उस दिन वृद्धाश्रम के अन्दर सन्नाटा छाया था , अचानक तिवारी जी का निधन हो गया और वहां के कर्ता धर्ता ने उनके बेटे को सूचना देने के लिए फ़ोन उठाया ही था की शर्मा जी ने उन्हें एक कागज़ पकड़ा दिया-' पहले इसको पढ़ लीजिये। '
'ये क्या है ?'
'ये तिवारी जी की वसीयत है।"
उसको निकल कर पढ़ा गया तो सब स्तब्ध रह गए। उसमें लिखा था 'मेरे मरने पर मेरे बेटे को खबर न दी जाय। मेरे इस शरीर को मेडिकल कॉलेज में दान कर दिया जाय। मुझे यहाँ से ही मेरे साथियों के द्वारा विदा किया जाय। जिस घर में मेरे लिए कोई जगह न हो , उसके दरवाजे पर मेरे शरीर को ले जाकर अपमानित न किया जाय।'
उसके नीचे तिवारी जी के हस्ताक्षर थे।



15 टिप्पणियां:
hriday vidarak ....!!
kis or jaa rha hai samaj ...!!
मार्मिक कथा है......
मगर बात आम हो चली है आज कल......
:-(
सादर
अनु
मार्मिक .... लेकिन सच को कहती ...
बिल्कुल सही निर्णय लिया और सही वसीयत की आज ऐसी ही सोच की जरूरत है वो ही जीने को आधार प्रदान करती है।
मार्मिक प्रस्तुति!
लिंक आपका है यहीं, मगर आपको खोजना पड़ेगा!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!
सच हि तो है..पर दुखद है.
dil tut gaya.....
....मार्मिक प्रस्तुति
समय आ गया है जब एक बार फ़िर वृद्धावस्था को आदर से देखा जाये पर ये तभी होगा जब बाजारवाद खत्म होगा। कालचक्र है, एक जमाना था जब युवा पीढ़ी न्युकिलिअर इकाई परिवार में ही रहना पसंद करती थी अब फ़िर जोइंट परिवार का चलन शुरु हो गया है चाहे युवा परिवार की मजबूरी के चलते ही। आशा कर रही हूँ कि वृद्धावस्था के दिन भी फ़िरेगें समाज में।
दुखद!
कई बुज़ुर्गों की वसीयत है ये तो...
मार्मिक ...बस ये ही कहूँगी ...आज के वक्त का सबसे कड़वा सच ...
सही तो वसीयत लिखवाई उन सज्जन ने... जीते jee जिस घर में जगह नहीं मिली, कदर नहीं हुई.. उस घर में मिटटी भी क्यों जाये....
बात एकदम सच है लेकिन क्या इस बात को नहीं दर्शा रही है कि हम अपने मूल्यों को कैसे संचित रखें ? कैसे अपने संस्कारों को हस्तांतरित करें कि जिससे इस की पुनरावृत्ति न हो.
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