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शनिवार, 4 अगस्त 2012

अब इसके आगे क्या ?

         

घर से बाहर साथियों  के साथ 





   मेरे के पारिवारिक मित्र जो डॉक्टर हें बिठूर  के एक वृद्धाश्रम में वृद्धों के स्वास्थ्य परीक्षण के लिए अक्सर जाते हैं, एक दिन मैंने उनके साथ चलने का विचार बनाया . मुझे वैसे भी ऐसी जगहों पर जाने में अच्छा लगता है. उस दिन मेरे ही सामने जो तमाशा हुआ उसको देख कर लगने लगा कि अब बुजुर्गों को घर से निकाल कर भी उनके बेटे और बहू को चैन नहीं मिल रहा है वे कुछ और भी चाहते हैं लेकिन वे चाहते क्या है? इसको इस घटना से देख कर समझा जा सकता है.
                             वह बुजुर्ग श्रीमान शर्मा एक उच्च पदाधिकारी थे और अपने रिटायर्ड होने के बाद आज उनको चालीस हजार पेंशन मिल रही है . उनकी पत्नी की मृत्यु के बाद उनको विविध तरीके से परेशान करना शुरू कर दिया गया. वह इंसान जो जीवन भर ऑफिस में और घर में ए सी में रहा उसको अपने ही तीन मंजिले मकान में ऊपर टिन शेड में रहने के लिए आदेश दिया गया.  जीवन भर ऐशो आराम से न सही लेकिन आराम से जीवन जिया था. खुद्दारी भी थी , फिर जब सब कुछ अपने बल बूते पर किया था तो फिर डरना किससे ? उन्होंने अपने मकान के सारे दस्तावेज लिए , बैंक के सारे दस्तावेज और अपने कपड़े लेकर घर छोड़ दिया. वह इस आश्रम में आकर रहने लगे. इस बारे में उन्होंने अपने घर में बेटे और बहू को कुछ भी नहीं बताया था. एक दो दिन तो उन लोगों ने सोचा कि चलो बाला ताली कुछ दिन चैन से रहेंगे और उन लोगों ने उनके बारे में कुछ भी पता लगाने की जरूरत नहीं समझी.
                           फिर आया बिजली का बिल जो कई हजार था , अब बहू बेटे के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं क्योंकि ये सारे खर्च तो पापाजी ही उठते थे. अब वे क्या करें? अब जरूरत समझी कि अपने पिता का पता लगायें . उनके यार दोस्तों से पता किया और फिर पता तो लगाना ही था. उस दिन वे दोनों बिठूर  वृद्धाश्रम में पहुंचे थे. पहले तो उन लोगों ने अकेले में बात करने की बात कही जो पिता ने मान ली और फिर पता नहीं क्या हुआ? बेटे ने पिता को मारना शुरू कर दिया . मार पीट की आवाज सुनकर सभी लोग उस तरफ भागे उनको उठाया. पूरी बात क्या हुई? इस बारे में जानने और पूछने की किसी को कोई जरूरत थी ही नहीं. वहाँ के बुजुर्गों ने ये भी देखा कि शर्मा जी की बहू ने अपने ससुर के हाथ में दाँत से काट लिया तो शर्मा जी ने भी उत्तर में उसका हाथ अपने दाँत के बीच में ले लिया. उसके बाद उसने उनको धक्का दे दिया और वे दूर जा गिरे.  वहाँ उपस्थित बुजुर्गों ने यह हालात देख कर उनके बेटे की सबने मिल कर पिटाई कर दी और फिर बेटे और बहू को वहाँ से भागते ही बना.  शर्मा जी के हाथ में उनकी बहू ने काट लिया था जिससे खून बह रहा था. उनकी ड्रेसिंग  की गयी . फिर उनको आराम से बिठा कर पूछा  गया कि ये लोग क्यों आये थे? फिर क्या हुआ जो इस तरह मार पीट पर उतार आये.
                             शर्मा जी का सिर शर्मिदगी से झुका हुआ था, वह सिर जो अपने ऑफिस में कभी झुका नहीं था और आज अपने ही खून के कारनामों से झुका हुआ था. उन्होंने ने बताया कि - घर के सारे खर्च मैं  उठाया करता था , फिर मैं इतनी पेंशन का करता भी क्या? बच्चों के लिए है लेकिन शायद उनका ख्याल था कि मकान का किराया मैं उन्हें दे दूं और घर भी उनके लिए खाली करके ऊपर छत पर शेड में चला जाऊं क्योंकि यहाँ पर उसके साले के बेटा और बेटी कोचिंग के लिए आने वाले थे तो उनके लिए मेरा कमरा ही सबसे ज्यादा ठीक रहेगा और मेरा क्या ? मैंने तो कहीं भी रह सकता हूँ, लेकिन ये मैं कैसे सहन कर सकता था? मैंने कोई विरोध नहीं किया और मैं घर छोड़ कर यहाँ आ गया. आज वे ए टी एम का पासवर्ड माँगने केलिए आये थे क्यों कि मेरा ए टी एम अलमारी में ही छूट गया था. मेरे वहाँ रहने या न रहने से उन्हें कोई मतलब नहीं है. बेटे से जब मैंने देने से इनकार कर दिया तो पहले उसने अपने बच्चों और खर्चे का हवाला दिया लेकिन मैं अब बिल्कुल भी तनाव लेने के लिए तैयार नहीं था. पत्नी के जाने के बाद वर्षों मैंने इन लोगों को हर तरीके से सहन किया लेकिन अब बिल्कुल नहीं. मैंने जब इनकार कर दिया तो बेटा गाली गलौज  पर उतार आया लेकिन मैं सोच चुका था कि नहीं देना है तो नहीं देना है. मैं ए टी एम बैंक जाकर ब्लाक करवा दूँगा और दूसरा ले लूँगा. मेरे बार बार इनकार पर उसने हाथ उठा दिया और जैसे ही मैंने उस पर हाथ उठाया तो मेरी बहू  ने मेरे हाथ में दाँत से काट लिया और जब मैंने उसके हाथ में काटा तो उसने मुझे धक्का दे दिया. बाकी आप लोगों के सामने है. 











                             हम कहते हैं कि हमारे बुजुर्ग भी कहीं न कहीं गलत होते हैं, हाँ कुछ बुजुर्ग होते हैं लेकिन उस समय घर बुजुर्ग नहीं बहू बेटे छोड़ने की सोचते हैं ताकि वे अलग जाकर चैन से रह सकें. यहाँ तो घर बुजुर्ग ने छोड़ा है  और फिर भी बेटे और बहू को चैन नहीं है. ये सोचने पर मजबूर करता है कि हम बुजुर्गों को इज्जत और आराम से रखना तो नहीं चाहते हैं लेकिन उनके धन के प्रति हमारे मन में पूरा लालच है ऐसी ही एक घटना तो मैंने अपने बहुत ही करीबी बुजुर्ग के जीवन में भी देखा था लेकिन वहाँ बस इतना था कि बेटे समर्थ थे और पिता को रखना नहीं चाहते थे क्योंकि उन्हें मालूम था कि पिता के पास जो भी है वह कहीं और नहीं जाएगा मिलना तो उन्हीं को है. जब तक वह जिन्दा है अपने तरीके से जिए , हम अपने व्यक्तिगत जीवन में उनको क्यों दखल देने दें.  पिता को कौन चाहता है? ये हद है हमारी निम्न मानसिकता की. और इससे आगे कुछ कह नहीं पाई लेकिन ये मेरा किसी वृद्धाश्रम का दूसरा अनुभव था.

सोमवार, 16 जुलाई 2012

कशमकश !

                   कभी कभी हम खुद एक  ऐसे असमंजस में फँस जाते हैं कि  पूछे गए सवालों का उत्तर हमारे पास नहीं होता है और होता भी है तो हम सामने वाले  संतुष्ट नहीं कर पाते हैं. तब न समझा पाने की जो छटपटाहट  होती है  और उस मनःस्थिति से गुजरते  हुए जो  बैचेनी और तनाव होता है , वह झकझोर  कर रख  देता है 
                   
                   मैंने अपने  जीवन में  पता नहीं  कितने लोगों  को काउंसिलिंग  करके तनाव और बिखरने वाली स्थिति से बचाया  है और दरकते हुए परिवार को भी टूटने से बचाया लेकिन  एक ऐसा मसला फँस गया और मैं खुद नहीं समझ पा रही हूँ कि  उस बच्चे को मैं संतुष्ट कर पायी  या नहीं। 
                 मेरी ममेरी जिठानी का पोता रजत कल मेरे पास आया . मेरी जिठानी का निधन हो चुका  है .इसलिए उस परिवार में  बड़े के नाते और  अन्तरंग होने  के नाते मुझसे सलाह  लेते हैं। मेरी जिठानी मुझसे बहुत बड़ी थी लेकिन छोटी बहन की तरह  वह भी हर काम  में हम दोनों को ही  बराबर साथ लेकर ही चली   या निर्णय लिया तो राय जरूर ली . 
                   उनके बड़े बेटे की मृत्यु एक दुर्घटना में शादी के दो साल बाद ही हो गयी थी। रजत उस 6  माह का था। उस घटना के बाद वह पूरी तरह से टूट चुकी थी और उससे अधिक तो वह बहू जिसने पति खोया था। फिर निर्णय लिया गया कि  बहू की शादी देवर  के साथ कर दी जाय . एक साल के बाद शादी करवा दी गयी। बच्चा बहुत छोटा था और वह चाचा का दुलारा तो भाई के समय भी था अतः  सोचा गया कि  रजत का जब भी स्कूल में नाम लिखाया जाएगा तो पिता की जगह पर चाचा  का ही नाम लिखाया जाय ताकि भविष्य में उसके मन में ये विचार न  आये कि मेरे पिता कोई और थे। शादी के बाद एक बेटी और हुई। पिता की ओर  से कभी भी कोई ऐसा व्यवहार नहीं हुआ कि  कोई इस बारे  में  सोचे। 
                   अब जब वह इंटर में पढ़ रहा है तब वह  इस सवाल को लेकर मेरे पास आया। वह मुझे दादू ही  कहता है जो अपनी दादी को कहता था। 
--'दादू मुझे आपसे कुछ पूछना है?'
--'हाँ बताओ क्या बात है?'
--'दादू क्या पापा मेरे पापा नहीं है? मेरे पापा कोई और थे?'
--'ये बात तुमसे किसने कही ?'
--'ये बात मुझे कल ही दया आंटी ने बताई है कि  तुम्हारे पापा तो संजय थे . ये तो तुम्हारे चाचा थे जिनसे दादू ने मम्मी  की शादी उनके न रहने पर करवाई '
                 दया उनके घर में बहुत वर्षों से किरायेदार थीं और अब दूसरी जगह रहने लगी .  ये बात सभी लोगों से कही गयी थी की इसा बच्चे को कभी ये बात न  जाये लेकिन मानव मन कब क्या कर बैठे ? इस बात की आशंका तो थी कि  ऐसा कभी न कभी हो सकता है। मैं भी मानसिक  पर इस स्थिति को झेलने के लिए  तैयार  थी।लेकिन ये जरूरी तो नहीं है कि  मैं सामने वाले को इस विषय मे सामने वाले को संतुष्ट कर ही  सकूं।  
--और दया आंटी ने क्या बतलाया?'
--'यही कि  तुम इस बारे में दादू से जाकर पूछ सकते हो। मैंने मम्मी से कुछ भी नहीं पूछा है , आपसे पूछ रहा हूँ। '
--'हाँ ये सच  है कि  तुम्हारे पिता संजय ही थे लेकिन तुम्हारे बचपन के  और मम्मी की मानसिक स्थिति को हम इतनी जल्दी बदल नहीं सकते थे कि  वह चाचा से शादी कल  तैयार हो जाएँ और जब तैयार हो गयीं तो ये निर्णय तुम्हारे और मम्मी के हित के लिए लिया गया . बार बार उस नाम और तस्वीरों को देख कर जो सवाल तुम उस उम्र में पूछते और मम्मी या दादू  उनके उत्तर तुमको देती तो शायद वह अपने अतीत  से बाहर  नहीं आ पाती . इसलिए ऐसा सोचा गया था। '
--'फिर पापा का नाम  किसी ने घर में क्यों नहीं लिया? '
--सिर्फ इसलिए की उस नाम पर तुम और तुम्हारी बहन  बड़े  होने पर जो सवाल करते उनके जवाब  नहीं होता और जवाब तो फिर भी दे देते तुम्हें उनसे संतुष्ट करना  और भी  कठिन था।' 
--'दादू ये तो ठीक नहीं  हुआ न, फिर उनका नाम तो कहीं भी नहीं बचा?'
--'हाँ ये सच है लेकिन जब वो इंसान ही नहीं रहता है तो फिर नाम कौन और कितने दिन लेता? उस नाम को बार बार याद करने के बाद भी हम उसको पा  नहीं सकते और फिर जो जीवित हैं उनके लिए जीना और भी मुश्किल  हो जाता. तुम्हारी दादू का वह बेटा था और बड़ा बेटा उन्होंने तुम्हारे और मम्मी के लिए अपने दिल  पर पत्थर रख कर,  उसके साथ ही उस नाम को खुले आम लेना बंद कर दिया।एक माँ के लिए अपने बेटे को भूलना असंभव होता है लेकिन उन्होंने ऐसा किया  तुम्हारे और मम्मी के लिए। '
--'मैंने तो अपने पापा की कोई तस्वीर भी नहीं देखी  है। वे कैसे थे? '
--'जिसको तुमने अपने होश संभालने के बाद से पिता के रूप में  है वही तुम्हारे पापा हैं। फिर से  संजय को वापस यादों और बातों में लाया गया तो सब कुछ उतना सहज नहीं रह जाएगा। मम्मी फिर से उलझ जायेगी। वह इस उम्र में बी पी की मरीज हो चुकी है क्योंकि उसने सिर्फ और सिर्फ दुःख ही देखे हैं। इसलिए उसके लिए तुम ये सवाल कभी उससे मत पूछना। '
--'नहीं दादू मैं आपसे  प्रॉमिस करता हूँ कि मम्मी से कभी नहीं पूछूंगा '
                           मैं   संतुष्ट कर पायी नहीं जानती  लेकिन बहुत मुश्किल काम था कि  हम लोगों ने कैसे संजय के नाम को न दुहराने की कसम के साथ ये निर्णय लिया था। 
 

गुरुवार, 28 जून 2012

क्या चाहता है समाज ?

                    इस समाज का यह स्वरूप आज नहीं बना है बल्कि सदियों से बना हुआ है , उसे नारी सदैव बेचारी के रूप में ही देख कर खुश होने की आदत पड़  चुकी है। उसका मन कैसे रोता है?  कुर्बान होने पर ये दर्द किसी को नहीं दिखाई देता है? वह उसके उस रूप को देख कर वाह वाह करने में उन्हें मजा आता है। 
                    पिछले दिनों में विश्वविद्यालय गयी ( बताती चलूँ कि मेरी शादी के समय हमारा परिवार विश्वविद्यालय परिसर में ही रहता था।)   मेरी मुलाकात मिसेज यादव से हो गयी . पके हुए बाल हलके रंग की साड़ी  में वे घर से ऑफिस आ रही थी। मैं ठिठक गई क्योंकि वे मुझे शायद न पहचान पाती क्योंकि हम दोनों की शादी सिर्फ कुछ ही महीने के अंतर से हुई थी। मेरे घर के सामने वाले ब्लाक में यादव जी रहते थे जिनकी पत्नी का निधन कुछ साल पहले हो चुका  था और उनके एक बेटा था। अपनी शादी के कुछ दिनों बाद सुना कि  यादव जी की शादी हो रही है और वह मंदिर में शादी करके आये घर में उन्होंने सत्यनारायण की कथा रखी . मैं नयी बहू थी सो जाने का कोई सवाल ही नहीं था। उनसे परिचय का एक अवसर था वह भी चला गया। नयी बहू का अपने जैसी बहू से परिचय का शौक जो होता है। 
                 सिर्फ 6 महीने बाद  यादव जी का  निधन हो गया। पूरे परिसर में कितनी तेजी से अफवाहें और चर्चाएँ  फैलने लगीं --
--कैसी अभागन आई है आते ही पति को खा गयी। 
--अब ये यहाँ टिकने वाली नहीं , सब लेकर चलती बनेगी ।
--यादव जी के बेटे का क्या होगा ? 
--इसका बाप बहुत चालू है ,  कुछ न कुछ तो चाल  चलेगा ही। 
--अरे विश्वविद्यालय की नौकरी नहीं छोड़ने वाला , खुद ले लेगा। 
--पढ़ी लिखी है क्या पता यही  नौकरी करने लगे? 
                   कुछ दिनों के बाद विश्वविद्यालय में उसको नौकरी दे दी गयी। वह अपने सौतेले बेटे के साथ वही रहने लगी और साथ में उनके पिता भी क्योंकि यादव जी के बेटे को टी बी की बीमारी थी और उसको देखभाल की जरूरत थी। उसने उस बेटे की देखभाल अपने बच्चे की तरह की क्योंकि उसके आगे इस बेटे के सिवा कोई और विकल्प था ही  नहीं।  उसके बाद मैं तीन साल तक उस परिसर में रही और वो भी उसी मकान  में रही . मेरी उनसे मिलने की इच्छा थी लेकिन पता नहीं क्यों? कौन सा पूर्वाग्रह था कि वहां की औरतों ने मुझे उससे मिलने नहीं दिया . उनका कहना था कि  किसी नवविवाहिता को ऐसी विधवा स्त्री से नहीं मिलाना चाहिए . मैं खिड़की से उसको ऑफिस जाते  हुए देखा करती थी और मुझे उनके साथ बहुत ही सहानुभूति थी।
               इतने साल बाद उन्हें उसी विधवा के वेश में देखा तो लगा कि  ये समाज कितना निष्ठुर है? उस बेचारी ने देखा क्या था?  किस पाप का दंड उसने भोगा ? न वैवाहिक जीवन का सुख , न परिवार का सुख और न दुनियादारी। इतने साल बाद परिसर के लोगों में से अधिकतर रिटायर्ड होकर जा चुके हैं लेकिन जब मिल जाते हैं तो जिक्र होने पर उनकी प्रशंसा करते हैं। 
            ये प्रशंसा किस बात की - इस बात की कि  उसने अपना पूरा जीवन एक विधवा का जीवन जीते हुए गुजार  दिया. हंसने  और बोलने तक पर पहरे लगे रहे क्योंकि ऑफिस का जीवन भी ऐसी औरतों के लिए आसान  नहीं होता है। फिर वह उस समय विश्वविद्यालय का माहौल जहाँ सिर्फ औरतें ही नहीं बल्कि पुरुष भी प्रपंच किया करते थे। करते तो आज भी हैं लेकिन उस समय के लोगों की सोच कुछ और ही होती थी। मिसेज यादव का जीवन इस समाज और सोच की बलि चढ़ ही गया । 


शनिवार, 9 जून 2012

परदेश की कमाई !

                       परदेश में कमा  रहे हैं - हमारे पास में एक ब्राह्मण  परिवार रहता है . उस परिवार का मुखिया जब नहीं रहा तो उसके चार बच्चे थे छोटे छोटे - माँ अनपढ़ आमदनी का कोई सहारा नहीं क्योंकि गाँव में खेती के बल पर बिगड़े नवाब थे . हर दिल दुखी था  कि  इस कच्ची उम्र की महिला का क्या होगा ? वह क्या करेगी ? धीरे धीरे जैसे ही बच्चे बड़े हुए किसी को हलवाई की दुकान में लगा दिया और किसी को टेम्पो में लगा दिया और रोटी चलने लगी। फिर एक एक करके वे शहर से बाहर निकल गए। सब बाहर  कमाने चले गए। जब 4-6 महीने में आते पैसा भी लाते  और माँ - बहन के लिए कपडे और सामान लेकर आते। कुल मिलकर माँ खुश सब बेटे कमाने लगे और वह भी छोटी उम्र में। आजकल पड़े लिखों को तो नौकरी मिलती नहीं है और मेरे बेटे तो इतना कमाते हैं कि अपना खर्च चला लेते हैं और घर भेजते रहते हैं।   खुद कुछ भी खाकर गुजरा कर लेते हैं और घर के लिए कमी नहीं होने देते हैं।
                             पिछले दिनों दिल्ली जाना हुआ वैसे तो अगर ऑफिस के काम से जाती  तो कोई बात नहीं पहले से  वाहन  मिल जाता है लेकिन  ये मेरी व्यक्तिगत यात्रा थी और स्टेशन से पास ही विष्णु दिगंबर मार्ग तक बेटी के हॉस्टल जाना था। मैने सोचा कि  सुबह का सुहाना मौसम है तो रिक्शा से चला जाय , दिल्ली के दर्शन ऑटो में तो हो नहीं पते हैं। सर्र  से निकल गए। रिक्शा चला जा रहा था और सड़क के किनारे कहीं पार्क के बाहर  अपने रिक्शे को ही बेड बनायें , पीछे हुड का तकिया, सीट का गद्दा और  चालक सीट पर पैर फैलाये गहरी नीद में सो रहे थे . कुछ रात  भर सवारी ढोने  के बाद  तड़के 3 या 4 बजे आ कर सोये हैं। एक पार्क के किनारे से गुजरते हुए मेरे रिक्शा वाले ने आवाज दी - 'ओए गोपाल उठ अभी सफाई वाला आएगा तो डंडा चलाएगा।'
वह गोपाल आँखे मलते हुए उठा तो मेरी नजर उस पर पड़  गयी ये तो मेरे मोहल्ले वाला गोपाल है तिवारिन  का बेटा ।   मुझे देखते ही वह उठ कर दूसरी और मुड़  गया। जैसे मैं उसको बचपन से देख रही थी वैसे ही वह भी देख रहा था। रिक्शा वाला रिक्शा खड़ा  करके  पानी पीने  चला गया तो गोपाल मेरे पास आया - 'आंटी वहां किसी को मत बतलाइयेगा  कि  मैं यहाँ पर रिक्शा चलाता  हूँ , अभी बहन की शादी करनी है न उसी के लिए हम सब पैसा इकठ्ठा कर रहे हैं। अगर वहां पता चल गया कि  हम रिक्शा चलाते  हैं तो कोई अच्छा लड़का नहीं मिलेगा। उसको हम इसी लिए पढ़ा रहे हैं कि वह खुश रहे और अच्छे घर में चली जाय। '
                     एक कम पढ़े लिखे बच्चे से ऐसे सुनकर मन खुश हो गया क्योंकि आज के पढ़े लिखे बच्चे अपने घर और परिवार की कितनी जिम्मेदारी को समझते हैं और कितना औरों के लिए सोचते हैं ? उस की बात ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि  यही बाहर   रहकर इतनी मेहनत  करके औरों की तरह से अपनी कमाई  शराब और जुए में नहीं उड़ा  रहा है। बाकी  भाई भी उसके कहीं न कहीं कमा  ही रहे हैं . यही तो कमाई  सच्ची  कमाई और  सार्थक कमाई  है। उससे भी सच्ची और सार्थक है उसकी सोच की हम कुछ न कर सके लेकिन बहन का भविष्य तो हम बना ही सकते हैं। 

रविवार, 27 मई 2012

श्रवण कुमार आज भी हैं !

          मैं   जीवन को इतने  करीब अकेले ही तो नहीं जीती हूँ  हर इंसान के आस-पास ऐसा  गुजरता  है।  कुछ पढ़ने वालों को  लगा कि मैं  सिर्फ नकारात्मक छवि ही प्रस्तुत  करती हूँ। ऐसा नहीं है मैं खुद जिस परिवार हूँ वहां मैंने जो  देखा  है तो ऐसी घटनाएँ कहीं हिला देती हैं। 
                 मैंने  अपने जीवन में ऐसा देखा है तो श्रवण कुमार  देखने के लिए कहीं और नहीं जाना पड़ता है। एक ऐसा इंसान भी मैंने देखा है जिसने अपने जीवन के 39 वर्ष  तक सिर्फ अपनी माँ  की सेवा में गुजारे हैं। न अपना करियर देखा और न भविष्य . फिर भी कभी कोई कमी नहीं हुई। यह बात और हैं कि अगर उन्होंने अपनी माता-पिता को नजरअंदाज किया होता तो शायद नहीं बल्कि निश्चित तौर पर आज बहुत समृद्ध और धनाढ्य होेते । जब वह 18 वर्ष की आयु में बीएससी कर रहा थे तभी 27 फरवरी 1972 को उनकी माँ  सड़क दुर्घटना का शिकार हुई . शरीर में 27 जगह से हड्डियाँ  टूटी हुई थी।                
           उनके पिता बड़े अस्पताल में फार्मासिस्ट थे और वहीँ कैम्पस में रहते थे। उस समय सर्जरी इतनी उन्नत नहीं थी कि घायल को तुरंत आपरेशन करके खड़ा किया जा सकता।घर में एक 7 साल बड़े भाई भी थे लेकिन जिम्मेदारी बाँटने के नाम पर सिर्फ अपने स्वार्थ को साधा।  3 साल तक उस इंसान ने घर, कालेज और अस्पताल में घूमते हुए अपनी एम एस सी को पूरा किया और उसमें अपनी डिवीजन  गवां बैठे और भविष्य में जो सोचा था गर्त में चला गया। तीन साल बाद जब माँ घर आयीं तब भी वह चल फिर नहीं सकती थी।  उनको बिस्तर पर ही रहना पड़ा। 5 साल बाद वह छड़ी के सहारे चलने काबिल हुई।         घर के हालातों को देखते हुए मेडिकल रिप्रजेंटेटिव की नौकरी कर ली। इससे अस्पताल में काम भी कर सकते थे और घर में माँ को भी देखा जा सकता था।  मैं इन सालों की साक्षी नहीं थी। इस परिवार से जुड़ने के बाद ही पता चला।  
                          1980 में मैंने इस इंसान के साथ अपना जीवन आरम्भ किया और मुझसे यही कहा कि इन दोनों को कोई तकलीफ मत होने देना। पिता को अल्सर था तो उन्हें कभी कभी अस्पताल में भर्ती  करना पड़  जाता था।  दवा,  डॉक्टर और अस्पताल में माहौल में जन्मे , पले-बढ़े, कुछ पिता का  संरक्षण।  जीवन में सेवा को  अपना काम मान लिया। माँ के लिए तो बराबर ही उनको लगे रहना था। 
             एक समय तो ऐसा भी आया था कि मैं बीएड कर रही थी और इनको दिल्ली मीटिंग में जाना था। मेरी परीक्षा होने वाली ही थी तो मैं किताबें लेकर ससुर जी के पास अस्पताल में बैठी पढ़ती  रहती थी। माताजी इस  काबिल थी ही नहीं वे वहां बैठ सके।
                     1990 में पिताजी को कैसंर बताया गया।  टूरिंग जॉब और जहाँ हमने घर बनाया था नयी जगह थी। वहाँ पर आवागमन के  साधन आसानी से उपलब्ध नहीं थे।  उनके पास स्कूटर था सो आना जाना आसन होता लेकिन वह तब जबकि शहर में हों। कैंसर के दौरान कितने बार घर और अस्पताल में भागदौड़ करने वाले वही एक इंसान थे। तीन माह वह अंतिम अवस्था में बिस्तर पर रहे लेकिन उनकी सेवा में कभी कोई भी कमी नहीं आने दी। 1991  में पिता को खो दिया। 
               माताजी तो अब भी उसी तरह से थी हाँ अब वह छड़ी के सहारे चल लेती थीं लेकिन उनकी तकलीफों में और इजाफा होता चला जा रहा था। उम्र के साथ साथ हड्डियों में दर्द बढ़ रहा था। चलने फिरने में तकलीफ होना स्वाभाविक था। इतना अवश्य था कि माँ के मुंह से निकला नहीं कि  उसको पूरा करना उनके लिए वेद वाक्य की तरह से था। 
                        फिर माँ को कैंसर बताया गया लेकिन पिता का हश्र  देखने के बाद उन्होंने माँ की बायोप्सी कराने से  इनकार कर दिया कि अगर जिन्दा रहना है तो इसके साथ भी उतने ही दिन जिन्दा रहना है और नहीं तो बायोप्सी के बाद भी उतने ही दिन रहेंगी। अब और कष्ट   इन्हें नहीं दूँगा। हाँ इतना जरूर कि जहाँ जिसने भी बताया कि  वहाँ अच्छा वैद्य   है , डॉक्टर है और कोई भी पैथी  ऐसी नहीं  बची जिसमें  न  कराया हो। डॉक्टर या वैद्य मीलों दूर  हो उसको अपने स्कूटर से लाना और  ले जाना वहाँ से दवा लाना। सारे  काम अकेले और खुद ही  करते थे। कैंसर की  डॉक्टर कह चुकी थी कि  इनकी जिन्दगी  से अधिक 6 महीने  है लेकिन  नहीं हारे और दवा कराते  रहे कि  बस उनकी तकलीफ में आराम हो। जाना तो सभी को है लेकिन आराम से जाएँ । उनकी त्वचा सड़ने  लगी थी और उसकी ड्रेसिंग करने काम मेरा था।  मैंने भी 6 महीने की छुट्टी ली क्योंकि दिन में कई बार तकलीफ बढ़ने पर उसकी ड्रेसिंग जरूरी  होती थी। जब उन्हें दर्द होता था तो गालियाँ  मैंने भी खूब खायीं। पता नहीं शायद भगवन भी उस तपस्या के आगे  हार गया और माँ  का कैंसर ठीक होने लगा और एक समय ऐसा भी आया की वह पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गयी। उसके बाद 14 साल रही लेकिन कैसर जैसी कोई तकलीफ उनके दुबारा नहीं हुई।                       दस साल बाद वह गिर गयीं और फिर वह अपना साहस खो बैठी दुबारा चलने का साहस न जुटा   सकीं और 4 साल बिलकुल बिस्तर पर ही रहीं। उनके उसी कमरे में सारे  काम करने होते थे . नहलाने से लेकर सभी काम .
उन्हें किसी भी काम में कोई गुरेज नहीं थे।  माँ की नित्य क्रिया करवानी हो या कपडे धोने हों या फिर उनको नहलाना हो। मेरे मीटिंग में बाहर  जाने पर ये सब काम खुद ही करते थे। और 4 साल बिस्तर पर रहने के बाद भी कभी उनको कहीं भी कोई घाव  नहीं हुए। कभी कोई नर्स या  काम करने वाले को उनका काम नहीं करने दिया। उनके कारण ही अपनी नौकरी छोड़ दी क्योंकि कैंसर की हालत में उन्हें छोड़ कर नहीं जा सकते थे। अपने काम को नया  रूप दे दिया जिसमें समय का प्रतिबन्ध  न हो. आखिर   माँ ने 2 जनवरी 2011 को उन्होंने शरीर त्याग दिया।
                        इतने सालों में  मैं साथ रही कभी भी मैंने उनको माँ या पिता के साथ कितने भी थके हों कभी भी झुंझलाते हुए नहीं देखा। अगर तुरंत ही आये हों और उन लोगों ने कह दिया कि  हमें ये खाना है या ये दवा चाहिए तो तुरंत ही स्कूटर लेकर चल देना है ऐसे में मुझे कभी कभी कष्ट होता था कि  आकर पानी या चाय भी नहीं पी और फिर चल दिए लेकिन उन्होंने कभी भी कोई शिकायत  नहीं की। 
                          ये श्रवण  कुमार मेरे पतिदेव हैं।  ये अतिश्योक्ति लग रही है तो यह अक्षरशः सत्य है। वैसे मैं इसको लिखने के लिए तैयार नहीं थी लेकिन जब ऐसी बात हो रही है तो सकारात्मक सोच वाले बेटे का ये उदारहण देना मुझे प्रासंगिक लगा। भले ही कोई कहे  -- दूल्हे को कौन सराहे दूल्हे का बाप। "सिर्फ ये नहीं कि  सिर्फ अपने माता पिता के लिए ही ऐसा किया हो उन्होंने तो अपने मित्रों के माता पिता के लिए भी बहुत किया है। खुद मेरे माता पिता को जब भी उनकी जरूरत पड़ी कभी पीछे नहीं हटे . मुझे फख्र है कि  उनके इस काम में मेरा सहयोग ने ही मुझे इतनी गहरे से दर्द की परिभाषा को सिखाया है और औरों के लिए कुछ भी करने का  जज्बा दिया है।