. तीन बेटे और तीनों बहुएँ एकदम आधुनिक लेकिन कुछ अवसर ऐसे होते हैं कि आधुनिकता हमें ये नहीं सिखाती है कि हम अपनी कुछ परम्पराओं को भूल कर चलें या तो हम कुछ भी नहीं करें. हम इस वैदिक रीति के कार्यक्रम को मानते ही नहीं है और होता भी है आर्यसमाज रीति से आप संस्कार कीजिये और उसकी विधि के अनुसार शांति हवन कीजिये. वह भी सर्वमान्य पद्धति है. लेकिन अगर वैदिक रीति से चले तो फिर उसके प्रत्येक नियम को कुछ हद तक तो पालन करना अनिवार्य है.
सुबह हवन होना था और पंडितों को खिलाना भी था. पंडित जी से पूछ कर सारा समान पैकेट बना कर उनको सौप दिया गया कि आप ब्राह्मण खोज कर उनको दे दें. सारी चीजों के पैकेट थे साथ ही खाने के पैकेट भी थे. कुछ काम घर में बहुओं के द्वारा भी किये जाते हैं तो वह कौन करे? खुद खाना घर में तो बनाती नहीं है तो यहाँ पूरियां कौन तलेगा? बड़ी ने छोटी से कहा और छोटी ने और छोटी से . फिर छोटी ने एप्रन पहना और डरते डरते गैस तक गयीं सिर्फ ७-८ पूरियां ताली . बस हो गया भाभी जी.
हम काफी अंतरंगता रखते हैं तो वहाँ हम दिन भर थे. शाम को जिन्हें कार्ड दिया गया था तो लोग आने शुरू हो गए. दोपहर में ही मुझसे पूछा गया कि इतने लोगों को कार्ड दिया गया है तो किस हिसाब से हलवाई को आर्डर दें कि क्या चीज कितनी होनी चाहिए?फिर सोचा गया कि अलग अलग चीजों के आने से झंझट बढेगा और फिर थाली कटोरी का भी काम बढ़ जाएगा. फिर पैक्ड थालियों का व्यक्तियों के हिसाब से आर्डर कर दिया गया. पैक्ड थालियाँ आ गयी और जैसे जैसे लोग आते जा रहे थे. मेजों पर थालियाँ रख दी जाती और लोग खाकर चलते जा रहे थे. हम भी उनमें से एक थे और खा पीकर हम भी घर आ गए. रात में देर तक नीद नहीं आई कि क्या इस तरह से भी होने लगा है. क्या सिर्फ एक संस्कार हम पूरी श्रद्धा से और नियमानुसार नहीं कर सकते हैं. पुरुष वर्ग शायद ऐसा करता भी लेकिन स्त्रियाँ जब कुछ करने के लिए राजी ही नहीं तो वे क्या करें? उनके लिए बर्थडे पार्टी और तेरहवी बराबर हो गयी . बाहर से आर्डर कर दिया और खुद तैयार होकर होस्ट बनी सबको अटैंड कर रहीं है. वही यहाँ था, सारी बहुएँ तैयार पूरे मेकअप में बाबूजी के गुणगान कर रही थी. और कुछ हम जैसी दकियानूसी महिलायें इस संस्कार की परंपरागत तरीके पर रो रही थीं.
गुरुवार, 11 नवंबर 2010
ऐसा भी होता है !
जीवन में मूल्य और सिद्धांतों की बलि चढ़ा मेरा करियर में एक महत्वपूर्ण घटना यह भी है , मुझे इससे कोई शिकायत नहीं है लेकिन ये आज भी मुझे कसक दे जाती है तो सोचा आप सबसे बाँट लूं.
मैं उस समय एक डिग्री कॉलेज में राजनीति शास्त्र विभाग में मानदेय पर प्रवक्ता पद पर कार्य कर रही थी. शायद विभाग में सबसे अधिक डिग्री मेरे पास ही थीं लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था. क्योंकि मानदेय प्रवक्ता किस दृष्टि से देखे जाते हैं ये इसके मुक्तभोगी अधिक अच्छी तरह से बता सकते है. मेरे विभागाध्यक्ष ने कहा कि मैं इस साल रिसर्च का पेपर लगवाना चाहता हूँ क्योंकि अभी तक इसको पढ़ाने वाला कोई नहीं था और आप रिसर्च पढ़ा सकती हैं. पेपर भी स्कोरिंग होता है रिजल्ट भी अच्छा रहेगा. मुझे रिसर्च में अधिक रूचि थी तो मैंने उनसे सहमति व्यक्त कर दी. जब कि मुझे मालूम था कि इस पेपर को लेने वाले बच्चों को पढ़ाई से लेकर उनके लघुशोध तक का काम मुझे ही अकेले देखना होगा . पर मेरा अपने काम के प्रति समर्पण कभी भी कम नहीं रहा. मैंने जो भी काम किया पूरी लगन और रूचि से ही किया.
करीब २० बच्चों ने रिसर्च का पेपर लिया और उन सबको मैंने उनके लघुशोध के लिए पूरा पूरा सहयोग किया. उनको उनके काम के लिए अगर कहीं और लेकर जाना पड़ा तो मैं बराबर उनके साथ जाकर काम करवाने का प्रयास किया. ऐसा नहीं है कि मेरे इस सहयोग और प्रयास के लिए मेरे छात्र आज भी अगर कहीं मिल जाते हैं तो पूरा सम्मान देते हैं. बात उनके लघुशोध के वायवा की है. परीक्षक ने छात्रों के प्रयास को काफी सराहा. उस समय विभाग के सभी शिक्षकों के अतिरिक्त एक अन्य विभाग के प्रवक्ता जो कि मेरे विभाग के एक प्रवक्ता के मित्र थे वह भी उपस्थित थे. उन्होंने वे लघुशोध उठा कर देखे उनमें पर्यवेक्षक के स्थान पर सभी में मेरा ही नाम था. ये बात उनको कुछ ठीक नहीं लगी. इससे पहले हमारे विभाग के किसी भी शिक्षक को इस बात पर कोई आपत्ति नहीं लगी क्योंकि सभी को कार्य मैंने ही करवाया था.
परीक्षक के जाने के बाद उन प्रवक्ता महोदय ने अपने मित्र को सुझाव दिया कि ये तो मानदेय पर हैं इस शोध कार्य से इनको कोई लाभ नहीं मिलेगा लेकिन अगर इन सभी शोधों पर आप लोगों के नाम पड़ जाएँ तो ये कार्य आगे आपके वेतनमान के लिए और शोध की दिशा में लाभकारी सिद्ध होगा. फिर क्या था. रातों रात विश्वविद्यालय जाने वाली प्रतियों पर कवर बदले गए और उन पर वहाँ पर स्थायी रूप से काम करने वाले लोगों के नाम डाल दिए गए. ये काम मेरे सामने जब आया तो कहा गया कि विश्वविद्यालय में मानदेय प्रवक्ताओं के शोध मान्य नहीं होंगे. इसके आगे मैं कुछ कह नहीं सकती थी वैसे मुझे वास्तविकता का ज्ञान तो था ही. कॉलेज में रखी गयीं प्रतियों पर आज भी मेरा ही नाम पड़ा हुआ है क्योंकि अगर ये बात छात्रों को पता लग जाती तो शायद बहुत बड़ा बवाल हो सकता था. इस लिए कॉलेज की प्रतियों को जैसे के तैसे ही रहने दिया गया.
ये बात छोटी थी या फिर बड़ी मैं नहीं जानती लेकिन मेरे सिद्धांतों के खिलाफ थी सो मैंने वह कॉलेज छोड़ दिया. फिर भी कॉलेज की इस राजनीति से मेरा मन बहुत दुखी हुआ. क्यों छात्र शिक्षकों के प्रति सम्मान का दृष्टिकोण नहीं रखते हैं शायद ऐसी ही कोई बात उनके सामने भी आ जाती होगी और अपने गुरु के इस तरह से नैतिक रूप से गिरा हुआ देख कर वे सम्मान भी नहीं कर पाते हैं. हम दोष छात्रों को देते हैं.
मैं उस समय एक डिग्री कॉलेज में राजनीति शास्त्र विभाग में मानदेय पर प्रवक्ता पद पर कार्य कर रही थी. शायद विभाग में सबसे अधिक डिग्री मेरे पास ही थीं लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था. क्योंकि मानदेय प्रवक्ता किस दृष्टि से देखे जाते हैं ये इसके मुक्तभोगी अधिक अच्छी तरह से बता सकते है. मेरे विभागाध्यक्ष ने कहा कि मैं इस साल रिसर्च का पेपर लगवाना चाहता हूँ क्योंकि अभी तक इसको पढ़ाने वाला कोई नहीं था और आप रिसर्च पढ़ा सकती हैं. पेपर भी स्कोरिंग होता है रिजल्ट भी अच्छा रहेगा. मुझे रिसर्च में अधिक रूचि थी तो मैंने उनसे सहमति व्यक्त कर दी. जब कि मुझे मालूम था कि इस पेपर को लेने वाले बच्चों को पढ़ाई से लेकर उनके लघुशोध तक का काम मुझे ही अकेले देखना होगा . पर मेरा अपने काम के प्रति समर्पण कभी भी कम नहीं रहा. मैंने जो भी काम किया पूरी लगन और रूचि से ही किया.
करीब २० बच्चों ने रिसर्च का पेपर लिया और उन सबको मैंने उनके लघुशोध के लिए पूरा पूरा सहयोग किया. उनको उनके काम के लिए अगर कहीं और लेकर जाना पड़ा तो मैं बराबर उनके साथ जाकर काम करवाने का प्रयास किया. ऐसा नहीं है कि मेरे इस सहयोग और प्रयास के लिए मेरे छात्र आज भी अगर कहीं मिल जाते हैं तो पूरा सम्मान देते हैं. बात उनके लघुशोध के वायवा की है. परीक्षक ने छात्रों के प्रयास को काफी सराहा. उस समय विभाग के सभी शिक्षकों के अतिरिक्त एक अन्य विभाग के प्रवक्ता जो कि मेरे विभाग के एक प्रवक्ता के मित्र थे वह भी उपस्थित थे. उन्होंने वे लघुशोध उठा कर देखे उनमें पर्यवेक्षक के स्थान पर सभी में मेरा ही नाम था. ये बात उनको कुछ ठीक नहीं लगी. इससे पहले हमारे विभाग के किसी भी शिक्षक को इस बात पर कोई आपत्ति नहीं लगी क्योंकि सभी को कार्य मैंने ही करवाया था.
परीक्षक के जाने के बाद उन प्रवक्ता महोदय ने अपने मित्र को सुझाव दिया कि ये तो मानदेय पर हैं इस शोध कार्य से इनको कोई लाभ नहीं मिलेगा लेकिन अगर इन सभी शोधों पर आप लोगों के नाम पड़ जाएँ तो ये कार्य आगे आपके वेतनमान के लिए और शोध की दिशा में लाभकारी सिद्ध होगा. फिर क्या था. रातों रात विश्वविद्यालय जाने वाली प्रतियों पर कवर बदले गए और उन पर वहाँ पर स्थायी रूप से काम करने वाले लोगों के नाम डाल दिए गए. ये काम मेरे सामने जब आया तो कहा गया कि विश्वविद्यालय में मानदेय प्रवक्ताओं के शोध मान्य नहीं होंगे. इसके आगे मैं कुछ कह नहीं सकती थी वैसे मुझे वास्तविकता का ज्ञान तो था ही. कॉलेज में रखी गयीं प्रतियों पर आज भी मेरा ही नाम पड़ा हुआ है क्योंकि अगर ये बात छात्रों को पता लग जाती तो शायद बहुत बड़ा बवाल हो सकता था. इस लिए कॉलेज की प्रतियों को जैसे के तैसे ही रहने दिया गया.
ये बात छोटी थी या फिर बड़ी मैं नहीं जानती लेकिन मेरे सिद्धांतों के खिलाफ थी सो मैंने वह कॉलेज छोड़ दिया. फिर भी कॉलेज की इस राजनीति से मेरा मन बहुत दुखी हुआ. क्यों छात्र शिक्षकों के प्रति सम्मान का दृष्टिकोण नहीं रखते हैं शायद ऐसी ही कोई बात उनके सामने भी आ जाती होगी और अपने गुरु के इस तरह से नैतिक रूप से गिरा हुआ देख कर वे सम्मान भी नहीं कर पाते हैं. हम दोष छात्रों को देते हैं.
रविवार, 24 अक्टूबर 2010
छाछ और दूध!
वह स्टाफ रूम में पानी के गिलास लेकर जा रही थी और उसके आँचल से टप टप करके दूध टपकने लगा. उसका कलेजा धक् से हो गया. क्या छोटा भूखा है? बड़के ने उसको दूध नहीं दिया होगा? भूल गया होगा? अरे अभी है ही कितने साल का? कुल ४ साल ही का तो है. फिर आँचल लपेट कर वह स्टाफ रूम में घुस ही गयी और टेबल पर गिलास रख कर वापस आ गयी.
अभी कुल ४ महीने का ही तो छोटा है, उसको अभी माँ का ही दूध चाहिए लेकिन किस्मत की मार ने उसके दूध को भी उससे छीन लिया. कैलाश इसी स्कूल में चपरासी था और एक दिन साईकिल से जाते समय उसको एक ट्रक ने कुचल दिया. वह उस समय १५ दिन के छोटे को गोद में लिए थी. उसका तो घर ही बिखर गया. घर में अब बचा कौन ? बूढी अंधी सास और दो छोटे बच्चे. स्कूल वालों ने कहा कि अभी तुम्हें उसी जगह नौकरी मिल जाएगी तो तुम्हारे बच्चे पल जायेंगे नहीं तो दर दर भटकोगी और ये दुनियाँ वाले तुम्हें जीने नहीं देंगे. तभी उसने छोटे के २ महीने के होते ही नौकरी पर आना शुरू कर दिया था.
सुबह खाना बना कर रख देती और खुद रोटियां बाँध लाती. बड़ा दादी को खाने को दे देता और छोटे को दूध बोतल में भर कर पिला देता था. बस इसी तरह से जिन्दगी चलने लगी थी. महीने में इतना मिल जाता कि बच्चों का पेट भर लेती. स्कूल जरूर दूर था पैदल चल कर आती तो एक घंटा लग जाता था लेकिन दो रोटी का सहारा तो था .
उसका मन आज स्कूल में नहीं लग रहा था. पता नहीं क्यों छोटा भूखा रो रहा है? छुट्टी की घंटी बजाते ही , वह प्रिंसिपल से बोली की 'बहनजी , हमारी तबियत ठीक नहीं है, हम आज अभी घर चले जाएँ.' उसके व्यवहार और उसकी व्यथा से सब परिचित थे कि वह नन्हा सा बच्चा घर छोड़ कर आती है इस लिए कोई कुछ न कहता और उसको घर आने की अनुमति मिल गयी.
घर में कदम रखते ही बड़ा बोला - 'अम्मा आज छोटे ने दूध नहीं पिया और अम्मा खूब रोया , मैंने तो झूले में लिटा कर जोर जोर से झुलाया तो रोते रोते सो गया. छोटे के गालों पर बहे आंसू अब सूख चुके थे. वह दूध के पास गयी तो दूध का बर्तन तो उतना ही भरा था जितना वह छोड़ गयी थी फिर बड़े ने क्या पिलाया? उसने छाछ का बर्तन खोला तो उसमें कम था. आज बड़े ने अनजाने में दूध की जगह बोतल में छाछ भर कर उसको पिला रहा था तभी तो उसने पिया नहीं और भूखे छोटे की भूख उसके आँचल में ढूध के साथ बहने लगी थी. उसने छोटे को उठा कर अपना ढूध पिलाना शुरू तो बड़ा भी आकर वहीं खड़ा हो गया. 'अम्मा मैंने इसको दूध पिलाया था इसने पिया नहीं - अम्मा क्यों नहीं पिया इसने? ' उसने बड़े को भी खींच कर अपने गले से लगा लिया और उसकी आँखों से आंसूं बहने लगे. माँ को रोता देख कर बड़ा बोला - 'सच्ची अम्मा मैंने इसको दूध पिलाया था. तुम क्यों रो रही हो? मैं बोतल लाता हूँ.'
'नहीं मेरे लाल , मैं जानती हूँ कि तूने इसे दूध पिलाया था और इसने नहीं पिया.' पर वह इस लिए नहीं रो रही थी . वह तो अपनी किस्मत पर रो रही थी . इतना छोटा बच्चा छाछ और दूध का अंतर क्या जाने?
अभी कुल ४ महीने का ही तो छोटा है, उसको अभी माँ का ही दूध चाहिए लेकिन किस्मत की मार ने उसके दूध को भी उससे छीन लिया. कैलाश इसी स्कूल में चपरासी था और एक दिन साईकिल से जाते समय उसको एक ट्रक ने कुचल दिया. वह उस समय १५ दिन के छोटे को गोद में लिए थी. उसका तो घर ही बिखर गया. घर में अब बचा कौन ? बूढी अंधी सास और दो छोटे बच्चे. स्कूल वालों ने कहा कि अभी तुम्हें उसी जगह नौकरी मिल जाएगी तो तुम्हारे बच्चे पल जायेंगे नहीं तो दर दर भटकोगी और ये दुनियाँ वाले तुम्हें जीने नहीं देंगे. तभी उसने छोटे के २ महीने के होते ही नौकरी पर आना शुरू कर दिया था.
सुबह खाना बना कर रख देती और खुद रोटियां बाँध लाती. बड़ा दादी को खाने को दे देता और छोटे को दूध बोतल में भर कर पिला देता था. बस इसी तरह से जिन्दगी चलने लगी थी. महीने में इतना मिल जाता कि बच्चों का पेट भर लेती. स्कूल जरूर दूर था पैदल चल कर आती तो एक घंटा लग जाता था लेकिन दो रोटी का सहारा तो था .
उसका मन आज स्कूल में नहीं लग रहा था. पता नहीं क्यों छोटा भूखा रो रहा है? छुट्टी की घंटी बजाते ही , वह प्रिंसिपल से बोली की 'बहनजी , हमारी तबियत ठीक नहीं है, हम आज अभी घर चले जाएँ.' उसके व्यवहार और उसकी व्यथा से सब परिचित थे कि वह नन्हा सा बच्चा घर छोड़ कर आती है इस लिए कोई कुछ न कहता और उसको घर आने की अनुमति मिल गयी.
घर में कदम रखते ही बड़ा बोला - 'अम्मा आज छोटे ने दूध नहीं पिया और अम्मा खूब रोया , मैंने तो झूले में लिटा कर जोर जोर से झुलाया तो रोते रोते सो गया. छोटे के गालों पर बहे आंसू अब सूख चुके थे. वह दूध के पास गयी तो दूध का बर्तन तो उतना ही भरा था जितना वह छोड़ गयी थी फिर बड़े ने क्या पिलाया? उसने छाछ का बर्तन खोला तो उसमें कम था. आज बड़े ने अनजाने में दूध की जगह बोतल में छाछ भर कर उसको पिला रहा था तभी तो उसने पिया नहीं और भूखे छोटे की भूख उसके आँचल में ढूध के साथ बहने लगी थी. उसने छोटे को उठा कर अपना ढूध पिलाना शुरू तो बड़ा भी आकर वहीं खड़ा हो गया. 'अम्मा मैंने इसको दूध पिलाया था इसने पिया नहीं - अम्मा क्यों नहीं पिया इसने? ' उसने बड़े को भी खींच कर अपने गले से लगा लिया और उसकी आँखों से आंसूं बहने लगे. माँ को रोता देख कर बड़ा बोला - 'सच्ची अम्मा मैंने इसको दूध पिलाया था. तुम क्यों रो रही हो? मैं बोतल लाता हूँ.'
'नहीं मेरे लाल , मैं जानती हूँ कि तूने इसे दूध पिलाया था और इसने नहीं पिया.' पर वह इस लिए नहीं रो रही थी . वह तो अपनी किस्मत पर रो रही थी . इतना छोटा बच्चा छाछ और दूध का अंतर क्या जाने?
बुधवार, 20 अक्टूबर 2010
न आया वो दिन.........!
पिछले चौदह वर्षों से जिस माँ का बेटा अपनी बचपन की एक नादानी के कारण जेल की सलाखों के पीछे जीवन गुजार रहा हो, उसके लिए ये राम के वनवास जैसा पहाड़ सा कालखंड कितना कष्ट देता होगा . इस बात का अहसास उस माँ के अतिरिक्त कोई भी नहीं लगा सकता है. उसने अपने बेटे के जेल से बाहर आने के दिन को सौ सौ साल के बराबर लम्बा मान कर काटे और जब वह दो दिन बाद जेल से बाहर आने वाला था घर में तैयारी चल रही थीं. वह बेटा जो सिर्फ १८ वर्ष २ दिन का था तब जेल चला गया था और अब ३२ साल का होकर बाहर आ रहा है. इतने वर्षों में कोई ख़ुशी नहीं मनाई गयी - कोई शादी ब्याह नहीं , कोई त्यौहार नहीं , दिवाली तो पर्व है सो दीपक जला लिए लेकिन होली खेलना ही भूल चुके थे.
**चित्र गूगल के साभार
घटना के बाद पिता की अकूत संपत्ति भी ख़त्म होने लगी थी. बहुत पैसा कमाया था - आयकर अधिकारी जो थे, किन्तु वो ऐसे जाएगा ऐसा नहीं सोचा था. मुकदमेबाजी में सब कुछ ख़त्म होने लगा और इस घटना के बाद तो उनकी प्रतिष्ठा भी गिरने लगी थी. मोहल्ले में कटाक्ष और व्यंग्य सुने नहीं जाते थे . संयुक्त परिवार के चारों भाइयों ने पैतृक मकान बेच कर अलग अलग दिशाओं में रुख कर लिए और मकान के ख़त्म होने के साथ ही शायद दिल भी दूर हो गए. जिन्दा सभी थे क्योंकि जीवन और मृत्यु अपने हाथ में नहीं होती और वह इस आशा में जी रहे थे कि रवि लौटेगा तो यह घर फिर से खुशियों से भर जाएगा.
* * * * *
चौदह साल पहले सब भाई एक साथ एक ही घर में अपने माता पिता और बच्चों के साथ रह रहे थे. बड़ा सा पैतृक मकान और सभी भाइयों के बच्चे ऐसा सोच ही नहीं पाते थे कि हमारे पिता अलग अलग हैं. सबमें गहरा प्यार था. सभी बच्चे लगभग हमउम्र थे, साथ खेलना और साथ स्कूल जाना, खाना पीना वे अलग होते ही कब थे. सब एक कमरे में सोते और धमाचौकड़ी मचाया करते. अगर कोई छोटा लड़ता तो बड़े भाई रवि के पास पहुँच जाते और वह सबका निपटारा करता था.
रवि १८ साल और २ दिन का हुआ था. अभी परसों ही उसका जन्मदिन धूमधाम से मनाया गया था. उस दिन वह अपने कॉलेज से आया था. उसका बी एस सी में एडमीशन हुआ था. घर के बाहर पड़ोसी के बच्चे और उसके छोटे भाई खेल रहे थे. खेलते खेलते बच्चों में लड़ाई हो गयी और वे गुत्थमगुत्था होने लगे और देखते ही देखते रवि के चचेरे भाई के सीने पर पड़ोसी का बेटा चढ़ गया और उसका गला दबाने लगा. उसे लगा कि ये तो मर जाएगा. उसने उसको तितर बितर करने के लिए एक ईंट का बड़ा सा टुकड़ा ऊपर से नीचे फेंका और ये क्या वह टुकड़ा तो सीने पर बैठे हुए बच्चे के सिर पर ही लगा और सिर से खून का फव्वारा बह निकला. सारे बच्चे भाग गए. उस बच्चे को लेकर अस्पताल भागे किन्तु उसने बीच में ही दम तोड़ दिया और बच्चों के खेल में हत्या का इल्जाम रवि के सिर पर आ गया.
पड़ोसी भी बड़ा व्यापारी था उसने रवि और उसके एक सगे और एक चचेरे भाई को नामजद किया. सभी बच्चे जेल में पहुँच गए.
उस बच्चे की अंत्येष्टि में सभी लोग गए क्योंकि यहाँ कोई दुश्मनी नहीं थी. मृत बालक के पिता ने उसी जगह सबके सामने कसम खाई कि "जैसे मैं अपने बच्चे को खोकर रो रहा हूँ, एक दिन वैसे ही तुमको भी रुलाऊंगा."
ये बात सब लोगों ने एक पिता के ह्रदय पर लगे आघात का असर समझ कर भुला दी. फिर मुकदमे बाजी शुरू हो गयी. कोई भी पैसे से कमजोर न था . इनके तीन बच्चों में दो नाबालिग थे सो उनको छोड़ दिया गया किन्तु रवि बालिग ही नहीं उसको अपराधी भी मना जा रहा था , उसकी जमानत नहीं होने दी उनलोगों ने. पड़ोसी के प्रभाव से भयभीत होकर और बच्चों के जीवन को देखते हुए ही उस घर को बेचने का निर्णय लिया गया. रवि को आजीवन कारावास कि सजा सुना दी गयी.
**चित्र गूगल के साभार * * * * *
रवि जेल के जीवन में रम गया क्योंकि वह कोई अपराधी प्रवृत्ति का लड़का नहीं था, उसको जमानत मिल सकती थी लेकिन अपने पैसे और प्रभाव से दूसरे पक्ष ने उसको बाहर नहीं आने दिया. अपने भाग्य के लेख मान कर वह वही आगे पढ़ने की तैयारी करने लगा और उसने ग्रेजुएशन कर ली. एक सभ्य परिवार का लड़का अपने आचरण से जेल में बहुत पसंद किया जाता था. उसको जेल के अस्पताल में दवा बांटने का काम दे दिया गया. उसने अपने काम में ही रूचि लेनी शुरू कर दी. कभी जब भी माता पिता आते तो वह हमेशा यही कहता - 'पापा मैं बिल्कुल ठीक हूँ, आप चिंता न करें.'
'मम्मी आप अब रोया मत कीजिये, शायद यही मेरे भाग्य में लिखा था. आप खुश रहिये कि आपका बेटा यहाँ भी सबके लिए काम कर रहा है.'
उसकी पसंद का खाना बनता तो माँ से खाया न जाता और वह चुपचाप खिसका कर उठ जाती. उसके दिन तो बेटे के घर वापस आने के इन्तजार में कट रहे थे. दिन , महीने, और वर्ष अपनी गति से गुजरते जा रहे थे. न काल की गति रुकी और न ही जीवन चक्र. छोटे भाई बहन सब पढ़ लिख कर तैयार हो गए थे. सब इसी इन्तजार में थे कि रवि घर आएगा तो उसकी शादी कर देंगे. वह कोई अपराधी तो है नहीं और कई लोग तैयार भी थे. फिर कोई बिजनेस करवा देंगे.
उस दिन के आने के ठीक दो दिन पहले जेल से फ़ोन आया कि ' आप लोग जेल पहुँचिये , आपके बेटे कि तबियत ख़राब हो गयी है.'
वह सब बदहवास से जेल की तरफ भागे तो उन्हें वहा अपना बेटा नहीं मिला बल्कि उसका शव मिला. सारा परिवार स्तब्ध कि आख़िर हुआ क्या था? जेल अधिकारियों के पास इसका कोई भी जबाव नहीं था . शायद फूड प्वाजनिंग हो गयी थी या फिर कुछ और वे नहीं बता सके. आखिर दौलत के लम्बे हाथों के नीचे जेल प्रशासन दब गया और दुश्मनों ने जो शायद इसी दिन के इन्तजार में थे अपनी चाल चल ही दी. वे ठगे से रह गए. किससे क्या कहें? किसको गालियाँ दें? किसको कोसें? कौन अब उनके बेटे को वापस लगा सकता है?
ये सिर्फ फिल्मों में ही देखा जाता है , किन्तु ये एक उस जीवन कि हकीकत है - जो अपने जीवन में कुछ देख ही नहीं पाया और माँ बाप जीवन भर का सदमा लेकर टूटे हुए जीवन के दिन पूरे कर रहे हैं और अब तो कोई इन्तजार भी नहीं बचा है.
आख़िर वह दिन आया ही नहीं.......................
**चित्र गूगल के साभार
घटना के बाद पिता की अकूत संपत्ति भी ख़त्म होने लगी थी. बहुत पैसा कमाया था - आयकर अधिकारी जो थे, किन्तु वो ऐसे जाएगा ऐसा नहीं सोचा था. मुकदमेबाजी में सब कुछ ख़त्म होने लगा और इस घटना के बाद तो उनकी प्रतिष्ठा भी गिरने लगी थी. मोहल्ले में कटाक्ष और व्यंग्य सुने नहीं जाते थे . संयुक्त परिवार के चारों भाइयों ने पैतृक मकान बेच कर अलग अलग दिशाओं में रुख कर लिए और मकान के ख़त्म होने के साथ ही शायद दिल भी दूर हो गए. जिन्दा सभी थे क्योंकि जीवन और मृत्यु अपने हाथ में नहीं होती और वह इस आशा में जी रहे थे कि रवि लौटेगा तो यह घर फिर से खुशियों से भर जाएगा.
* * * * *
चौदह साल पहले सब भाई एक साथ एक ही घर में अपने माता पिता और बच्चों के साथ रह रहे थे. बड़ा सा पैतृक मकान और सभी भाइयों के बच्चे ऐसा सोच ही नहीं पाते थे कि हमारे पिता अलग अलग हैं. सबमें गहरा प्यार था. सभी बच्चे लगभग हमउम्र थे, साथ खेलना और साथ स्कूल जाना, खाना पीना वे अलग होते ही कब थे. सब एक कमरे में सोते और धमाचौकड़ी मचाया करते. अगर कोई छोटा लड़ता तो बड़े भाई रवि के पास पहुँच जाते और वह सबका निपटारा करता था.
रवि १८ साल और २ दिन का हुआ था. अभी परसों ही उसका जन्मदिन धूमधाम से मनाया गया था. उस दिन वह अपने कॉलेज से आया था. उसका बी एस सी में एडमीशन हुआ था. घर के बाहर पड़ोसी के बच्चे और उसके छोटे भाई खेल रहे थे. खेलते खेलते बच्चों में लड़ाई हो गयी और वे गुत्थमगुत्था होने लगे और देखते ही देखते रवि के चचेरे भाई के सीने पर पड़ोसी का बेटा चढ़ गया और उसका गला दबाने लगा. उसे लगा कि ये तो मर जाएगा. उसने उसको तितर बितर करने के लिए एक ईंट का बड़ा सा टुकड़ा ऊपर से नीचे फेंका और ये क्या वह टुकड़ा तो सीने पर बैठे हुए बच्चे के सिर पर ही लगा और सिर से खून का फव्वारा बह निकला. सारे बच्चे भाग गए. उस बच्चे को लेकर अस्पताल भागे किन्तु उसने बीच में ही दम तोड़ दिया और बच्चों के खेल में हत्या का इल्जाम रवि के सिर पर आ गया.
पड़ोसी भी बड़ा व्यापारी था उसने रवि और उसके एक सगे और एक चचेरे भाई को नामजद किया. सभी बच्चे जेल में पहुँच गए.
उस बच्चे की अंत्येष्टि में सभी लोग गए क्योंकि यहाँ कोई दुश्मनी नहीं थी. मृत बालक के पिता ने उसी जगह सबके सामने कसम खाई कि "जैसे मैं अपने बच्चे को खोकर रो रहा हूँ, एक दिन वैसे ही तुमको भी रुलाऊंगा."
ये बात सब लोगों ने एक पिता के ह्रदय पर लगे आघात का असर समझ कर भुला दी. फिर मुकदमे बाजी शुरू हो गयी. कोई भी पैसे से कमजोर न था . इनके तीन बच्चों में दो नाबालिग थे सो उनको छोड़ दिया गया किन्तु रवि बालिग ही नहीं उसको अपराधी भी मना जा रहा था , उसकी जमानत नहीं होने दी उनलोगों ने. पड़ोसी के प्रभाव से भयभीत होकर और बच्चों के जीवन को देखते हुए ही उस घर को बेचने का निर्णय लिया गया. रवि को आजीवन कारावास कि सजा सुना दी गयी.
**चित्र गूगल के साभार * * * * *
रवि जेल के जीवन में रम गया क्योंकि वह कोई अपराधी प्रवृत्ति का लड़का नहीं था, उसको जमानत मिल सकती थी लेकिन अपने पैसे और प्रभाव से दूसरे पक्ष ने उसको बाहर नहीं आने दिया. अपने भाग्य के लेख मान कर वह वही आगे पढ़ने की तैयारी करने लगा और उसने ग्रेजुएशन कर ली. एक सभ्य परिवार का लड़का अपने आचरण से जेल में बहुत पसंद किया जाता था. उसको जेल के अस्पताल में दवा बांटने का काम दे दिया गया. उसने अपने काम में ही रूचि लेनी शुरू कर दी. कभी जब भी माता पिता आते तो वह हमेशा यही कहता - 'पापा मैं बिल्कुल ठीक हूँ, आप चिंता न करें.'
'मम्मी आप अब रोया मत कीजिये, शायद यही मेरे भाग्य में लिखा था. आप खुश रहिये कि आपका बेटा यहाँ भी सबके लिए काम कर रहा है.'
उसकी पसंद का खाना बनता तो माँ से खाया न जाता और वह चुपचाप खिसका कर उठ जाती. उसके दिन तो बेटे के घर वापस आने के इन्तजार में कट रहे थे. दिन , महीने, और वर्ष अपनी गति से गुजरते जा रहे थे. न काल की गति रुकी और न ही जीवन चक्र. छोटे भाई बहन सब पढ़ लिख कर तैयार हो गए थे. सब इसी इन्तजार में थे कि रवि घर आएगा तो उसकी शादी कर देंगे. वह कोई अपराधी तो है नहीं और कई लोग तैयार भी थे. फिर कोई बिजनेस करवा देंगे.
उस दिन के आने के ठीक दो दिन पहले जेल से फ़ोन आया कि ' आप लोग जेल पहुँचिये , आपके बेटे कि तबियत ख़राब हो गयी है.'
वह सब बदहवास से जेल की तरफ भागे तो उन्हें वहा अपना बेटा नहीं मिला बल्कि उसका शव मिला. सारा परिवार स्तब्ध कि आख़िर हुआ क्या था? जेल अधिकारियों के पास इसका कोई भी जबाव नहीं था . शायद फूड प्वाजनिंग हो गयी थी या फिर कुछ और वे नहीं बता सके. आखिर दौलत के लम्बे हाथों के नीचे जेल प्रशासन दब गया और दुश्मनों ने जो शायद इसी दिन के इन्तजार में थे अपनी चाल चल ही दी. वे ठगे से रह गए. किससे क्या कहें? किसको गालियाँ दें? किसको कोसें? कौन अब उनके बेटे को वापस लगा सकता है?
ये सिर्फ फिल्मों में ही देखा जाता है , किन्तु ये एक उस जीवन कि हकीकत है - जो अपने जीवन में कुछ देख ही नहीं पाया और माँ बाप जीवन भर का सदमा लेकर टूटे हुए जीवन के दिन पूरे कर रहे हैं और अब तो कोई इन्तजार भी नहीं बचा है.
आख़िर वह दिन आया ही नहीं.......................
रविवार, 17 अक्टूबर 2010
आज भी ...........!
क्या आज भी हम वहीं है , जहाँ हम आज से पचास साल पहले थे. इसका ताजा उदाहरण मैंने देखा --
मेरी बहुत करीबी की बहू अपने विवाह के २ साल बाद ही विधवा हो गयी. उसके पास एक साल का बेटा भी था. सारे घर वालों और रिश्तेदारों में एक प्रश्न चिह्न था कि अब क्या होगा? इतनी सी उम्र में लड़की विधवा हो गयी वह माँ भी है. लेकिन मेरी उन रिश्तेदार ने बहुत ही बहादुरी से काम लिया, उन्होंने संस्कार के समय बहू को छोटी सी बिंदी और दो दो चूड़ियाँ दीं और कहा कि तुम मेरी बहू ही रहोगी. लेकिन उन्होंने अपने मन में बेटे के शव उठाने से पहले ही संकल्प कर लिया था कि वे अपनी बहू को छोटे बेटे से ब्याह कर इसी घर में रखेंगी और उसके बेटे को बाप का प्यार मिलेगा और बहू को जीवन भर एक अभिशप्त जीवन नहीं गुजरना पड़ेगा.
उस दिन उस स्थिति में पड़ोसी और रिश्तेदार कितने प्रश्नों के साथ वहाँ खुसर पुसर कर रहे थे --
'पता नहीं कैसी किस्मत है इस लड़की की?'
'अब इसका क्या होगा?'
'बच्चा ले जाएगी या फिर छोड़ जाएगी?'
'दूसरी शादी कौन करेगा? बच्चे वाली है.'
इन प्रश्नों से जुड़े लोग पढ़े लिखे और समझदार कहे जाने वाले थे. लेकिन वे उस माँ के निर्णय से वाकिफ न थे.
उन्होंने बहू को मायके भी नहीं भेजा और स्वयं भी बहू की तरह ही सादा रहने लगी, उन्होंने एक साल तक कोई शादी विवाह या अन्य उत्सव में जाना बंद रखा क्योंकि वह जानती थी कि कहीं भी जाने पर उनको कम से कम अच्छे कपड़े और जेवर तो पहने ही पड़ेंगे और इससे उनकी बहू को दुःख होगा. एक साल बीतने पर उन्होंने अपने बड़े बेटे की बरसी की और फिर आर्य समाज मंदिर में छोटे बेटे के साथ शादी कर दी.
इस शादी के बाद उनकी देवरानी ने अपने घर में पूजा रखी , जिसमें सुहागन औरतें ही शामिल होती हैं. उसमें अपनी जिठानी को भी बुलाया और बहू को भी, लेकिन पूजा में शामिल होने के वक्त अपनी जेठानी से बोली - "इसमें आप शामिल हो जाइये और बहू को रहने दीजिये."
उनका आशय यह था कि बहू तो विधवा हो चुकी है तो उनको अभी भी सधवा स्वीकार्य नहीं है. उनकी जेठानी एकदम उठ कर खड़ी हो गयी - "मैं क्यों और मेरी बहू क्यों नहीं? अगर बहू नहीं तो मैं भी नहीं. तुमने क्या इसका अपमान करने के लिए यहाँ बुलाया था. वह मेरे छोटे बेटे कि पत्नी है और आइन्दा से मुझे भी बुलाने की जरूरत नहीं है."
हम कहाँ से कहाँ पहुँच रहे हैं और हमारी सोच कहीं कहीं हमें कितना पिछड़ा हुआ साबित कर देती है? हमें अपने पर शर्म आने लगती है.
बुधवार, 6 अक्टूबर 2010
वसीयत !
सबसे पहले मैं बता दूं किये कहानी बिल्कुल भी नहीं है बल्कि हाल ही में घटी एक सच्ची कहानी है. वैसे कहानियां आती कहाँ से हैं? लेकिन जब अपने घर और परिवार के करीब घटती है तो लिखना अधिक मुश्किल होता है. फिर भी कलम जब मुझे नहीं छोड़ती है तो फिर रिश्तों का लिहाज कर करेगी.
कभी कभी ऐसा होता है कि जिसके लिए कोई तैयार नहीं होता, शायद भाग्य के लेख ऐसे होते हैं या ईश्वर कि मर्जी ऐसी होती है कि इंसान को उसकी नेकी और खुद्दारी के जीवन जीते हुए ही बिना किसी के हाथ से कुछ भी मांगे चल देता है और तब यही कहना होता है कि उस ईश्वर ने उसका मान रख लिया. यह भी कहने का मन होता है कि हाँ इस तरह तूने न्याय किया भगवान.
उस दिन सुबह फ़ोन कि घंटी से ही नीद खुली --"रात में ....मामाजी नहीं रहे."
"अचानक?" इनके मुँह से निकला .
"हाँ कुछ ऐसा ही समझ लो."
"उनके पास कौन था?" हमें पाता था कि मामाजी अकेले ही रहते थे.
"मैं."
सूचना देने वाले इनके मामा के बेटे थे. दिवंगत आत्मा के हमराज और हमउम्र भांजे थे. मामाजी का बचपन और पढ़ाई अपनी बहन के यहाँ हुई थी और इससे भांजे से उनके आत्मीय सम्बन्ध आरम्भ से ही थे. मेरे पतिदेव भी और बच्चों कि तरह से ननिहाल जाते ही थे तो उनसे बहुत छोटे होने पर भी उनकी आत्मीयता अच्छी ही थी.
यहाँ के पौश इलाके में उनकअ तीन मंजिल का मकान है और उसमें वे और उनके किरायेदार ही रहते थे. उनके तीन बेटे - एक आयकर अधिकारी (परिवार यही पर रहता है). दूसरा आई जी बाहर तैनात और तीसरा सी बी आई अफसर और वह भी बाहर. बेटे और डॉक्टर दामाद यहीं पर हैं. प्रशासनिक पद से सेवानिवृत - अपने जीवन में बहुतों का जीवन संवर दिया, जिनको लगवा सके नौकरी में लगवा दिया. करोड़ों कि संपत्ति. जिस रिश्तेदार को जरूरतमंद समझ दिल खोलकर सहायता की. बच्चों कि शादी के बाद ही मामी का निधन हो गया था सो वह अकेले ही रहते थे.
कोई उनके साथ रहने को तैयार नहीं था, जो बाहर थे वो बाहर थे. कभी जाना हुआ और लगा कि इनको लग रहा है कि उनकी स्वतंत्रता में खलल पड़ रही है तो तुरंत ही चल दिए. फिर अपने शहर और घर से प्यार किसे नहीं होता? शहर वाले भी नहीं रखना चहेते थे रखते क्या उस घर में ही नहीं रहना पसंद था. सो अलग अपनी कालोनी में रहते थे. हम ठहरे रिश्तेदार सो मामा कि भी सुनी और उनके बेटों कि भी लेकिन निर्णय लेने कि क्षमता थी .
मौत वाले दिन का वाक्य था, उन्होंने अपने भांजे को फ़ोन किया कि मैंने डॉक्टर से समय ले लिया है और aaj रात १० बजे का समय दिया है. तुम आ जाना तो मेरे साथ चलना. पास ही बहू और पोते सब रहते हैं लेकिन किसी को बताने कि जरूरत नहीं समझी और न ही सूचना देने कि जरूरत समझी. जब भांजे पहुंचे तो उन्होंने बताया कि आज सुबह मुझे खून कि उलटी हुई है इसी लिए मैंने डॉक्टर से समय लिया . लौटने में हमें देर हो जाएगी इस लिए तुम रात मेरे पास ही रुक जाना. स्थिति गंभीर समझ कर भांजे ने उनके बेटे को फ़ोन किया तो पाता चला कि वे बाहर से अभी आये हैं और थके हुए हैं. इसलिए डॉक्टर को आप ही दिखा आइये मैं सुबह आऊंगा .
जब रात जाने का समय आया तो भांजे से बोले - 'देखो सुबह से दुबारा तो मुझे कोई परेशानी हुई नहीं है, अब लौटने में भी बहुत देर हो जाएगी फिर रिक्शे से चलना होगा. सुबह चलेंगे . '
खाना खाकर बोले टी अब तुम भी सो जाओ और मैं भी सोता हूँ. दोनों ही सो गए. पता नहीं कब रात उन्हें एक बार खून कि उलटी हुई , वह उठकर बेसिन तक गए और फिर जब दुबारा हुई तो वे लौटकर सोफे पर ही बैठ गए और भांजे को हिलाया भर भांजे उठ गए तो वे होश में थे और बोले मुझे फिर उलटी हुई है और आँखें बंद कर ली . फिर वे चिरनिद्रा में चले गए. भांजे घबरा गए और उन्होंने किरायेदार को बुलाया . उसके बाद उनके बेटे को फ़ोन किया, वह गाड़ी लेकर आया और नर्सिंग होम ले गए वहाँ डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.
रात के दो बजे थे , बाकी बेटे और बेटी को भी खबर कर दी गयी . जो जहाँ था वहाँ से अपनी गाड़ी से या फ्लाईट पकड़ कर आ गए. शाम 4 बजे वह पंचतत्व में विलीन हो गए.
सभी बच्चे अच्छी ही नहीं बल्कि बहुत अच्छी स्थिति में थे लेकिन शायद पैसा ऐसी चीज होती है कि जहाँ सारे रिश्ते पड़ोसियों से भी बदतर हो जाते हैं. उन्हें पंचतत्व में विलीन हुए अभी कुछ ही घटे हुए थे. सभी बेटे बहुएँ और बेटी घर में थे. बड़े होने के नाते और मामाजी से सबसे घनिष्ठ और आत्मीय होने के नाते भांजे भी रात में वहीं रुके हुए थे. वे मामा के राजदार भी थे.
वे सो गए तो हाल में जोर जोर से बोलने की आवाजें आ रही थी, बीच में नीद टूटी तो सोचा कि पिता और ससुर की मृत्यु के बाद नीद नहीं आ रही होगी तो सभी एक साथ बातें कर रहे होंगे . तब तक वे भी चैतन्य हो चुके थे और आवाजें उनको साफ साफ उन्हें देने लगी थीं.
---मम्मी के मरने पर सारी सदियाँ आप ही लेकर गयीं थी.
==वो मम्मी ने पहले ही पापा को बोल दिया था कि ये सदियाँ मुझे दे दी जाय.
--अब क्या और चाहती हैं , आपके तीनों बच्चों की शादी में पापा ने कितना खर्च किया था? अब भी लेना चाहती हो .
--उससे क्या? वो उन्होंने अपनी मर्जी से खर्च किया था.
--अब मम्मी के जेवर से भी कुछ और चाहिए ?
--देखती हूँ कि क्या लेना है ?
--पापा कि वसीयत जो भी हो , हम सब आपस में सहमति से बाँट लेंगे .
--ऐसा क्यों ? फिर वसीयत का मतलब क्या हुआ ?
--कुछ भी हो , उन्होंने हम सबको कभी बराबर नहीं समझा , हमेशा मुझे दूर दूर रखा
--क्यों कभी ये सोचा तुमने?
-- हाँ , क्योंकि हम उनकी तानाशाही के नीचे सांस नहीं लेना चाहते थे, हम यहाँ होकर भी उनसे अलग रहे. क्या बुरा किया तुम लोग तो बाहर रहकर स्वतन्त्र हो कर जी रहे हो और हम उनके शासन में रहें.
--एक जगह रहने से कुछ तो तकलीफ होती ही है लेकिन फर्ज भी कोई चीज होती है.
--फर्ज तो सभी के हैं, दीदी भी तो यहाँ है कभी ले जाती उनको और रखती अपने पास.
--वो मेरे घर रहना नहीं चाहते थे, बेटी का घर जो था.
--वाह ! देने के लिए बेटी पहले और करने के लिए बेटे . ये अच्छा सिद्धांत है.
--मेरे पापा को देखो रिटायर होने पर दोनों बेटों को बराबर बराबर बाँट दिया है.
--और आगे उसके बाद वृन्दावन में आश्रम में रह रहे हैं, अब कोई पूछता भी नहीं है उंको.
--वो तो अपनी मर्जी से गए हैं, सेवा भाव से वर्ना उन्हें क्या कमी है?
--बस बस रहने दो.
भांजे इन सब बातों आजिज आ गए और वह हाल के दरवाजे पर आकर खड़े हो गए. उनसे रहा नहीं गया -- 'बस करो तुम लोग इतने अच्छे अच्छे जगह पर हो और पैसे की भी कोई कमी नहीं है, फिर भी इस तरह से लड़ रहे हो . are उनकी चिता की रख तो ठंडी हो जाने देते . अरे लड़ो तो इसपर की उनकी अश्थियों को ठिकाने कौन lagayega . तुम्चार हो अरे सब उसको बाँट कर चारों धाम में जाकर विसर्जित करते तो शायद उन्हें अब तो शांति मिल जाती . अगर वह भी न कर सको तो मुझे दे देना मैं कर दूंगा .'
उनको गुस्से में देख कर सब धीरे धीरे खिसक लिए क्योंकि मामा के अन्तरंग और हमराज होने के नाते सभी उनकी इज्जत तो करते ही थे . वे सोफे पर सिर पकड़ कर बैठ गए. उनके दिमाग में ये चल रहा था कि अभी जब इनको वसीयत के बारे में कुछ पता नहीं है तब तो ये हाल है और अगर इन्हें उसके बारे में पता चल गया तो क्या होगा ?
वास्तव में मामा की वसीयत के एक गवाह वह भी थे और मामा ने अपने बच्चों को उसमें कुछ भी नहीं दिया था . मामा की वसीयत थी --
'मेरी चल अचल संपत्ति से मेरे बेटे और बेटी को कुछ भी नहीं दिया जाएगा . मेरी जो भी संपत्ति शेयर , मकान और बैंक बैलेंस है वह अमुक ट्रस्ट में जमा कर दिया जाएगा और उसकी जिम्मेदारी है कि मेरे मकान के नीचे के हिस्से में एक वृद्धाश्रम खोल दे . जिसमें मेरे जैसे उपेक्षित वृद्धों को रहने दिया जाएगा और वे सभी वृद्ध अगर सक्षम हैं तो अपनी संपत्ति इस ट्रस्ट में जमा कर दें ताकि इसका खर्च उठाने में को भी परेशानी न हो . शेष मकान का किराया और इस आश्रम की व्यवस्था ट्रस्ट ही देखेगा . मेरे पैसे से ट्रस्ट गरीब लड़कियों की शादी की व्यवस्था भी करेगा . इस धन के संचय और व्यय की जिम्मेदारी इस ट्रस्ट की रहेगी . अगर मेरे बच्चों में से कोई इसके बाद इस ट्रस्ट में अपनी सहयोगत्मक सेवाएं देना चाहें तो उनको इसमें सदस्यता प्रदान की जा सकती है. '
कभी कभी ऐसा होता है कि जिसके लिए कोई तैयार नहीं होता, शायद भाग्य के लेख ऐसे होते हैं या ईश्वर कि मर्जी ऐसी होती है कि इंसान को उसकी नेकी और खुद्दारी के जीवन जीते हुए ही बिना किसी के हाथ से कुछ भी मांगे चल देता है और तब यही कहना होता है कि उस ईश्वर ने उसका मान रख लिया. यह भी कहने का मन होता है कि हाँ इस तरह तूने न्याय किया भगवान.
उस दिन सुबह फ़ोन कि घंटी से ही नीद खुली --"रात में ....मामाजी नहीं रहे."
"अचानक?" इनके मुँह से निकला .
"हाँ कुछ ऐसा ही समझ लो."
"उनके पास कौन था?" हमें पाता था कि मामाजी अकेले ही रहते थे.
"मैं."
सूचना देने वाले इनके मामा के बेटे थे. दिवंगत आत्मा के हमराज और हमउम्र भांजे थे. मामाजी का बचपन और पढ़ाई अपनी बहन के यहाँ हुई थी और इससे भांजे से उनके आत्मीय सम्बन्ध आरम्भ से ही थे. मेरे पतिदेव भी और बच्चों कि तरह से ननिहाल जाते ही थे तो उनसे बहुत छोटे होने पर भी उनकी आत्मीयता अच्छी ही थी.
यहाँ के पौश इलाके में उनकअ तीन मंजिल का मकान है और उसमें वे और उनके किरायेदार ही रहते थे. उनके तीन बेटे - एक आयकर अधिकारी (परिवार यही पर रहता है). दूसरा आई जी बाहर तैनात और तीसरा सी बी आई अफसर और वह भी बाहर. बेटे और डॉक्टर दामाद यहीं पर हैं. प्रशासनिक पद से सेवानिवृत - अपने जीवन में बहुतों का जीवन संवर दिया, जिनको लगवा सके नौकरी में लगवा दिया. करोड़ों कि संपत्ति. जिस रिश्तेदार को जरूरतमंद समझ दिल खोलकर सहायता की. बच्चों कि शादी के बाद ही मामी का निधन हो गया था सो वह अकेले ही रहते थे.
कोई उनके साथ रहने को तैयार नहीं था, जो बाहर थे वो बाहर थे. कभी जाना हुआ और लगा कि इनको लग रहा है कि उनकी स्वतंत्रता में खलल पड़ रही है तो तुरंत ही चल दिए. फिर अपने शहर और घर से प्यार किसे नहीं होता? शहर वाले भी नहीं रखना चहेते थे रखते क्या उस घर में ही नहीं रहना पसंद था. सो अलग अपनी कालोनी में रहते थे. हम ठहरे रिश्तेदार सो मामा कि भी सुनी और उनके बेटों कि भी लेकिन निर्णय लेने कि क्षमता थी .
मौत वाले दिन का वाक्य था, उन्होंने अपने भांजे को फ़ोन किया कि मैंने डॉक्टर से समय ले लिया है और aaj रात १० बजे का समय दिया है. तुम आ जाना तो मेरे साथ चलना. पास ही बहू और पोते सब रहते हैं लेकिन किसी को बताने कि जरूरत नहीं समझी और न ही सूचना देने कि जरूरत समझी. जब भांजे पहुंचे तो उन्होंने बताया कि आज सुबह मुझे खून कि उलटी हुई है इसी लिए मैंने डॉक्टर से समय लिया . लौटने में हमें देर हो जाएगी इस लिए तुम रात मेरे पास ही रुक जाना. स्थिति गंभीर समझ कर भांजे ने उनके बेटे को फ़ोन किया तो पाता चला कि वे बाहर से अभी आये हैं और थके हुए हैं. इसलिए डॉक्टर को आप ही दिखा आइये मैं सुबह आऊंगा .
जब रात जाने का समय आया तो भांजे से बोले - 'देखो सुबह से दुबारा तो मुझे कोई परेशानी हुई नहीं है, अब लौटने में भी बहुत देर हो जाएगी फिर रिक्शे से चलना होगा. सुबह चलेंगे . '
खाना खाकर बोले टी अब तुम भी सो जाओ और मैं भी सोता हूँ. दोनों ही सो गए. पता नहीं कब रात उन्हें एक बार खून कि उलटी हुई , वह उठकर बेसिन तक गए और फिर जब दुबारा हुई तो वे लौटकर सोफे पर ही बैठ गए और भांजे को हिलाया भर भांजे उठ गए तो वे होश में थे और बोले मुझे फिर उलटी हुई है और आँखें बंद कर ली . फिर वे चिरनिद्रा में चले गए. भांजे घबरा गए और उन्होंने किरायेदार को बुलाया . उसके बाद उनके बेटे को फ़ोन किया, वह गाड़ी लेकर आया और नर्सिंग होम ले गए वहाँ डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.
रात के दो बजे थे , बाकी बेटे और बेटी को भी खबर कर दी गयी . जो जहाँ था वहाँ से अपनी गाड़ी से या फ्लाईट पकड़ कर आ गए. शाम 4 बजे वह पंचतत्व में विलीन हो गए.
सभी बच्चे अच्छी ही नहीं बल्कि बहुत अच्छी स्थिति में थे लेकिन शायद पैसा ऐसी चीज होती है कि जहाँ सारे रिश्ते पड़ोसियों से भी बदतर हो जाते हैं. उन्हें पंचतत्व में विलीन हुए अभी कुछ ही घटे हुए थे. सभी बेटे बहुएँ और बेटी घर में थे. बड़े होने के नाते और मामाजी से सबसे घनिष्ठ और आत्मीय होने के नाते भांजे भी रात में वहीं रुके हुए थे. वे मामा के राजदार भी थे.
वे सो गए तो हाल में जोर जोर से बोलने की आवाजें आ रही थी, बीच में नीद टूटी तो सोचा कि पिता और ससुर की मृत्यु के बाद नीद नहीं आ रही होगी तो सभी एक साथ बातें कर रहे होंगे . तब तक वे भी चैतन्य हो चुके थे और आवाजें उनको साफ साफ उन्हें देने लगी थीं.
---मम्मी के मरने पर सारी सदियाँ आप ही लेकर गयीं थी.
==वो मम्मी ने पहले ही पापा को बोल दिया था कि ये सदियाँ मुझे दे दी जाय.
--अब क्या और चाहती हैं , आपके तीनों बच्चों की शादी में पापा ने कितना खर्च किया था? अब भी लेना चाहती हो .
--उससे क्या? वो उन्होंने अपनी मर्जी से खर्च किया था.
--अब मम्मी के जेवर से भी कुछ और चाहिए ?
--देखती हूँ कि क्या लेना है ?
--पापा कि वसीयत जो भी हो , हम सब आपस में सहमति से बाँट लेंगे .
--ऐसा क्यों ? फिर वसीयत का मतलब क्या हुआ ?
--कुछ भी हो , उन्होंने हम सबको कभी बराबर नहीं समझा , हमेशा मुझे दूर दूर रखा
--क्यों कभी ये सोचा तुमने?
-- हाँ , क्योंकि हम उनकी तानाशाही के नीचे सांस नहीं लेना चाहते थे, हम यहाँ होकर भी उनसे अलग रहे. क्या बुरा किया तुम लोग तो बाहर रहकर स्वतन्त्र हो कर जी रहे हो और हम उनके शासन में रहें.
--एक जगह रहने से कुछ तो तकलीफ होती ही है लेकिन फर्ज भी कोई चीज होती है.
--फर्ज तो सभी के हैं, दीदी भी तो यहाँ है कभी ले जाती उनको और रखती अपने पास.
--वो मेरे घर रहना नहीं चाहते थे, बेटी का घर जो था.
--वाह ! देने के लिए बेटी पहले और करने के लिए बेटे . ये अच्छा सिद्धांत है.
--मेरे पापा को देखो रिटायर होने पर दोनों बेटों को बराबर बराबर बाँट दिया है.
--और आगे उसके बाद वृन्दावन में आश्रम में रह रहे हैं, अब कोई पूछता भी नहीं है उंको.
--वो तो अपनी मर्जी से गए हैं, सेवा भाव से वर्ना उन्हें क्या कमी है?
--बस बस रहने दो.
भांजे इन सब बातों आजिज आ गए और वह हाल के दरवाजे पर आकर खड़े हो गए. उनसे रहा नहीं गया -- 'बस करो तुम लोग इतने अच्छे अच्छे जगह पर हो और पैसे की भी कोई कमी नहीं है, फिर भी इस तरह से लड़ रहे हो . are उनकी चिता की रख तो ठंडी हो जाने देते . अरे लड़ो तो इसपर की उनकी अश्थियों को ठिकाने कौन lagayega . तुम्चार हो अरे सब उसको बाँट कर चारों धाम में जाकर विसर्जित करते तो शायद उन्हें अब तो शांति मिल जाती . अगर वह भी न कर सको तो मुझे दे देना मैं कर दूंगा .'
उनको गुस्से में देख कर सब धीरे धीरे खिसक लिए क्योंकि मामा के अन्तरंग और हमराज होने के नाते सभी उनकी इज्जत तो करते ही थे . वे सोफे पर सिर पकड़ कर बैठ गए. उनके दिमाग में ये चल रहा था कि अभी जब इनको वसीयत के बारे में कुछ पता नहीं है तब तो ये हाल है और अगर इन्हें उसके बारे में पता चल गया तो क्या होगा ?
वास्तव में मामा की वसीयत के एक गवाह वह भी थे और मामा ने अपने बच्चों को उसमें कुछ भी नहीं दिया था . मामा की वसीयत थी --
'मेरी चल अचल संपत्ति से मेरे बेटे और बेटी को कुछ भी नहीं दिया जाएगा . मेरी जो भी संपत्ति शेयर , मकान और बैंक बैलेंस है वह अमुक ट्रस्ट में जमा कर दिया जाएगा और उसकी जिम्मेदारी है कि मेरे मकान के नीचे के हिस्से में एक वृद्धाश्रम खोल दे . जिसमें मेरे जैसे उपेक्षित वृद्धों को रहने दिया जाएगा और वे सभी वृद्ध अगर सक्षम हैं तो अपनी संपत्ति इस ट्रस्ट में जमा कर दें ताकि इसका खर्च उठाने में को भी परेशानी न हो . शेष मकान का किराया और इस आश्रम की व्यवस्था ट्रस्ट ही देखेगा . मेरे पैसे से ट्रस्ट गरीब लड़कियों की शादी की व्यवस्था भी करेगा . इस धन के संचय और व्यय की जिम्मेदारी इस ट्रस्ट की रहेगी . अगर मेरे बच्चों में से कोई इसके बाद इस ट्रस्ट में अपनी सहयोगत्मक सेवाएं देना चाहें तो उनको इसमें सदस्यता प्रदान की जा सकती है. '
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