चिट्ठाजगत www.hamarivani.com

शनिवार, 31 मार्च 2012

पैसा नहीं दिल चाहिए !

कल एक प्रोग्राम देखा प्रोग्राम न कहें उसे एक समाचार के रूप में यथार्थ को दर्शा रहे थे। वैसे हर इंसान इस दुनियाँ में कुछ बन कर आता है और कुछ बन कर जाता है लेकिन उसके भावनाएं और संस्कार कब कैसे बदल जाते हें? ये हम सोच नहीं पाते हें।
किस्सा एक फिल्मी दुनियाँ के एक्स्ट्रा कलाकार का है । जो कम से कम एक हजार फिल्मों में काम करने के बाद आज लखनऊ में भीख मांग कर अपना गुजारा कर रहा है। सुरेन्द्र खरे नाम के इस इंसान ने जीवन में खुद शादी नहीं की। परिवार में बहने और भाई है (भाई रेलवे में एकाउंट ऑफिसर है) । लेकिन रिश्ते अब कोई मतलब नहीं रखते हें। ऐसा नहीं कि इस इंसान ने जीवन में बहुत कमाया और सारा का सारा दूसरों की सहायता में खर्च किया और अपने लिए सोचा था कि सारी दुनियाँ के काम आ रहा हूँ तो मुझसे कौन मुँह मोड़ेगा? इस दिन की तो उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। साथ ही बताती चलूँ कि इस इंसान ने मदर इण्डिया , मुगले आजम, यहूदी की बेटी और पाकीजा जैसी हिट फिल्मों में काम किया था।
इस किस्से को एक दूसरे घटना से जोड़ना चाहती हूँ। मेरी काम करने वाली जिसकी उम्र ६० साल से काम नहीं होगी ने कहलाया कि वह आगे १५ नहीं आ पायेगी क्योंकि उसके जेठ जी का निधन हो गया है। वह विधवा औरत ६ बेटों की माँ है और अपने खर्च के लिए खुद काम करती है साथ ही एक बहू के न रहने के कारण उसकी बेटी को रखती है और अपने बेटों के द्वारा घर से निकाले गए जेठ को भी रखती थी।
उसके पास सिर्फ एक कमरा है बाकी बेटों में ले रखा है। उसके बाहर चबूतरे पर उसने एक हाथ ठेला लगा कर और बाहर से तिरपाल डाल कर जेठ को लिटा रखा था क्योंकि अब वह चलने फिरने में भी असमर्थ था। उसने जेठ के निधन पर उनके बेटों को खबर भेजी तो उन लोगों ने कहला दिया कि जब उनकी अर्थी उठे तो हमारे घर हो कर ही ले जाना हम भी साथ हो लेंगे। अपने पिता को उन्होंने यह कह कर घर से निकाल दिया था कि जीवन भर खाया उड़ाया है हमारे रहने के लिए जगह भी नहीं की। चाचा अपने बेटों के लिए रहने की जगह तो कर गए। फिर पिता भीख मांगने लगे और इसको पता चला तो वह अपने घर ले आई कि मेरे पास चलो आखिर अगर आपका भाई होता तो इस तरह तो भीख न माँगने देता। मैं जो भी कमाती हूँ उससे पेट तो भर ही सकती हूँ।
कई जगह काम करती है और घर जाकर चाहे खुद खाना न खाए लेकिन जेठ के लिए कुछ बना कर जरूर दे आती और दूसरे घरों में निकल जाती। कभी किसी भी घर से उसने कभी खाने को नहीं माँगा और न खाती है। अपनी कमाई का ही खाती है।
जेठ की अंतिम क्रिया से लेकर उसकी त्रयोदशी तक के सारे काम उसने किया । जेठ के बेटों ने श्मशान जाने तक की जहमत नहीं उठाई क्योंकि उनके घर से शव ले ही नहीं जाया गया। भतीजों ने स्पष्ट मना कर दिया कि अब जब वे अंतिम समय में हमारे घर में रहे तो काम भी हम ही कर देंगे। यद्यपि उसके बेटे भी बहुत समर्थ नहीं है कोई कबाड़ का काम करता है कोई कहीं फैक्ट्री में काम करता है और कोई फेरी लगता है। लेकिन माँ के इस कदम को उन्होंने इतना सहारा दिया कि अगर उसने रखा तो शेष काम हम कर ही लेंगे।
कहाँ तो आफिसर होकर अपने भाई को भीख माँगते हुए देख कर भी आत्मा कांपी नहीं । हो सकता है कि टीवी पर आने के बाद कुछ शर्म आये लेकिन किसी को क्या पता कि ये हें कौन।
दूसरे घर घर काम करने वाली ने अपने पति के भाई गर्त से निकल कर अपनी सामर्थ्य के अनुसार रखा खिलाया पिलाया और उसके अंतिम काम भी कर डाले। यहाँ खून के रिश्ते काम नहीं आते बल्कि संवेदनाएं होनी चाहिए जो आज अपनों में ही क्या अपने अंशों में भी ख़त्म होती चली जा रही हें।

शनिवार, 24 मार्च 2012

बदलते लोग !

आज डॉ मोनिका शर्मा का लेख पढ़ा तो उससे निकल कर एक घटना मेरे जेहन में उभरने लगी - जिसने मुझे उस परिवार से दूर कर दिया

मेरी शादी जब हुए तो मेरा परिवार कानपुर विश्वविद्यालय परिसर में रहता थावहाँ की डिस्पेंसरी मेरे ससुर जी चलाते थेउस समय कालोनी बहुत बड़ी थीएक रजिस्ट्रार का परिवार का था - उनके परिवार में बेटियाँ और बेटा थाउनकी बड़ी बेटी मेरी हमउम्र थी सो मेरी अच्छी दोस्त बन गयीमैं बहू थी सो वह मेरे पास जाती थीहमारे बीच अच्छी अंतरंगता थी और बाद में वह मेरे पति को राखी बांधने लगी और उससे ये सम्बन्ध आज भी जारी है
उसकी शादी हो गयी और हमने विश्वविद्यालय छोड़ दिया लेकिन सम्बन्ध ख़त्म नहीं हुए थेउनकी चौथी नंबर की बेटी जहाँ मैं प्रिंसिपल थी उसी स्कूल में पढ़ाने लगी थी लेकिन उससे हमारे सम्बन्ध बड़ी बहन के अनुसार ही थेमेरी बेटी का मुंडन था और मैं इसका निमंत्रण देने के लिए उनके घर गयी तो घर में उनकी दूसरे नंबर की बेटी मिलीअब उनकी दो बेटियों की शादी हो चुकी थी और बाकी नौकरी करने लगी थींस्थिति में बहुत फर्क गया थावह मुझे देखते ही बोली 'कहिये भाभी कोई काम है क्या?'
मुझे सुनकर बहुत बुरा लगामैंने कहा कि नहीं ऐसा कुछ नहीं मीनू से मिलने आई थी कि सोनू का मुंडन है
'अच्छा मैं तो समझी कि यूनिवर्सिटी का कोई काम होगा यहाँ कोई बिना काम के तो आता नहीं है। '
मुझे सुनकर बड़ा आश्चर्य लगा कि ये लड़कियाँ जब इन्हें कॉलेज जाना होता था तो मेरे पति के घर से निकलने के समय पहले से जाती - 'भाई साहब के साथ निकल जाऊँगी।'
उनको तो शहर जाना ही होता था सो साथ ले जाते और कॉलेज छोड़ देते थेये वही लड़की है जो संबंधों को अब सिर्फ अपने पापा और अपनी हैसियत से तौलने लगी थीअपने पद पर रहते हुए उनके पिता ने अपने बच्चों को विश्वविद्यालय या डिग्री कॉलेज में लगा दिया और देखते देखते ही वे बहुत पैसे वाले हो गए

सोमवार, 12 मार्च 2012

पूत न भये सपूत !

                  इसे मजाक न समझिएगा , एक यथार्थ है ऐसा जिसे अपनी आँखों से देख रही हूँ और हमारे समाज की दकियानूसीपन के मुँह पर एक करारा तमाचा भी। हमारे समाज में एक पुत्र होने पर वंश का नाम चलता रहेगा ये अवधारणा आज भी पूरे जोर शोर से बाकी है। फिर हमसे एक पिछली पीढ़ी भी इससे कहीं अधिक सोचती रही है कि वंश का नाम न डूब जाए भले ही वंशज कहीं और जाकर रहें और यहाँ कोई नाम लेवा न रहे।
मेरी एक सहेजी जो उरई में मेरे साथ १९६९ में ग्यारहवीं तक ही पढ़ी
फिर उसके बाद उसके पापा का ट्रान्सफर इटावा हो गया और वह चली गयी। उस समय उसके पापा कोर्ट में किसी अच्छी पोस्ट पर थे। हमारे बीच १९७२ तक ही संपर्क रहा और उसके बाद उसकी शादी जल्दी कर दी गयी और हम अलग हो गए कोई खोज खबर नहीं रही। जब वह उरई से गयी थी उसके दो भाई और दो बहन थी। पिता कई भाई थे सो उन्हें दो बेटों में संतोष न हुआ और उसकी शादी के बाद उनके घर में दो बेटे और दो बेटियाँ और हुईं। अपने रिटायरमेंट के बाद तक उन्होंने बेटों की इच्छा पूरी की। चार सपूत हुए। लेकिन सपूत तो क्या कोई पूत भी न निकल पाया।
              कुछ इत्तेफाक ऐसा था कि जब मेरी सहेली का उसका बेटा पढ़ लिख कर इंजीनियर बन गया तो उसने मेरे बारे में बताया और कहा कि नेट पर खोजो शायद कहीं मिल जाए और इत्तेफाक से वाकई मैं उसको मिल गयी और फिर मेल के जरिये ३३ साल बाद हम एक दूसरे की खबर ले सके और फिर मिल भी सके क्योंकि उसकी मम्मी कानपुर में ही रहती थीं।
           जब उससे मुलाकात हुई तो पता चला कि हमारे अलग होने के बाद उसके पापा ने और परिवार बढाया था कि उसका नाम दूर दूर चलता रहेगा। लेकिन अफसोस उनके चारों बेटों में कोई इतना भी नहीं पढ़ा कि वे कहीं नौकरी कर लेते। माँ जीवित थीं तो उनको पेंशन मिलती थी और एक बहन तलाकशुदा थी जो सबके लिए खाना बनाया करती थी और माँ की सेवा करती थी। बेटे अपने जेब खर्च भर के लिए इधर उधर करके कुछ कमा लेते थे लेकिन रोटियां तो माँ को ही खिलानी पड़ती हें।
फिर एक साल के अन्दर उसकी माँ का स्वर्गवास होगया और बहन तो जैसे उनके लिए ही जी रही थी। माँ के १५ दिन बाद बहन चल बसी। घर में कोई रोटी बनाने वाला न था। चार बेटे उनकी किसी की भी शादी न हुई थी। सिर छुपाने के लिए घर माँ के नाम था सो सब रह भर सकते थे। पिता परिवार तो बढ़ाते रहे कि वंश चलता रहे लेकिन उन वंश चलाने वालों के लिए कुछ भी न सोचा कि इनका भविष्य न बनाया तो क्या होगा? बेटियाँ तो उन्होंने अपने जीवन में ही ब्याह दी थी , उसमें से भी एक का तलाक हो गया था।
                  एक दिन   उसका फ़ोन आया कि उसके चाचा का निधन हो गया है और वह नागपुर से सीधे मेरे पास ही आएगी उसके बाद वह उनके घर जायेगी। आने पर उसने बताया कि अब घर में कोई इतना भी नहीं है कि जाकर वहाँ इंसान बैठ कर नाश्ता करके निकल जाए। अब ऐसे भाइयों के बारे में मैंने सोचना छोड़ दिया क्योंकि ये नाकारा लोगों को कौन अपनी बेटी देगा और किस मुँह से किसी को बताऊँ कि मेरे भाई से अपनी बेटी की शादी कर दीजिये। वे करते कुछ ही नहीं है। बस अपने अपने पेट भरने का इंतजाम भर किसी तरह से कर लेते हें।
बस यही कहते बनता है कि चिराग तले अँधेरा ऐसे ही होता है कि पिता ने तो चार बेटे पैदा किये कि वंश का नाम चलेगा और बेटों ने नाम जीते जी डुबो दिया।

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

एक दिन बिक जाएगा......!

एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल ,
जग में रह जायेंगे प्यारे तेरे बोल .


इन पंक्तियों में छिपा सच एक दिन दिखाई ही दे गया और दो चार हुई इस घटना से .

जीवन में इंसान अहम् से भरा मदमस्त हाथी की तरह से होता है , जिसको अपने सामने कोई और नजर ही नहीं आता है कौन सामने पड़ा और किसको कुचल दिया इससे कोई सरोकार नहीं होता है लेकिन कब तक ? जब तक कि उसको अंकुश करने वाला नहीं मिल जाता लेकिन मनुष्य का अहम् तो इससे भी अधिक खतरनाक होता है अपने इस अहंकार के चलते हम अपनी शक्ति और धन के सामने किसी को कुछ भी नहीं समझते हें चाहे ये इंसान की क्षुद्र बुद्धि हो या फिर मदान्धता
उन्हें मैं मिस्टर जज ही कहूँगी वे सेशन कोर्ट के जज थेपद, सम्मान और पद के अनुरुप सफेद और काले धन की दीवारों ने उनको मानसिक तौर पर अपने में ही कैद कर दिया थाघर में किसी का भी आना जाना उन्हें पसंद था और ही किसी रिश्तेदार या सम्बन्ध रखनाउन्हें शक था कि लोग मेरे पैसे के पीछे मुझसे रिश्ता रखना चाहते हेंउनकी पत्नी चाहकर भी रिश्ते निभा पाती थीं और जोड़ पाती थीउनको अपने स्तर के लोगों से ही मिलने जुलने की हिदायत थी और जीवन भर ऐसे रहते रहते उनकी दुनियाँ भी उन्हीं लोगों के बीच रह गयी थी। ।अपने बच्चों तक उनकी दुनियाँ सीमित थी और उनमें से उन बच्चों से कोई रिश्ता था जिन्होंने उनके अहंकार को चोट पहुंचा कर खुद किसी साधारण परिवार के सदस्य से शादी कर ली थीबच्चे उनकी अनुपस्थिति में माँ से मिलने आते रहते
एक दिन ईश्वर ने उस अहंकार की सजा उन्हें ऐसे दी कि देखने वाले कह उठे सामान सौ बरस का पल की खबर नहींइंसान अगर पैसे और पद के साथ विनम्र और व्यवहार कुशल भी तो उसकी कोई बराबरी नहीं कर सकता लेकिन इन जैसे..........। आलीशान बंगला और गाड़ियों की फौज ने उनका साथ देने से इनकार कर दिया क्योंकि उनके पास सब कुछ था बस नहीं थी तो इंसानियत और रिश्तों को निभाने की चाहत
जज साहब कोर्ट से आये उनके रिटायर होने के कुछ ही महीने बाकी थे कि अचानक उन्हें सीने में दर्द हुआ और किसी भी तरह की सहायता मिलने से पूर्व ही चल बसेउनकी पत्नी तो हतप्रभ हो गयी लेकिन क्या करती? नौकरों से कहा कि रिश्तेदारों को फ़ोन कर दोकुछ त्रासदी ऐसी थी कि उनके बच्चे भी उस शहर में नहीं थे और उनके बच्चे उनकी तरह इज्जतदार होने का तमगा नहीं लगा पाए थेवे अपने परिवार के साथ खुश थेरात भर पत्नी अपने नौकरों के साथ जज साहब के शव के साथ बैठी रहींखुद किसी से रिश्ता रखने के कारण उनकी हिम्मत ही नहीं हुई कि वे किसी को खबर करके बुला लेंसुबह नौकर तो उनके नौकर थे उन लोगों ने जिन्हें बता दिया उन्हें खबर कर दी गयी और कुछ रिश्तेदार मृतक से अब क्या बैर - सोच कर गए लेकिन उनकी प्रथा के अनुसार कुछ रिश्तेदार शव को हाथ नहीं लगा सकते थे और जो लगा सकते थे वे लगाने को तैयार नहीं थेवैसे इस जगह इंसानियत का वास्ता देकर उन्हें भी ऐसा नहीं करना चाहिए था लेकिन इंसान के लिए एक सबकबाजार से चार लेबर बुलाये गए और उनके शव को उन लोगों ने ही शव वहाँ में रखा और फिर श्मशान के लिए रवाना किया गया
लोग अपने घरों को वापस, कितने ही सगे रिश्ते होने के बाद भी वे आगे नहीं बढेपत्नी को क्लब और पार्टियों में जाने की पूरी अनुमति थी लेकिन रिश्तेदार के नाम पर नहीं शायद उन्हें लगता था कि हर रिश्तेदार उनके पैसे और पद से लाभ उठाने के लिए ही जुड़ना चाहता है इसी लिए किसी से भी नहीं सम्बन्ध रखने की सख्त हिदायत थीक्लब और पार्टी वाले मिलने वाले कुछ समय के लिए आये और चले गएशाम को कुछ रिश्तेदार खाना लेकर पहुंचे तो उनके पास सिर्फ उनकी बेटी थीपति के अहंकार के रंग में रंग कर शायद अनजाने में उन्होंने भी बहुत कुछ खो दिया था
ऐसी घटनाओं को देख कर बस यही कहा जा सकता है कि बेशक आप अपने पैसे और पद से किसी को लाभान्वित मत कीजिये लेकिन ये बोल ऐसे हें कि इससे तो इंसान को अपनी ही तरह इंसान समझते रहिये , वे आपको इंसान होने का सबूत आपको अवश्य ही देंगेसमाज के सदस्य होने के नाते उससे काट कर आप अपनी दुनियाँ में जी तो सकते हें और खुश भी रह सकते हें लेकिन सामाजिक सरोकार के वक़्त आप अकेले ही खड़े होंगे

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

खून के रिश्ते !

बहुत दिनों से व्यस्त थी, पहले एक बेटी (जेठ जी की बेटी) की शादी ११ फरवरी को सम्पन्न हुई और फिर सम्पन्न हुए मेरी बेटी प्रज्ञा की सहेली और मेरी मानस पुत्री कल्पना की। पहली शादी में पूरा परिवार साथ था और काफी लोगों ने शिरकत की भी लेकिन दूसरी बेटी की शादी में तो जन्मदात्री माँ के बिना दूसरे स्वभाव से बागी पिता और उनसे रुष्ट रिश्तेदार और घर वालों के सहयोग और असहयोग ने कुछ जिम्मेदारियों को बढ़ा दिया था लेकिन मैं तो उस माँ से वचनबद्ध थी जिसे मैंने उसके अंतिम समय वचन दिया था।
कल
उसकी विदाई के बाद जब घर आई तो फिर तुरंत ही प्रज्ञा की विदाई करनी थी और रात में सोनू की। सब करके जब रात में सोने चली तो नींद नहीं आई क्योंकि कल्पना का रिसेप्शन था और उसमें हमारे लिए कोई जगह नहीं थी। मुझे बुरा नहीं लगा लेकिन फिर सोचा कि अगर ये अगर खून के रिश्ते होते तो जरूर निमंत्रण मिलता। असहयोगी पिता और गैर जिम्मेदार भाई और भाभी की जगह थी और वे गये और उससे भी बड़ी बात कि वे मेरा दिया हुआ उपहार ही लेकर उसके घर पहुचे मेरे पति बोले कि 'अब भूल जाओ कल्पना को, तुम्हारा काम पूरा हुआ।'
मैं
इसे सोचती रही लेकिन कैसे भूल जाऊं? वो बच्ची जिसे मैंने पिछले दस साल से अपना अंश मना है , वह दिल्ली से कानपुर आई तो उनके पिता को ये चिंता नहीं होती कि वो स्टेशन से घर कैसे आएगी? अगर रात या सुबह की ट्रेन से जाना है तो कैसे जायेगी? ये चिंता हम करते थे और उसको घर हम लाते थे हाँ इतना जरूर कि घर आने के पहले से उसके पिता के फ़ोन आने शुरू हो जाते कि उसको घर पहुंचा दो या फिर घर कब रहीहै?
इसे
मैंने उसी तरह से पूरा किया जैसे अपनी बेटी के लिए करते थे क्योंकि दोनों साथ ही आती और जाती थीं लेकिन जब वह अकेले भी आई तब भी ये काम हम करते रहे क्योंकि वो मेरी बेटी हें।
सगाई
हुई और फिर शादी भी हो गयी लेकिन हम अपना परिचय उसके भावी परिवार को क्या दें? क्योंकि उनकी नजर में मित्रता सिर्फ मित्रता होती है उसके परिवार से इतनी प्रगाढ़ता उनके समझ नहीं आती। ऐसा नहीं है कि वो परिवार पढ़ा लिखा हो लेकिन वो ठाकुर परिवार से हें और उनकी सोच खून से अधिक कुछ सोच ही नहीं सकते हें। पिछले एक हफ्ते से सारे दिन और रात उसके सारे काम पूरे करवाने में बीत गए कैसे घर में व्यवस्था होगी और कैसे उसकी रस्मों के लिए तैयारी करनी होगी? सब कुछ कर लिया और विवाह के सम्पन्न होते ही सब कुछ जैसे सपना सा हो चुका है।
मैं
उसके सामने नहीं रोई लेकिन अब सोचती हूँ कि ये आंसूं क्यों बह रहे हें? शायद एक अंश के छूट जाने का दर्द है लेकिन इंसान इन रिश्तों के लिए सार्थक क्यों नहीं सोच सकता है? क्या इस रिश्ते में भी किसी को कोई स्वार्थ दिख सकता है। नहीं जानती लेकिन ये जरूर लग रहा है कि अब तक तो ये ही सोचा था कि खून के रिश्ते कभी कभी रिश्तों को झुठला देते हें लेकिन ये आत्मा और स्नेह के रिश्ते तो सबसे गहरे होते हें। इनके लिए कोई कैसे ऐसा सोच सकता है?
अब
मेरे इस रिश्ते का भविष्य कल ही पता चलेगा , जब वो इसके लिए सबको तैयार करेगी कि ये रिश्ता कितना अहम् है? नहीं भी स्वीकारा तो भी वो मेरी बेटी तो रहेगी ही। लेकिन ये खालीपण और उदासी कब मेरा साथ छोड़ेगी ये नहीं जानती। इतना कष्ट जो मैंने प्रज्ञा के विवाह के बाद भी नहीं सहा। आज से महीने पहले लिखा "ख़ुशी मिली इतनी ...." और आज ये लिख रही हूँ। सब कुछ बांटती रही तो ये भी बाँट लिया। मन हल्का हो गया

बुधवार, 25 जनवरी 2012

३२ वर्ष का जीवन !







२६ जनवरी १९८० वह दिन था जिस दिन हम नई जिन्दगी शुरू करने के लिए वचनबद्ध हुए थे एक लम्बा अरसा गुजर गया और लगता नहीं कि ये वर्ष कहाँ गुजर गए ? संयुक्त परिवार की जिम्मेदारियों को पूरा करते करते और अपने बच्चों के बड़ा करने और पढ़ाने लिखने में ही सारा समय गुजर गया
आज हम जिस स्थिति में हें तो पुराने किसी किस्से को याद करके हँस लेते हेंबात २६ जनवरी १९८१ की है हमारी पहली विवाह की वर्षगांठ थी और इत्तेफाक से दिन भी ऐसा कि चाहे कहीं भी रहें इस दिन तो छुट्टी होनी है और हम कहीं भी जाने और आने के लिए स्वतन्त्रबड़े अरमानों से मैं तैयार हुई कि आज हम पिक्चर देखने जाते हें और वहीं से खाना खाकर लौटेंगेपरिवार हमारा बहुत आधुनिक था लेकिन मेरे पति उस समय मेडिकल रिप्रजेंतेतिवे थे और उनका मिलने जुलने वालों का स्तर अलग था और वे सब में शरीक होते थे इसलिए पार्टी देना भी जरूरी थालेकिन ये बात किसी को नहीं बताई थी घर में
मैं तो तैयार हो गयी और उस समय घर से बाहर जाने पर ससुर जी की अनुमति लेनी पड़ती थीमेरे तो पूछने का कोई सवाल ही नहीं उठता था सो पतिदेव गए पूछने के लिएउन्होंने सपाट शब्दों में मना कर दिया नहीं कहीं नहीं जाना है घर में रहोये घर में नई आई हैं कि घूमने जायेंगीमैंने साड़ी उतार दी और लेट कर खूब रोई, लेकिन तब ये था कि अगर पिताजी ने मना कर दिया है तो उनके लड़के उसके विरुद्ध कुछ कर सकेंबस दोनों चुपचाप घर में बैठ गएअपने दोस्तों को इन्होने फ़ोन करके बता दिया की पार्टी रेखा की तबियत ठीक नहीं है इसलिए शाम को रख लेते हेंऔर फिर इस बात के लिए उन्होंने ही भूमिका बनायीं और झूठ बोला कि रेखा के पेट में दर्द है इसे डॉक्टर को दिखाने के लिए ले जाना है. मेरा दिन में गुस्से के मारे खाना खाने का मन नहीं हुआ और मैंने खाना खाया भी नहीं तो ससुर जी को विश्वास हो गया कि जरूर तबियत ख़राब है और उन्होंने अनुमति दे दीहम दिन के बजाय शाम को निकले और रात तक लौटे
ससुर जी को लगा की इसको तो डॉक्टर को दिखाने में समय लगता नहीं है फिर इतनी देरगेट खोलते ही पूछा इतनी देर कहाँ लगा दी?
"वो डॉक्टर बहादुर को दिखाया था तो वो बोले बहू पहली बार आई है बगैर खाना खाए नहीं जाओ।" बताती चलूँ कि ये डॉक्टर बहादुर मेरे ससुर के सेवाकाल में अस्पताल में डॉक्टर थे और उनसे अच्छे सम्बन्ध थेबस बात बन गयी अब सोचती हूँ की एक दिन को अपने ढंग से जीने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़े थे

शनिवार, 7 जनवरी 2012

गरीबी खुद एक इल्जाम है!

गरीबी खुद एक इल्जाम है क्योंकि उसको ईश्वर ने बनाया ही इसलिए है कि जो गरीब है भले ही ईमानदार हो उसको चोर , बेईमान और गिरा हुआ कहने का सबको अधिकार प्राप्त होता है और बेकुसूर को दो चार हाथ लगाकर अपने हाथ साफ करने का मौका भी सबको ऊपरवाला दे ही देता है।


पिछले दिनों की बात है एक भव्य शादी समारोह था, करीब हजार लोग तो उसमें शामिल हुए ही होंगे। उसमें एक गरीब बच्चा घुस कर खाना खाने लगा। अभी ठीक से खा भी नहीं पाया था कि किसी की उसपर नजर पड़ गयी और फिर क्या था? उस बच्चे को रस्सी से बांध कर जीप के पीछे बाँध कर मैदान में घसीटा गया और जब वह बच्चा लहूलुहान हो गया तो कुछ समझदार कहे जाने वाले लोगों ने उसको छुड़ाया और अस्पताल पहुँचाया। पेट की भूख ही तो थी जिसने उसको उस स्थान पर जाने के लिए मजबूर किया । क्या उन घसीटने वालों ने उन प्लेटों को देखा जो पूरी पूरी भरी हुई डस्टबिन में डाल दी गयीं थी। उन में जितना खाना बर्बाद हुआ था उसमें उस जैसे कई सौ बच्चे खाना खा सकते थे लेकिन नहीं उस बच्चे को अपने अपराध की इतनी बड़ी सजा मिल गयी कि शायद वह इस जन्म में तो ऐसा कोई काम करेगा नहीं।


बड़े घरों की बात कहें उन्हें चाहिए होती हें गरीब लड़कियाँ जो २४ घंटे उनके घर में काम करें और अगर उन घरों के लड़के अपने शौक को पूरा करने के लिए अलमारी से रुपये उड़ा कर ले जाता है तो इल्जाम इन नौकरानियों पर ही आता है क्योंकि वे गरीब जो ठहरी। बड़े घर के बच्चे तो अपराध कर ही नहीं सकते हें । जब आज अच्छे घरों के लड़के ही बाइक पर घूमते हुए अपराधों के जनक बन रहे हें। उनके लिए ये शगल है क्योंकि बाइक भागना कोई कठिन काम नहीं और फिर एक दो आवारा दोस्तों को साथ लेकर ऐश करने के लिए कुछ तो मिल ही जाता है।


एक उद्योगपति घराने की बात करती हूँ वहाँ पर मेहमानों के लिए चाँदी के बर्तन खाने के लिए प्रयोग किये जाते हें और ऐसे ही एक दिन उसमें से एक गिलास गायब हो गया। चोर को पकड़ना बहुत ही मुश्किल होता है और कुछ तो परम विश्वास पात्र होते हें। घर में काम करने वाले नौकरों की पूरी फौज के वेतन से पैसे काट लिए गए। शायद उस गिलास की कीमत से ज्यादा। वह घराना अपने बेटे के स्वास्थ्य की समय के लिए प्रतिदिन हजारों रुपये खर्च कर रहा था। वे गरीब जिनके वेतन से रुपये कटने के बाद इतना भी नहीं मिला कि वे अपने बच्चों के लिए महीने भर का खाना भी जुटा सकें। लेकिन ये तो उनके भाग्य की विडम्बना ही कही जायेगी न कि वे गरीब हें। और गरीबी खुद में एक इल्जाम है।