बुधवार, 25 दिसंबर 2019

हमारी सोच : आज भी वही क्यों है ?


                      नीता की एक सहेली वर्षों तक उसके  साथ काम करती आ रही थी।  उन्होंने  एक दूसरे के साथ करीब  सालों काम किया है।  उनकी मानसिकता से परिचित तो अच्छी तरह थी ।  उन्होंने अपनी बेटी की शादी अंतर्जातीय की और बेटे की खुद खोज कर सजातीय।  फिर शुरू हुआ उनके परिवार में शादी का सिलसिला।   साथ रही तो एक दूसरे के परिवार ससुराल और मायके पक्ष के  विषय में अच्छे से परिचित हैं।  हमने  हर सुख दुःख भी बांटा है - चाहे नीता के पापा का निधन हो या दीप्ति की माँ के निधन की घडी।
                          अब दोनों ही कम मिल पाते हैं लेकिन संपर्क में तो रहते ही हैं।  उनके परिवार में किसी लडके की शादी होनी है तो उन्होंने नीता से अप्रत्यक्ष रूप से कहा की - 'यार  कोई अच्छी सी ब्राह्मण  लड़की बताओ , देवर के बेटे के लिए खोज रहे हैं। '
                 दीप्ति ने सहज रूप से लिया लेकिन बाद में वही बोलीं कि  वह लोग लड़कियों की शादी तो कहीं भी कर सकते हैं, लेकिन अपने घर में सजातीय लड़की ही चाहते हैं क्योंकि वह अगर दूसरे जाति की होगी  तो उसके तौर तरीके , संस्कार सब  अलग होंगे। अपने परिवार में कैसे ले सकते हैं ? आखिर खून तो हर जाति का अलग अलग होता है। उसे  बड़ा आश्चर्य हुआ कि क्या हमारी मानसिकता शिक्षा, पद या फिर प्रगतिवादी होने के बाद भी बदलती नहीं है या फिर हम अवसरवादी हो जाते हैं कि अगर हमारी बेटी सुन्दर नहीं है और अपनी जाति में वर नहीं मिला तो बेटी की पसंद को प्राथमिकता दे दी जाय।  हाँ अगर बेटे वैसे हुए तो उनकी तो शादी हो ही जायेगी।

इसके बाद ढेर सारे प्रश्न खड़े हो जाते हैं --
- क्या संस्कार भी जाति के आधार पर होते हैं?
- क्या  नैतिकता , सामाजिकता और संस्कार की भी परिभाषा अलग हो जाती है?  
- क्या बड़ों को सम्मान देने का तरीका , अपने दायित्वों को संभालने का ,शिक्षा  ग्रहण करने का तरीका जाति के अनुसार बदल जाता है ?
- क्या शरीर का खून भी अलग अलग रंग का होता है ?
- क्या ब्राह्मण , कायस्थ , ठाकुर कही जाने वाली जातियों में अपराधी  जन्म नहीं लेते? 
- क्या इनके घर में षडयंत्र नहीं रचे जाते? 
- क्या इन परिवारों में महिला उत्पीड़न , घरेलू हिंसा नहीं होती , दहेज़ नहीं माँगा जाता है ? 
             आज सभी उच्च शिक्षित हो रहे हैं , परिवार का स्तर भी बहुत अच्छा हो चुका  है , उनके संस्कार भी हमसे कम नहीं है , फिर भी हम अपने मानसिकता को बदल नहीं पा रहे हैं , अपनी कमियों को छिपाने के लिए नयी नयी दलीलें खोज लेते हैं और दूसरे को उसी काम के लिए निकृष्ट घोषित कर देते हैं और अपने से कमतर समझते हैं।  आखिर हमारी सोच कब बदलेगी   या फिर कभी नहीं। बदलेगी। 
.  
                     अगर हम दूसरे पक्ष को देखे तो लोग कहते हैं ( अभी भी समाज में उच्च शिक्षित 75 प्रतिशत लोग इसको मानते हैं ) अगर निम्न जाति में शादी कर दी जाएगी तो बेटी उसी जाति  की हो जायेगी। अगर वह किसी नीची जाति  में शादी कर लेती  है तो फिर हम अपने घर कैसे बुला सकते हैं ? क्यों क्या सिर्फ शादी कर देने भर से उस बेटी के शरीर का खून बदल जाएगा या फिर  उसकी डी एन ए बदल जाएगा और वह आपके परिवार की बेटी न होकर उस परिवार की हो जाएगी ? कई बार ऐसी ऐसी दलीलें सुनने को मिल जाती हैं कि   आश्चर्य भी होता है और गहरा सदमा भी लगता है कि हम अपनी सोच कब बदल पायेंगे ? ये  जाति की परिभाषा कहाँ से गठित हुई ? उस इतिहास में जाकर उसके आधार को देखने की किसी को जरूरत नहीं है. बस लीक आज भी पीटने को तैयार है।  अगर नौकरी में कोई अफसर निम्न जाति का हुआ तो उसको घर बुला कर धन्य हो जाएंगे और मौका पड़ने पर उसके चरण भी छू लेंगे लेकिन बेटी को लेने या देने के वक़्त हम कट्टरवादी हो जाते हैं। 


कब बदलेगी ये सोच ?
 
                         ऐसी सोच अगर हम रख कर प्रोफेसर , डॉक्टर , अधिकारी हुए भी तो हमारी शिक्षा का , हमारे समाज के लिए दिग्दर्शन करने का कोई आधार रहेगा ? हम रूढ़िवादिता न छोड़ सके।  हम यथार्थ को समझने के लिए तैयार न हुए तो फिर हममें और हमारे पीछे की गुजरी पीढ़ियों में क्या अंतर हुआ ? हमने घर में चूल्हे को छोड़ कर गैस अपना ली , हाथ के पंखे झलने के जगह पर अब बिजली के उपकरण अपना लिए।  बेटियों को अपने पुराने परिधान के जगह पर नयें पाश्चात्य परिधान स्वीकार कर लिए।  उनको घर से बाहर भेज कर पढ़ाने के लिए भेजने पर भी कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि अब हम प्रगति कर रहे हैं लेकिन हमारी  वही प्रगति इस विषय पर कहाँ चली जाती है ? अगर आज भी हम दोहरे मानको को लेकर चलते रहेंगे तो हम इस समाज में कौन सा सन्देश दे सकेंगे ? 


ऑनर किलिंग ;

                       पहले ये काम बहुत कम होता था क्योंकि लड़कियों को घर से बाहर निकलने के अवसर काम थे और जो थे वह सिर्फ स्कूल या कॉलेज जाने तक ही थे और उसे पर भी समाज के कुछ ठेकेदारों की निगाह दूसरे की बेटियों पर लगी रहती थीं कि कहाँ जाती है ? किससे बात करती है ? किस तरह की लड़कियों से उसका उठाना बैठना है ? फिर गाहे बगाहे वही ठेकेदार लड़कियों के परिवार के पुरुषों के कान भरने का काम भी करते और फिर वह तथाकथित उच्च या रसूखदार परिवार का खून उबाल मारने लगता , परिणाम या तो लड़की पर पहरे बैठा दिए जाते , स्कूल /कॉलेज जाना बंद , या फिर एक बॉडीगॉर्ड साथ में लगा दिया जाता।  फिर भी मन की न हुई तो एक को ख़त्म कर दिया जाता।  तब ये काम मिलता था लेकिन अब ज्यादा मिलता है क्योंकि अब खुले आम ऐसे काम करते अपने को इज्जतदार महसूस करते हैं और रसूख के चलते कोई क़ानून उनका कुछ नहीं बिगड़ सकता है।  
                  सबको लगता है कि समाज में हमारा सम्मान हो और हम सिर उठा कर जियें लेकिन बच्चों के स्तर पर जी कर हम बड़े नहीं हो सकते हैं बल्कि अपनी सोच और अपने कार्यों से ही बड़े हो सकते हैं।  इस समाज में चाहे दलित हों या नारी लोगों की दृष्टि अभी भी वही बोल रही है।  और तो और नारियां भी इस बात पर  बदल पायीं हैं।  आज भी कहते सुने जा सकते हैं कि उनके घर का पानी पीने का धर्म नहीं है क्योंकि उनके यहाँ सभी जाति के लोगों का बराबरी से खाना पीना होता रहता है - चाहे मुसलमान हो , क्रिश्चियन हो या फिर नीच जाति का हो।  लोगों के यहाँ जाति के अनुसार अलग बर्तन रखते हुए हमने देखा है।  रसोई में एक अलग जगह जिसमें कुछ बर्तन लगे होते है कि बाहर के आने वालों को उसी में चाय नाश्ता देना हैं।  

2 टिप्‍पणियां:

दिलबागसिंह विर्क ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 26.12.2019 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3561 में दिया जाएगा । आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी

धन्यवाद

दिलबागसिंह विर्क

Daisy ने कहा…

Best Valentines Day Roses Online
Best Valentines Day Gifts Online
Send Teddy Day Gifts Online