जन्मदिवस पर :- 20 सितम्बर 1904 - 14 फरवरी 1978
बाबू प्रताप नारायण श्रीवास्तव!
हिंदी साहित्य में जिस उपन्यास विधा की परम्परा को मुंशी प्रेमचंद ने स्थापित किया उसको आगे बढ़ाने में उनके समकालीन बाबू प्रताप नारायण श्रीवास्तव का नाम भी अग्रणी साहित्यकारों में आता है, लेकिन यह नाम स्थापित होकर भी धीरे धीरे साहित्याकाश में बादलों की ओट में डूबता नजर आ रहा है। शायद वर्तमान साहित्य जगत में इस सूर्य को कोई याद कर लेता हो।
उनमें एक प्रताप नारायण श्रीवास्तव जी भी है, जिनका साहित्य अब उपलब्ध होना भी दुर्लभ हो गया है। उन्हीं डूबते हुए सितारे को, जो प्रेमचंद , भगवती चरण वर्मा, बाबू गुलाब राय के समकालीन ही नहीं बल्कि उनसे जुड़े भी थे, जानने वालों की कमी निरंतर होती जा रही है क्योंकि उनका साहित्य उपलब्ध ही नहीं है। इन साहित्य के पुरोधाओं के बीच मित्रता और पत्र-व्यवहार भी था और उनके पत्रों को उनके मित्रों द्वारा समय समय पत्र-पत्रिकाओं में उद्धृत भी किया गया है।
प्रारम्भिक जीवन :-
आपका जन्म 20 सितम्बर 1904 में कानपुर के हरवंश मोहाल में बाबू रत्ननारायण श्रीवास्तव के घर में हुआ था, जो मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार से थे। उनकी माताजी का नाम मणिदेवी था। उनकी दो बहनें भी थीं - गंगा देवी और कमला देवी, जिनकी अल्पायु में ही निधन हो गया था। वे अपने पिता की इकलौती संतान थे। उनकी ननिहाल भी एक देशभक्त परिवार में थी, जिसके सदस्यों ने 1847 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था और उसके चलते ही परिवार को अंग्रेजों के क्रूर व्यवहार का शिकार होना पड़ा था। इस विषय में उन्होंने स्वयं ही उल्लेख किया है - "पितामह ने मेरे पिता के विवाह अपनी ही भांति उसे विप्लव में सताए हुए एक परिवार में किया। मेरी नानी के पिता अर्थात मेरे प्रमातामहका देहांत सं 1923 में 97 वर्ष की अवस्था में हुआ था। विप्लव के समय उनकी आयु लगभग तीस वर्ष थी और उन्होंने स्वयं युद्ध में भाग लिया था।"
आपकी शिक्षा आर्य समाज स्कूल में हुई थी और उसके बाद थियोसोफिकल सोसायटी स्कूल में प्रवेश लिया। उन्होंने 1922 में वीएसएसडी कॉलेज में कॉमर्स में प्रवेश लिया यद्यपि यह विषय उनकी रुचि का नहीं था, लेकिन तब बाल सुलभ ही कहा जाएगा कि सिर्फ एक साइकिल मिलने और उस पर चढ़ने की ललक ने उन्होंने वीएसएसडी कॉलेज में कॉमर्स में प्रवेश लिया था। इसके बाद उन्होंने क्राइस्ट चर्च कॉलेज में बीेेए में प्रवेश लिया और 1928 में उन्होंने बीए की परीक्षा पास थी और फिर लखनऊ में एलएलबी में प्रवेश लिया और उसको पूर्ण करने के बाद, अंग्रेजी में एमए में प्रवेश लेने के बाद आर्थिक कारणों से उन्होंने पढाई छोड़ कर जोधपुर रियासत में न्यायाधीश के पद पर कार्य करना आरम्भ कर दिया था। वहाँ पर उन्होंने बीस वर्ष नौकरी की, लेकिन अपनी अभिरुचि के अनुसार उनको लेखन का समय नहीं मिलता था, अतः वे वहाँ से त्यागपत्र देकर कानपुर आ गए। यहाँ पर कानपुर विकास बोर्ड में हिंदी अधिकारी के पद पर कार्य करने लगे थे। अब उन्हें लेखन का पर्याप्त समय मिलता था।
लेखन का सफर :--
'होनहार बिरवान के होत चीकने पात' वाली कहावत को चरितार्थ करने हुए उन्होंने 6 वर्ष की आयु में 'चन्द्रकान्ता संतति' उपन्यास पढ़ लिया था। लेखन अभिरुचि के कारण ही उन्होंने पंद्रह वर्ष की आयु में उनका प्रथम कहानी संग्रह "निकुंज" प्रकाशित हुआ था। तब वे वीएसएसडी कॉलेज में पढ़ रहे थे। उसका प्रकाशन बनारस से हुआ था।
अपने जीवन के 48 वर्ष उन्होंने लेखन में लगाए थे। इस काल में उन्होंने 21 उपन्यास , पांच कहानी संग्रह और दो एकांकी संग्रह साहित्य संसार को भेंट किये। इसके अतिरिक्त उनकी रचनाएँ जिनमें कहानी , आलेख , समीक्षा आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई जिनमें मनोरंजन , सारिका, माया,मर्यादा, माधुरी ,प्रभा, सहयोगी सविता और मनु आदि प्रमुख थीं। इसके बाद भी उनकी कितनी ही रचनाएं अप्रकाशित रह गयीं। उन्होंने एक जापानी उपन्यास का अनुवाद भी किया था। इसके साथ ही बाल साहित्य भी रचा था।
उनके प्रसिद्ध कृतियों में विदा, विजय, विषमुखी , वरदान, विकास ,विपथगा , व्यावर्तन, बन्धनविहीना, वन्दिता, विसर्जन , विहान, बेबसी , विरागिनी , बयालीस , बेकसी की मजार(समस्त उपन्यास ), आशीर्वाद, विधाता का विधान (कहानी संग्रह ),विवाह विभ्राट , विजय का व्यामोह (एकांकी संग्रह ) और उनकी चौथी विधा अनुवाद थे जिसमें वहोने जापानी भाषा के लेखक जून इचिरो तानजकी के ' ओ-सूया-कोरोशी के अंग्रेजी संस्करण 'स्प्रिन्ग टाइम केस ' का हिंदी रूपांतरण 'पाप की ओर' था।
उनकी लेखन साहित्य की एक विशेषता यह रही कि उनकी अधिकाँश कृतियां "व" और "ब" अक्षर से आरम्भ होने वाली थीं। उनकी सभी कृतियों के विषय में मुंशी प्रेमचंद ने भी अपने विचार व्यक्त किये हैं - "विदा" मौलिक उपन्यास है और मेरे विचार से भाषा-सौष्ठव, चरित्र-चित्रण और भाव व्यंजना जो उपन्यास के तीन प्रमुख प्रधान स्तम्भ हैं। प्रताप नारायण जी को अपने पहले ही उपन्यास में जितनी सफलता मिली है। वह महान आशाओं से परिपूर्ण है।"
"विदा" उपन्यास ने ही उनको औपन्यासिक संसार में उपन्यासकार होने की प्रतिष्ठा प्रदान की। इसकी प्रथम दो संस्करण की सम्पूर्ण प्रतियां एक वर्ष में ही बिक गयीं थी। अपने सभी उपन्यासों में उन्होंने अभिजात्य वर्ग के जीवन को वर्णित किया है। इसका कारण उनका स्वयं भी एक प्रतिष्ठित एवं उच्च मध्यमवर्गीय परिवार से होना था। लेकिन भारतीयता को उन्होंने कभी भी पीछे नहीं रखा। आदर्शों और नैतिक मूल्यों को उन्होंने बराबर वर्णित किया है।
1948 तक वहाँ पर रहे और फिर लेखन की तीव्र उत्कंठा ने उनको वापस कानपुर ला दिया।
सामाजिक जीवन :--
सामाजिक जीवन में वे बहुत ही सीमित थे। उनका दैनिक जीवन एक निश्चित दिनचर्या के अनुसार ही चलता रहा। कई जगह मिला कि वह घूमने जाते थे लेकिन उनके दत्तक पुत्र कमल नारायण श्रीवास्तव*, जिन्होंने उनके साथ कई वर्ष गुजारे। उन्होंने जिस बात की पुष्टि की है कि 'सुबह उठकर चाय वगैरह लेने के बाद आराम से अख़बार पढ़ते थे और नहाने धोने के बाद नाश्ता करके अपने लेखन पर बैठ जाते थे। वे पेपर की रिम लेकर जब चौकी के सामने बैठते थे तो भाँग की एक चने के बराबर गोली अपने मुँह में रखते थे और फिर कितने घंटे तक लेखन कार्य करते रहें इसका कोई निश्चित नहीं था।'
गोष्ठियों आदि में जाने का शौक उनको नहीं के बराबर ही था, बल्कि वो देर रात तक बाहर रहना पसंद नहीं करते थे। शायद ही उन्होंने कुछ समारोहों में अपनी उपस्थिति दर्ज की हो। हाँ अपने लेखक मित्रों आदि के साथ वह ग्रन्थ कुटीर नामक स्थल पर बैठते थे.
जीवन की एक भूल:---
बहुत बड़े साहित्यकार होने के बाद भी एक भूल कि वह अपने निर्णय लेने में न्यायाधीश जैसी दृढ़ता और कठोरता नहीं रख पाए और जिसने उसके जीवन को अंतिम समय नर्क बना दिया। उनके इतने सारे ग्रंथों के लिखने के बाद भी प्रकाशकों ने उनके साथ बहुत बेईमानी की। जिसने उनको अंतिम समय में आर्थिक परेशानियों में भी डाल दिया था लेकिन तब वह खुद निर्णय लेने के काबिल नहीं रहे थे।, अपने दत्तक पुत्र को लेकर वह कई प्रकाशकों के पास गए भी लेकिन कोई सफलता नहीं मिली थी।
अपने भतीजे को गोद(*) लेकर उसे कमल नारायण श्रीवास्तव नाम दिया। अपने पास रखने के बाद उनकी पत्नी ने एक शर्त रखी कि कमल को उसकी माँ से नहीं मिलने देंगे। तब बाबूजी आजाद नगर में रहते थे और उनके भाई उर्सला हॉस्पिटल में फार्मासिस्ट थे और हॉस्पिटल कैंपस में रहते थे। उस समय उस बच्चे की आयु ५ वर्ष थी और इतने छोटे बच्चे को माँ से न मिलने दिया जाय बहुत बड़ी बात थी। उनकी वह दत्तक पुत्री मंजूलता उर्फ भुल्लन कमल से आठ वर्ष बड़ी थी। निजी स्वार्थ के चलते पति के त्यागने के बाद वह पुत्रों सहित कानपुर आ गयी थी और फिर दोनों परिवारों के बीच एक दीवार खड़ी कर दी। कमल ने ताऊजी का घर छोड़ दिया था लेकिन आना जाना और कार्य करना विधिवत चलता रहा।
कमल को लेकर वह गंगा पुस्तकमाला प्रकाशन , अमीनाबाद लखनऊ भी गए थे क्योंकि उनकी अधिकांश पुस्तकें वहीं से प्रकाशित हुई थी। कुछ रॉयल्टी के बारे में बात करने के लिए लेकिन उनकी रॉयल्टी कभी समुचित नहीं मिली। कई बार कहा कि प्रेमचंद के लड़के उनके किताबों का काम देखते हैं, तुम मेरा काम देखो तो तुमको नौकरी करने की जरूरत ही नहीं है। लेकिन तब तक उनकी दत्तक पुत्री अपनी ससुराल से आपस आ चुकी थी तो उसने जो भी सोचा हो। ताऊजी और ताईजी की उम्र देखते हुए उन पर अंकुश रखने लगी। उनकी तबियत ख़राब होने पर उनके भाई और कमल ने कहा भी कि आप हमारे साथ चलिए उर्सुला हॉस्पिटल में इलाज हो जाएगा तो आप ठीक हो जाएंगे लेकिन मंजू ने नहीं आने दिया और उसके बेटे भी जवान हो चुके थे।
उसने उन दोनों ही लोगों को हॉस्पिटल में नहीं रखा और घर पर ही जो हुआ किया गया। जब उसे लगा कि ताईजी नहीं बचेंगी तो ताऊजी इन लोगों के साथ न चले जाय, उसने रिश्तेदारों का घर में आना बंद करवा दिया था। यहाँ तक कि ताईजी के निधन पर उसने घर वालों को सूचना तक नहीं दी। दूसरे रिश्तेदारों से सूचना प्राप्त हुई।
ताईजी के निधन के बाद ताऊजी बहुत बीमार रहने लगे थे, यहाँ तक कि उनकी स्मृति भी प्रभावित होने लगी थी। शेष उनकी उस स्थिति के साक्षी कई साहित्यकार है, उनके अंतिम समय में उनकी जो हालत हुई थी। उनका 14 फरवरी 1978 को देहावसान हुआ। यह लिखते हुए भी शर्म आती है कि घरवाले होते हुए भी उनसे न मिलने के लिए मजबूर कर दिए गए थे। उनके निधन पर भी उसने भाई के परिवार को सूचित तक नहीं किया और उस बेटी ने उनके निधन के बाद किसी शादी-ब्याह की तरह ग्रुप फोटोग्राफ बीच में उनके पार्थिव शरीर को रख कर अगल बगल कुर्सियाँ डालकर खिंचवाई गयी ताकि सनद रहे। जो मुझे श्री रूपसिंह चंदेल द्वारा उपलब्ध कराई गयी और उस फोटोग्राफ में उन्हें बताया गया कि परिवार के लोग हैं, जबकि उसमें मात्र मेरे एक फूफाजी माताबदलजी हैं, उन्हें मैंने इसलिए पहचान लिया क्योंकि वह मेरे इस परिवार में आने के बाद भी बहुत साल तक थे।
उनके जाने के बाद उनके पड़ोस में रहने वाली डॉक्टर वी के सिंह से उनका मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाया गया था। जो कि जीवन में एक अफ़सोस भर रह गया कि परिवार में उनके दत्तक पुत्र के होते हुए भी सिर्फ संपत्ति के लालच में उनका अंतिम संस्कार भी विधिवत न हो सका।
(*)श्री रूपसिंह चंदेल जी ने अपने शोधग्रन्थ में लिखा है कि उन्होंने एक लड़का गोद लिया था लेकिन दुर्भाग्य वह गोद लेने के कुछ दिनों पश्चात् ही उस बालक की मृत्यु हो गयी थी। पृ. 29
ये जानकारी उनको किसी ने गलत दी क्योंकि मैं उसी दत्तक पुत्र की पत्नी हूँ। हाँ मेरा इस परिवार में आगमन ताऊजी के निधन के दो वर्ष बाद हुआ।
(लेखिका उनके दत्तक पुत्र कमल नारायण श्रीवास्तव की पत्नी है और लेखन कार्य करती हैं। )


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें