शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

बूढा उम्र से नहीं बोझ से !

एक बड़े प्रतिष्ठान में भोज आयोजित किया गया था। प्रतिष्ठान के सभी कर्मचारी उसमें शामिल हुए थे क्योंकि वह काम के दौरान ही आयोजन रखा गया था। उस दिन सारे मालिक मेजबानी में जुटे थे। उनको यह नहीं लग रहा था की ये हमारे यहाँ वेतनभोगी है, बड़े आग्रह के साथ सबको भोजन कराया जा रहा था।

इतने में प्रतिष्ठान के मालिक के सबसे बड़े बेटे वहां आए और एक कर्मचारी - जो काफी बुजुर्ग लग रहे थे उनसे सवाल किया - "कहिये शुक्ला जी, इस समय आपकी उम्र क्या हो रही है?"

"साहब ६०-६२ की होगी।"
"अरे नहीं भाई , इतने का तो मैं ही हो रहा हूँ, आप उस समय से काम कर रहे हैं, जब मैं स्कूल जाया करता था।"
"हाँ साहब , लेकिन मैं इतने का ही हूँ।"
"अरे नहीं, शुक्ला जी, आप भूल रहे हैं आप को देखिये और मुझे देखिये, आप ज्यादा के होंगे। अब आपको रिटायर हो जाना चाहिए।"
"साहब आप ठीक कह रहे हैं, जब आप स्कूल जाते थे , तब भी मैं इन्हीं मशीनों पर काम कर रहा था। स्कूल जाने की उम्र में मैं स्कूल नहीं कारखाने में आता था। और रहा बूढा होना का सवाल तो बूढा तो इंसान बोझ और चिंताओं से होता है - उम्र से नहीं। अभी आपके पिताजी भी मुझसे अधिक जवान दिखलाई देते हैं। रिटायर होना मेरे नसीब में नहीं है। आप कर देंगे तो कहीं और जाकर काम करूंगा। अपने साथ साथ एक पेट और पालना होता है।"
" शुक्ला जी, मुझे माफ कर दीजिये, मेरा मतलब यह नहीं था। आप यही रहें और जो भी कर सकते हों करें। जब नहीं कर पायेंगे तो आपको खर्च मैं दूँगा।"
खुशी के मौके पर शुक्ला जी के इस सत्य ने मालिक को हिला दिया था.

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