गुरुवार, 17 मई 2012

वसीयत !

                             उस दिन वृद्धाश्रम के अन्दर सन्नाटा छाया था , अचानक तिवारी जी का निधन हो गया और वहां के कर्ता धर्ता ने उनके बेटे को सूचना देने के लिए फ़ोन उठाया ही था की शर्मा जी ने उन्हें एक कागज़ पकड़ा दिया-' पहले इसको पढ़ लीजिये। '
'ये क्या है ?' 
'ये तिवारी जी की वसीयत है।"
                   उसको निकल कर पढ़ा गया तो सब स्तब्ध रह गए। उसमें लिखा था 'मेरे मरने पर मेरे बेटे को खबर न दी जाय। मेरे इस शरीर को मेडिकल कॉलेज में दान कर दिया जाय। मुझे यहाँ से ही मेरे साथियों के द्वारा विदा किया जाय। जिस घर में मेरे लिए कोई जगह न हो , उसके दरवाजे पर मेरे शरीर को ले जाकर अपमानित न किया जाय।' 
                       उसके नीचे तिवारी जी के हस्ताक्षर थे।

15 टिप्‍पणियां:

Anupama Tripathi ने कहा…

hriday vidarak ....!!
kis or jaa rha hai samaj ...!!

expression ने कहा…

मार्मिक कथा है......
मगर बात आम हो चली है आज कल......
:-(

सादर
अनु

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

मार्मिक .... लेकिन सच को कहती ...

वन्दना ने कहा…

बिल्कुल सही निर्णय लिया और सही वसीयत की आज ऐसी ही सोच की जरूरत है वो ही जीने को आधार प्रदान करती है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

मार्मिक प्रस्तुति!
लिंक आपका है यहीं, मगर आपको खोजना पड़ेगा!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

shikha varshney ने कहा…

सच हि तो है..पर दुखद है.

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

dil tut gaya.....

संजय भास्कर ने कहा…

....मार्मिक प्रस्तुति

anitakumar ने कहा…

समय आ गया है जब एक बार फ़िर वृद्धावस्था को आदर से देखा जाये पर ये तभी होगा जब बाजारवाद खत्म होगा। कालचक्र है, एक जमाना था जब युवा पीढ़ी न्युकिलिअर इकाई परिवार में ही रहना पसंद करती थी अब फ़िर जोइंट परिवार का चलन शुरु हो गया है चाहे युवा परिवार की मजबूरी के चलते ही। आशा कर रही हूँ कि वृद्धावस्था के दिन भी फ़िरेगें समाज में।

मनोज कुमार ने कहा…

दुखद!

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

कई बुज़ुर्गों की वसीयत है ये तो...

anju(anu) choudhary ने कहा…

मार्मिक ...बस ये ही कहूँगी ...आज के वक्त का सबसे कड़वा सच ...

lokendra singh rajput ने कहा…

सही तो वसीयत लिखवाई उन सज्जन ने... जीते jee जिस घर में जगह नहीं मिली, कदर नहीं हुई.. उस घर में मिटटी भी क्यों जाये....

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

बात एकदम सच है लेकिन क्या इस बात को नहीं दर्शा रही है कि हम अपने मूल्यों को कैसे संचित रखें ? कैसे अपने संस्कारों को हस्तांतरित करें कि जिससे इस की पुनरावृत्ति न हो.