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सोमवार, 22 जुलाई 2013

गुरु पूर्णिमा : गुरु को नमन !

                          गुरु हमें वह सब देता है जिसकी हमें जरूरत होती है . मानव तो जीवन में दिशाहीन सा जीता रहता है कुछ  भौतिकता को ही जीवन का सत्य मान कर  आगे बढ़ जाते हैं .  वह गुरु जो मानव को  देता एक ऐसी दृष्टि   देता  है , जिससे वह ग्रहण करता है आध्यात्मिक ज्ञान , दिव्य ज्ञान और वह सब कुछ जो गुरु उसको  समझाता है .   ऐसे गुरु को इंसान  खुद नहीं खोज पाता है बल्कि गुरु अपने शिष्यों को खुद पहचानता है और   जब उन्हें योग्य पाता है तो वह सब कुछ सौंप देता है जिसको उसने  अर्जित किया होता है . वह जीवन में कई कसौटियों पर कसकर ही चुनता है और  तब अपने शिष्य को शिष्यत्व  प्रदान करता है. 

                                मैं अपने गुरु को नमन करते हुए विनम्र नमन के साथ कहती हूँ  कि मैं एक ऐसी शिष्या - मेरा जैसा सौभाग्य शायद ही किसी को मिला हो कि जो अपने गुरु की गोद में बचपन से खेलते  हुए बड़ी हुई और अंततः उनके लिए शिष्य बन गयी . वे  पितातुल्य मेरे फूफाजी "श्री जगदम्बा प्रसाद श्रीवास्तव " थे .  जब भी वे कानपूर से उरई जाते कुछ  सिखा  कर आते . प्रिय तो उनको पूरा परिवार था लेकिन मैं और मेरे भाई साहब विशेष प्रिय थे . 
                                मेरी शादी के निर्णय को अंतिम स्वीकृति देने वाले वही थे. उसके बाद भी पग पग पर सावधान करते रहे और इस तरह से बच  कर निकलना है  ये बताते रहे . जीवन में संघर्ष की परिभाषा और उससे जूझकर निकलने की शक्ति भी उन्ही से मिली . उन्होंने मुझे अपने पैमाने के अनुसार  कसौटियों पर कसते हुए जब इस योग्य पाया कि मैं कहीं भी उनकी दी गयी शिक्षाओं और मार्गों की अवमानना नहीं करूंगी तब मुझसे कहा था -- 'तुम अपने जीवन में कभी किसी का अहित मत सोचना , भले ही वह तुम्हारा हित न सोचे .'  मैंने इसे स्वीकार कर उनको वचन दिया था और उसको आज भी निभा रही हूँ . 
                           तब मैं ये नहीं जानती थी की दीक्षा क्या होती है औरकैसे ली जाती है ?  क्योंकि हमें इस विषय में कभी बताया ही नहीं गया था . मेरी हर मुसीबत से लड़ने के अस्त्र उन्होंने मन्त्रों के रूप में सहज ही  दे रखे थे . फूफाजी थे कोई बात नहीं थी . वे एक सीधे सादे गृहस्थ थे और उनके ज्ञान को मैं स्वयं अपने जीवन में नहीं समझ पायी थी . फिर एक दिन उन्होंने मुझसे कहा - "रेखा , अब तुम इस जीवन में किसी भी व्यक्ति से दीक्षा मत लेना ." मैं इस बारे में कुछ जानती नहीं थी सो कह दिया कि नहीं लूंगी
                           फिर १९९६ में मेरे परिवार में " आसाराम बापू " की दीक्षा लेने के लिए तैयार हुए . तब मुझे वह शब्द याद आये और मैंने मना कर दिया कि मेरे गुरु तो वही थे जिन्होंने मुझे सब कुछ ऐसे सिख दिया जैसे माँ अपने बच्चे को सिखाती है . वे हमें १९९५ में छोड़ कर चले गए थे . तब मुझे पता चला कि दीक्षा क्यों लेते हैं ? मेरे गुरु तो मुझे बचपन से दीक्षा देते रहे और मैं लेती रही . मेरे जैसे गुरु शायद ही किसी को  मिले होंगे .
                          उनके अपने गुरु कौन थे ? ये बात उन्होंने मुझे बताई थी की उनका गुरु भी कोई मानव नहीं था बल्कि  उन्होंने सूर्य की उपासना करके सम्पूर्ण ज्ञान अर्जित किया और मोक्षगामी आत्मा बने . आज भी अप्रत्यक्ष रूप से वे मेरा दिग्दर्शन करते हैं .

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

कब बदलेंगे हम ?

                                  अपने जीवन में बहुत सारे लोगों से  हुआ . बहुत से लोगों की गुत्थियों को सुलझाया , दिशा दी या फिर कुछ इस तरह से जीवन में शामिल हो गए कि जैसे वे मेरे बहुत अपने हों लेकिन इस बार कुछ ऐसा हुआ कि लग रहा है शायद एक आत्महत्या को बचा पाना मुश्किल है . कहेंगे हम इसे आत्महत्या लेकिन होगी ये ऑनर किलिंग ?

                                निधि ( काल्पनिक नाम ) मेरी बेटी की सहेली है बचपन से K G  से साथ पढ़ी और आगे जाकर उनकी दिशा तो बदल गयी लेकिन साथ नहीं बदला। जब भी बेटी कानपूर आती है वो जरूर मिलने आती है और सारा दिन एक साथ बीतता है  या फिर बेटी वहां जाती है . कुछ इत्तेफाक ऐसा है कि मेरी बड़ी बेटी की जितनी भी सहेलियां है हम सबके परिवार से जुड़े हैं लेकिन छोटी वाली की सहेलियों से तो जुड़े हैं उनके परिवार से कोई वास्ता नहीं है .  न मैं कभी गयी और न वे लोग कभी आये .
                             वैसे तो बिटिया रानी भी अच्छी काउंसलिंग कर लेती हैं लेकिन इस बार हार  कर मुझसे सलाह ली और मामला कुछ ऐसा निकला कि उनकी मित्र जो नौकरी भी करती है लेकिन वह जिससे शादी करना चाहती है वह उनके क्षेत्र का ही इंसान है लेकिन वह उनके बराबर की सजातीय  नहीं है . उसने इस बारे में अपने घर में बात की और परिणाम ये है कि  हमें कहते हुए शर्म आती है कि पढ़े लिखे उच्च शिक्षित लोग भी ऐसा कर सकते हैं . राजी होने तो दूर की बात उन्होंने बेटी को जिस तरीके से टार्चर कर सकते हैं किया , वह हमेशा चहकने वाली लड़की - खामोश हो चुकी है .  आज के ज़माने में जब की संकीर्णता की बेड़ियाँ टूट रही है हम अब भी वहीँ जी रहे हैं . मुझसे बात नहीं हुई लेकिन उनकी दलील सुनी तो लगा कि क्या कुछ लोगों  की विचारधारा कभी बदल नहीं सकतीहै .     इज्जत के नाम पर खुद अपनी दुनियां उजड़ जाए तो कोई बात नहीं है लेकिन इज्जत रहनी चाहिए . ये क्यों भूल जाते हैं कि  अगर अति संवेदनशील बच्चा अवसाद की स्थिति में कोई आत्मघाती कदम उठा  लेता है तो आप लोगों को क्या उत्तर देंगे ? उनके कितने कटाक्ष सुनेगें ? तब आपकी इज्जत बरक़रार रहेगी शायद नहीं,  आप अपने बच्चे को भी खो देंगे और इज्जत को भी . शादी के बाद कोई पूछने नहीं आता है कि आपकी बेटी कैसी है ? उसके और आपके सुख दुःख में साथ  देने वाले कोई नहीं होंगे आपके अपने बच्चे ही होंगे .
               अगर कल को वह लड़की इतने अवसाद के चलते आत्महत्या कर लेती है तो उनकी इज्जत के लिए कितने  सवाल पैदा होंगे ? ये बात उनकी समझ क्यों नहीं आती है ?
                     मान लीजिये कि उस लड़की ने आपकी इज्जत की दुहाई के लिए कहींऔर शादी कर भी ली और कल 
वह सामंजस्य न बिठा पाई तो आप उसके जीवन को कितने वर्षों तक साथ देंगे ?
            आपने अपनी जिन्दगी अपने अनुकूल जी और अब चाहते हैं कि बच्चे भी अपनी जिन्दगी आपके अनुरूप ही जियें . समझदारी इसी में है कि उनकी जिन्दगी उन्हें जीने दें . वे अब बच्चे नहीं रहे कि  हम उनकी अंगुली पकड़ कर या गाय बकरी की तरह से जहाँ चाहे जिस खूंटे से चाहे बांध दें और वे बंधे रहें .अगर जिद और हालत के चलते बड़ों ने निर्णय न बदला तो कल का इतिहास कुछ भी हो सकता है .  आप लोग भी कुछ राय दें कि हम क्या कर सकते हैं ?

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शनिवार, 11 मई 2013

एक पाती माँ के नाम !

                      
चित्र गूगल के साभार 

                 
       माँ मेरी प्यारी माँ शायद तुम्हें मालूम भी नहीं होगा  कि आज "मातृ दिवस " है और मैं तुमसे बहुत दूर सात समंदर पार पड़ी हूँ  और आँसू बहा रही हूँ क्योंकि मैं तुमसे बात भी तो नहीं कर सकती हूँ .  उम्र के चलते  तुमको कम सुनाई देता है फिर भी तुमसे जब भी बात करती हूँ जो तुमको सुनाई दे गया उसका सही उत्तर दे दिया और जब तुम अपने दर्द को मुझसे बांटना चाहती हो तो कान लगा कर खड़ी  हुई तुम्हारी बहू सुन लेती है और फिर तुम्हारा मोबाइल जो मैंने तुम्हें बात करने के लिए देकर आई थी, उसको तुमसे छीन लिया और अपने पास रख लिया . ये यह सोच कर किया कि  कहीं उसकी अनुपस्थिति में तुम हम लोगों से अपने दिल की बात न कर लो . वैसे तो उसका पहरा रहता ही है . जो भी सुना उसको लेकर फिर खरी खोटी तो तुम्हें ही सुनना पड़ता है . ऐसा नहीं है कि  वे सब बातें मुझे पता नहीं लगती है . सब कुछ जान लेती हूँ , तुम्हारे दिल का दर्द और तुम्हारी तड़प मुझे भी महसूस होती है. 
                     मेरी मजबूरी ये है माँ कि मैं तुम्हें अपने पास नहीं ले जा सकती क्योंकि तुम इतनी दूर आना कभी नहीं चाहोगी क्योंकि अपनी वहां रहने वाली बेटियों के पास इसलिए नहीं जाती हो कि  कहीं उनके पास रहते हुए तुम्हें कुछ हो गया तो क्या होगा ? तुम अपने घर में ही आखिरी सांस लेना चाहती हो और बेटे के बिना तो माँ का काम हो ही नहीं सकता है . जब कि सब चाहते हैं तुम कहीं भी चली जाओ . हाँ घर से निकाल नहीं सकते क्योंकि अभी समाज का डर उनके मन में कहीं शेष है . घर के अन्दर समाज झांकने नहीं आता है लेकिन घर से कदम निकालने  पर सवाल खड़े हो जायेंगे . 
                   माँ जिस बेटे को बड़ा आदमी बनाने का तुम्हारा सपना तो पूरा हुआ लेकिन तेरे त्याग और तपस्या के साक्षी हम सब है लेकिन वह भूल गया . तुम्हारे संघर्ष को तुम्हारी बहू ने अपना हथियार बना लिया , मानो तेरे बेटे की तरक्की वह अपने साथ ही लायी थी . माँ मुझे सब कुछ पता चल जाता है , दूर हूँ तो क्या - मेरी आत्मा का तेरी आत्मा से सीधा रिश्ता है अगर तू तड़पती है तो मैं रात  भर सो नहीं पाती हूँ . 
                   माँ इतने बड़े सुसज्जित घर में तुम्हारे हिस्से में एक पीछे का कमरा आया है जिसमें सिर्फ एक खिड़की है . माँ इस भीषण गर्मी में तुम बगैर कूलर के कैसे रहती होगी ? बाकी  उनके कमरे में तो ए सी लगे हैं . ठन्डे पानी के लिए माँ तुम्हें क्या क्या करना पड़ता है ? एक बार मांग लिया तो फिर दुबारा जल्दी नहीं दे सकता है , जब कि  इस गरमी में तो पानी थोड़ी देर में गर्म हो जाता है और उस गर्म पानी के फेकने पर तुम्हें बातें सुनाई  जाती हैं,  जो तुम्हारी खुद्दारी को मंजूर नहीं।  इसलिए एक बार लिया हुआ पानी पीकर फिर उस बर्तन पर गीला कपड़ा लपेट कर रखती हो जिससे कि फिर एक बार और पी सको  . माँ तुम वही हो जो घर में आने वालों को गर्मी में ठन्डे पानी के साथ गुड या कुछ मीठा लेकर ही जाती थी . भले तब वह पानी घड़े का होता था . 
                  माँ तुम वही अन्नपूर्ण हो जिसे बचपन से हमने घर में इतने बड़े परिवार के लोगों को और साथ ही गाँव और रिश्तेदारों को खाना खिलाते हुए देखा है और चेहरे पर एक शिकन तक नहीं आती थी . कहाँ से सब मैनेज करती थी मेरी नजर से नहीं छुपा रहता था . कभी ज्यादा पैसे की जरूरत पड़ी तो बूढी काकी से लेकर फिर ब्याज सहित देते मैंने देखा था लेकिन कभी कोई कमी नहीं होने दी . चार चार बच्चों की फीस पढाई और फिर संयुक्त परिवार के खर्चे सब कितनी ख़ुशी से उठाया करती थीं . 
                  आज वे सभी कन्नी काट रहे हैं और तुम्हें लग रहा है कि  सब लोग तुम्हारा किया भूल गए नहीं माँ ऐसा नहीं है . सबको याद है वे अहसान फरामोश नहीं है लेकिन वे तुम्हारे बारे में कुछ गलत नहीं सुन पाते हैं क्योंकि कहने वाले से अधिक समय तक उन लोगों ने तुम्हारे साथ जीवन बिताया है . वे भी अब टूट चुके हैं . तुम्हारे पास आने से पहले उनका साक्षात्कार तुम्हारी बहू से होता है और फिर घंटों तुम्हारी कमियों और अवगुणों का बखान होता है उसके बाद तुम्हारे पास आ पाते हैं . इसी लिए माँ वे नहीं आते हैं भूला कोई भी नहीं है. 
                     मैंने जानती हूँ कि ये पाती तुम्हें मिलेगी नहीं क्योंकि अगर मैंने इसको पोस्ट कर दिया तो ये तुमसे पहले उनको मिलेगी और कोई और पढ़े और तुम्हारी मुसीबतें और बढा दें ये तो मैं आज के दिन कभी नहीं चाहूंगी . माँ मैं वह सब लिख रही हूँ जो मुझे पता है , अपने शब्दों में तुम्हारे दर्द को बयान कर रही हूँ और क्या पता है तुम्हें कि इसका एक एक शब्द लिखते हुए मेरे आंसुओं ने थमने का नाम नहीं लिया है . मैं कितनी विवश हूँ माँ ! तुम्हें कुछ भी दे नहीं सकती हूँ और अपने पास भी नहीं बुला सकती हूँ . मालूम मैं क्या चाहती हूँ ? सच कहूं - माँ अब ईश्वर  इस जीवन से मुक्त कर दूसरा जीवन दे . मुझे पता है कि ये सोचना एक बेटी के लिए कितना कठिन है लेकिन सच माँ तुम्हारे कष्ट को देखने से बेहतर तुम्हें उस कष्ट से मुक्त होते देखना है .  माँ मैंने इस मातृ दिवस पर सब कुछ कह दिया - तुम्हारे दिल तक मेरा सन्देश जरूर पहुँच गया होगा . माँ तेरा अंश हूँ तेरी आत्मा का अंश - इस अंश का तुम्हें शत शत नमन !

मंगलवार, 7 मई 2013

बेटियों से आह्वान !

                    मेरे इससे पूर्व लिखे गए लेख -' बेटे की माँ ' पर नीलिमा शर्मा जी ने ये कविता भेजी है , ये उनका बेटियों से आह्वान वाकई विचारणीय है .

 लडकियों 
 दुनिया बदल रही हैं 
किस्मत चमक रही हैं 
 अब घर बेठने से कम नही चलेगा 
 उठो निकलो काम  पर अपने काम से 


रास्ता अँधेरा होगा 
 दूर पर कही सवेरा होगा 
 रोशन करनी हैं तुम्हे दुनिया 
 उठो चलो कदम बढाओ शान से 


 एक अकेली मत चलो 
 आपस में तुम मत लड़ो 
 छा सकती हो तुम दुनिया पर 
 जब चला दो झुण्ड में  तीर कमान से 


 कारवां होने लगा छोटा 
नर नारी की जातका 
 कन्या को भी  जन्मदो 
 और समूह बनाओ उनका तुम सम्मान से 



 एकता मैं बल हैं 
 बल ही बलवान हैं 
नारी ही नारी की दुश्मन 
झूठ कर दो इस बयां को अपने ज्ञान से .................. नीलिमा

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

बेटे की माँ !

                      आज केवल राम जी का नारी विषयक लेख की श्रृंखला पढ़ रही थी और उसमें ही पढ़ा कि आज भी परिवार चाहे जितनी आधुनिकता का दम भरते हों और चाहे जितनी सभा और मंच पर बेटी और बेटे की समानता की बातें करते हों लेकिन अन्दर से हम आज भी वैसे ही हैं और खास तौर पर महिलायें भी . जिन्हें शायद अपने महिला होने पर गर्व होना चाहिए और बेटियों से मिल रहे प्रेम और समर्पण को मानना चाहिए .

                       नाम तो मैं उजागर नहीं करूंगी लेकिन बहुत करीब के लोगों के परिवार में दो बेटियां माँ  बनने वाली थी और दोनों के प्रति घर में सभी सदस्यों को उत्सुकता थी .उन दोनों के अलावा  परिवार की एक बेटी बाहर रहती हैं।  वह भारत आ रही थी तो उसने सोचा की दोनों के होने वाले बच्चों के लिए कुछ ड्रेसेज लेती चलूँ और वह दोनों के होने वाले बच्चों के लिए ड्रेसेज का सेट बना कर पैक करके रख गयी कि जब जिसके घर आप लोगों का जाना हो तो आप लोग मेरा पैक भी लेती जाएँ . 
                       इत्तेफाक से दोंनों ही बेटियों के लडके हुए और पैक यथा समय जाते वक्त लोग लेते चले गए . 
             कुछ दिनों बाद उनमें से एक कानपुर आई और उसके लाये हुए कपड़ों से एक ड्रेस जो लड़कियों की तो नहीं थी लेकिन दोनों के पहनने काबिल थी . वापस करती हुई बोली - ये ड्रेस न लड़कियों की है और मेरा बेटा लड़कियों की ड्रेस क्यों पहनेगा  ? इसको रख लीजिये , आगे किसी और के काम आ जायेगा . उस लड़की में मैंने बेटा को जन्म देने का जो दर्प देखा तो लगा कि अपनी माँ के कोई बेटा न होने का दंश या फिर उस मानसिकता को बदल न पाने का प्रतीक . इसको क्या कहा जाएगा ? मुझे तो लगा कि शिक्षा , प्रगतिशीलता या फिर आधुनिकता का जामा पहन भर लेने से हमारी मानसिकता में बसे पुरातनता के कीड़े कभी मर नहीं सकते हैं . ये फर्क ख़त्म करने कि  हम हामी भर रहे हैं और खुद को इससे ऊपर ले जाने का दम भर रहे हैं लेकिन वह दम सिर्फ जबान से बोलने भर के लिए है  . हम आज भी वही हैं जहाँ सदियों पहले थे और आज भी दिल से यही चाहते हैं की घर में पहला बेटा  जो जाये फिर चाहे दूसरी संतान हो न हो क्योंकि आज कल एक की परवरिश ही कठिन हो रही हैं .

सोमवार, 22 अप्रैल 2013

नारी और नारी !

                                वह  मेरी सिर्फ परिचित ही नहीं  है बल्कि  पारिवारिक मित्रता उसके ससुर और मेरे ससुर  के समय से चली आ  रही है. वह मुझसे बहुत छोटी है लेकिन रिश्ते से भाभी कहती है . उसके बच्चे अभी पढ़ ही रहे हैं . अचानक पता चला कि  उसके पति को एक हॉस्पिटल की  लापरवाही के कारण एक संक्रमण हो  गया और फिर उसकी जिन्दगी अँगुलियों पर गिनी जाने वाले दिनों की रह गयी .  यहाँ से मुंबई तक जो भी जहाँ भी इलाज संभव था उसने करवाया लेकिन जब जिन्दगी की घड़ियाँ ख़त्म हो जाती है तो फिर ईश्वर  नहीं देखता कि पीछे क्या होगा? 
                           वही हुआ जो होना था पिछले हफ्ते वह नहीं रहा . उनके घर के और सदस्य भी मेरे परिचितों में है . इसके बाद  हुआ प्रपंचों का सिलसिला . झूटी संवेदना दिखाती हुई उनकी रिश्तेदार रोज वहां जाती रही और फिर घर पर  उसकी आलोचना . उसने पति के न रहने पर श्रृंगार भी नहीं उतारा (जो एक हिन्दू धर्म के  एक दर्दनाक रस्म पूरी करवाई जाती है ) . उसकी बहन कह रही थी कि  ये न मैं बर्दास्त कर  हूँ और न वह खुद . बस जो पहना  था उतार कर रख दिया और दूसरा पहना दिया । ये तो मैं इतने वर्षों में औरतों  को करते हुए देख रही हूँ , इसमें उम्र की क्या  बात है? अगर पति नहीं रहा तो विधवा तो कहलाएगी ही। इंसान की आत्मा  घर वालों के पास भटकती रहती है. 
                       मुझे सुनकर बहुत गुस्सा आया लेकिन वो मुझसे बहुत बड़ी  हैं और मैं उन्हें इस विषय में फटकार तो नहीं  सकती थी हाँ मैंने उन्हें समझाते हुए दबी जुबान  से कहा कि  उसकी जिन्दगी में इतनी बड़ी चुनौती आ खड़ी  हुई है और उसको हम सहारा न दे सकें तो मानसिक तौर पर प्रताड़ना तो न दें . अब विधवा के लिबास में उसको आप देख पाएंगी जो आपकी बहू जैसी है . ये सब पुरातन पंथी छोडें  और उसको मानसिक संबल दीजिये। वो मुझसे ये सब इसलिए कह रही थीं कि वह मेरे बहुत करीब थी . बहू उनके परिवार की थी, लेकिन परिवार की हो या बच्चों की सारी  बातें वह मुझसे डिस्कस कर लेती थी और सलाह भी मान जाती है .
                       ये  मुझे झकझोर गयी कि अपने बहुत अपने कहलाने वाले ही अपनी बहू और बेटी से आज भी ऐसे  कर  सकते हैं . ये तो घरेलू महिला की बात है , अच्छी पढ़ी  और कामकाजी महिलायें  अगर  विधवा को अच्छी साड़ी पहने देख लें तो कुछ न कुछ कमेन्ट कर ही देतीं  हैं . ये हमारी मानसिकता अपने ही  के वर्ग के लिये.  

शुक्रवार, 1 मार्च 2013

कुम्भ : एक पक्ष ये भी !

               
चित्र गूगल के साभार 

           महाकुम्भ का पर्वकाल बीत गया और वहां पर महीने भर से अधिक ढेरा डाले हुए कल्पवासी , सन्यासी, महामंडलेश्वर  और विभिन्न अखाड़ों के लोग अब तक जा  चुके है. कुम्भ हमारी धार्मिक आस्था के अनुसार मनुष्य जीवन के तमाम पुन्योंको देने वाला होता है और यही कारण  है कि हर पर्वकाल पर करोडों लोगों ने स्नान किया , पुण्य कमाया . सिर्फ भारतीय ही नहीं बल्कि विदेशी भी इस बात में आस्था रखते वाले थे और देश विदेश की सारी सरहदें इसके आगे बौनी हो गयीं थीं . इनके  मन में आस्था थी और हमारी धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप ये वर्षों के तप के समान पुण्यदायी होता है. 
                 अपने पापों की गठरी लाकर उस पुण्यदायी कुम्भ के पर्व पर स्नान करके नदी के पावन जल में समर्पित करते चले जाते हैं (ऐसी हमारी मान्यता है ) किन्तु इसके साथ ही कुछ ऐसे पुण्य कमाने वाले आये थे जो अपने सिर के बोझ को उतरने के लिए आये थे और वे अपने अपने बुजुर्गों को इसा कुम्भ के मेले में सिर्फ छोड़ कर जाने के पवन उद्देश्य को लेकर ही आये थे. उनसे मुक्ति मिल गयी ठीक वैसे ही जैसे कुछ लोग अपने जाने अनजाने पापों से मुक्त होने के लिए यहाँ कुम्भ स्नान के लिए आये थे. पूरे देश से करोड़ों श्रद्धालु यहाँ आये थे और बुजुर्ग तो खास तौर पर इस काल को अपने जीवन का सौभाग्य समझते हैं . बड़ी ख़ुशी से वे अपने घर चले होंगे और फिर ..........?  ये छोड़े गए बुजुर्ग देश के विभिन्न प्रान्तों से आते हैं और उनकी भाषा बोली सबके समझ नहीं आती और वे भी खुद भी स्थानीय भाषा या बोली नहीं समझ पाते है . वे बुजुर्ग बेचारे क्या ये जानते हैं कि  उनके बेटे , बहू या बेटी उनको यहाँ कुम्भ स्नान के लिए नहीं बल्कि उनको यहाँ छोड़ कर उनसे मुक्ति पाने के लिए आये थे. 
                  फिल्मों में पहले देखने को मिलता था कि  मेले में बच्चे बिछुड़ गए और फिर वे अनाथ या दूसरों के द्वारा पाले  गए लेकिन यह परिकल्पना फ़िल्म वाले भी नहीं सोच पाए थे कि  अपने माँ बाप को कुम्भ के मेले में छोड़ जाओ और फिर उनके भार से मुक्त . गाँव में जाकर बता दिया कि  वे मेले में खो गये लेकिन प्रश्न यह कि  वे खो कर गए कहाँ? 
                   ये छोड़े गए बुजुर्ग एक या दो नहीं बल्कि इनकी संख्या अर्ध शतक से भी अधिक है . जिन्हें खोये हुए व्यक्तियों के शिविर में रखा गया है कि  उनके घर वाले उन्हें खोजते हुए आ जाएँ और उनको उनके घर भेज  सके. वे अपनी सूनी आँखों से अपने घर वालों का इन्तजार कर रहे हैं और उनमें से कुछ को तो ये भान  भी नहीं है कि वे खोये नहीं है बल्कि उनके घर वाले उन्हें लाये ही इसलिए थे. कुछ को इस बात का भान अब हो गया है क्योंकि घर में उनके कारण होने वाली रोज रोज की कलह से वे आजिज जो थे. ऐसा कैसे जाना  क्योंकि पूछने पर वे अपनी गीली आँखें बार बार पौंछ  रहे है. और फिर वे  शून्य में निहारने लगते है। 
                   ये सभी निम्न मध्यम वर्गीय परिवार के बुजुर्ग हैं  तब ये प्रश्न उठते हैं हमारे जेहन में ---
क्या उनके घर वाले गरीबी से त्रस्त होकर इन्हें यहाँ छोड़ गए ?
क्या गरीबी के आगे हमारी संवेदनाएं मर चुकी हैं?
कभी उनहोने ये सोचा कि  क्या उनके माता -पिता इतने समर्थ होंगे कि उनको आराम से पाला  होगा फिर वे क्यों उन्हें कहीं छोड़ कर नहीं चले गये. ?
                  ये वर्ग वृद्धाश्रम में रखने के लिए अपने को समर्थ नहीं पाते  होंगे और इस वर्ग के लिए समाज और उसके मूल्य मायने रखते हैं वे जवाबदेह होते हैं कि अपने बुजुर्गो को किस तरह से रखते हैं? ये बात और है समाज के बदलते मूल्यों के चलते अब कोई किसी के पारिवारिक मामलों में नहीं बोलता लेकिन कटाक्ष करने में आज भी लोग पीछे नहीं हटते हैं और इसी लिए खो गए एक ऐसा उत्तर है जिसे सुनकर लोग निरुत्तर हो जायेंगे लेकिन क्या वाकई हम सब खामोश होकर उनकी इस दलील को स्वीकार कर रहे है. ? वे प्रश्न उठा रहे हैं  कि  कैसे हम इतने गैर जिम्मेदार हो जाते हैं ? अगर वे बुजुर्ग को साथ लेकर जाते हैं तो क्यों नहीं वे उसके साथ अपने घर और परिवार के बारे में जानकारी उन्हें लिख कर दे देते हैं . ताकि अगर वे भटक भी जाएँ तो वहां की व्यवस्था उसके आधार पर उन्हें अपने परिजनों से मिलवा सकें . उनके पास अपने घर के जिम्मेदार व्यक्ति का फ़ोन नंबर  भी उनको दे सकते हैं ताकि उनसे सम्बन्ध साधा जा सके. लेकिन ये तो तब किया जाता है जब हम इस स्थिति को टालने के लिए सोच रहे हों . हम उन्हें सड़क पर फ़ेंक आयें या फिर मेले में छोड़ आये लेकिन क्या परिवार से शेष सभी सदस्य इतने निष्ठुर हो जाते हैं कि अपने घर के बुजुर्गों को इस  तरह से छोड़े जाने के निर्णय को स्वीकार कर चुप लगा जाते हैं  ?