पिछले दिनों एक जबरदस्त अवसाद का सामना करना पड़ा। नहीं सोचा था कि जिन्दगी में हर चुनौती को कष्ट कोपहाड़ की तरह से खड़े होकर झेल सकती हूँ और इस एक छोटी सी घटना मुझे अवसाद में धकेल सकती है और फिर वहजब कि मैं न तो नेट के संपर्क में थी और न ही मैं उसमें कुछ कर सकती थी। मुझे अपने कुछ शुभचिंतकों के फ़ोन कालमिल रहे थे कि आपका ऑरकुट अकाउंट हैक कर लिया गया है और उस पर बहुत कुछ अश्लील डाल कर स्क्रैप से औरवैसे भी भेज दिया गया है। आप ठीक कर लें।
मैं उस समय लम्बे सफर पर थी और कुछ कर भी नहीं सकती थी वैसे अपनी परिस्थितियों के कारण मानसिक तौर परसामान्य तो नहीं ही थी। मैंने अपनी बेटी को फ़ोन किया कि मेरा ऑरकुट अकाउंट खोलो और उसमें क्या है ? उसकोदेख कर डिलीट कर लो और मेरा पासवर्ड बदल दो। उसने भी मुझे बताया नहीं कि क्या पड़ा था? उसने कहा कि बहुतही गन्दी भाषा में कुछ डाला गया है और मैंने सब डिलीट कर दिया । उसपर भी ऑरकुट पर जो लोग थे उनके भी स्क्रैपआये हैं । माँ ऐसे लोगों को क्यों रखा है? उनमें से कुछ लड़के तो मेरे अच्छे जानने वाले थे। मिले नहीं थे लेकिन वर्षोंपहले संपर्क में रहे थे। नाम सुनकर शर्म तो आई थी और एक वितृष्णा सी हो गयी ऐसी सोच वालों से। इनमें से एक तोकई बार मुझसे मेरी बेटी कि शादी का प्रस्ताव रख चुका था लेकिन मुझे अपनी बेटी कि शादी उस तरह के नौकरी वालेलड़के से नहीं करनी थी और मैंने उसको सभ्य भाषा में इनकार कर दिया था कि मुझे अभी उसकी शादी नहीं करनी हैऔर फिर अगर करनी है तो उसके कार्य क्षेत्र के लड़के से ही करनी है। हो सकता है कि अपने मन में कुछ पाले उसनेऐसा कृत्य किया , मैं नहीं जानती लेकिन मैंने बहुत कष्ट झेला।
हमारी मानसिक विकृतियाँ हमें कहाँ ले जा रही हैं? क्यों हमारी सोच जाकर सिर्फ अश्लील भाषा और अश्लील चित्रों तकसीमित है? क्या ये हमारे व्यक्तित्व को उजागर नहीं करती - नहीं ये हमारी कुंठाओं को उजागर करती है, जिन्हें हममानसिक रूप से या फिर किसी अन्य रूप से असंतुष्टि के बदले पाल लेते हैं। हाँ हमें उम्र का लिहाज होता है और न हीव्यक्ति के कार्यों का। हमारी सोच कितनी गिरी हुई हो सकती है, ये इस बात से पता चल गया। ये आज की पीढ़ी है, इनका अपना चरित्र क्या होगा? भविष्य क्या होगा? अगर अधिक प्रतिभा का प्रयोग सकारात्मक कार्यों में किया जायतो औरों का भला भी हो सकता है लेकिन अगर वही नकारात्मक दिशा में चली जाती है तो वह प्रतिभा प्रतिभा नहींरहती मानसिक विकृति का स्वरूप बन जाती है। इसमें किसका दोष है? क्या हमारे संस्कारों का जो हम आज की पीढ़ीको दे रहे हैं या फिर विज्ञान के बढ़ते स्वरूप को जो इंसान को उत्थान के साथ पतन की अधिक तेजी से ले जा रहा है।नहीं जानती ऐसे लोगों का क्या होगा? हाँ इतना अवश्य है कि ऐसे ही लोग हैं जो समाज में आज बढ़ रही बलात्कार कीघटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। ये उनके कुत्सित विचार उजागर होकर बहुत भयावह हो जाते हैं और ऐसे लोगों का कोईउपचार नहीं है।
रविवार, 26 जून 2011
सोमवार, 20 जून 2011
कहाँ से लायें पिता का नाम?
आज समाज में बलात्कार की घटनाएँ दिन पर दिन बढ़ती जा रही हैं, इसमें दोष किसे दें? उन लड़कियोंको जो इसका शिकार हो रही हैं या फिर उन पुरुषों को जो अपनी बहशियत में पागल होकर इन मासूमों को अपनाशिकार बना रहे हैं। जिन्हें मार दिया - उनके माँ बाप भाग्यशाली है क्योंकि बलात्कार की शिकार बेटी को लेकर समाजके कटाक्षों का सामना तो नहीं करना पड़ता है और वह लड़की उससे भी अधिक भाग्यशाली है क्योंकि इस समाज की हेय दृष्टि वह बेकुसूर होते हुए भी कब तक सहन कर सकती है? वे हेय दृष्टि से नहीं देखे जाते हैं जो ऐसे कुकृत्यों कोअंजाम देते हैं क्योंकि ये या तो उनकी फिदरत में शामिल है और ये लोग या तो रईस बाप की बिगड़ी हुई संतान है याफिर दबंग कहे जाने वाले अपराधी प्रवृति के लोग । इन सबके १०० खून माफ होते हैं क्योंकि पुलिस इनके पैसे पर ऐशकरती है और इनके दरवाजे पर हाजिरी लगाने आती है।
पिछले दिनों अपनी मूक बधिर बलात्कार की शिकार बेटी के बच्चे को स्कूल में नाम लिखने के लिए एकपिता गया तो उससे बच्चे के पिता का नाम पूछा गया और न बता पाने पर उसको लौटा दिया गया। बाप ने बेटी कोसमझाया तो वह चीख चीख कर रोने लगी क्योंकि यह संतान उसके बलात्कार के शिकार का ही परिणाम थी और उसेएक नहीं कई लोगों ने बलात्कार का शिकार बनाया था। वह किसका नाम ले ये तो उसको भी पता नहीं है।
इतना ही नहीं बल्कि इस बलात्कार की शिकार लड़की को गाँव से बाहर निकाल दिया गया क्योंकि पूरागाँव उन दबंगों के खिलाफ बोल नहीं सकता है अतः दोषी इसी को बना दिया गया। उस गूंगी और बहरी लड़की ने जिसबच्चे को जन्म दिया उसके लिए ये सबसे बड़ा प्रश्न है? ऐसे एक नहीं कई किस्से हो सकते हैं लेकिन कुछ ही घटनाएँऐसे बन जाती हैं की सोचने के लिए मजबूर कर देती हैं। ये उसका साहस की उसने चुनौती दी उन लोगों को जिन्होंनेउसे अपनी हवस का शिकार बनाया लेकिन अब?
इस अब के लिए अब सोचना होगा , कौन सोचेगा? ये समाज, हम, कानून या फिर हमारी सरकार? येप्रक्रिया इतनी आसान भी नहीं है, ऐसे बच्चों को पिता का नाम देने के लिए विकल्प सोचना होगा क्योंकि ऐसीलड़कियाँ या महिलाएं इन बलात्कारियों का नाम अपने बच्चे को दें यह उनके लिए अपमान होगा। अब कानून कीनजर में अगर बाप का नाम जरूरी है तो फिर ये क्या करें? हमें इसका विकल्प कोई भी सुझा सकता है। एक बाप केनाम को पाने के लिए या फिर अपनी अस्तित्व को स्वीकार करने के लिए ऐसे बच्चे खुद क्या लड़ पायेंगे? रोहितशेखर जैसे लड़के इसके लिए लड़ रहे हैं और फिर उसके द्वारा किये गए दावे के लिए जिम्मेदार लोग उससे भाग रहे हैंक्यों ? इसलिए कि उनकी प्रतिष्ठा का सवाल है और ये सौ प्रतिशत सच है कि अगर वह दोषी न होता तो उसको डी एनए टेस्ट कराने में कोई भी आपत्ति न होती।
वह तो मामला ही इतर है , लेकिन ऐसे बच्चे के लिए क़ानून के द्वारा माँ का नाम ही काफी होना चाहिए। जोजीवित है उसका नाम दें। पिता का नाम माँ के अतिरिक्त कोई नहीं बता सकता और फिर ऐसे मामले में तो कोई पिताकहा ही नहीं जा सकता है। ऐसे लोग क्या डी एन ए टेस्ट करने की चुनौती दें और फिर बच्चे को दाखिला दिलाएं। अबआवाज ऐसे ही उठाई जानी चाहिए कि ऐसे मामलों में पिता का नाम न हो तो उसको माँ के नाम के आधार पर शिक्षासंस्थानों में प्रवेश दिया जाना चाहिए। इस बात के लिए एक लम्बी लड़ाई लड़नी होगी क्योंकि ऐसा काम आसान नहींहै और फिर इसको अब सोचने का एक मुद्दा तो मिल ही गया है। अब आप भी कहें की क्या मेरी ये सोच गलत है? याफिर इस पर विचार किया जाना चाहिए।
पिछले दिनों अपनी मूक बधिर बलात्कार की शिकार बेटी के बच्चे को स्कूल में नाम लिखने के लिए एकपिता गया तो उससे बच्चे के पिता का नाम पूछा गया और न बता पाने पर उसको लौटा दिया गया। बाप ने बेटी कोसमझाया तो वह चीख चीख कर रोने लगी क्योंकि यह संतान उसके बलात्कार के शिकार का ही परिणाम थी और उसेएक नहीं कई लोगों ने बलात्कार का शिकार बनाया था। वह किसका नाम ले ये तो उसको भी पता नहीं है।
इतना ही नहीं बल्कि इस बलात्कार की शिकार लड़की को गाँव से बाहर निकाल दिया गया क्योंकि पूरागाँव उन दबंगों के खिलाफ बोल नहीं सकता है अतः दोषी इसी को बना दिया गया। उस गूंगी और बहरी लड़की ने जिसबच्चे को जन्म दिया उसके लिए ये सबसे बड़ा प्रश्न है? ऐसे एक नहीं कई किस्से हो सकते हैं लेकिन कुछ ही घटनाएँऐसे बन जाती हैं की सोचने के लिए मजबूर कर देती हैं। ये उसका साहस की उसने चुनौती दी उन लोगों को जिन्होंनेउसे अपनी हवस का शिकार बनाया लेकिन अब?
इस अब के लिए अब सोचना होगा , कौन सोचेगा? ये समाज, हम, कानून या फिर हमारी सरकार? येप्रक्रिया इतनी आसान भी नहीं है, ऐसे बच्चों को पिता का नाम देने के लिए विकल्प सोचना होगा क्योंकि ऐसीलड़कियाँ या महिलाएं इन बलात्कारियों का नाम अपने बच्चे को दें यह उनके लिए अपमान होगा। अब कानून कीनजर में अगर बाप का नाम जरूरी है तो फिर ये क्या करें? हमें इसका विकल्प कोई भी सुझा सकता है। एक बाप केनाम को पाने के लिए या फिर अपनी अस्तित्व को स्वीकार करने के लिए ऐसे बच्चे खुद क्या लड़ पायेंगे? रोहितशेखर जैसे लड़के इसके लिए लड़ रहे हैं और फिर उसके द्वारा किये गए दावे के लिए जिम्मेदार लोग उससे भाग रहे हैंक्यों ? इसलिए कि उनकी प्रतिष्ठा का सवाल है और ये सौ प्रतिशत सच है कि अगर वह दोषी न होता तो उसको डी एनए टेस्ट कराने में कोई भी आपत्ति न होती।
वह तो मामला ही इतर है , लेकिन ऐसे बच्चे के लिए क़ानून के द्वारा माँ का नाम ही काफी होना चाहिए। जोजीवित है उसका नाम दें। पिता का नाम माँ के अतिरिक्त कोई नहीं बता सकता और फिर ऐसे मामले में तो कोई पिताकहा ही नहीं जा सकता है। ऐसे लोग क्या डी एन ए टेस्ट करने की चुनौती दें और फिर बच्चे को दाखिला दिलाएं। अबआवाज ऐसे ही उठाई जानी चाहिए कि ऐसे मामलों में पिता का नाम न हो तो उसको माँ के नाम के आधार पर शिक्षासंस्थानों में प्रवेश दिया जाना चाहिए। इस बात के लिए एक लम्बी लड़ाई लड़नी होगी क्योंकि ऐसा काम आसान नहींहै और फिर इसको अब सोचने का एक मुद्दा तो मिल ही गया है। अब आप भी कहें की क्या मेरी ये सोच गलत है? याफिर इस पर विचार किया जाना चाहिए।
गुरुवार, 16 जून 2011
इसका दोषी कौन?
अभी मैं इस वाकये को बयान करने के लिए मानसिक रूप से तैयार भी नहीं हूँ, लेकिन अपने को रोक भी नहीं पा रही हूँ।इस दर्द से मैं भी आहत हूँ क्योंकि कोई बहुत अपना जब गुजरता है इस दर्दनाक हादसे तो आत्मा तक काँप जाती है।
वह एक बहुत भला इंसान जिसने अपने जीवन में किसी का दिल दुखाना तो दूर तेज आवाज में बोलना भी नहीं सीखा है।पांच साल पहले अचानक पता चला कि उसके जांघ में कैंसर हो चुका है। उसको हम टाटा मेमोरिअल कैसर हॉस्पिटल मेंले कर गए और डॉक्टर ने उसका ऑपरेशन करके उसे घर भेज दिया। उसको पहले हर ३ महीने में चेक अप के लिएबुलाते रहे कि कहीं उसकी सेकेंडरी न फैल रही हो। फिर ६ महीने में और फिर साल में एक बार। डॉक्टर उसको हर तरीकेसे निरोग बताते रहे। सारी जानकारी जिस तरीके या जिस टेस्टिंग से वह लेते रहे हों। वह भी अपनी पत्नी और बच्ची केसाथ खुश था कि इस रोग से मुक्त हो चुका है।
पांच साल बीतने के बाद भी वह चेक अप के लिए बराबर जाता रहा। कुछ दिनों से उसको कुछ तकलीफ महसूस होने लगीथी। पिछले अप्रैल में वह वहाँ गया तो डॉक्टर ने चेक करके बता दिया कि अब आप को कोई खतरा नहीं है और आप अबचेक कराने न आये तो कोई बात नहीं तो उसने बताया कि उसको पिछले हिस्से में दर्द होने लगा है। तो डॉक्टर ने कहा किआप अपनी तसल्ली के लिए एम आर आई करवा लीजिये और हम उसको देख लेते हैं। उसने एम आर आई करवाई औरजब डॉक्टर ने देखा तो उसका कैंसर बोन मेरो में बहुत ज्यादा फैल चुका था। टाटा मेमोरिअल जैसे संस्थान के डॉक्टर सेइस तरह की लापरवाही की आशा नहीं की जा सकती थी। वह तो पत्नी और बच्ची के साथ गया था। और जब लौटा तो पूरीतरह से निराश होकर। उसे ऑपरेशन की तिथि १ महीने बाद दी गयी थी।
१३ जून को जब ऑपरेशन किया तो उसको सभालने में खुद डॉक्टर ही हार गए और फिर उन्होंने घर वालों से उसके पूरेपैर को ही काट देने के विकल्प पर विचार करने को कहा कि अगर जिन्दगी चाहिए तो ये ही करना पड़ेगा। हमारे सामनेकोई दूसरा चारा नहीं था। आखिर कल डॉक्टर ने वही काम कर दिया। अभी उसको होश में नहीं ला रहे हैं क्योंकि इसट्रौमा को सहन वह कर पायेगा या नहीं इस बात से हम भी वाकिफ नहीं है। लेकिन इस बात के लिए पूरी तरह से तैयार हैंकि उसको कैसे मानसिक रूप से इसको स्वीकार करने के लिए समझा पायेंगे। उसके बाद के विकल्प भी हमने सब सोचलिए क्योंकि जिन्दगी से बड़ा कुछ भी नहीं होता। उसकी जिन्दगी उसकी पत्नी और ११ साल की बच्ची के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।
इसके लिए हम किसको दोष दें उन डॉक्टर को जो पांच साल तक उसको बुलाते रहे और ठीक होने की रिपोर्ट देते रहे फिरउस बेचारे कि किस्मत को जिसकी जिन्दगी में ये दिन भी लिखा था। ये पीड़ित और कोई नहीं मेरी छोटी बहन का पतिहै। उसके इस हादसे को सहन करने के लिए खुद को और उसके लिए साहस जुटा रहे हैं क्योंकि बड़ी होने के नाते सिर्फवही नहीं इससे जुड़े सभी परिवार के सदस्यों को भी संभालना होगा। और मैं ऐसी दुखिया कि सबके सामने रो भी नहींसकती हूँ। अकेले में रोकर दर्द आप सबसे बाँट रही हूँ।
वह एक बहुत भला इंसान जिसने अपने जीवन में किसी का दिल दुखाना तो दूर तेज आवाज में बोलना भी नहीं सीखा है।पांच साल पहले अचानक पता चला कि उसके जांघ में कैंसर हो चुका है। उसको हम टाटा मेमोरिअल कैसर हॉस्पिटल मेंले कर गए और डॉक्टर ने उसका ऑपरेशन करके उसे घर भेज दिया। उसको पहले हर ३ महीने में चेक अप के लिएबुलाते रहे कि कहीं उसकी सेकेंडरी न फैल रही हो। फिर ६ महीने में और फिर साल में एक बार। डॉक्टर उसको हर तरीकेसे निरोग बताते रहे। सारी जानकारी जिस तरीके या जिस टेस्टिंग से वह लेते रहे हों। वह भी अपनी पत्नी और बच्ची केसाथ खुश था कि इस रोग से मुक्त हो चुका है।
पांच साल बीतने के बाद भी वह चेक अप के लिए बराबर जाता रहा। कुछ दिनों से उसको कुछ तकलीफ महसूस होने लगीथी। पिछले अप्रैल में वह वहाँ गया तो डॉक्टर ने चेक करके बता दिया कि अब आप को कोई खतरा नहीं है और आप अबचेक कराने न आये तो कोई बात नहीं तो उसने बताया कि उसको पिछले हिस्से में दर्द होने लगा है। तो डॉक्टर ने कहा किआप अपनी तसल्ली के लिए एम आर आई करवा लीजिये और हम उसको देख लेते हैं। उसने एम आर आई करवाई औरजब डॉक्टर ने देखा तो उसका कैंसर बोन मेरो में बहुत ज्यादा फैल चुका था। टाटा मेमोरिअल जैसे संस्थान के डॉक्टर सेइस तरह की लापरवाही की आशा नहीं की जा सकती थी। वह तो पत्नी और बच्ची के साथ गया था। और जब लौटा तो पूरीतरह से निराश होकर। उसे ऑपरेशन की तिथि १ महीने बाद दी गयी थी।
१३ जून को जब ऑपरेशन किया तो उसको सभालने में खुद डॉक्टर ही हार गए और फिर उन्होंने घर वालों से उसके पूरेपैर को ही काट देने के विकल्प पर विचार करने को कहा कि अगर जिन्दगी चाहिए तो ये ही करना पड़ेगा। हमारे सामनेकोई दूसरा चारा नहीं था। आखिर कल डॉक्टर ने वही काम कर दिया। अभी उसको होश में नहीं ला रहे हैं क्योंकि इसट्रौमा को सहन वह कर पायेगा या नहीं इस बात से हम भी वाकिफ नहीं है। लेकिन इस बात के लिए पूरी तरह से तैयार हैंकि उसको कैसे मानसिक रूप से इसको स्वीकार करने के लिए समझा पायेंगे। उसके बाद के विकल्प भी हमने सब सोचलिए क्योंकि जिन्दगी से बड़ा कुछ भी नहीं होता। उसकी जिन्दगी उसकी पत्नी और ११ साल की बच्ची के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।
इसके लिए हम किसको दोष दें उन डॉक्टर को जो पांच साल तक उसको बुलाते रहे और ठीक होने की रिपोर्ट देते रहे फिरउस बेचारे कि किस्मत को जिसकी जिन्दगी में ये दिन भी लिखा था। ये पीड़ित और कोई नहीं मेरी छोटी बहन का पतिहै। उसके इस हादसे को सहन करने के लिए खुद को और उसके लिए साहस जुटा रहे हैं क्योंकि बड़ी होने के नाते सिर्फवही नहीं इससे जुड़े सभी परिवार के सदस्यों को भी संभालना होगा। और मैं ऐसी दुखिया कि सबके सामने रो भी नहींसकती हूँ। अकेले में रोकर दर्द आप सबसे बाँट रही हूँ।
मंगलवार, 7 जून 2011
क्यों बनते हैं मुन्ना भाई ?
आज जब कि हर किसी कोर्स के लिए प्रवेश परीक्षाएं होने लगी हैं और दूसरे दिन जब देखते हैं तो पता चलता है कि इतने मुन्ना भाई पकड़े गए और उनको जेल में डाल दिया गया। यहाँ मुन्ना भाई बनने वालों का दर्द और उनकी मजबूरी किसी ने नहीं समझी और उन्हें जेल में डाल दिया गया।
एक परीक्षा में बैठे मुन्ना भाई से पता चला कि उसको आँत की कोई बीमारी है और उसके इलाज के लिए २० हजार रुपये मिल जाना बहुत बड़ी बात है, इसलिए उसने किसी और की जगह पर परीक्षा देना स्वीकार कर लिया और फिर पकड़ा गया। वह पेशेवर मुन्ना भाई नहीं था। नहीं तो वह २० हजार में नहीं बिकता। ये खेल तो इंजीनियरिंग कॉलेज में भी चलता है। वहाँ पढ़ने वाले छात्रों को खरीद लिया जाता है और वे परीक्षा दे आते हैं। कभी ये सोचा है कि इसके लिए वाकई दोषी कौन है? वे बच्चे जो पैसे के लालच में बिक जाते हैं या फिर वे पैसे वाले लोग जो अपने नाकारा बेटों के लिए (बेटियों के लिए कोई ये काम नहीं करेगा और अगर करे भी तो शायद बेटियाँ स्वीकार न करेंगी।) कितना भी पैसा खर्च करके मुन्ना भाई खरीद लेते हैं और मुन्ना भाई वे बिचारे ठगे जाते हैं उन ठेकेदारों के हाथ जिनका ये धंधा है कि वे पैसे वालों से कई गुण ज्यादा पैसा लेकर मुन्ना भाई को उसकी स्थिति के अनुसार पैसे देकर खरीद लेते हैं और बाकी उनकी अपनी जेब में जाता है। फिर पकड़े भी वही मुन्ना भाई जाते हैं।
कभी मुन्ना भाइयों के खिलाफ ये मुहिम छेदने वालों ने ये सोचा है कि पकड़ा किसे जाना चाहिए? इसमें पकड़ा उन्हें जाना चाहिए जो वाकई इसके गुनाहगार हैं। उन माँ बाप को पकड़ा जाना चाहिए जो अपने बच्चों के लिए इन्हें खरीदने के लिए तैयार होते हैं और फिर उन दलालों को जो इसको पेशा बना कर लाखों रुपये कमा रहे हैं। जब तक ये दलाल बने रहेंगे , तब तक मुन्ना भाइयों का अंत हो ही नहीं सकता है और वे अपनी मजबूरी में बिकते रहेंगे। इसके लिए कभी सोचा जाता है कि क्यों ऐसा हो रहा है? नहीं इसको सोचने के लिए किसी के पास फुरसत ही कहाँ है? मेधावी छात्र जो अपनी मेधा के साथ भी आज भी बेकार घूम रहे हैं , उन्हें पैसा कहाँ से मिलेगा वे अपनी मेधा बेच रहे हैं क्योंकि हमारे देश में उनकी मेधा का उपयोग नहीं हो पा रहा है। वे जायेंगे हर हाल में अपराध की ओर ही क्योंकि हमारे यहाँ मेधा की नहीं बल्कि कुछ विशेष श्रेणियों की जरूरत होती है जिससे उनके भविष्य सुरक्षित हो सके।
इन मुन्ना भाइयों पर अंकुश लगाने के लिए पहले दलालों और फिर उन अभिभावकों को भी अन्दर करना चाहिए जो इस खरीद-फ़रोख्त के असली नायक हैं। शायद पुलिस उन पर हाथ न डाल सके क्योंकि यहाँ क़ानून तो सिर्फ मुन्ना भाइयों के लिए ही बना है उन्हें मुन्ना भाई बनाने वालों के लिए कोई भी सजा नहीं है। इसी को कहते हैं अंधेर नगरी चौपट राजा।
एक परीक्षा में बैठे मुन्ना भाई से पता चला कि उसको आँत की कोई बीमारी है और उसके इलाज के लिए २० हजार रुपये मिल जाना बहुत बड़ी बात है, इसलिए उसने किसी और की जगह पर परीक्षा देना स्वीकार कर लिया और फिर पकड़ा गया। वह पेशेवर मुन्ना भाई नहीं था। नहीं तो वह २० हजार में नहीं बिकता। ये खेल तो इंजीनियरिंग कॉलेज में भी चलता है। वहाँ पढ़ने वाले छात्रों को खरीद लिया जाता है और वे परीक्षा दे आते हैं। कभी ये सोचा है कि इसके लिए वाकई दोषी कौन है? वे बच्चे जो पैसे के लालच में बिक जाते हैं या फिर वे पैसे वाले लोग जो अपने नाकारा बेटों के लिए (बेटियों के लिए कोई ये काम नहीं करेगा और अगर करे भी तो शायद बेटियाँ स्वीकार न करेंगी।) कितना भी पैसा खर्च करके मुन्ना भाई खरीद लेते हैं और मुन्ना भाई वे बिचारे ठगे जाते हैं उन ठेकेदारों के हाथ जिनका ये धंधा है कि वे पैसे वालों से कई गुण ज्यादा पैसा लेकर मुन्ना भाई को उसकी स्थिति के अनुसार पैसे देकर खरीद लेते हैं और बाकी उनकी अपनी जेब में जाता है। फिर पकड़े भी वही मुन्ना भाई जाते हैं।
कभी मुन्ना भाइयों के खिलाफ ये मुहिम छेदने वालों ने ये सोचा है कि पकड़ा किसे जाना चाहिए? इसमें पकड़ा उन्हें जाना चाहिए जो वाकई इसके गुनाहगार हैं। उन माँ बाप को पकड़ा जाना चाहिए जो अपने बच्चों के लिए इन्हें खरीदने के लिए तैयार होते हैं और फिर उन दलालों को जो इसको पेशा बना कर लाखों रुपये कमा रहे हैं। जब तक ये दलाल बने रहेंगे , तब तक मुन्ना भाइयों का अंत हो ही नहीं सकता है और वे अपनी मजबूरी में बिकते रहेंगे। इसके लिए कभी सोचा जाता है कि क्यों ऐसा हो रहा है? नहीं इसको सोचने के लिए किसी के पास फुरसत ही कहाँ है? मेधावी छात्र जो अपनी मेधा के साथ भी आज भी बेकार घूम रहे हैं , उन्हें पैसा कहाँ से मिलेगा वे अपनी मेधा बेच रहे हैं क्योंकि हमारे देश में उनकी मेधा का उपयोग नहीं हो पा रहा है। वे जायेंगे हर हाल में अपराध की ओर ही क्योंकि हमारे यहाँ मेधा की नहीं बल्कि कुछ विशेष श्रेणियों की जरूरत होती है जिससे उनके भविष्य सुरक्षित हो सके।
इन मुन्ना भाइयों पर अंकुश लगाने के लिए पहले दलालों और फिर उन अभिभावकों को भी अन्दर करना चाहिए जो इस खरीद-फ़रोख्त के असली नायक हैं। शायद पुलिस उन पर हाथ न डाल सके क्योंकि यहाँ क़ानून तो सिर्फ मुन्ना भाइयों के लिए ही बना है उन्हें मुन्ना भाई बनाने वालों के लिए कोई भी सजा नहीं है। इसी को कहते हैं अंधेर नगरी चौपट राजा।
मंगलवार, 31 मई 2011
मुश्किल है घर बचाना !
शिल्पी रेलवे में अधिकारी के पद पर काम कर रही है और उसको वहीं पर घर मिला हुआ है। कुछ जीवन की विसंगतियों की मारी वह अपने घर को बचाने के लिए जद्दोजहद में लगी है। ये यथार्थ शायद कई घरों का हो सकता है लेकिन क्या सिर्फ एक ही हाथ से ताली बजाई जा सकती है।
शिल्पी के पिता भी रेलवे में आफिसर थे, उनके चार बच्चों में शिल्पी तीसरे नंबर पर थी। कुछ अफसर होने का उनमें और कुछ बच्चों में घमंड तो था ही, उनके पिता मेरे चाचा के मित्रों में से थे और जब बचपन में मैं झाँसी जाती तो उनके यहाँ भी जाती। मैं उनको ताऊ और ताई ही कहा करती थी। फिर शादी के बाद सालों का अंतराल । चाचा रिटायर्ड हो गए और ताऊ जी भी नहीं रहे। घर भी दूर दूर हो गए ।
बहुत सालों बाद जाना हुआ चाचा जी से मिलने के लिए तो भाभी से सभी पुराने लोगों के बारे में पूछने लगी। तभी ताई जी का भी जिक्र आया और उनके बच्चों का भी। तभी पता चला कि बेटे दोनों अपने अपने परिवार के साथ रह रहे हैं और माँ बची तो छोटी बेटी के साथ रह रही है।
पहले ऑफिसर होने के नाते ये सोच थी कि लड़कियों की शादी किसी ऑफिसर से ही करेंगे लेकिन ऐसा संयोग न जुट सका। शिल्पी को उसके पापा ने रेलवे में परीक्षा दिलवा कर क्लर्क में लगवा दिया। लेकिन थी वह उच्च शिक्षित । बहुत परेशान होने के बाद उन्होंने उसी ऑफिस में एक क्लर्क लड़के से ही उसकी शादी कर दी। शिल्पी की ससुराल झाँसी के पास ही थी। तब उसके पिता थे तो वह अपने पति के साथ उसको मिले हुए मकान में रहने लगी। कुछ साल अच्छी तरह से बीते। वह दोनों ही परिवारों के साथ सामंजस्य बिठा कर रहती थी। अचानक उसके पापा का निधन हो गया और माँ उसके पास रहने आ गयी। यहाँ तक तो उसके पति को ठीक लगा लेकिन कुछ ही दिनों में विभागीय परीक्षा पास करके शिल्पी को पति से ऊँचा ग्रेड मिल गया और वह ऑफिसर रेंक में आ गयी।
यही उसके जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप बन गया। शिल्पी को उसकी रेंक के अनुसार ही सरकारी मकान मिल गया। पति से कहा कि हम उस घर में शिफ्ट हो लेते हैं लेकिन पति ने बड़े बेमन से ये स्वीकार किया और फिर कुछ ही महीने के बाद उसने अपने घर जाकर रहने का फैसला सुना दिया। वह अपने माँ बाप के पास जाकर रहने लगा और वहीं से अप डाउन करने लगा। । एक तो उसी ऑफिस में अफसर और क्लर्क का अंतर फिर पुरुषोचित अहम् के लिए ये कहाँ स्वीकार्य था? कुछ दिन शिल्पी ने इन्तजार किया कि वह ऑफिस से घर आएगा लेकिन नहीं वह ऑफिस से सीधे गाड़ी पकड़ कर अपने माँ बाप के शहर चला जाता । उसको मुश्किल से आधा घंटा लगता था । उसका पति हीन भावना का शिकार हो गया था । वह अपनी बीमार और बूढी माँ को छोड़ कर ससुराल रहने नहीं जा सकती थी और फिर उसके लिए अप डाउन संभव भी नहीं था।
उसको घर बचाना था इसलिए वह सन्डे की छुट्टी में ससुराल जाकर रहने लगी । माँ के लिए किसी की व्यवस्था करके वह चली जाती । इस तरह से कई महीने गुजर गए। उसने सोचा था कि वह पति के दिमाग से यह बात निकाल कर कि वह बंगला मुझे मिला है तो वह सिर्फ मेरा ही है उसको वापस ले आएगी , लेकिन उसकी सोच गलत निकली , वह अपने पति को नहीं समझा सकी और एक दिन हार कर वह बैठ गयी। उनके बीच में ऐसा कुछ भी नहीं था कि वे तलाक जैसी बात सोचते लेकिन पति की सोच के करण ही वह खुद भी तनाव में रहने लगी है। इसका कोई भी समाधान उसको समझ नहीं आ रहा है। बच्चे उनके हैं नहीं जिससे कि कोई डोर उसके पति को उसके पास खींच लाती। फिर वह क्या करे? कैसे बचाए अपने घर को? इस हीन भावना से कैसे मुक्ति दिलाये अपने पति को? उसका पति कभी इस वास्तविकता से समझौता कर पायेगा? ये ढेरों प्रश्न है जिनपर शिल्पी कि जिन्दगी टिकी हुई है। ये सिर्फ एक शिल्पी की समस्या नहीं है बल्कि और भी कई ऐसे परिवार हैं।
शिल्पी के पिता भी रेलवे में आफिसर थे, उनके चार बच्चों में शिल्पी तीसरे नंबर पर थी। कुछ अफसर होने का उनमें और कुछ बच्चों में घमंड तो था ही, उनके पिता मेरे चाचा के मित्रों में से थे और जब बचपन में मैं झाँसी जाती तो उनके यहाँ भी जाती। मैं उनको ताऊ और ताई ही कहा करती थी। फिर शादी के बाद सालों का अंतराल । चाचा रिटायर्ड हो गए और ताऊ जी भी नहीं रहे। घर भी दूर दूर हो गए ।
बहुत सालों बाद जाना हुआ चाचा जी से मिलने के लिए तो भाभी से सभी पुराने लोगों के बारे में पूछने लगी। तभी ताई जी का भी जिक्र आया और उनके बच्चों का भी। तभी पता चला कि बेटे दोनों अपने अपने परिवार के साथ रह रहे हैं और माँ बची तो छोटी बेटी के साथ रह रही है।
पहले ऑफिसर होने के नाते ये सोच थी कि लड़कियों की शादी किसी ऑफिसर से ही करेंगे लेकिन ऐसा संयोग न जुट सका। शिल्पी को उसके पापा ने रेलवे में परीक्षा दिलवा कर क्लर्क में लगवा दिया। लेकिन थी वह उच्च शिक्षित । बहुत परेशान होने के बाद उन्होंने उसी ऑफिस में एक क्लर्क लड़के से ही उसकी शादी कर दी। शिल्पी की ससुराल झाँसी के पास ही थी। तब उसके पिता थे तो वह अपने पति के साथ उसको मिले हुए मकान में रहने लगी। कुछ साल अच्छी तरह से बीते। वह दोनों ही परिवारों के साथ सामंजस्य बिठा कर रहती थी। अचानक उसके पापा का निधन हो गया और माँ उसके पास रहने आ गयी। यहाँ तक तो उसके पति को ठीक लगा लेकिन कुछ ही दिनों में विभागीय परीक्षा पास करके शिल्पी को पति से ऊँचा ग्रेड मिल गया और वह ऑफिसर रेंक में आ गयी।
यही उसके जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप बन गया। शिल्पी को उसकी रेंक के अनुसार ही सरकारी मकान मिल गया। पति से कहा कि हम उस घर में शिफ्ट हो लेते हैं लेकिन पति ने बड़े बेमन से ये स्वीकार किया और फिर कुछ ही महीने के बाद उसने अपने घर जाकर रहने का फैसला सुना दिया। वह अपने माँ बाप के पास जाकर रहने लगा और वहीं से अप डाउन करने लगा। । एक तो उसी ऑफिस में अफसर और क्लर्क का अंतर फिर पुरुषोचित अहम् के लिए ये कहाँ स्वीकार्य था? कुछ दिन शिल्पी ने इन्तजार किया कि वह ऑफिस से घर आएगा लेकिन नहीं वह ऑफिस से सीधे गाड़ी पकड़ कर अपने माँ बाप के शहर चला जाता । उसको मुश्किल से आधा घंटा लगता था । उसका पति हीन भावना का शिकार हो गया था । वह अपनी बीमार और बूढी माँ को छोड़ कर ससुराल रहने नहीं जा सकती थी और फिर उसके लिए अप डाउन संभव भी नहीं था।
उसको घर बचाना था इसलिए वह सन्डे की छुट्टी में ससुराल जाकर रहने लगी । माँ के लिए किसी की व्यवस्था करके वह चली जाती । इस तरह से कई महीने गुजर गए। उसने सोचा था कि वह पति के दिमाग से यह बात निकाल कर कि वह बंगला मुझे मिला है तो वह सिर्फ मेरा ही है उसको वापस ले आएगी , लेकिन उसकी सोच गलत निकली , वह अपने पति को नहीं समझा सकी और एक दिन हार कर वह बैठ गयी। उनके बीच में ऐसा कुछ भी नहीं था कि वे तलाक जैसी बात सोचते लेकिन पति की सोच के करण ही वह खुद भी तनाव में रहने लगी है। इसका कोई भी समाधान उसको समझ नहीं आ रहा है। बच्चे उनके हैं नहीं जिससे कि कोई डोर उसके पति को उसके पास खींच लाती। फिर वह क्या करे? कैसे बचाए अपने घर को? इस हीन भावना से कैसे मुक्ति दिलाये अपने पति को? उसका पति कभी इस वास्तविकता से समझौता कर पायेगा? ये ढेरों प्रश्न है जिनपर शिल्पी कि जिन्दगी टिकी हुई है। ये सिर्फ एक शिल्पी की समस्या नहीं है बल्कि और भी कई ऐसे परिवार हैं।
लेबल:
अहम् का टकराव और समाज,
परिवार,
हीन भावना
सोमवार, 30 मई 2011
किसी के हक पर डाका तो नहीं?
हमारे देश की स्थिति तो किसी से छुपी नहीं है। सामाजिक, आर्थिक विसंगतियों ने ही मनुष्य काजीवन दूभर कर रखा है। कहीं इतनी सुविधाएं है कि लोग़ उसका दुरूपयोग कर रहे हैं और कहीं दर्द से तड़पते हुए लोगजिनके पास इतना भी पैसा नहीं है कि वे दर्दनिवारक खरीद कर अपने दर्द से कुछ क्षणों की राहत ही पा लें। कहीं हमउनके हक को छीन तो नहीं रहे हैं। अगर छीन रहे हैं या फिर छिनते हुए देख रहे हैं तो उन्हें इसके लिए आगाह करने कादुस्साहस अवश्य कीजिये।
मेरे पड़ोसी रक्षा संस्थान के प्रतिष्ठान से रिटायर्ड हैं। उन्हें दवा और इलाज की सुविधा सरकारी तौरपर मिलती है और बिल्कुल मुफ्त। उनका ये नियम है वह पहले हफ्ते में एक बार जरूर CGHS जाकर पता नहीं क्याक्या बीमारी बता कर ढेर सारी दवाएं ले आते और उन्हें अपनी अलमारी में बास्केट में सजा कर रख लेते थे। उनकोखाना है या नहीं इससे कोई लेना देना नहीं। वर्षों तक तो ये क्रम चला। दवाओं का ज्ञान तो उनको है नहीं सो सारी दवा आपस में मिल जाती तो फिर उन्हें अलग रख देते। क्योंकि नई मिलना तो बंद होंगी नहीं। धीरे धीरे सरकारी तौर परदवायों का रिकॉर्ड रखा जाने लगा कि अगर डॉक्टर एक हफ्ते की दवा लिखता है तो वहाँ से एक हफ्ते की दवा मिलेगीऔर रिकॉर्ड में चढ़ जाएगी। दुबारा उससे पहले जायेंगे तो दवा नहीं मिलेगी । यह तो एक अंकुश लगा लेकिन उसकेबाद वह फिर जाकर ले आयेंगे। ये प्रतिष्ठान में या सरकारी चिकित्सा सुविधा लेने वाले अकेले व्यक्ति नहीं हैं बल्किबहुत सारे लोग हैं जिनकी मानसिकता क्या है? ये तो मैं नहीं जाना पायी लेकिन इतना जरूर है कि वे इस सुविधा कादुरूपयोग कर रहे हैं।
एक दिन उन्होंने एक पलंग पर दवाइयाँ फैला कर रखी और मेरे पति को बुलाया कि जरा इन दवाओं कोदेख लीजिये इनमें से कौन सी किस मर्ज की हैं और कौन सी एक्सपायर हो चुकी हैं। उनमें से बहुत सारी दवाएंएक्सपायर हो चुकी थी , जिन्हें इस तरह से फेंका भी नहीं जाता है बल्कि उनको पूरी तरह से नष्ट करना होता है। उनको ये नहीं पता है कि इस तरह से दवाएं लेकर वे कितने लोगों को इन दवाओं से वंचित कर रहे हैं। अस्पताल औरसरकारी दवाएं भी पैसे से आती हैं अगर आपको सुविधा है तो इसका अर्थ ये बिल्कुल भी नहीं है की आप उसको अपनीसंपत्ति मान कर जमा करें। अगर आप ले भी आये हैं तो फिर उसको किसी जरूरतमंद को दे दें जो इसको खरीदने मेंअसमर्थ हो। ऐसा नहीं है कि हम ऐसा नहीं कर सकते हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसी मानसिकता के होते हैं कि जो अपना पाप भी नहीं दे सकते हैं फिर भौतिक वस्तु तो बहुत बड़ी चीज होती है। अगर आप ऐसे लोगों को जानते हों तो फिरउनको समझाइए कि इस संग्रह को करने से अच्छा है कि इसका उपयोग और लोगों के लिए होने दें।
मेरे पड़ोसी रक्षा संस्थान के प्रतिष्ठान से रिटायर्ड हैं। उन्हें दवा और इलाज की सुविधा सरकारी तौरपर मिलती है और बिल्कुल मुफ्त। उनका ये नियम है वह पहले हफ्ते में एक बार जरूर CGHS जाकर पता नहीं क्याक्या बीमारी बता कर ढेर सारी दवाएं ले आते और उन्हें अपनी अलमारी में बास्केट में सजा कर रख लेते थे। उनकोखाना है या नहीं इससे कोई लेना देना नहीं। वर्षों तक तो ये क्रम चला। दवाओं का ज्ञान तो उनको है नहीं सो सारी दवा आपस में मिल जाती तो फिर उन्हें अलग रख देते। क्योंकि नई मिलना तो बंद होंगी नहीं। धीरे धीरे सरकारी तौर परदवायों का रिकॉर्ड रखा जाने लगा कि अगर डॉक्टर एक हफ्ते की दवा लिखता है तो वहाँ से एक हफ्ते की दवा मिलेगीऔर रिकॉर्ड में चढ़ जाएगी। दुबारा उससे पहले जायेंगे तो दवा नहीं मिलेगी । यह तो एक अंकुश लगा लेकिन उसकेबाद वह फिर जाकर ले आयेंगे। ये प्रतिष्ठान में या सरकारी चिकित्सा सुविधा लेने वाले अकेले व्यक्ति नहीं हैं बल्किबहुत सारे लोग हैं जिनकी मानसिकता क्या है? ये तो मैं नहीं जाना पायी लेकिन इतना जरूर है कि वे इस सुविधा कादुरूपयोग कर रहे हैं।
एक दिन उन्होंने एक पलंग पर दवाइयाँ फैला कर रखी और मेरे पति को बुलाया कि जरा इन दवाओं कोदेख लीजिये इनमें से कौन सी किस मर्ज की हैं और कौन सी एक्सपायर हो चुकी हैं। उनमें से बहुत सारी दवाएंएक्सपायर हो चुकी थी , जिन्हें इस तरह से फेंका भी नहीं जाता है बल्कि उनको पूरी तरह से नष्ट करना होता है। उनको ये नहीं पता है कि इस तरह से दवाएं लेकर वे कितने लोगों को इन दवाओं से वंचित कर रहे हैं। अस्पताल औरसरकारी दवाएं भी पैसे से आती हैं अगर आपको सुविधा है तो इसका अर्थ ये बिल्कुल भी नहीं है की आप उसको अपनीसंपत्ति मान कर जमा करें। अगर आप ले भी आये हैं तो फिर उसको किसी जरूरतमंद को दे दें जो इसको खरीदने मेंअसमर्थ हो। ऐसा नहीं है कि हम ऐसा नहीं कर सकते हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसी मानसिकता के होते हैं कि जो अपना पाप भी नहीं दे सकते हैं फिर भौतिक वस्तु तो बहुत बड़ी चीज होती है। अगर आप ऐसे लोगों को जानते हों तो फिरउनको समझाइए कि इस संग्रह को करने से अच्छा है कि इसका उपयोग और लोगों के लिए होने दें।
सोमवार, 9 मई 2011
ये कैसा मदर्स डे?
कल सबने अपनी अपनी माँ को विश किया और जिन माओं के बच्चे दूर थे उनकी आँखें छलक आई लेकिन मन को वह ख़ुशी और संतोष मिला की अन्दर तक समां गयी। उस ख़ुशी कको बयान करने के लिए हमारे पास कोई शब्द नहीं होते हैं। भले ही ये पश्चिमी संस्कृति की दें है लेकिन जिसमें कुछ अच्छा है अपनाने में कोई हर्ज तो नहीं है। न मिले माँ से उन्हें याद तो किया। जो पास थे उन्होंने तो विश किया ही और जो दूर थे उन्होंने भी माँ को विश करके अपना प्यार लुटा दिया। पर सारी माँओं को ये सौभाग्य नहीं मिल पाया ।
वह चार बेटियों और एक बेटे की ७० वर्षीय माँ हैं और आज वह घर में बिल्कुल अकेली बैठी रहीं क्योंकि बहू और बेटा जो साथ में रहता है आज सुबह सुबह अपनी ससुराल निकाल गया वहाँ एक माँ है न उसको विश करने के लिए और अपनी माँ पर पहरे लगा दिए।
उनकी चारों बेटियाँ हर बार विश करती हैं ये सबको पता है लेकिन शायद ये ख़ुशी उनके भाग्य में न थी। उन्हें आँखों से कम दिखाई देता है वह नंबर नहीं मिला पति फिर मोबाइल के दस नंबर मिलते कहीं न कहीं गलती हो जाती तो मिलता ही नहीं है। कभी घर खाली हुआ तो उन्हें अपनी देवरानी का नंबर जो बेसिक फ़ोन का ही याद है मिलाकर उनसे कह देती की आज वह घर में नहीं है बेटियों से कह दो की फ़ोन मिलाकर बात कर लें।
वह चार बेटियों और एक बेटे की ७० वर्षीय माँ हैं और आज वह घर में बिल्कुल अकेली बैठी रहीं क्योंकि बहू और बेटा जो साथ में रहता है आज सुबह सुबह अपनी ससुराल निकाल गया वहाँ एक माँ है न उसको विश करने के लिए और अपनी माँ पर पहरे लगा दिए।
उनकी चारों बेटियाँ हर बार विश करती हैं ये सबको पता है लेकिन शायद ये ख़ुशी उनके भाग्य में न थी। उन्हें आँखों से कम दिखाई देता है वह नंबर नहीं मिला पति फिर मोबाइल के दस नंबर मिलते कहीं न कहीं गलती हो जाती तो मिलता ही नहीं है। कभी घर खाली हुआ तो उन्हें अपनी देवरानी का नंबर जो बेसिक फ़ोन का ही याद है मिलाकर उनसे कह देती की आज वह घर में नहीं है बेटियों से कह दो की फ़ोन मिलाकर बात कर लें।
आज उनकी किसी भी बेटी का फ़ोन सुबह से नहीं आया और वे इन्तजार करा रही थी. उन्होंने देवरानी को मिलना चाहा तो फ़ोन लगा ही नहीं. चुपचाप मुँह ढक कर लेट गयी घर में आज तो कोई भी नहीं था कि वे किसी की आवाज भी सुन लेती. बस इधर उनकी तड़प और उधर उनकी बेटियाँ परेशान होंगी कि आखिर हो क्या गया है कि फ़ोन ही नहीं मिलता है.. माँ बेटी की तड़प का अनुमान शायद उस भगवान को भी नहीं हुआ नहीं तो ऐसे निष्ठुर लोग और निर्णय कैसे लिए जा सकते हैं? कुछ इत्तेफाक कि शाम को मैंने उनसे मिलने की सोची क्योंकि कुछ तो अंदाजा मैं लगा ही सकती हूँ न उनकी बेटी सही फिर भी कोई और आकर हिल हल्का कर देता है. मुझे ये पता नहीं था कि वे घर में अकेली हैं. मुझे देख कर तो वे फफक ही पड़ी . मैंने उनसे पूछा कि क्या आपके पास बेटियों के मोबाइल नंबर है तो उन्होंने एक छोटी सी डायरी निकाल कर दी उसमें उनके खास लोगों के नंबर लिखे थे. वैसे तो उनको जरूरत ही नहीं पड़ती थी क्योंकि बेटियाँ खुद ही मिलाकर बात कर लेती थीं. मैंने बेसिक फ़ोन देखा तो वह डिस्कनेक्ट पड़ा था उसका वायर निकाल कर अलग कर दिया गया था. बेसिक से किसी तरह से बात कर लें तो फिर कॉल बेक करके देख लेती और अब तो कालर आई डी लगवा लिया था.
मैंने उनकी बेटियों के नंबर अपने मोबाइल पर मिलाकर उनसे बात करवाई तो पता चला कि बेटियाँ सुबह से traai कर रही हैं और हार कर जब भाई के मोबाइल पर किया तो पता चला कि वे तो घर में नहीं है और कहा कि बेसिक पर मिला कर बात कर लो. उस समय उन्होंने अपनी सारी बेटियों से बात की . उन्हें जो सुकून मिला यह तो उनकी आत्मा ही जानती है लेकिन मुझे जो सुकून मिला वह मैं बयान नहीं कर सकती . मैंने ईश्वर से यही कहा कि हे ईश्वर ऐसी मजबूरी किसी माँ को न दे.
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