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मंगलवार, 20 जनवरी 2015

फर्ज बेटे का !

           जीवन में बेटे अपना फर्ज निभाते है और अपने माता-पिता या फिर अपने पालने वाले की देखभाल करते हैं और हमारे सामाजिक मूल्यों के अंतर्गत यही न्यायसंगत माना जाता है. लेकिन बदलते हुए परिवेश और सामाजिक वातावरण में बेटे इस कार्य को न भी करें तो कोई अचरज की बात नहीं समझी जाती है. माता-पिता अगर सक्षम है तो अपने आप और नहीं हैं तो मेहनत करके अपना जीवनयापन कर ही लेते हैं। 

                                 हो सकता कि इस बात पर कोई विश्वास न करे लेकिन ये यथार्थ है - कानपुर में किसी किसी इलाकों में बंदरों का बड़ा आतंक है ऐसे ही इलाके में यहाँ का रीजेंसी अस्पताल है। यहाँ पर एक लंगूर का मालिक सुबह एक लम्बी रस्सी के साथ अपने लंगूर को बाँध जाता है और उसके डर से बंदरों का आतंक नहीं मचता। अस्पताल उसके मालिक को ८ हजार रुपये मासिक अदा करता है। अगर उस मालिक का कोई बेटा होता तो शायद इस फर्ज को नहीं भी निभाता लेकिन एक बेजुबान कैसे अपने मालिक का जीवनयापन का साधन बना हुआ है। 
                             कहते हैं कि कुछ कर्ज ऐसे होते हैं कि जिन्हें लेने के बाद इस जन्म न सही अगले जन्मों में चुकाना पड़ता है और शायद यही बात इस लंगूर पर लागू होती है।

बुधवार, 1 अक्टूबर 2014

आँगन की लकीर !

                                      इसे ही हम समाज कहते हैं , जो अच्छा हो तो भी उसमें कुछ बुराई खोजने की आदत , कुछ गलतफहमियां पैदा करने की बात , कुछ कहावतों का सहारा लेकर उनको सत्य सिद्ध करने की आदत या फिर चिता की आग में हाथ सेंकने की आदत।  शुभचिंतक बन आँगन में लकीर खींचने की आदत।  
                                     मैं इस काम से बहुत आहत हुई।  मेरी माँ की  मिलने वाली ( उनके पति मेरे पापा के मित्र थे ) उस दिन घर आयीं।  हम तीन बहन भाई और भाभी सब बैठे हुए थे उनके पास।  इधर उधर की बातें करने के बाद बोलने लगीं -  "देखो जब तक माँ तब तक ही मायका होता है , अब तो भाई भाभी किसी कामकाज में बुलाएँगे  तभी आओगी न।  माँ होती है तो कभी कभी उनसे मिलने चली आयीं तुम लोग। " 
                                     उनके कहे शब्द समाज  बनायीं हुई धारणा के अनुरूप थे और कभी कभी ये प्रत्यक्ष भी देखे जाते हैं लेकिन अवसर और माहौल के अनुसार ही कुछ कहा जाता है।  ये बात सुनकर मेरे भाई भाभी के चेहरे के भाव और भरी हुई आँखें देख कर मुझे एकदम गुस्सा आ गया।  उस समय मुझे इस बात का ध्यान ही नहीं रहा कि वे हमसे बहुत बड़ी हैं और हम उनकी बहुत इज्जत करते हैं।  अभी माँ को गए हुए सिर्फ ३ दिन हुए थे और लोग अभी से हमारे बीच दीवार खींचने लगे।  
                                     मेरे भाई ने पिछले ही महीने माँ की सारे अकाउंट में मुझे नॉमिनी बनाया था क्योंकि उन्हें था कि कोई ये न कह सके कि माँ  के पैसे के मालिक खुद बन गए।  चार बहनों में वे सबसे बड़े और इकलौते भाई है।  
                                       मैंने उनसे कहा - 'चाची ऐसी बात नहीं है , हम पांच अभी भी एक दूसरे के लिए तैयार रहेंगे।  जब भी जिसको जरूरत होगी हम सब साथ खड़े होंगे।  माँ तो हर समय हमें दिशा नहीं देती थी।  हम जैसे पहले आते थे वैसे ही अब भी आते रहेंगे।  भाई  के सुख दुःख में सबसे पहले मैं आती हूँ क्योंकि मैं सबसे पास हूँ।  किसी भी मुसीबत या परेशानी में उनके बच्चे भी दूर हैं और सबसे पास  के होने के नाते मैं सबसे  रहूंगी और मेरे लिए भाई साहब।  अभी माँ थी लेकिन सारा कुछ करते तो भाई और भाभी ही , चाहे मेरी बेटियों की शादी में भात पहनने की बात हो या फिर कोई और अवसर।  माँ तो नहीं जाती थी।  '
                                      इसके बाद उन्हें कुछ भी बोलते नहीं बना।  कैसे लोग बिना मांगे सलाह देने लगते हैं और अधिकार सहित।  

सोमवार, 22 सितंबर 2014

दुर्भाग्य मेरा !

                                     कहते है न कि कुछ चीजें इंसान अपनी मेहनत और प्रयास से हासिल कर लेता है लेकिन कुछ वह चाह कर भी नहीं पा सकता है। मुझे २३ साल पहले तो पापा के निधन की खबर तक नहीं मिली क्योंकि उस समय फ़ोन इतने कॉमन नहीं थे।  टेलीग्राम ही एक मात्र साधन थे।वह भी मुझे आज तक नहीं मिला। दो दिन तक नहीं पहुंची तब भाई साहब ने किसी भेज कर सूचित करवाया।    उनके अंतिम दर्शन तो बहुत बड़ी बात है।  जब कि  कानपूर और उरई के बीच २०० किमी का फासला था।  कुछ हालात भी ऐसे थे। 
                                      लेकिन माँ के अंतिम समय मेरा उनके पास न होना मेरा  दुर्भाग्य ही  कहा जाएगा।  माँ दो महीने से हाथ में फ्रैक्चर के कारण बिस्तर पर थीं और मैं भी पिछले मातृ दिवस से हर माह चाहे दो दिन के लिए ही सही उनके पास जा रही थी।  जो कि मेरी शादी  ३४ वर्षों में ऐसा पहली बार हो रहा था।  मैं ९ अगस्त को उनके पास से आई थी।  उनके स्वास्थ्य की खबर रोज लेती रहती थी।


                                      १२ सितम्बर को मेरी उनसे बात हुई और मैंने उन्हें बताया कि  मैं १४ को आ रही हूँ और १२ को ही अपनी छोटी बहन को इलाहबाद फ़ोन किया कि तुम भी आ जाओ संडे को मैं माँ के पास जा रही हूँ दोनों साथ चलते हैं।  वो मेरे पास शनिवार को आ गयी और हमें दूसरे दिन जाना था।  शनिवार की रात पतिदेव को बुखार आ गया तो मैंने उसे भेज दिया कि मैं तबियत ठीक होते ही आती हूँ।  बहन पहुँच गयी और माँ ने उससे यही सवाल किया ' रेखा नहीं आई। '  उसने कहा ,' जीजाजी  तबियत ख़राब हो गयी वह एक दो दिन में आ जाएंगी।' 
                                    लेकिन वह दिन आया ही नहीं उन्होंने मेरा इन्तजार नहीं किया और सोमवार की सुबह चल दीं।  मैं पहुंची लेकिन उनके अंतिम दर्शन ही मिले वो नहीं।  इसे मैं अपना दुर्भाग्य ही मानती हूँ कि विधि ने ऐसी रचना रची कि मैं जा ही नहीं सकी।    

गुरुवार, 4 सितंबर 2014

कैसा घर : कैसे लोग ?

                                 जीवन के कितने रंग देखे ? हर बार चमकते हुए रंग , खिलखिलाते हुए पल कम ही नजर आये। ऊपर से पोते गए रंग और खोखली ओढ़ी गयी हंसी तो बहुत दिखाई  अंदर झांक कर देखने वाले भी तो कम ही मिलते और उनके दर्द को समझने वाले तो और भी कम।  कहीं कहीं बहुत अपने और नितांत अपने ही पलक झपकते ही कैसे बदल जाते हैं ? ये भी इंसानों का ही स्वभाव है।
                                 मीरा अपने पति और बच्चों से दूर एक गाँव में नौकरी करती थी क्योंकि पति माँ बाप का सात बेटियों के बीच अकेला बेटा था।  बिगड़ गया - माँ को ये घमंड था कि मेरा बेटा कुछ भी नहीं करेगा तब भी घर बैठे खायेगा लेकिन कुछ भ्रम इतनी जल्दी टूट जाते हैं जिसकी कल्पना किसी ने की नहीं होती है। माँ का भ्रम टूटा बेटे ने नए नए धंधे किये और सब चौपट कर दिया।  मीरा को समझ आ गया कि अगर बच्चों का भविष्य देखना है तो उसे नौकरी करना पड़ेगा।
                                 भविष्य में सरकारी नौकरी की आशा में शिक्षा मित्र की नौकरी उसको दूर दराज के गाँव में मिली।  बच्चे बाबा दादी और पिता के पास रह कर पढ़ रहे थे।  वह १५ दिन में एक बार आ पाती थी।  उसके नसीब में क्या था ? ये उसको भी पता नहीं था।  पहले अचानक सास चल बसी , फिर ससुर ने बिस्तर पकड़ लिया और वह भी चल बसे।  उन दोनों की पेंशन होने वाली आमदनी ख़त्म।  सब कुछ उसको ही देखना था।  इकलौते बेटे को पहले नाना नानी और फिर माँ बाप ने नाकारा बना दिया था।
                                मीरा के भाग्य में अभी कुछ और देखना बदा था।  एक बार वह छुट्टी पर घर आई।  दो दिन के अंदर ही पति को हार्ट अटैक हुआ और वह बिना कुछ कहे चल दिया।  मीरा ने पति का सुख सिर्फ इतना ही देखा था कि उसके नौकरी पर रहने के दौरान सास ससुर और बच्चों को अच्छी तरह से ख्याल रखा था।
                                 सुना तो एकदम विश्वास ही नहीं हुआ क्योंकि वह अपने वृहत परिवार में सब भाई बहनों में बहुत छोटा था।  अपनी सात बहनों में ही चौथे नंबर पर था।  मीरा जो गर्मियों की छुट्टी में ननदों की पूरी सेवा किया करती थी।  अचानक सब शशिकला बन गयीं।  अब मीरा सिर्फ एक विधवा थी और उसके प्रति सबकी नजर ऐसे उठती थी जैसे की उसने कोई गुनाह जानबूझ कर किया हो।   
                                  पति के निधन पर उसके सहकर्मी भी आये और ऐसे दुःख के समय में रिश्तेदार कम  वो लोग ज्यादा सहारा देते हैं , जो आस पास होते हैं।  उस बिचारी के अकेले होने के नाते परिवार सहित रहने वाले लोग उसके लिए खाना भी बना लेते हैं। सुख और दुःख बाँट लेते हैं।  ऐसे ही एक सहकर्मी दंपत्ति  मिलने के लिए आये और जाते समय उन्होंने मीरा के कंधे पर हाथ रख कर कहा कि परेशान मत होना।  अभी छुट्टियां हैं , जब आओगी तो तुम्हारे लिए ट्रांसफर की पूरी कोशिश की जायेगी।  जिससे तुम अपने बच्चों  के पास आकर रह सको।  '
                                   उसके जाते ही  ननदों ने हंगामा काट दिया - 'उसने तुम्हारे कंधे पर हाथ कैसे रखा ? उसकी इतनी हिम्मत कैसे हुई ? ' और बहुत कुछ।  हार कर मीरा ने उसकी पत्नी को फ़ोन करके कहा कि भाई साहब ने कंधे पर हाथ रखा वह गलत था मेरे घर वालों को बहुत आपत्ति हुई।  
                                   आज मीरा अकेली अपने ट्रांसफर के लिए घूम रही है , उसका साथ देने वाला कोई भी नहीं है।  वह ननदें भी नहीं जिन्होंने उसको इसके लिए प्रताड़ित किया था।  बच्चे घर पर अकेले और वह गाँव में।  उन दंपत्ति ने भी मीरा का साथ छोड़ दिया।  अब उसकी समझ नहीं आता है कि वह कहाँ जाए और क्या करे ?

गुरुवार, 21 अगस्त 2014

बस स्टॉप से ………( प्रीती बहरानी ) !

                     लिखना तो बहुत कुछ चाहती हूँ लेकिन समय हर जगह देर करवा देता है।  ये चरित्र जो मेरे जीवन में बस स्टॉप से जुड़े बहुत महत्वपूर्ण और नारी संघर्ष की एक बानगी है।  हो सकता है कि हमारे कुछ मित्रों को ये काल्पनिक लगे लेकिन जिसने जीवन का जो पहलू नहीं देखा है वो उससे अनजान ही रहता है।  इसी लिए भोगा हुआ यथार्थ ही जीवन के सजीव तस्वीर प्रस्तुत कर पाता है। 

                     वह बस स्टॉप पर मिली थी बहुत साल पहले, अपनी ननद के साथ आई थी।  उनकी ननद पूछने लगी कि मैं किस विभाग में काम करती हूँ।  मैंने बताया तो कंप्यूटर साइंस में।  उन्होंने पूछा कि  कंप्यूटर सेंटर में एक इंजीनियर मि. बहरानी को आप जानती हैं।  मि. बहरानी की हाल ही में पीलिया से मृत्यु हुई थी।  मैंने कहा हाँ।  बताने लगी कि ( साथ में जो एक सीधी सादी महिला थी)  ये प्रीती बहरानी है।  मेरी भाभी मि. बहरानी  की पत्नी।  इसकी नौकरी के लिए कुछ हो जाए।
                       मेरे प्रोजेक्ट डायरेक्टर बहुत ही सज्जन और दयालु व्यक्ति थे।  मैंने उनसे कहा कि आप उनसे मिल लीजियेगा।  मैंने उनका रूम न. सब बता दिया।  वह दूसरे ही दिन  मिली - सर उनको लेकर हमारे रूम में आये ( हम लोगों के काम करने का एक अलग रूम था ) और उन्होंने परिचय कराया और कहा कि कल से ये आप लोगों के साथ बैठेंगी और इनके लायक काम इनको बतला दीजिये।
                        प्रीती की ननद ने चलते समय कहा - आप लोग इसे मुसीबत की मारी अपनी छोटी बहन समझिए।  इसे कुछ भी नहीं आता है , पर आपके साथ सब सीख लेगी।  इसको आपके सहयोग की बहुत जरूरत है।
                    वही प्रीती सिर्फ हायर सेकेंडरी पास थी , जीवन में ऐसे सदमे  के लिए कोई तैयार नहीं होता है।  मि. बहरानी जेई के एग्जाम के लिए पीलिया की हालत में चेन्नई गए थे और वहाँ से लौट कर ऐसे बीमार हुए कि कोमा में चले गए और फिर कभी होश में नहीं आये।  चूंकि कंप्यूटर सेंटर नीचे ग्राउंड फ्लौर पर है और हम फर्स्ट फ्लोर कर बैठते थे।  जानकारी तो रहती ही थी।
                      प्रीती को हिंदी वाला काम दिया गया।  तब हम डेस्कटॉप पर जिस्ट कार्ड लगा कर काम करते थे।  उसको कंप्यूटर पर काम करने के लिए टाइपिंग सीखनी थी।  वह ऑफिस से छूट कर टाइपिंग स्कूल भी जाने लगी।  उसकी २ बेटियां थी।  एक ८ साल की और दूसरी ३ साल की।  बेटियों को घर में बंद करके जाती थी।  धीरे धीरे उसने टाइपिंग सीख ली।   लंच टाइम में डेस्कटॉप पर ही टाइपिंग के लेसन  पड़े थे।  उन पर प्रैक्टिस करती रहती।  अधिक समय नहीं लगा और वह काम करने लगी। उसने इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की,  जिससे उसको अगर यहाँ पर नौकरी मिले तो चतुर्थ श्रेणी में न मिले।  एक इंजीनियर की पत्नी को कम से कम क्लर्क की  नौकरी तो मिले।   
                        परिवार में उसी मकान  में उसके जेठ और उसके लडके रहते थे , उनकी नजर हमेशा उसके  पैसों पर रहती थी।  वह जीवन में बहुत सीमित हो गयी थी।  ऑफिस , घर और बेटियां।  सिर्फ उसकी ननद ही ऐसी थी जो उसके साथ खड़ी रहती थी. अपने परिवार वालों का व्यवहार , उसके और बेटियों के प्रति उपेक्षा उसको सालती रहती थी।  पति के रहते बड़े भाई हमेशा प्रेम से बोलते थे लेकिन उनके जाते हीउनका भी रवैया बदल गया।  प्रीती नौकरी करना ही उन्हें पसंद न था।  

                        पति के साथी इंजीनियर उसकी नौकरी आई आई टी में दिलवाने का प्रयास बराबर कर रहे थे।  उसके वहां पर काम करने से साथियों पर भावात्मक दबाव बना रहता था।  तीन साल तक उसने हमारे साथ काम किया और फिर उसका संघर्ष फल लाया और उसे आई आई टी के  एक विभाग में नौकरी मिल गयी।  वह हमारा साथ छोड़ कर वहां चली गयी।  कभी कभी मुलाकात होती थी लेकिन काम में किसी को  कहाँ मिलता है ? 
                         फिर महीनों और  बरसों गुजरने लगे।  हम अलग अलग हो गए।  उसकी बड़ी बेटी जब ग्रेजुएट हो गयी तो उसे लगा कि वह शादी कर दे।  उसने भाग दौड़ शुरू की लेकिन पता नहीं वक़्त को क्या मंजूर  था।  वह अथक प्रयास के बाद भी सफल न हो सकी।  
                            फिर उसके बाद इतने साल बाद बस स्टॉप पर ही  मनहूस खबर मिली कि प्रीती बहरानी नहीं रही।  उसको बुखार आ रहा था हॉस्पिटल में एडमिट  हुई।  एक शाम ऑफिस फ़ोन किया कि वह सोमवार से ज्वाइन करेगी और इसी के बाद उसको इतना तेज बुखार हुआ कि वह कोमा में चली गयी और फिर हमेशा के लिए। उसकी अंतिम क्रिया पर भी घर वालों ने दांव खेला  कि  जेठ का बेटा  तभी अंतिम संस्कार करेगा जब उसके पैसे का वारिस उसको बना दिया जाय।  बेटियों की शादी की जिम्मेदारी वह लोग उठाएंगे  , लेकिन बुआ ने मना कर दिया और बड़ी बेटी ने बेटे का काम पूरा  किया।   बस दो बच्चियां माँ और बाप दोनों के साये से वंचित हो गयीं।  बच्चियों को उनकी बुआ ले गयीं।
  

बुधवार, 20 अगस्त 2014

भारतीय होने का प्रमाण पत्र !

                                      जन्म से लेकर आज तक कितने प्रमाण पत्र मिलते हैं और हर बात को साबित करने के यही एक मात्र साधन होता है।  जन्म प्रमाण पत्र , विवाह प्रमाण पत्र , शिक्षा के प्रमाण पत्र , निवास प्रमाण पत्र , जाति प्रमाण पत्र , आय प्रमाण पत्र , अनुभव प्रमाण पत्र --  पता नहीं क्या क्या देखे हैं ? इतनी बड़ी आयु में पहली बार पता चला कि भारतीयता को प्रमाणित करने वाला प्रमाण पत्र भी चाहिए।  
                                        लेकिन ये कोई नहीं बता रहा है कि ये प्राप्त कहाँ से किया जा सकता है ? इसको प्रमाणित करने वाला कौन अधिकारी होगा ? तीन दिन से भागते भागते एड़ी चोटी का जोर लगा लिया।  पसीना बहाते बहाते दिन में कई बार नहा भी लिए लेकिन परिणाम सिफर। 
                                       मामला  एक संस्थान में प्रवेश लेने का है , जिसमें काउंसलिंग के समय ही भारतीयता प्रमाण पत्र माँगा गया है। वैसे भारतीय नागरिक होना - हमारे देश की किसी भी सेवा , चुनाव लड़ने से लेकर हर जरूरी माना गया है लेकिन क्या हमारे इतने सरे सांसद , विधायक , पार्षद या फिर पूरी सरकारी तंत्र में इसके प्रमाण पत्र को प्रस्तुत किया भी गया है  ( मुझे इसका ज्ञान नहीं है , इसीलिए आप लोगों  से पूछ रही हूँ। )  कचहरी से लेकर SDM तक के हर दरवाजे को नाप डाला।  कोई नहीं जानता है कि ये कहाँ से बनेगा ? बस यहाँ से नहीं बनता है।  इसके आगे कोई कुछ भी नहीं जानता है।  अगर संस्थान में प्रवेश  से पहले ये प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना इतना आवश्यक है तो महत्वपूर्ण पदों पर बैठे अधिकारीयों को भी तो इसको प्रस्तुत करना जरूरी ही होगा अगर नहीं तो फिर बच्चों को क्यों परेशान किया जा रहा है ? 
                                         कोई इसके फॉर्मेट के बारे में तक नहीं बता पाया।  कोई कहता है विधान सभा जाइए वहां पर मिल सकता है।  क्या इतना आसान है बच्चों के लिए विधान सभा तक पहुँचना। फिर  पूरी विश्वसनीयता से बताने वाला कोई भी नहीं।  अगर आप में से कोई जानता हो तो मार्गदर्शन करें।

सोमवार, 18 अगस्त 2014

कहाँ है हम ?

                                    हम बहुत आगे जा रहे हैं और इसमें कोई शक भी नहीं है लेकिन क्या हम अपनी मानसिकता से भी उतने ही आगे बढ़  पा रहे हैं या नहीं। कभी कभी ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं कि सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि  आज भी हम वहीँ खड़े हैं क्या ? 

                                     एक दंपत्ति मेरे पास आये थे।  उनको बच्चे नहीं थे और उम्र के चलते डॉक्टर ने उम्मीद भी काम ही बताई थी और सलाह दी थी कि कोई बच्चा गोद ले लीजिए।  पतिदेव  गाँव से सम्बंधित थे सो  परिवार में सभी प्रकार के लोग थे।  पत्नी शहर से थी लेकिन  सबका सम्मान बराबर करती थी।  जब गोद लेने की बात आई तो पतिदेव के बचपन का सहपाठी जिसकी दो बेटियां थी अपने तीसरी बेटी को देने के लिए तैयार था लेकिन वो उनके पास के गाँव का था और साथ ही वह अनुसूचित जाति का भी था। 
                                    घर वालों ने मना कर दिया कि  'एक तो लड़की लो वह भी नीच जाति की , लड़का होता तो भी सोच लेते।  गाँव भर थू थू हो जायेगी। '
                          पति को भी कोई परेशानी न थी और पत्नी को भी नहीं लेकिन घर वाले।  उनका कहना था कि'  ' अभी छोटे भाई की पत्नी कोबच्चा होने वाला है अगर लड़का हो जाएगा तो अगला बच्चा तुम्हें दे दिया जाएगा।  बाहर का पता नहीं कैसा खून हो ? '

                                     इस परिवार  में सभी भाई सरकारी नौकरी करने वाले हैं और सोच उनकी कितनी छोटी है।