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रविवार, 17 अक्टूबर 2010

आज भी ...........!

                   क्या आज भी  हम वहीं है , जहाँ हम आज से पचास साल पहले थे. इसका ताजा उदाहरण मैंने देखा --
मेरी बहुत करीबी की बहू अपने विवाह के २ साल बाद ही विधवा हो गयी. उसके पास एक साल का बेटा भी था. सारे घर वालों और रिश्तेदारों में एक प्रश्न चिह्न था कि अब क्या होगा? इतनी सी उम्र में लड़की विधवा हो गयी वह  माँ भी है. लेकिन मेरी उन रिश्तेदार ने बहुत ही बहादुरी से काम लिया, उन्होंने संस्कार के समय बहू को छोटी सी बिंदी और दो दो चूड़ियाँ दीं और कहा  कि तुम मेरी बहू ही रहोगी. लेकिन उन्होंने अपने मन में बेटे के शव उठाने से पहले ही संकल्प कर लिया था कि वे अपनी बहू को छोटे बेटे से ब्याह कर इसी घर में रखेंगी और उसके बेटे को बाप का प्यार मिलेगा और बहू को जीवन भर एक अभिशप्त जीवन नहीं गुजरना पड़ेगा. 
              उस दिन उस स्थिति में पड़ोसी और रिश्तेदार कितने प्रश्नों के साथ वहाँ खुसर पुसर कर रहे थे --
'पता नहीं कैसी किस्मत है इस लड़की की?'
'अब इसका क्या होगा?'
'बच्चा ले जाएगी या फिर छोड़ जाएगी?'
'दूसरी शादी कौन करेगा? बच्चे वाली है.' 
               इन प्रश्नों से जुड़े लोग पढ़े लिखे और समझदार कहे जाने वाले थे. लेकिन वे उस माँ के निर्णय से वाकिफ न थे.
उन्होंने बहू को मायके भी नहीं भेजा और स्वयं  भी बहू की तरह ही सादा रहने लगी, उन्होंने एक साल तक कोई शादी विवाह या अन्य उत्सव में जाना बंद रखा क्योंकि वह जानती थी कि कहीं भी जाने पर उनको कम से कम अच्छे कपड़े और जेवर तो पहने ही पड़ेंगे और इससे उनकी बहू को दुःख होगा. एक साल बीतने पर उन्होंने अपने बड़े बेटे की बरसी की और फिर आर्य समाज मंदिर में छोटे बेटे के साथ शादी कर दी. 
              इस शादी के बाद उनकी देवरानी ने अपने घर में पूजा रखी , जिसमें सुहागन औरतें ही शामिल होती हैं. उसमें अपनी जिठानी को भी बुलाया और बहू को भी, लेकिन पूजा में शामिल होने के वक्त अपनी जेठानी से बोली - "इसमें आप शामिल हो जाइये और बहू को रहने दीजिये." 
              उनका आशय यह था कि बहू तो विधवा हो चुकी है तो उनको अभी भी सधवा स्वीकार्य नहीं है. उनकी जेठानी एकदम उठ कर खड़ी हो गयी - "मैं क्यों और मेरी बहू क्यों नहीं? अगर बहू नहीं तो मैं भी नहीं. तुमने क्या इसका अपमान करने के लिए यहाँ बुलाया था. वह मेरे छोटे बेटे कि पत्नी है और आइन्दा से मुझे भी बुलाने की जरूरत नहीं है." 
               हम कहाँ से कहाँ पहुँच रहे हैं और हमारी सोच कहीं कहीं हमें कितना पिछड़ा हुआ साबित कर देती है? हमें अपने पर शर्म आने लगती है.